जलवायु-स्मार्ट कृषि (Climate-Smart Agriculture — CSA) एक साथ तीन उद्देश्यों का पीछा करती है: उत्पादकता बढ़ाना, जलवायु प्रत्यास्थता का निर्माण करना, और GHG उत्सर्जन को कम करना। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने 2010 में इस अवधारणा को गढ़ा था, और अब यह शर्म अल-शेख कृषि पर संयुक्त कार्य (COP27) के अंतर्गत UNFCCC के कृषि एजेंडे का स्तंभ बन चुकी है। भारत के लिए — जहाँ 58% जनसंख्या कृषि पर निर्भर है, और 60% से अधिक कृषि क्षेत्र वर्षा-आधारित (rainfed) है — CSA एक विकल्प नहीं, अनिवार्यता है। यूपीएससी के लिए यह विषय GS-III (कृषि, पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन) और GS-II (खाद्य सुरक्षा) — दोनों के संगम पर है।
2024 के एक IMD विश्लेषण के अनुसार, भारत में पिछले तीन दशकों में मानसून की वर्षा का मानक विचलन (standard deviation) बढ़ा है, और “औसत मानसून” अब वास्तव में अधिक “अनिश्चित मानसून” बन गया है। ऐसे माहौल में पारंपरिक खेती जोखिमपूर्ण होती जा रही है — और CSA उसी जोखिम-प्रबंधन का संरचित ढाँचा है।
जलवायु-स्मार्ट कृषि क्या है?
परिभाषा (FAO)
CSA भू-दृश्यों — फसल भूमि, पशुधन, वन, मत्स्य — के प्रबंधन का एक एकीकृत दृष्टिकोण है, जो खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन की परस्पर जुड़ी चुनौतियों का समाधान करता है। यह कोई एकल तकनीक नहीं, बल्कि स्थान-विशिष्ट उत्तर खोजने का दृष्टिकोण है।
“ट्रिपल विन” (तीन-तरफ़ा लाभ)
CSA एक साथ तीन उद्देश्यों का पीछा करती है:
- उत्पादकता और आय में टिकाऊ वृद्धि।
- जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन और प्रत्यास्थता निर्माण।
- जहाँ संभव हो, GHG उत्सर्जन में कमी/उन्मूलन।
CSA यह नहीं माँगती कि हर अभ्यास तीनों लाभ दे — बल्कि यह व्यापारिक-समझौतों (trade-offs) को न्यूनतम और तालमेल (synergies) को अधिकतम करने का प्रयास है, अल्पकालिक तथा दीर्घकालिक — दोनों समय-सीमाओं में।
कृषि को जलवायु-स्मार्ट दृष्टिकोण की आवश्यकता क्यों है
कृषि की भेद्यता
- उच्च तापमान फसल उपज घटाता है — विशेषकर गेहूँ, चावल। ICAR के अनुसार, हर 1°C वृद्धि गेहूँ की उपज में 4-5% की कमी ला सकती है।
- मानसून परिवर्तनशीलता बढ़ रही है; सूखे और बाढ़ के दौर एकांतरित हो रहे हैं।
- कीट और रोग वितरण ध्रुवीय दिशा में स्थानांतरित हो रहे हैं।
- जल तनाव बढ़ रहा है।
- पशुधन पर ऊष्मा तनाव (heat stress)।
- समुद्र जल-स्तर वृद्धि तटीय फार्मों में लवण-अंतःक्षेपण ला रही है।
कृषि का जलवायु परिवर्तन में योगदान
- कृषि, वानिकी, भू-उपयोग: वैश्विक GHG उत्सर्जन का ~22%।
- धान के खेतों और पशुधन से मीथेन (CH4)।
- उर्वरकों से नाइट्रस ऑक्साइड (N2O)।
- कृषि के लिए वनोन्मूलन, मृदा कार्बन हानि से CO2।
- भारत का हिस्सा: कृषि से राष्ट्रीय GHG उत्सर्जन का ~14%।
विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि भारत में मीथेन उत्सर्जन का सबसे बड़ा एकल स्रोत धान की खेती है — और चूँकि मीथेन का GWP (Global Warming Potential) CO2 की तुलना में 80 गुना अधिक है, धान-केंद्रित CSA हस्तक्षेप जलवायु शमन में सबसे ऊँचा प्रतिफल देते हैं।
CSA के तत्व
CSA अभ्यासों का कोई स्थिर समूह नहीं, बल्कि एक स्थान-विशिष्ट दृष्टिकोण है। प्रमुख तत्व:
1. खेत स्तरीय प्रबंधन
- फसल, पशुधन, जलकृषि प्रबंधन — खाद्य सुरक्षा को अनुकूलन और शमन के साथ संतुलित करना।
- फसल पैटर्न में विविधीकरण (Diversification)।
- उन्नत किस्में — सूखा/बाढ़/ऊष्मा-सहिष्णु।
2. पारिस्थितिकी और भू-दृश्य प्रबंधन
- पारिस्थितिकी सेवाओं का संरक्षण — जलविभाजक, मृदा कार्बन, परागणकर्ता।
- कृषि-वानिकी (Agroforestry) — फसलों के साथ वृक्षों का एकीकरण।
- एकीकृत कीट और पोषक तत्व प्रबंधन।
3. किसानों के लिए सेवाएँ
- जलवायु सूचना सेवाएँ — मौसम पूर्वानुमान, सलाह।
- मौसम-आधारित बीमा — प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY)।
- चरम घटनाओं के लिए शीघ्र चेतावनी (Early warning)।
4. व्यापक खाद्य प्रणालियाँ
- माँग-पक्ष उपाय — आहार में परिवर्तन, खाद्य हानि में कमी।
- मूल्य शृंखला दक्षता।
- टिकाऊ खरीद (Sustainable procurement)।
CSA के प्रमुख अभ्यास
खेत पर
- संरक्षण जुताई (Conservation tillage) — शून्य/न्यूनतम जुताई।
- फसल विविधीकरण और चक्रण।
- मल्चिंग (Mulching)।
- परिशुद्धता सिंचाई — ड्रिप, स्प्रिंकलर।
- जलवायु-प्रत्यास्थ किस्में — सूखा-सहिष्णु दलहन, जलमग्नता-सहिष्णु धान (स्वर्णा सब1)।
- एकीकृत कृषि प्रणालियाँ (IFS) — फसल + पशुधन + मछली + वृक्ष।
- प्राकृतिक खेती (Natural farming) — शून्य रासायनिक इनपुट।
खेत से परे
- कार्बन खेती — मृदा कार्बन प्रच्छादन अभ्यास।
- कृषि-वानिकी।
- जलविभाजक प्रबंधन (Watershed management)।
- पवन और सौर पंपिंग (KUSUM योजना)।
भारत की नीति और कार्यक्रम
सतत कृषि पर राष्ट्रीय मिशन (NMSA)
NAPCC के अंतर्गत 8 मिशनों में से एक। प्रमुख उप-मिशन:
- वर्षा-आधारित क्षेत्र विकास (RAD)।
- खेत पर जल प्रबंधन (OFWM) — PMKSY।
- मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन (SHM)।
- जलवायु परिवर्तन अनुकूलन — ICAR में NICRA।
जलवायु प्रत्यास्थ कृषि पर राष्ट्रीय नवाचार (NICRA)
- ICAR द्वारा 2011 में आरंभ।
- संवेदनशील ज़िलों में 151 जलवायु प्रत्यास्थ गाँव।
- सूखा/बाढ़/ऊष्मा-सहिष्णु तकनीकें विकसित और प्रदर्शित करता है।
PKVY — परम्परागत कृषि विकास योजना
- जैविक खेती (Organic farming) को बढ़ावा।
- 50 एकड़ के क्लस्टर।
PM-PRANAM (2023)
- कृषि प्रबंधन के लिए वैकल्पिक पोषक तत्वों के संवर्धन की योजना।
- राज्यों को रासायनिक उर्वरक उपयोग कम करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
प्राकृतिक खेती मिशन
- राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन — 2024 में आरंभ।
- लक्ष्य: 15,000 क्लस्टरों में 1 करोड़ किसान।
- देशी गाय-आधारित खेती (भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति) को बढ़ावा।
- आंध्र प्रदेश का ZBNF (शून्य बजट प्राकृतिक खेती) इसका प्रमुख आदर्श मॉडल है।
अन्य योजनाएँ
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) — “हर खेत को पानी”।
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) — फसल बीमा।
- KUSUM — सौर पंप और कृषि-सौर।
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड — 22 करोड़ से अधिक जारी।
- eNAM — डिजिटल बाज़ार संपर्क।
- कृषि-अवसंरचना निधि — कटाई-उपरांत।
अंतर्राष्ट्रीय मंच
- अफ्रीकी कृषि का अनुकूलन (AAA) — भारत समर्थन देता है।
- FAO-नेतृत्व वाली CSA पहल।
- 4 प्रति 1000 पहल — मृदा कार्बन प्रच्छादन।
CSA हस्तक्षेपों का तुलनात्मक स्नैपशॉट
| हस्तक्षेप | उत्पादकता | अनुकूलन | शमन |
|---|---|---|---|
| शून्य जुताई | मध्यम | उच्च | उच्च |
| ड्रिप सिंचाई | उच्च | उच्च | निम्न |
| कृषि-वानिकी | मध्यम | उच्च | उच्च |
| प्राकृतिक खेती | परिवर्तनशील | उच्च | उच्च |
| सौर पंप (KUSUM) | उच्च | मध्यम | उच्च |
CSA के लिए कार्यान्वयन क्रियाएँ
साक्ष्य आधार
- कृषि क्षेत्र में जलवायु प्रभाव मूल्यांकन।
- भेद्यता, अनुकूलन विकल्प, शमन क्षमता की पहचान।
- लागत और बाधा विश्लेषण।
सक्षम नीति
- कृषि, जलवायु और खाद्य सुरक्षा नीतियों एवं योजनाओं का संरेखण।
- मंत्रालयों के बीच समन्वय।
सशक्त स्थानीय संस्थाएँ
- FPO (किसान उत्पादक संगठन) के माध्यम से किसानों को सशक्त करना।
- नीति-निर्माताओं की क्षमता निर्माण।
वित्त
- जलवायु वित्त — GCF अनुकूलन परियोजनाएँ।
- CSA स्टार्टअप्स में निजी निवेश।
- कृषि-जलवायु परियोजनाओं के लिए हरित बॉन्ड।
CSA में लैंगिक पहलू
- महिलाएँ भारत के खेत श्रम का 60-80% हैं, परंतु 14% से कम भूमि की मालिक हैं।
- CSA को मुख्यधारा में लाना होगा:
- लैंगिक-संवेदनशील विस्तार।
- जलवायु-प्रत्यास्थ अभ्यासों में महिलाओं का प्रशिक्षण।
- महिला किसानों के लिए ऋण पहुँच।
- महिला-नेतृत्व वाले FPOs।
चुनौतियाँ
- लघु एवं सीमांत किसान (86% भूधारक) संक्रमण लागत वहन करते हैं।
- विस्तार अंतर — कृषि-विश्वविद्यालय और KVK संसाधन-कमज़ोर हैं।
- बाज़ार प्रोत्साहन — CSA उत्पाद अक्सर विभेदित नहीं।
- सब्सिडी विकृतियाँ — उर्वरक सब्सिडी प्राकृतिक इनपुट को हतोत्साहित करती है।
- डेटा अंतराल — मृदा कार्बन, जल उपयोग, उत्सर्जन की निगरानी।
- जलवायु-प्रत्यास्थ बीज — सीमित किस्म उपलब्धता।
नवीनतम विकास (2024-26)
अद्यतन संदर्भ: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय (MoA&FW) तथा ICAR की वार्षिक रिपोर्टों से पुष्टि करें।
- राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (2024) — पूर्ण परिचालन।
- बजट 2024-25 — दलहन और तिलहन मिशन; जलवायु-प्रत्यास्थ फसल संवर्धन।
- COP28 दुबई — जलवायु परिवर्तन के लिए कृषि पहल; 150+ देशों ने समर्थन किया।
- शर्म अल-शेख कृषि पर संयुक्त कार्य — COP27 निर्णय जो CSA को परिचालन बनाता है।
- कोरोनिविया कृषि पर संयुक्त कार्य — पूर्ववर्ती, अब शर्म अल-शेख ट्रैक में अवशोषित।
- भारत का हरित ऋण कार्यक्रम (2023) — टिकाऊ कृषि शामिल।
- PM-KISAN डिजिटल आईडी एकीकरण।
यूपीएससी प्रासंगिकता
GS-III मैपिंग
- कृषि, पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन।
- खाद्य सुरक्षा।
प्रीलिम्स बिंदु
- NMSA — NAPCC के 8 मिशनों में से एक।
- NICRA — 2011 से, ICAR।
- PKVY — जैविक खेती योजना।
- PM-PRANAM — रासायनिक उर्वरक उपयोग में कमी।
- 4 प्रति 1000 पहल — मृदा कार्बन।
- ZBNF — शून्य बजट प्राकृतिक खेती (आंध्र मॉडल)।
- KUSUM — सौर पंप।
- स्वर्णा सब1 — जलमग्नता-सहिष्णु धान किस्म।
मेन्स अभ्यास प्रश्न
- “जलवायु-स्मार्ट कृषि ट्रिपल विन प्रदान करती है, परंतु भारत में कार्यान्वयन छोटे किसानों की वास्तविकताओं से सीमित है। आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।” (15 अंक)
- “भारत की जलवायु-प्रत्यास्थ कृषि रणनीति में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन की भूमिका पर चर्चा कीजिए।” (10 अंक)
- “कृषि में जलवायु अनुकूलन के लिए भारत के नीतिगत पारितंत्र का मूल्यांकन कीजिए।” (15 अंक)
निबंध संकेत
- भविष्य की खेती — खाद्य सुरक्षा के रूप में जलवायु प्रत्यास्थता।
- लैंगिक और जलवायु — महिला किसान CSA एजेंट के रूप में।
- जलवायु समाधान के रूप में मृदा कार्बन।
त्वरित पुनरावलोकन
| उद्देश्य | CSA अभ्यास |
|---|---|
| उत्पादकता | उन्नत किस्में, परिशुद्धता इनपुट |
| अनुकूलन | जलवायु सूचना, बीमा, विविधीकरण |
| शमन | शून्य जुताई, कृषि-वानिकी, प्राकृतिक खेती |
यूपीएससी के लिए निष्कर्ष: जलवायु-स्मार्ट कृषि कोई “सिल्वर बुलेट” नहीं, बल्कि भारत के कृषि भविष्य को जलवायु और खाद्य-सुरक्षा अनिवार्यताओं के साथ संरेखित करने का एक ढाँचा है। NMSA, NICRA, PM-PRANAM, और प्राकृतिक खेती मिशन नीतिगत संरचना प्रदान करते हैं — परंतु इसे लघु किसान कार्रवाई में बदलना अधूरा कार्य है।
सामान्य प्रश्न
जलवायु-स्मार्ट कृषि (CSA) किसने गढ़ी थी?
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने 2010 में ‘जलवायु-स्मार्ट कृषि’ की अवधारणा गढ़ी थी, जो अब UNFCCC के कृषि एजेंडे का स्तंभ है।
CSA की ‘ट्रिपल विन’ क्या है?
तीन एक साथ लक्ष्य: (1) उत्पादकता एवं आय में टिकाऊ वृद्धि; (2) जलवायु प्रत्यास्थता एवं अनुकूलन; (3) GHG उत्सर्जन में कमी जहाँ संभव हो।
भारत में NICRA कब आरंभ हुआ?
राष्ट्रीय जलवायु प्रत्यास्थ कृषि नवाचार (NICRA) 2011 में ICAR द्वारा आरंभ किया गया, और इसमें संवेदनशील ज़िलों के 151 जलवायु प्रत्यास्थ गाँव शामिल हैं।
PM-PRANAM योजना क्या है?
PM-PRANAM (Promotion of Alternate Nutrients for Agriculture Management) 2023 में आरंभ हुई। यह राज्यों को रासायनिक उर्वरक उपयोग कम करने और प्राकृतिक/जैविक विकल्पों को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित करती है।
NAPCC के अंतर्गत कितने मिशन हैं?
राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के अंतर्गत 8 मिशन हैं, जिनमें से एक सतत कृषि पर राष्ट्रीय मिशन (NMSA) है।
ZBNF क्या है?
शून्य बजट प्राकृतिक खेती (Zero Budget Natural Farming) सुभाष पालेकर द्वारा प्रवर्तित विधि है जो शून्य रासायनिक इनपुट और देशी गाय आधारित बीजामृत/जीवामृत पर आधारित है। आंध्र प्रदेश इसका प्रमुख राज्य है।
स्वर्णा सब1 क्या है?
स्वर्णा सब1 IRRI और भारत द्वारा विकसित जलमग्नता-सहिष्णु धान की किस्म है, जो 14 दिनों तक पानी में डूबे रहने पर भी जीवित रह सकती है — यह बाढ़-प्रवण ओडिशा, बिहार, यूपी के लिए वरदान है।
भारत के GHG उत्सर्जन में कृषि का हिस्सा कितना है?
कृषि भारत के राष्ट्रीय GHG उत्सर्जन का लगभग 14% है — मुख्यतः धान खेती से मीथेन, उर्वरकों से नाइट्रस ऑक्साइड, और पशुधन पाचन से उत्सर्जन के माध्यम से।
‘4 प्रति 1000’ पहल क्या है?
‘4 per 1000’ पहल COP21 (पेरिस, 2015) में फ्रांस द्वारा प्रवर्तित अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम है, जो दावा करता है कि वैश्विक मृदा कार्बन भंडार में प्रति वर्ष 0.4% की वृद्धि वार्षिक मानवीय CO2 उत्सर्जन की भरपाई कर सकती है।