फतेहपुर सीकरी लाल बलुआ पत्थर का वह शहर है जिसे मुगल बादशाह अकबर ने उत्तर प्रदेश में, आगरा से करीब 37 किलोमीटर पश्चिम-दक्षिण-पश्चिम में एक पथरीली पहाड़ी पर बसाया था। यह लगभग 1571 से 1585 तक उसकी राजधानी रहा। यह शहर सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के आश्रम के आसपास बसा, और अकबर मानता था कि उन्हीं की दुआ से उसे वारिस मिला। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और UNESCO, दोनों इसे मुगलों का पहला योजनाबद्ध शहर बताते हैं। UNESCO ने 1986 में इसे विश्व धरोहर स्थल के रूप में अपनी सूची में शामिल किया।
इस जगह के बारे में ज्यादातर लोगों के मन में दो सीधी-सादी कहानियाँ बैठी हैं। पहली, अकबर ने गुजरात जीतने की खुशी में बुलंद दरवाजा बनवाया। दूसरी, शहर इसलिए उजड़ गया क्योंकि वहाँ पानी खत्म हो गया। पहली कहानी मोटे तौर पर सही है, हालाँकि दरवाजे पर बाद में लगे एक शिलालेख की वजह से कुछ लेखक इसे दक्कन विजय का द्वार भी कहने लगे थे। दूसरी कहानी कोई तय तथ्य नहीं, बल्कि आज भी चल रही बहस है। और लोकप्रिय नाम “जोधा बाई का महल” तो इससे भी कमजोर जमीन पर खड़ा है। आगे हम सिर्फ वही बात करेंगे जिसका स्रोतों में आधार है, और जहाँ स्रोत अलग-अलग राय रखते हैं, वहाँ साफ-साफ बताएँगे।
फतेहपुर सीकरी क्या है और कब बना
फतेहपुर सीकरी कोई एक स्मारक नहीं, बल्कि चारदीवारी से घिरा एक महल-नगर है। इसे एक ही पहाड़ी पर एक झील के किनारे बसाया गया था, और वह झील अब ज्यादातर सूख चुकी है। ASI यहाँ और इसके आसपास 93 स्मारकों का संरक्षण करता है। सबसे पहले ये तथ्य पक्के कर लीजिए।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थान | आगरा जिला, उत्तर प्रदेश; आगरा से करीब 37 किलोमीटर पश्चिम-दक्षिण-पश्चिम |
| किसने बनवाया | अकबर, तीसरे मुगल बादशाह (शासन 1556 से 1605) |
| मुख्य निर्माण | 1571 से 1573 (UNESCO); सबसे पहले जामा मस्जिद पूरी हुई, 1571-72 में |
| राजधानी | दरबार 1572 से 1585 तक सीकरी में रहा (ASI), फिर लाहौर चला गया |
| नाम | सीकरी, जिसका नाम गुजरात अभियान के बाद बदला गया; फतेहपुर का मतलब है “जीत का शहर” |
| शैली | लाल बलुआ पत्थर, शहतीरी (trabeate) यानी खंभा-और-धरन शैली में, गुंबद बहुत कम |
| पहचान | बुलंद दरवाजा, जामा मस्जिद का दक्षिणी दरवाजा, लगभग 1575-76 में बना |
| UNESCO | 1986 में मानदंड (ii), (iii) और (iv) के तहत सूची में शामिल |
| संरक्षण | भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (आगरा मंडल), AMASR अधिनियम, 1958 के तहत |
अकबर यहाँ कितने साल रहा, इसके तीन आँकड़े चलते हैं। हर आँकड़ा अलग शुरुआती बिंदु से गिना गया है:
- UNESCO के छोटे विवरण के मुताबिक यह शहर सिर्फ करीब 10 साल राजधानी रहा।
- ASI 13 साल गिनता है, 1572 से 1585 तक, यानी जब से दरबार यहाँ आकर रहने लगा।
- आगरा जिला प्रशासन करीब 14 साल बताता है, और गिनती 1571 में शहर की नींव पड़ने से करता है।
इसलिए उत्तर में “लगभग 1571 से 1585 तक राजधानी” लिखिए। इससे आप तीनों हिसाबों से सही रहेंगे।
फतेहपुर सीकरी किसने बनवाया, और सीकरी में ही क्यों
फतेहपुर सीकरी मुगल बादशाह अकबर ने बनवाया, और सीकरी में बनवाने की वजह एक संत थे। अपने पिता हुमायूँ की मौत के बाद अकबर 1556 में गद्दी पर बैठा था। लेकिन 1560 के दशक के आखिर तक उसकी कोई भी संतान जीवित नहीं बची थी। इसी पहाड़ी पर शेख सलीम चिश्ती रहते थे। वे चिश्ती सिलसिले के सूफी थे और यहाँ एक गुफा में रहते थे।
अकबर से पहले की सीकरी
सीकरी कोई खाली पहाड़ी नहीं थी। ASI के आगरा मंडल के मुताबिक हदा महल के पास हुई खुदाई में पाँच सांस्कृतिक कालों के अवशेष मिले हैं, और इनमें सबसे पुराना काल ईसा पूर्व दूसरी सहस्राब्दी तक जाता है। यहीं जैन देवी सरस्वती की एक मूर्ति भी मिली है, जिस पर 1010 ईस्वी की तारीख है। उसके शिलालेख में इस जगह को सेकरिक्या कहा गया है।
उसके बाद बाबर आया। 1527 में खानवा में राणा सांगा को हराने के बाद उसने झील के किनारे एक बाग और एक जल महल बनवाया। अबुल फजल के विवरण के मुताबिक इस जीत की याद में उसने गाँव का नाम शुक्री रखा, यानी “शुक्राना”।
संत और वारिस
ASI की पुरानी गाइडबुक के विवरण के मुताबिक अकबर इन फकीर से मिलने गया, और संत ने उसे तीन बेटों की भविष्यवाणी सुनाई। 1569 में सीकरी में एक बेटा पैदा हुआ। संत के नाम पर उसका नाम सलीम रखा गया, और आगे चलकर वही जहाँगीर के नाम से बादशाह बना। अगले साल दूसरा शहजादा मुराद पैदा हुआ। तब अकबर ने तय किया कि यह जगह इतनी शुभ है कि इसे अपनी राजधानी बनाया जाए।
चिश्तियों से अकबर का रिश्ता पूरे रिकॉर्ड में दिखता है। इबादत खाना बनाने का हुक्म भी उसने 1575 की शुरुआत में अजमेर से लौटते हुए दिया था, और अजमेर में इसी सिलसिले के संस्थापक की दरगाह है। इस सिलसिले के विचारों और संतों के बारे में भारत में सूफी आंदोलन वाला नोट पढ़िए।
फतेहपुर सीकरी का इतिहास, एक-एक चरण में
फतेहपुर सीकरी दो दशक से भी कम समय तक राजधानी रहा। लेकिन फतेहपुर सीकरी का इतिहास उससे काफी पहले शुरू होता है, और उसके काफी बाद तक चलता है।
| चरण | समय | क्या हुआ |
|---|---|---|
| मुगलों से पहले | 16वीं सदी की शुरुआत तक | झील के किनारे बस्ती; 1010 ईस्वी की एक जैन मूर्ति इस जगह को सेकरिक्या कहती है |
| बाबर | 1527 | खानवा की जीत के बाद एक बाग और जल महल |
| अकबर की राजधानी | 1571 से 1585 | मस्जिद, महल, दफ्तर और पानी की व्यवस्था बनी; 1572 से दरबार यहीं रहा |
| राजधानी हटने के बाद | 1585 से आगे | राजधानी लाहौर गई; बाद के बादशाह आते रहे, और जहाँगीर 1619 में तीन महीने ठहरा |
| मरम्मत और संरक्षण | 19वीं सदी से आज तक | अंग्रेजी दौर से मरम्मत; ASI की देखरेख; 1986 में UNESCO सूची |
यह सिर्फ महल नहीं, एक जीता-जागता शहर था। अंग्रेज यात्री राल्फ फिच 1585 में यहाँ आया था। ASI का आगरा मंडल उसके शब्द उद्धृत करता है कि आगरा और फतेहपुर, दोनों में से हर शहर उसे “लंदन से कहीं बड़ा” लगा। ASI सीकरी के इन सालों को अकबर की कई सबसे मशहूर संस्थाओं का श्रेय भी देता है:
- इबादत खाना, यानी धार्मिक बहस का हॉल;
- सुलह-ए-कुल, यानी “सबसे मेल”, शासन के एक सिद्धांत के रूप में;
- झरोखा दर्शन, यानी महल की खिड़की पर बादशाह का रोज लोगों के सामने आना;
- दीन-ए-इलाही, जिसका शाब्दिक अर्थ है “ईश्वरीय धर्म”, और तारीख-ए-इलाही, यानी अकबर का इलाही कैलेंडर संवत।
फतेहपुर सीकरी को क्यों छोड़ा गया?
अकबर ने 1585 में फतेहपुर सीकरी छोड़ दिया और अपनी राजधानी लाहौर ले गया। उसने ऐसा क्यों किया, इस पर आज भी बहस है। दोनों व्याख्याओं के पीछे गंभीर स्रोत खड़े हैं।
पानी वाली व्याख्या
पुराना जवाब पानी है। ब्रिटानिका कहता है कि शहर में “पानी की आपूर्ति नाकाफी” होने की वजह से राजधानी हटी। ASI की पुरानी गाइडबुक ने इसके लिए “खराब पानी, सेहत के लिए बुरी जलवायु और कुछ राजनीतिक कारणों” को जिम्मेदार बताया था। ब्रिटानिका दिल्ली और 1586 का नाम भी लेता है, जबकि UNESCO और ASI दोनों 1585 में लाहौर कहते हैं। आप लाहौर और 1585 ही लिखिए।
राजनीतिक व्याख्या
नया जवाब राजनीति है। ASI के आगरा मंडल का पेज कहता है कि “राजनीतिक मजबूरियाँ” अकबर को लाहौर ले गईं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहासकार सैयद अली नदीम रिजवी अपनी किताब फतेहपुर सीकरी रिविजिटेड (Fatehpur Sikri Revisited) में तर्क देते हैं कि शहर में पानी की अच्छी व्यवस्था थी। उनके मुताबिक मुगल दस्तावेजों में इस बात के बहुत कम सबूत हैं कि यहाँ का पानी जवाब दे गया था। उनका तर्क शहर की जल-व्यवस्था पर टिका है:
- बांध वाला जलाशय: एक घाटी को बंद करके पानी से भर दिया गया था। ASI की गाइडबुक इसे खारी नदी को रोककर बनी झील बताती है।
- वर्षा जल संचयन: जामा मस्जिद और संत के मकबरे के नीचे टंकियाँ थीं। मकबरे के बरामदे के खंभे खोखले हैं, ताकि बारिश का पानी नीचे उतरकर आंगन के नीचे बनी टंकी में पहुँच सके।
- पानी ऊपर चढ़ाने की व्यवस्था: उत्तरी तरफ फारसी रहट लगे थे। ये पानी को कई चरणों में, हाथी पोल दरवाजे से होते हुए, ऊपर महलों तक पहुँचाते थे।
संतुलित निष्कर्ष
सही स्थिति इन दोनों के बीच में है। 1585 में राजधानी हटाना एक राजनीतिक फैसला था, और ASI का मौजूदा विवरण और रिजवी, दोनों इसे ऐसे ही पढ़ते हैं। हो सकता है पानी ने दबाव बढ़ाया हो, लेकिन इसे मुख्य वजह मानने के सबूत कमजोर हैं। शहर रातोंरात खाली भी नहीं हुआ, क्योंकि ASI दर्ज करता है कि जहाँगीर 1619 में यहाँ तीन महीने ठहरा था।
फतेहपुर सीकरी की इमारतें, उसी क्रम में जिसमें आप उन्हें देखते हैं
फतेहपुर सीकरी लगभग पूरी तरह स्थानीय लाल बलुआ पत्थर से बना है, और ज्यादातर मेहराबों की जगह धरनों से। ASI इस शैली को शहतीरी कहता है, यानी खंभा-और-धरन: खंभों के ऊपर पत्थर की सपाट धरनें रखी जाती हैं, जैसे मेज का ऊपरी तख्ता उसके पायों पर टिका रहता है। लेकिन यह तुलना जोड़ों पर आकर टूट जाती है। यहाँ धरनें अक्सर खंभों से बाहर निकले नक्काशीदार टोड़ों पर टिकी होती हैं, और किसी मेज को इनकी जरूरत नहीं पड़ती।
अकबर की इमारतों में चार शब्द बार-बार आते हैं:
- छज्जा: टोड़ों पर टिकी पत्थर की ढलवाँ ओलती, जो धूप और बारिश को दूर रखती है।
- झरोखा: दीवार से बाहर निकली हुई बालकनी जैसी खिड़की। कहा जाता है कि ख्वाबगाह, यानी शयनकक्ष, के एक झरोखे से अकबर हर सुबह जनता को दर्शन देता था।
- छतरी: खंभों पर टिका छोटा गुंबददार मंडप।
- जाली: पत्थर की छेददार जाली, जो हवा और रोशनी को तो आने देती है, लेकिन नजर को रोक देती है।
UNESCO इस नतीजे को देसी और फारसी शैलियों का मेल कहता है, और मुगल स्थापत्य वाला नोट इसे बड़ी कहानी के भीतर रखता है। नीचे का सफर उसी क्रम में चलता है जिसमें कोई पर्यटक इस जगह को देखता है: दीवान-ए-आम के पास वाले टिकट वाले महल परिसर से लेकर पहाड़ी की चोटी पर बनी मस्जिद तक।
दीवान-ए-आम और दीवान-ए-खास
दीवान-ए-आम, यानी आम दरबार का हॉल, एक खुला आंगन है जिसके चारों ओर खंभों वाले बरामदे हैं। UNESCO के विवरण के मुताबिक इसकी पश्चिमी तरफ बादशाह की ऊँची, जालीदार बैठक है, जो सीधे निजी महल में खुलती है।
दीवान-ए-खास, यानी खास दरबार का हॉल, अपनी मुख्य खूबी भीतर छिपाए हुए है: बीचों-बीच एक अकेला नक्काशीदार खंभा, जिसके ऊपर एक ऊँची बैठक टिकी है। ASI की गाइडबुक इसे “अकबर का स्तंभ सिंहासन” कहती है, और ASI का आगरा मंडल इसे एकल स्तंभ वाला हॉल कहता है। इसका जाना-पहचाना नाम भी पक्का नहीं है, क्योंकि UNESCO कहता है कि यह इमारत सिर्फ “लोकप्रिय रूप से” दीवान-ए-खास के नाम से जानी जाती है। एक स्थानीय परंपरा इसी को इबादत खाना मानती है, जिसे ASI की गाइडबुक असंभव बताती है।
पंच महल
पंच महल, यानी “पाँच मंजिला महल”, पाँच मंजिलों वाला एक खुला मंडप है। हर मंजिल अपने नीचे वाली मंजिल से छोटी है, और पूरी इमारत सिर्फ खंभों पर खड़ी है। ASI की गाइडबुक हर मंजिल के खंभे अलग-अलग गिनती है:
- भूतल: 84 खंभे;
- पहली मंजिल: 56;
- दूसरी मंजिल: 20;
- तीसरी मंजिल: 12;
- सबसे ऊपर की छतरी: 4।
यानी कुल 176 खंभे, और एक भी ठोस दीवार नहीं। कभी इन खाली जगहों को पत्थर की जालियाँ भरती थीं। इसी वजह से गाइडबुक इस इमारत को शाही हरम की महिलाओं से जोड़ती है। वहीं UNESCO इसकी तुलना फारसी बादगीर से करता है, यानी हवा पकड़ने वाली एक मीनार, जो ऊपर से हवा खींचकर नीचे कमरों में उतार देती है। गाइडबुक इस पुराने दावे पर शक करती है कि यह किसी बौद्ध मठ (विहार) की नकल है, और मानती है कि इसके उद्देश्य पर “राय अलग-अलग है”।
जोधा बाई का महल: एक नाम, कोई रिकॉर्ड नहीं
महल परिसर का सबसे बड़ा भवन हर जगह जोधा बाई के महल के नाम से जाना जाता है, और UNESCO भी रिहायशी परिसर की सबसे बड़ी इमारत के लिए यही नाम इस्तेमाल करता है। इसे एक नाम भर मानिए, सबूत नहीं। लोकप्रिय कहानी के मुताबिक यह अकबर की राजपूत रानी, यानी जहाँगीर की माँ, का घर था। लेकिन रिकॉर्ड में वे अपनी उपाधि मरियम-उज-जमानी से दर्ज हैं, जिसका अनुवाद ASI की गाइडबुक “युग की मरियम” करती है।
यही गाइडबुक बताती है कि “जोध बाई” एक दूसरी महिला थीं। उनका नाम जगत गोसाईं था। वे जोधपुर की राजकुमारी थीं, जिनकी शादी 1585-86 में जहाँगीर से हुई, और उन्होंने आगे चलकर बादशाह बने शाहजहाँ को जन्म दिया। रिजवी इस लोकप्रिय नाम को उद्धरण चिह्नों में रखते हैं और इस परिसर को हरमसरा कहते हैं, यानी शाही महिलाओं का निवास।
जामा मस्जिद, संत का मकबरा और बुलंद दरवाजा
आखिरी पड़ाव, यानी चोटी पर बना मस्जिद परिसर, शहर का सबसे पुराना हिस्सा है। UNESCO जामा मस्जिद, यानी सामूहिक नमाज वाली मस्जिद, को 1571-72 का बताता है, और इसे पहाड़ी की चोटी पर बनी सबसे पहली इमारत मानता है। ब्रिटानिका इसकी लंबाई करीब 165 मीटर बताता है।
इसके आंगन में शेख सलीम चिश्ती का मकबरा है। यह संगमरमर की दरगाह है, जिसमें जालियाँ हैं, और छज्जों के नीचे साँप की तरह बल खाते (सर्पिल) टोड़े लगे हैं। ASI की गाइडबुक के मुताबिक दरवाजे के ऊपर सुनहरे अक्षरों वाला एक फारसी शिलालेख संत की मौत 1572 में दर्ज करता है। UNESCO इस मकबरे को 1580-81 का बताता है, और कहता है कि जहाँगीर के दौर में 1606 में इसकी सजावट और बढ़ाई गई।
बुलंद दरवाजा, यानी “ऊँचा दरवाजा”, मस्जिद का दक्षिणी प्रवेश द्वार है, जो मस्जिद पूरी होने के बाद जोड़ा गया। UNESCO इसे 1575 का बताता है और इसे गुजरात विजय से जोड़ता है। ASI का आगरा मंडल भी यही कहता है। उलझन बीच वाले मेहराब पर लगे 1601-02 के एक शिलालेख से पैदा होती है, जो अकबर के दक्कन अभियान का जिक्र करता है। कुछ पुराने लेखकों ने इसे ही निर्माण की तारीख मान लिया। लेकिन ASI की गाइडबुक इसे दक्कन से अकबर की वापसी का रिकॉर्ड मानती है, और दरवाजे का निर्माण 1575-76 में बताती है।
इसकी ऊँचाई के भी दो आँकड़े मिलते हैं: UNESCO के मुताबिक 40 मीटर, और आगरा जिला प्रशासन के मुताबिक 54 मीटर। शायद दोनों को अलग-अलग आधार से नापा गया है। उत्तर में UNESCO का आँकड़ा लिखना ज्यादा सुरक्षित है। बीच वाला दरवाजा घोड़े की नाल वाला दरवाजा (Horseshoe Gate) कहलाता है। यह नाम उन घोड़े की नालों से पड़ा, जिन्हें बीमार जानवरों के मालिक संत के आशीर्वाद की उम्मीद में इसके किवाड़ों पर ठोक देते थे।
इबादत खाना: यह क्या था और कहाँ था
इबादत खाना, यानी “पूजा का घर”, फतेहपुर सीकरी का वह हॉल था जहाँ अकबर धार्मिक बहसें करवाता था। पहले इनमें सिर्फ मुस्लिम विद्वान बैठते थे, और बाद में कई धर्मों के विद्वान शामिल हुए। इसकी दीवारें भले न मिलें, लेकिन इसकी तारीखें पक्की हैं:
- 1575 की शुरुआत: अबुल फजल के मुताबिक अजमेर से लौटते हुए अकबर इसे बनाने का हुक्म देता है।
- 1576: इमारत पूरी हो जाती है, और गुरुवार की शामों को बहसें होती हैं, जो कभी-कभी पूरी रात चलती हैं।
- 1578: कुछ समय रुकने के बाद बहसें फिर शुरू होती हैं, और अक्टूबर 1578 से कई धर्मों के विद्वान इनमें हिस्सा लेते हैं।
- 2 सितंबर 1579: प्रमुख विद्वान महजर पर दस्तखत करते हैं। यह एक घोषणा थी, जिसने तय किया कि जहाँ इस्लामी कानून के जानकारों में मतभेद हो, वहाँ आखिरी फैसला अकबर का होगा।
- 1579: अकबर पहले जेसुइट मिशन को बुलाता है; इबादत खाना की एक बैठक की मुगल पेंटिंग में जेसुइट पादरी रूडोल्फ अक्वाविवा बोलते हुए दिखते हैं।
- लगभग 1582: बहसें बंद हो चुकी हैं।
अक्टूबर 1578 से वहाँ मौजूद लोगों की जो सूची अबुल फजल देता है, उसमें सुन्नी और शिया धर्मशास्त्रियों से लेकर जैन मुनि और ईसाई तक शामिल हैं। इसमें चार्वाक भी हैं, यानी भारत का भौतिकवादी दर्शन। रिजवी इस पूरी कवायद को ऐसे पढ़ते हैं कि इसमें तर्क (अक्ल) को विरासत में मिली सत्ता (तकलीद, यानी बिना सवाल किए पुरानी मिसाल पर चलना) से ऊपर रखा गया। मकसद यह था कि किसी धार्मिक दावे का फैसला ओहदे से नहीं, दलील से हो।
यह कहाँ था, इस पर विवाद है, और रिजवी सात या आठ सुझाई गई जगहें गिनाते हैं। इनमें तीन अहम हैं:
- दीवान-ए-खास: यह एक स्थानीय परंपरा है, जिसे ASI की गाइडबुक असंभव बताती है। वजह यह है कि बदायूँनी नई खानकाह (सूफी आश्रम) के पास एक संत की कोठरी के चारों ओर बने चार हॉलों का वर्णन करता है।
- जामा मस्जिद के पूरब में एक टीला: मस्जिद के बादशाही दरवाजे के पास अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की एक टीम को आर. सी. गौड़ के नेतृत्व में एक के ऊपर एक बने तीन चबूतरे मिले। 1984 से आम तौर पर इसी जगह को इबादत खाना माना जाता है।
- तथाकथित दफ्तर खाना (अभिलेख कार्यालय): यह रिजवी का अपना सुझाव है, क्योंकि उनका तर्क है कि खुदाई वाली जगह अबुल फजल और बदायूँनी के विवरण से मेल नहीं खाती।
“इबादत खाना कहाँ था?” इस सवाल का ईमानदार जवाब छोटा है: फतेहपुर सीकरी में, लेकिन इसकी सटीक जगह विवादित है।
फतेहपुर सीकरी आज: UNESCO दर्जा, संरक्षण और 2024 का मुकदमा
फतेहपुर सीकरी एक विश्व धरोहर स्थल है, और केंद्र द्वारा संरक्षित स्मारक भी। UNESCO ने इसे विश्व धरोहर समिति के 10वें सत्र में सूची में शामिल किया, जो 24 से 28 नवंबर 1986 तक पेरिस में हुआ था। UNESCO की सूची इसे तीन मानदंडों पर टिकाती है। आसान शब्दों में:
- मानदंड (ii): इस शहर ने आगे के मुगल नगर नियोजन पर असर डाला, और UNESCO इसके उदाहरण के तौर पर शाहजहानाबाद, यानी पुरानी दिल्ली, का नाम लेता है।
- मानदंड (iii): यह 16वीं सदी के आखिर की मुगल सभ्यता का असाधारण प्रमाण है।
- मानदंड (iv): पूरा शहर मिलकर बहुत ऊँची गुणवत्ता वाली इमारतों का एक समूह है, जो 1571 से 1585 के बीच बना।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण AMASR अधिनियम, 1958 के तहत इसकी देखरेख करता है। सूची में दर्ज क्षेत्र 60.735 हेक्टेयर है, और इसके चारों ओर 475.542 हेक्टेयर का बफर जोन है। UNESCO इन खतरों का नाम लेता है:
- खनन और विस्फोट: 10 किलोमीटर के दायरे में खनन पर रोक है, लेकिन अवैध विस्फोटों पर अब भी नजर रखनी पड़ती है।
- कस्बे का फैलाव: कस्बे का बेतरतीब फैलाव स्मारकों के आसपास के नजारे के लिए खतरा है।
- नई सुविधाएँ: पर्यटकों के लिए कोई भी नया ढांचा बनाने से पहले विरासत प्रभाव आकलन (Heritage Impact Assessment) जरूरी है।
यह स्थल ताज ट्रेपेजियम जोन के भीतर भी आता है। यह 10,400 वर्ग किलोमीटर का वह इलाका है जहाँ दिसंबर 1996 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने स्मारकों को प्रदूषण से बचाने के लिए उद्योगों में कोयले और कोक के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी।
दरगाह पर 2024 का मुकदमा
मई 2024 में आगरा के एक वकील की अगुवाई वाले कुछ ट्रस्टों ने आगरा की एक अदालत में दीवानी मुकदमा दायर किया। उनका दावा है कि सलीम चिश्ती की दरगाह और जामा मस्जिद का परिसर देवी कामाख्या के एक पुराने मंदिर की जगह पर खड़ा है। प्रतिवादियों में उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड शामिल है। दरगाह और मस्जिद का प्रबंधन करने वाली समितियाँ भी प्रतिवादी हैं। दिसंबर 2024 में भी सुनवाई जारी रही, और किसी फैसले की खबर नहीं आई। यह परिसर अब भी ASI की देखरेख में एक संरक्षित स्मारक है।
सारनाथ भी सूची में शामिल
25 जुलाई 2026 को बुसान में हुए विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र ने सारनाथ के प्राचीन बौद्ध स्थल को सूची में शामिल किया। UNESCO की गिनती के मुताबिक यह भारत का 45वाँ विश्व धरोहर स्थल है, और आगरा क्षेत्र के तीन स्थलों के बाद उत्तर प्रदेश का चौथा। ब्योरे के लिए सारनाथ के सूची में शामिल होने पर नोट पढ़िए, और बड़ी तस्वीर के लिए भारत के UNESCO विश्व धरोहर स्थल वाला राउंडअप देखिए।
परीक्षा के लिए फतेहपुर सीकरी कैसे पढ़ें
फतेहपुर सीकरी सामान्य अध्ययन के GS पेपर I में भारतीय विरासत और संस्कृति के तहत आता है। मध्यकालीन इतिहास में यह अकबर की धार्मिक नीति की पृष्ठभूमि के रूप में भी आता है। इतिहास वैकल्पिक विषय वाले उम्मीदवार मुगल स्थापत्य पढ़ते हुए इससे दोबारा मिलते हैं।
इस पर दोनों तरफ से सवाल आते हैं। प्रीलिम्स 2014 में पूछा गया था कि फतेहपुर सीकरी में इबादत खाना क्या था, और उत्तर था वह हॉल जहाँ अकबर अलग-अलग धर्मों के विद्वानों से चर्चा करता था। Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक के 1,403 प्रश्नों में से 94 कला और संस्कृति से हैं। मुख्य परीक्षा 2025 में GS पेपर I ने पूछा: “अकबर के धार्मिक समन्वयवाद के मुख्य पहलुओं का परीक्षण कीजिए।” इसका सीधा जवाब इबादत खाना देता है। इतिहास वैकल्पिक विषय और गहराई में जाता है। मुख्य परीक्षा 2024 में इतिहास वैकल्पिक के पेपर I ने उम्मीदवारों से इस कथन पर टिप्पणी करने को कहा: “इबादत खाना ने अकबर को श्रेय दिलाने के बजाय उसकी बदनामी ही बढ़ाई।” फिर मुख्य परीक्षा 2023 में इतिहास वैकल्पिक के पेपर I में पूछा गया: “मुगल स्थापत्य का चरित्र समन्वयवादी था। टिप्पणी कीजिए।”
इन तथ्यों को तब तक दोहराइए जब तक ये जुबान पर न चढ़ जाएँ:
- अकबर ने बनवाया: मुख्य निर्माण 1571 से 1573 तक, और 1585 में लाहौर जाने तक यही राजधानी रही।
- सीकरी ही क्यों: शेख सलीम चिश्ती का आश्रम, और 1569 में वहीं शहजादा सलीम का जन्म।
- नाम: फतेहपुर, यानी “जीत का शहर”, 1572-73 के गुजरात अभियान के बाद।
- बुलंद दरवाजा: जामा मस्जिद का दक्षिणी दरवाजा, लगभग 1575-76 में बना; इस पर लगा 1601-02 का शिलालेख बाद की एक घटना दर्ज करता है।
- इबादत खाना: 1575 में इसका हुक्म हुआ, और 1578 से यह कई धर्मों के लिए खुला; इसकी जगह विवादित है।
- पंच महल: 176 खंभों पर पाँच मंजिलें, और UNESCO इसकी तुलना फारसी बादगीर यानी हवा पकड़ने वाली मीनार से करता है।
- UNESCO: 1986 में मानदंड (ii) से (iv) के तहत सूची में शामिल; उस साल सूची में आए चार भारतीय स्थलों में से एक।
आम गलतफहमियाँ जोड़ियों में आती हैं:
- बुलंद दरवाजा और दक्कन: दरवाजा 1575-76 का है; उस पर लगा दक्कन वाला शिलालेख 1601-02 का है।
- इबादत खाना और दीवान-ए-खास: दीवान-ए-खास एक खंभे वाला हॉल है; इबादत खाना की पहचान अभी तक नहीं हुई है।
- इबादत खाना और दीन-ए-इलाही: बहस का हॉल कोई धर्म नहीं है, इसलिए उत्तर में इन दोनों को एक मत कीजिए।
- जोधा बाई और मरियम-उज-जमानी: महल का नाम लोगों की जुबान का चलन है; जहाँगीर की माँ रिकॉर्ड में अपनी उपाधि से दर्ज हैं।
- लाहौर और दिल्ली: राजधानी 1585 में लाहौर गई, जैसा UNESCO और ASI दोनों कहते हैं।
इसके साथी स्थलों की तुलना, जिनमें आगरा का किला भी शामिल है, कुछ ऐसे बनती है:
| फतेहपुर सीकरी | आगरा का किला | हुमायूँ का मकबरा, दिल्ली | लाल किला, दिल्ली | |
|---|---|---|---|---|
| यह क्या है | योजनाबद्ध महल-नगर | लाल बलुआ पत्थर का किला-महल | बाग वाला मकबरा | शाहजहानाबाद का महल-किला |
| समय | 1571 से 1585 | 16वीं सदी, बाद में बने महलों के साथ | 1570 में बना | शाहजहाँ का शासनकाल |
| UNESCO वर्ष | 1986 | 1983 | 1993 | 2007 |
| यह क्यों अहम है | पहला योजनाबद्ध मुगल शहर | 2.5 किलोमीटर लंबी दीवारों के भीतर बसा एक शाही शहर | उपमहाद्वीप का पहला बाग वाला मकबरा | वह बाद का शहर जिस पर UNESCO के मुताबिक फतेहपुर सीकरी का असर पड़ा |
फतेहपुर सीकरी उस छात्र को फायदा देता है जो पक्का कालक्रम भी याद रखे, और जहाँ रिकॉर्ड कमजोर पड़े वहाँ “विवादित” कहना भी जाने। इमारतों की तारीखें बिल्कुल सही याद कीजिए। फिर पानी वाली बहस और खोए हुए इबादत खाना के सहारे दिखाइए कि आप जानते हैं कि सबूत कहाँ जाकर रुकते हैं। जो उत्तर ये दोनों काम करता है, वह इतिहास जैसा पढ़ा जाता है; सिर्फ इमारतों की सूची किसी पर्यटक पुस्तिका जैसी लगती है।
सामान्य प्रश्न
फतेहपुर सीकरी किसने बनवाया और कब?
फतेहपुर सीकरी मुगल बादशाह अकबर ने बनवाया था, और UNESCO की तारीखों के मुताबिक इसका मुख्य निर्माण 1571 से 1573 के बीच हुआ। सबसे पहले जामा मस्जिद पूरी हुई, 1571-72 में, और दरबार 1572 से लेकर 1585 में लाहौर जाने तक यहीं रहा। अकबर ने यह जगह इसलिए चुनी क्योंकि सूफी संत शेख सलीम चिश्ती इसी पहाड़ी पर रहते थे, और 1569 में उसका बेटा सलीम यहीं पैदा हुआ।
इसका नाम फतेहपुर सीकरी क्यों पड़ा?
सीकरी पहाड़ी पर बसे गाँव का नाम था, और फतेहपुर का मतलब है "जीत का शहर"। अकबर ने 1572-73 में गुजरात जीतने के बाद इस जगह का नाम बदला। ASI दर्ज करता है कि पहले उसने इसे फतहाबाद कहा, और उसके बाद फतेहपुर सीकरी नाम चलन में आया।
अकबर ने बुलंद दरवाजा क्यों बनवाया?
आम विवरण, जिसे UNESCO और ASI भी मानते हैं, यह है कि बुलंद दरवाजा लगभग 1575-76 में गुजरात विजय की याद में जामा मस्जिद में जोड़ा गया। दरवाजे पर 1601-02 का एक शिलालेख अकबर के दक्कन अभियान का जिक्र करता है। इसी वजह से कुछ पुराने लेखक इसे दक्कन विजय का द्वार कहने लगे। ASI की गाइडबुक इस शिलालेख को बाद की एक घटना का रिकॉर्ड मानती है, निर्माण की तारीख नहीं।
फतेहपुर सीकरी को क्यों छोड़ा गया?
अकबर 1585 में अपनी राजधानी लाहौर ले गया, और इसकी वजह पर इतिहासकार एकमत नहीं हैं। पुरानी व्याख्या पानी की कमी की है, जिसे ब्रिटानिका दोहराता है। वहीं ASI का मौजूदा विवरण राजनीतिक मजबूरियों की बात करता है, और इतिहासकार सैयद अली नदीम रिजवी का तर्क है कि शहर में पानी की अच्छी व्यवस्था थी। सबसे संतुलित जवाब यह है कि राजधानी हटाना एक राजनीतिक फैसला था, और पानी ज्यादा से ज्यादा एक सहायक दबाव था।
इबादत खाना क्या था?
इबादत खाना, यानी पूजा का घर, वह हॉल था जिसे बनाने का हुक्म अकबर ने 1575 में फतेहपुर सीकरी में दिया। यहाँ गुरुवार की शामों को धार्मिक बहसें होती थीं। शुरुआत में सिर्फ मुस्लिम विद्वान हिस्सा लेते थे, लेकिन 1578 से कई धर्मों के विद्वान जुड़े, और बाद में जेसुइट पादरी भी आए। इसकी सटीक जगह आज भी विवादित है।
क्या पंच महल सच में पाँच मंजिला है?
हाँ। पंच महल पाँच मंजिलों वाला एक खुला मंडप है, जिसकी हर मंजिल अपने नीचे वाली मंजिल से छोटी है। ASI की गाइडबुक की गिनती के मुताबिक यह कुल 176 खंभों पर टिका है। इसके उद्देश्य पर बहस है, क्योंकि गाइडबुक इसे शाही हरम की महिलाओं से जोड़ती है, जबकि UNESCO इसकी तुलना फारसी बादगीर, यानी हवा पकड़ने वाली मीनार, से करता है।
क्या जोधा बाई का महल अकबर की पत्नी के लिए बना था?
लोकप्रिय कहानी यही है, लेकिन इस नाम को एक नाम भर मानना बेहतर है। अकबर की राजपूत रानी, यानी जहाँगीर की माँ, रिकॉर्ड में अपनी उपाधि मरियम-उज-जमानी से दर्ज हैं। ASI की पुरानी गाइडबुक कहती है कि जोध बाई नाम जगत गोसाईं का था, जो जोधपुर की राजकुमारी थीं और जिनकी शादी जहाँगीर से हुई। रिजवी जैसे इतिहासकार इसे हरमसरा, यानी शाही महिलाओं के निवास, का हिस्सा मानते हैं।
फतेहपुर सीकरी UNESCO विश्व धरोहर स्थल कब बना?
UNESCO ने फतेहपुर सीकरी को 1986 में, पेरिस में हुए विश्व धरोहर समिति के 10वें सत्र में अपनी सूची में शामिल किया। इसे मानदंड (ii) से (iv) के तहत शामिल किया गया। ये मानदंड आगे के मुगल नगर नियोजन पर इसके असर को, और 16वीं सदी के आखिर की इमारतों के एक समूह के रूप में इसकी गुणवत्ता को मान्यता देते हैं।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
1. फतेहपुर सीकरी के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. जामा मस्जिद सीकरी पहाड़ी की चोटी पर बनी सबसे पहली इमारत थी। 2. बुलंद दरवाजा जामा मस्जिद के मूल नक्शे का हिस्सा था। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a) UNESCO जामा मस्जिद को 1571-72 का और चोटी की सबसे पहली इमारत बताता है, जबकि बुलंद दरवाजा मस्जिद पूरी होने के बाद जोड़ा गया।
2. इबादत खाना के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. अकबर ने इसे बनाने का आदेश 1575 में अजमेर से लौटने पर दिया। 2. इस्लाम के अलावा दूसरे धर्मों के विद्वान इसके पहले ही साल से इसमें शामिल हुए। 3. फतेहपुर सीकरी में इसकी जगह बिना किसी विवाद के पहचानी जा चुकी है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 1 और 2
- (c) केवल 2 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a) आदेश 1575 की शुरुआत में आया और दूसरे धर्म 1578 से ही जुड़े, जबकि इस इमारत के लिए कम से कम सात या आठ जगहें सुझाई जा चुकी हैं।
3. निम्नलिखित युग्मों में से कौन-सा एक सही सुमेलित है?
- (a) पंच महल : पूरी तरह खंभों पर टिका पाँच मंजिलों वाला खुला मंडप
- (b) दीवान-ए-आम : बीच में एक अकेले खंभे वाला हॉल, जिस पर बादशाह की बैठक टिकी है
- (c) घोड़े की नाल वाला दरवाजा : पंच महल का प्रवेश द्वार
- (d) ख्वाबगाह : शहर की सामूहिक नमाज वाली मस्जिद
उत्तर: (a) पंच महल घटती हुई पाँच मंजिलों में 176 खंभों पर खड़ा है; एक खंभे वाला हॉल दीवान-ए-खास है।
4. निम्नलिखित में से कौन-से स्थल उसी वर्ष UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल किए गए, जिस वर्ष फतेहपुर सीकरी? 1. हम्पी का स्मारक समूह 2. खजुराहो स्मारक समूह 3. ताजमहल नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 2 और 3
- (c) केवल 1 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a) हम्पी और खजुराहो 1986 में फतेहपुर सीकरी के साथ शामिल किए गए, जबकि ताजमहल 1983 में शामिल हुआ।
5. बुलंद दरवाजा के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. यह फतेहपुर सीकरी की जामा मस्जिद का दक्षिणी प्रवेश द्वार है। 2. इस पर 1601-02 का एक शिलालेख अकबर के दक्कन अभियान का जिक्र करता है। 3. UNESCO इसके पूरा होने की तारीख 1585 बताता है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 2 और 3
- (c) केवल 1 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a) UNESCO दरवाजे के पूरा होने की तारीख 1575 बताता है, 1585 नहीं, और 1601-02 का शिलालेख बाद की एक घटना दर्ज करता है।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- भारतीय कला विरासत की रक्षा करना इस समय की जरूरत है। चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2018, GS पेपर I।
- फतेहपुर सीकरी को अक्सर फारसी और भारतीय निर्माण परंपराओं का संगम कहा जाता है। इसकी इमारतों का नाम लेकर इस दावे का परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- “फतेहपुर सीकरी इसलिए छोड़ा गया क्योंकि वहाँ पानी खत्म हो गया था।” उपलब्ध सबूतों की रोशनी में इस व्याख्या का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- अकबर ने अपनी राजधानी सीकरी में क्यों बनाई? चर्चा कीजिए कि यह चुनाव शुरुआती मुगल राजनीतिक संस्कृति में सूफी संतों की जगह के बारे में क्या बताता है। (10 अंक, 150 शब्द)
- इबादत खाना की बहसों ने अकबर की सुलह-ए-कुल की नीति के लिए किस हद तक जमीन तैयार की? (15 अंक, 250 शब्द)