गांधी-इरविन समझौता 5 मार्च 1931 को नई दिल्ली में महात्मा गांधी और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन (Lord Irwin) के बीच हस्ताक्षरित एक राजनीतिक समझौता था, जिसे आधिकारिक रूप से दिल्ली समझौता (Delhi Pact) भी कहा जाता है। इसी समझौते के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) अस्थायी रूप से स्थगित हुआ, राजनीतिक बंदी रिहा हुए, और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (Second Round Table Conference) में भाग लेने पर सहमति दी। यह समझौता पहला अवसर था जब ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस को बराबरी के स्तर पर एक राजनीतिक पक्षकार के रूप में मान्यता दी।
परिचय (Introduction)

गांधी-इरविन समझौता आधुनिक भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ है। मार्च 1930 में दांडी मार्च (Dandi March) से शुरू हुआ सविनय अवज्ञा आंदोलन देखते-ही-देखते देशव्यापी जनान्दोलन में बदल गया। नमक कानून तोड़ने से लेकर विदेशी कपड़ों के बहिष्कार, करों के भुगतान से इनकार और चौकीदारी कर के विरोध तक, यह आंदोलन ब्रिटिश सत्ता के लिए गहरी चुनौती बन गया।
ब्रिटिश सरकार ने एक ओर लॉर्ड इरविन के घोषणापत्र (1929) के माध्यम से डोमिनियन स्टेटस का संकेत दिया, तो दूसरी ओर प्रथम गोलमेज सम्मेलन (नवंबर 1930) में कांग्रेस की अनुपस्थिति ने स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस के बिना कोई संवैधानिक हल संभव नहीं है। इसी पृष्ठभूमि में तेज बहादुर सप्रू, एम. आर. जयकर और वी. एस. श्रीनिवास शास्त्री की मध्यस्थता से गांधीजी और इरविन के बीच 17 फरवरी 1931 से बातचीत शुरू हुई और तीन सप्ताह की संधि-वार्ता (negotiation) के बाद 5 मार्च 1931 को समझौता हुआ।
मुख्य तथ्य एक नज़र में (Quick Facts at a Glance)
- तिथि: 5 मार्च 1931
- स्थान: नई दिल्ली (वायसराय भवन)
- हस्ताक्षरकर्ता: महात्मा गांधी (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से) और लॉर्ड इरविन (Lord Irwin), तत्कालीन वायसराय (कार्यकाल 1926–1931)
- दूसरा नाम: दिल्ली समझौता (Delhi Pact)
- पृष्ठभूमि आंदोलन: सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–34), दांडी मार्च (12 मार्च 1930)
- मध्यस्थ: तेज बहादुर सप्रू, एम. आर. जयकर, वी. एस. श्रीनिवास शास्त्री
- गांधीजी की 11 माँगें: जनवरी 1930 के यंग इंडिया लेख में पहली बार रखी गई थीं
- समझौते के बाद: सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित, राजनीतिक बंदी रिहा
- कांग्रेस का अनुमोदन: कराची अधिवेशन (मार्च 1931, अध्यक्ष — सरदार वल्लभभाई पटेल)
- सुभाष चंद्र बोस की प्रतिक्रिया: भगत सिंह की फाँसी पर समझौता रद्द न होने पर तीव्र असहमति
- अगला कदम: द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (सितंबर–दिसंबर 1931), लंदन
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background)
गांधी-इरविन समझौते की जड़ें 1928–1930 के बीच घटी कई घटनाओं में हैं। साइमन कमीशन (1927) के बहिष्कार और नेहरू रिपोर्ट (1928) की अस्वीकृति के बाद लाहौर अधिवेशन (दिसंबर 1929) में कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज (Purna Swaraj) का संकल्प लिया। 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।
इसी क्रम में 31 जनवरी 1930 को गांधीजी ने यंग इंडिया में अपनी प्रसिद्ध 11 माँगें प्रकाशित कीं — नमक कर समाप्ति, सैन्य व्यय में 50% कटौती, सिविल सेवकों के वेतन में कटौती, संरक्षणात्मक शुल्क, रुपया-स्टर्लिंग विनिमय दर, राजनीतिक बंदियों की रिहाई, गुप्त पुलिस सुधार, हथियार रखने का अधिकार आदि। माँगें न मानने पर 12 मार्च 1930 को साबरमती से दांडी तक 240 मील की पदयात्रा शुरू हुई और 6 अप्रैल 1930 को नमक कानून का प्रतीकात्मक उल्लंघन हुआ।
आंदोलन की तीव्रता ने ब्रिटिश सरकार को घेर लिया। 60,000 से अधिक सत्याग्रही जेल में डाले गए। धरसाना सत्याग्रह (मई 1930) की अंतर्राष्ट्रीय कवरेज ने ब्रिटिश छवि को धक्का पहुँचाया। नवंबर 1930 में लंदन में हुए प्रथम गोलमेज सम्मेलन में कांग्रेस की अनुपस्थिति ने ब्रिटिश सरकार को बातचीत के लिए मजबूर किया।
गांधीजी की 11 माँगें (Eleven Demands of Gandhiji)

गांधीजी ने ये माँगें तीन श्रेणियों में रखी थीं:
सामान्य प्रशासनिक माँगें:
- सैन्य व्यय में 50% की कटौती
- सिविल सेवकों के वेतन में 50% की कटौती
- रुपये की विनिमय दर में संशोधन (₹1 = 1 शिलिंग 4 पेंस)
- संपूर्ण निषेध (मद्यपान पर)
- राजनीतिक बंदियों की रिहाई और दमनकारी अधिनियमों की समाप्ति
विशिष्ट बुर्जुआ माँगें:
- कपड़ा उद्योग के लिए संरक्षणात्मक शुल्क
- तटीय यातायात आरक्षण भारतीयों के लिए
- खुफिया विभाग (CID) पर सार्वजनिक नियंत्रण
किसान-वर्गीय माँगें:
- नमक कर की समाप्ति और सरकारी नमक एकाधिकार समाप्त
- भू-राजस्व में 50% की कटौती
- आत्मरक्षा हेतु आग्नेयास्त्र रखने का लाइसेंस सरल
समझौते की प्रमुख शर्तें (Key Terms of the Pact)
समझौते की शर्तें दो भागों में थीं — एक सरकार की ओर से रियायतें, दूसरी कांग्रेस की ओर से प्रतिबद्धताएँ।
सरकार की ओर से रियायतें
- राजनीतिक बंदियों की रिहाई — हिंसा के अपराधियों को छोड़कर सभी सत्याग्रहियों की तत्काल रिहाई
- जब्त संपत्ति की वापसी — आंदोलन के दौरान जब्त की गई कांग्रेस कार्यकर्ताओं की निजी संपत्तियाँ लौटाई जाएँगी (जो अभी तक तीसरे पक्ष को नहीं बेची गई)
- तटवर्ती गाँवों को नमक का अधिकार — समुद्र तट पर बसे गाँव अपने उपयोग हेतु बिना कर के नमक बना सकेंगे
- दमनकारी अध्यादेशों की वापसी — आंदोलन-काल में जारी विशेष अध्यादेश रद्द
- शांतिपूर्ण धरने का अधिकार — विदेशी शराब और कपड़े की दुकानों के सामने शांतिपूर्ण धरना मान्य
- बर्खास्त सरकारी कर्मचारियों की पुनर्बहाली की सहानुभूतिपूर्ण समीक्षा
कांग्रेस की ओर से प्रतिबद्धताएँ
- सविनय अवज्ञा आंदोलन का स्थगन (suspension) — आंदोलन को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाएगा
- विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की समाप्ति — हालाँकि स्वदेशी का स्वैच्छिक प्रचार जारी रह सकता है
- गोलमेज सम्मेलन में भागीदारी — कांग्रेस द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेगी
- पुलिस-अत्याचार की जाँच की माँग वापस — गांधीजी ने जाँच की माँग छोड़ दी, यह बाद में आलोचना का बड़ा बिंदु बना
कराची अधिवेशन और कांग्रेस का अनुमोदन (Karachi Session)
समझौते के बाद कांग्रेस का कराची अधिवेशन (29 मार्च 1931) हुआ, जिसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की। यह अधिवेशन तीन कारणों से ऐतिहासिक है:
- गांधी-इरविन समझौते का अनुमोदन — कुछ असहमति के बावजूद कांग्रेस ने समझौते को मंजूरी दी
- मौलिक अधिकार और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम का प्रस्ताव — जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत; यह स्वतंत्र भारत के संविधान में मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्वों का बीज बना
- भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी (23 मार्च 1931) की निंदा — कराची अधिवेशन से ठीक छह दिन पहले फाँसी होने से कांग्रेस के युवा वर्ग में गहरी नाराज़गी थी
सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह का प्रश्न (Bose and the Bhagat Singh Question)
सुभाष चंद्र बोस ने समझौते की कड़ी आलोचना की। उनका तर्क था कि गांधीजी को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी रुकवाने को समझौते की अनिवार्य शर्त बनाना चाहिए था। बोस ने कराची अधिवेशन में युवाओं के एक समूह के साथ काले झंडे प्रदर्शन में भाग लिया।
गांधीजी ने तीन बार वायसराय से फाँसी की सज़ा कम करने का अनुरोध किया, परंतु इरविन ने अस्वीकार कर दिया। 23 मार्च 1931 को तीनों क्रांतिकारियों को फाँसी दे दी गई, जो समझौते के मात्र 18 दिन बाद थी। यह घटना समझौते की सबसे गहरी आलोचना का बिंदु बनी और कांग्रेस के भीतर उग्रवादी (radical) और उदारवादी (moderate) धड़ों के बीच की खाई को और चौड़ा कर गई।
विंस्टन चर्चिल की प्रतिक्रिया (Churchill’s Reaction)
ब्रिटेन में रूढ़िवादी राजनीतिज्ञ विंस्टन चर्चिल (Winston Churchill) ने समझौते की कटु निंदा की। उन्होंने अपने प्रसिद्ध भाषण में कहा कि “यह देखना घृणास्पद है कि श्री गांधी, एक राजद्रोही मध्य मंदिर वकील (seditious Middle Temple lawyer), एक अर्ध-नग्न फ़कीर के रूप में, वायसराय के महल की सीढ़ियाँ चढ़ रहे हैं।” चर्चिल का यह विरोध प्रदर्शित करता है कि समझौते ने गांधीजी को विश्व-स्तरीय नेता के रूप में स्थापित कर दिया था।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन और परिणाम (Second Round Table Conference)
समझौते की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (7 सितंबर–1 दिसंबर 1931, लंदन) में कांग्रेस की भागीदारी थी, जहाँ गांधीजी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में गए।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| अवधि | 7 सितंबर — 1 दिसंबर 1931 |
| स्थान | सेंट जेम्स पैलेस, लंदन |
| ब्रिटिश PM | रामसे मैकडोनल्ड (Ramsay MacDonald) |
| कांग्रेस प्रतिनिधि | केवल गांधीजी |
| मुख्य मुद्दा | अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व, साम्प्रदायिक प्रश्न |
| परिणाम | विफलता; गांधीजी 28 दिसंबर 1931 को खाली हाथ लौटे |
| उत्तरवर्ती घटनाक्रम | जनवरी 1932 में सविनय अवज्ञा का पुनः आरंभ |
सम्मेलन की विफलता का मुख्य कारण साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व पर असहमति थी, जिसने आगे चलकर 1932 के साम्प्रदायिक पंचाट (Communal Award) और पूना समझौते (Poona Pact, सितंबर 1932) का मार्ग प्रशस्त किया। इस पर विस्तृत समझ के लिए देखें — पूना पैक्ट और दलित प्रतिनिधित्व का प्रश्न।
महत्व और प्रभाव (Significance and Impact)
गांधी-इरविन समझौते का ऐतिहासिक महत्व कई स्तरों पर देखा जा सकता है।
राजनीतिक महत्व: यह पहला अवसर था जब ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस को समतुल्य पक्षकार (equal party) के रूप में मान्यता दी। वायसराय और एक कांग्रेस नेता का बराबरी पर समझौता करना ब्रिटिश साम्राज्य के लिए मनोवैज्ञानिक हार थी।
अंतर्राष्ट्रीय महत्व: समझौते ने गांधीजी को विश्व-राजनीतिक मंच पर स्थापित किया। टाइम पत्रिका ने उन्हें 1930 का “मैन ऑफ द ईयर” चुना।
संगठनात्मक महत्व: आंदोलन की अस्थायी विश्रांति ने कांग्रेस को संगठनात्मक पुनर्गठन और भविष्य की रणनीति बनाने का अवसर दिया।
मनोवैज्ञानिक महत्व: भारतीय जनता ने पहली बार महसूस किया कि अहिंसक संघर्ष से ब्रिटिश सरकार को मेज़ पर लाया जा सकता है।
आलोचना और सीमाएँ (Criticism and Limitations)
समझौता बिना आलोचना के नहीं रहा। तीन प्रमुख आलोचनाएँ इस प्रकार हैं:
- भगत सिंह की फाँसी न रुकवा सकना — सबसे गहरी और स्थायी आलोचना
- पुलिस-अत्याचार की जाँच की माँग छोड़ना — सत्याग्रहियों पर बर्बर लाठी-चार्ज और गोली-कांड की कोई जाँच नहीं हुई
- द्वितीय गोलमेज की विफलता — ठोस संवैधानिक प्रगति न मिलना; कांग्रेस की मुख्य माँग पूर्ण स्वराज पर ब्रिटिश सरकार की कोई प्रतिबद्धता नहीं
- साम्प्रदायिक प्रश्न का अनसुलझा रहना — मुस्लिम लीग और अंबेडकर के साथ कांग्रेस की पकड़ कमज़ोर पड़ी
मार्क्सवादी इतिहासकारों — विशेषकर आर. पी. दत्त (R. P. Dutt) — ने तर्क दिया कि समझौता पूँजीपति-वर्गीय हितों के सामने झुकना था, क्योंकि व्यापारिक वर्ग को सविनय अवज्ञा से होने वाली आर्थिक क्षति बढ़ रही थी। हालाँकि, बिपन चंद्र (Bipan Chandra) जैसे नवीनतम इतिहासकार इसे “रणनीतिक विश्रांति (strategic withdrawal)” के रूप में देखते हैं — एक अहिंसक आंदोलन की चक्रीय प्रकृति का स्वाभाविक चरण।
तुलनात्मक विश्लेषण: गांधी-इरविन बनाम पूना पैक्ट (Comparative Analysis)
| आधार | गांधी-इरविन समझौता (1931) | पूना पैक्ट (1932) |
|---|---|---|
| तिथि | 5 मार्च 1931 | 24 सितंबर 1932 |
| पक्ष | गांधीजी और लॉर्ड इरविन | गांधीजी और डॉ. भीमराव अंबेडकर |
| संदर्भ | सविनय अवज्ञा आंदोलन | साम्प्रदायिक पंचाट का विरोध |
| मुख्य मुद्दा | राजनीतिक बंदी, गोलमेज सहभागिता | दलित वर्गों का पृथक निर्वाचक मंडल |
| परिणाम | द्वितीय गोलमेज में कांग्रेस सहभागिता | संयुक्त निर्वाचक मंडल + 148 आरक्षित सीटें |
संबंधित विषयों के लिए देखें — भारत में सामाजिक न्याय और आरक्षण और कांग्रेस के स्वतंत्रता-संग्राम के विभिन्न चरण।
UPSC के लिए प्रासंगिकता (UPSC Relevance)
- Prelims (तथ्यात्मक हुक): गांधी-इरविन समझौते की तिथि (5 मार्च 1931), हस्ताक्षरकर्ता, कराची अधिवेशन के अध्यक्ष (वल्लभभाई पटेल), द्वितीय गोलमेज में कांग्रेस का प्रतिनिधि (केवल गांधीजी), 11 माँगों के मुख्य बिंदु — ये सभी UPSC प्रिलिम्स में नियमित रूप से पूछे जाते हैं।
- Mains GS-I (आधुनिक भारतीय इतिहास): राष्ट्रीय आंदोलन के रणनीतिक चरण, सविनय अवज्ञा आंदोलन का मूल्यांकन, गांधीजी के नेतृत्व की समीक्षा, अहिंसक आंदोलन की चक्रीय प्रकृति।
- Mains GS-IV (नीतिशास्त्र): बातचीत, समझौता और सिद्धांतों के बीच नैतिक संतुलन का प्रश्न; भगत सिंह की फाँसी पर गांधीजी की दुविधा।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Mains Practice Questions)
- “गांधी-इरविन समझौता न जीत था, न हार — यह एक रणनीतिक विश्रांति थी।” इस कथन की समीक्षा कीजिए। (150 शब्द, 10 अंक)
- द्वितीय गोलमेज सम्मेलन की विफलता के कारणों का विश्लेषण कीजिए और बताइए कि इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा को किस प्रकार प्रभावित किया। (250 शब्द, 15 अंक)
- भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी और गांधी-इरविन समझौते के बीच का संबंध एक नैतिक दुविधा प्रस्तुत करता है। चर्चा कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)
निष्कर्ष (Conclusion)
गांधी-इरविन समझौता भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम का एक जटिल अध्याय है — न पूर्ण विजय, न पूर्ण पराजय। यह समझौता दिखाता है कि अहिंसक संघर्ष भी ब्रिटिश साम्राज्य जैसी विशाल शक्ति को बातचीत की मेज़ तक ले आ सकता है। साथ ही, यह उन सीमाओं को भी रेखांकित करता है जो किसी भी राजनीतिक समझौते में अनिवार्य रूप से रहती हैं — भगत सिंह की फाँसी न रुक पाना, साम्प्रदायिक प्रश्न का अनसुलझा रहना, और द्वितीय गोलमेज की विफलता इसके स्थायी निशान हैं।
UPSC उम्मीदवार के लिए महत्वपूर्ण है कि वह इस समझौते को एकल घटना के रूप में नहीं, बल्कि 1929 के पूर्ण स्वराज संकल्प से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक के लंबे प्रक्षेप-पथ का एक चरण मानकर देखे। गांधीजी की रणनीति का सार “struggle-truce-struggle” था — संघर्ष, विश्रांति, फिर संघर्ष — और गांधी-इरविन समझौता इसी चक्र की कड़ी थी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
गांधी-इरविन समझौता कब हुआ था?
गांधी-इरविन समझौता 5 मार्च 1931 को नई दिल्ली में हस्ताक्षरित हुआ। इसे दिल्ली समझौता (Delhi Pact) भी कहा जाता है।
गांधी-इरविन समझौते पर किन-किन के बीच हस्ताक्षर हुए?
यह समझौता महात्मा गांधी (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से) और लॉर्ड इरविन (Lord Irwin), तत्कालीन वायसराय (कार्यकाल 1926–1931), के बीच हुआ था।
गांधी-इरविन समझौते की मुख्य शर्तें क्या थीं?
मुख्य शर्तें थीं — सविनय अवज्ञा आंदोलन का स्थगन, राजनीतिक बंदियों की रिहाई, जब्त संपत्ति की वापसी, तटवर्ती गाँवों को बिना कर के नमक बनाने का अधिकार, और कांग्रेस की द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भागीदारी।
गांधीजी की 11 माँगें क्या थीं?
ये माँगें जनवरी 1930 में गांधीजी ने यंग इंडिया में प्रकाशित की थीं — सैन्य व्यय में 50% कटौती, सिविल सेवा वेतन में कटौती, नमक कर समाप्ति, संपूर्ण निषेध, राजनीतिक बंदियों की रिहाई, संरक्षणात्मक शुल्क, रुपया-स्टर्लिंग दर संशोधन, हथियार रखने का अधिकार, गुप्त पुलिस सुधार, तटीय यातायात आरक्षण और भू-राजस्व में 50% कटौती।
क्या भगत सिंह की फाँसी रोकने के लिए गांधीजी ने प्रयास किया था?
हाँ, गांधीजी ने तीन बार लॉर्ड इरविन से भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी की सज़ा कम करने का अनुरोध किया, परंतु इरविन ने अस्वीकार कर दिया। 23 मार्च 1931 को तीनों को फाँसी दे दी गई। यह समझौते की सबसे गहरी आलोचना का बिंदु बनी।
कराची अधिवेशन में गांधी-इरविन समझौते का क्या हुआ?
मार्च 1931 में हुए कराची अधिवेशन की अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की। अधिवेशन ने समझौते का अनुमोदन किया और मौलिक अधिकार और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम का प्रस्ताव (जवाहरलाल नेहरू द्वारा) पारित किया।
सुभाष चंद्र बोस ने समझौते का विरोध क्यों किया?
सुभाष चंद्र बोस का तर्क था कि गांधीजी को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी रुकवाने को समझौते की अनिवार्य शर्त बनाना चाहिए था। उन्होंने कराची अधिवेशन में काले झंडे प्रदर्शन में भाग लिया।
गांधी-इरविन समझौता क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है?
यह पहला अवसर था जब ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस को समतुल्य पक्षकार के रूप में मान्यता दी। वायसराय और एक कांग्रेस नेता का बराबरी पर समझौता करना ब्रिटिश साम्राज्य के लिए मनोवैज्ञानिक हार थी और इसने गांधीजी को विश्व-नेता के रूप में स्थापित किया।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में क्या हुआ?
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन 7 सितंबर–1 दिसंबर 1931 को लंदन में हुआ। गांधीजी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि थे। साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व पर असहमति के कारण सम्मेलन विफल रहा और गांधीजी 28 दिसंबर 1931 को खाली हाथ लौटे। जनवरी 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः शुरू हुआ।
गांधी-इरविन समझौते का दूसरा नाम क्या है?
गांधी-इरविन समझौते को दिल्ली समझौता (Delhi Pact) भी कहा जाता है, क्योंकि यह नई दिल्ली के वायसराय भवन में हस्ताक्षरित हुआ था।