DNA प्रोफाइलिंग (DNA Profiling) — जिसे DNA फिंगरप्रिंटिंग भी कहते हैं — अपराध जाँच, व्यक्ति पहचान और पितृत्व निर्धारण के लिए एक शक्तिशाली वैज्ञानिक उपकरण है। भारत में इसका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है और DNA प्रौद्योगिकी (उपयोग और अनुप्रयोग) विनियमन विधेयक, 2019 इसे विधायी ढाँचा देने का प्रयास करता है।
DNA प्रोफाइलिंग कैसे काम करती है?
- नमूना संग्रह: रक्त, लार, बाल, नाखून, त्वचा कोशिका।
- DNA निष्कर्षण: कोशिकाओं से DNA अलग करना।
- PCR (Polymerase Chain Reaction): DNA की छोटी मात्रा को लाखों गुना बढ़ाना।
- STR (Short Tandem Repeat) विश्लेषण: DNA के विशिष्ट दोहराव वाले क्रमों की पहचान।
- DNA प्रोफाइल: अद्वितीय संख्यात्मक कोड जो व्यक्ति की पहचान करता है।
DNA प्रोफाइलिंग के अनुप्रयोग
| क्षेत्र | उपयोग |
|---|---|
| अपराध जाँच | हत्या, बलात्कार, चोरी के मामलों में साक्ष्य |
| गुमशुदा व्यक्ति | लावारिस शव/गुमशुदा लोगों की पहचान |
| पितृत्व निर्धारण | कानूनी विवाद में पिता की पहचान |
| आपदा पीड़ित पहचान | सुनामी, विमान दुर्घटना पीड़ितों की पहचान |
| वन्यजीव अपराध | तस्करी के सबूत |
DNA प्रौद्योगिकी विनियमन विधेयक, 2019
इस विधेयक की मुख्य विशेषताएँ:
- राष्ट्रीय DNA डेटा बैंक और क्षेत्रीय DNA डेटा बैंक की स्थापना।
- DNA नमूना संग्रह के लिए सहमति का प्रावधान।
- DNA डेटा के दुरुपयोग पर कठोर दंड।
- DNA नियामक बोर्ड की स्थापना।
गोपनीयता और नैतिक चिंताएँ
- DNA डेटा में अत्यंत संवेदनशील जनगणना सूचना होती है।
- जाति-जातीयता, स्वास्थ्य प्रवृत्ति, वंश का खुलासा।
- डेटाबेस का बीमा कंपनियों या नियोक्ताओं द्वारा दुरुपयोग का खतरा।
UPSC के लिए प्रासंगिकता
GS III में DNA प्रोफाइलिंग विज्ञान, आपराधिक न्याय और गोपनीयता अधिकार के संगम पर है। DNA प्रौद्योगिकी विधेयक, PCR, STR और गोपनीयता बनाम सुरक्षा — ये सभी UPSC में पूछे जाते हैं।