कंदुकुरी वीरेशलिंगम (1848 से 1919) आज के आंध्र प्रदेश के राजमुंदरी के समाज सुधारक और लेखक थे। उन्होंने 11 दिसंबर 1881 को तेलुगु इलाके का पहला विधवा पुनर्विवाह करवाया। लोग उन्हें आम तौर पर वीरेशलिंगम पंतुलु कहते थे। उन्होंने लड़कियों के स्कूल खोले, सुधारवादी पत्रिकाएं चलाईं और वह किताब लिखी जिसे आम तौर पर पहला तेलुगु उपन्यास माना जाता है। इसीलिए उन्हें तेलुगु पुनर्जागरण के जनक और आधुनिक तेलुगु गद्य के जनक के रूप में याद किया जाता है।
बहुत से पाठक उन्हें “दक्षिण का विद्यासागर” कहकर बात खत्म कर देते हैं। यह तुलना एक हद तक ठीक है, लेकिन इससे वह फर्क छिप जाता है जो असल में मायने रखता है। विद्यासागर की बड़ी जीत एक कानून थी, यानी 1856 का अधिनियम। वीरेशलिंगम ने एक पीढ़ी बाद काम किया, जब कानून पहले से मौजूद था। उनका काम कहीं ज्यादा मुश्किल था: परिवारों को उस कानून का सच में इस्तेमाल करने के लिए तैयार करना। यह नोट राजमुंदरी में उनके इसी काम को देखता है और दिखाता है कि उनका लेखन और उनका सुधार एक ही परियोजना के दो हिस्से थे।
कंदुकुरी वीरेशलिंगम एक नजर में
तालिका में मुख्य तथ्य दिए गए हैं। एक तारीख, यानी उनकी पत्रिका की स्थापना का साल, अलग-अलग स्रोतों में अलग बताया गया है। इसलिए दोनों रूप दिखाए गए हैं।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| जन्म | 16 अप्रैल 1848, राजमुंदरी, मद्रास प्रेसिडेंसी |
| निधन | 27 मई 1919 |
| कार्यक्षेत्र | गोदावरी के किनारे बसा राजमुंदरी |
| पहला बालिका स्कूल | धवलेश्वरम, राजमुंदरी के पास, 1874 |
| पत्रिका | विवेकवर्धिनी, हैदराबाद विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार 1874 में शुरू; दूसरे विवरणों में 1876 |
| महिलाओं की पत्रिका | सतीहितबोधिनी, 1883 |
| पहला विधवा पुनर्विवाह | 11 दिसंबर 1881, राजमुंदरी |
| उपन्यास | राजशेखर चरित्रमु, 1878 से किस्तों में छपा, 1880 में किताब के रूप में प्रकाशित |
| स्मृति | भारतीय डाक का टिकट, 1974 |
शुरुआती जीवन और एक सुधारक का बनना
वीरेशलिंगम का जन्म 16 अप्रैल 1848 को राजमुंदरी के एक कट्टर तेलुगु ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता सुब्बारायुडु की मौत तब हो गई जब बालक चार साल का था। फिर एक चाचा ने उन्हें पाला। मां और चाचा के सहारे उन्होंने 1869 में मैट्रिक पूरी की और कोरंगी गांव में स्कूल शिक्षक के रूप में काम शुरू किया।
दो असर उन पर साफ दिखते हैं। पहला था बंगाल और बंबई का सुधारवादी चिंतन, खास तौर पर ब्रह्म समाज और केशव चंद्र सेन। दूसरा असर स्थानीय था: वे राजमुंदरी के जिला मुंसिफ आत्मूरि लक्ष्मीनरसिंहम का बहुत सम्मान करते थे, जो जाति के खुले आलोचक थे। तीस की उम्र के करीब पहुंचते-पहुंचते उन्होंने पढ़ाने, पत्रकारिता और लेखन को एक ही अभियान में बदल दिया था।
महिला शिक्षा: उनके सुधार की नींव
उनका सुधार कक्षा से शुरू हुआ। उनका मानना था कि जिस लड़की को स्कूल से दूर रखा जाता है, उसकी शादी जल्दी हो जाएगी, वह कम उम्र में विधवा हो जाएगी और उसके पास अपना पेट पालने का कोई रास्ता नहीं होगा। 1874 में उन्होंने राजमुंदरी के पास धवलेश्वरम में बालिका स्कूल खोला। आंध्र के सुधार आंदोलन पर हैदराबाद विश्वविद्यालय का एक अध्ययन एक ऐसी बात दर्ज करता है जो इस स्कूल को अलग बनाती है। विजयनगरम का बालिका स्कूल सिर्फ ब्राह्मण और क्षत्रिय लड़कियों को दाखिला देता था, लेकिन उनके स्कूल में दाखिले पर जाति की कोई रोक नहीं थी।
इसके बाद स्कूल और संस्थाएं बनती गईं:
- 1884 में राजमुंदरी के इन्निसपेटा में लड़कियों का दूसरा स्कूल;
- 1905 तक राजमुंदरी में उनके विधवा आश्रम से जुड़ा लड़कियों का एक लोअर सेकेंडरी स्कूल;
- 1883 में सतीहितबोधिनी, जिसे वही अध्ययन आंध्र की पहली महिला पत्रिका बताता है।
उन्होंने अपनी पत्नी राज्यलक्ष्मी को भी पढ़ाने की मेहनत की। यह उस दौर की बात है जब बहुत से सुधारक घर के बाहर महिला शिक्षा का उपदेश देते थे, लेकिन घर के भीतर उसे छोड़ देते थे।
1881 का विधवा पुनर्विवाह: जब सुधार का सामना विरोध से हुआ
आंध्र का पहला विधवा पुनर्विवाह 11 दिसंबर 1881 को राजमुंदरी में हुआ, और यह बरसों की तैयारी का नतीजा था। कानूनी जमीन पहले से तैयार थी: हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 ने ऐसी शादियों को वैध बना दिया था। कमी थी तो समाज की मंजूरी की।
1856 का अधिनियम काफी क्यों नहीं था
अधिनियम ने कानूनी रोक तो हटा दी, लेकिन तीन चीजें विधवाओं को उसका इस्तेमाल करने से रोकती रहीं। साइट का अधिनियम वाला नोट इन्हें ऐसे गिनाता है:
- अधिनियम की धारा 2 के तहत दोबारा शादी करने वाली विधवा का अपने दिवंगत पति की संपत्ति पर हर हक खत्म हो जाता था। इसलिए जिस विधवा को कुछ विरासत मिलनी थी, उसके पास दोबारा शादी न करने की मजबूत वजह थी।
- जाति पंचायतें पुनर्विवाह कराने वाले परिवारों को बिरादरी से बाहर करती रहीं, और कानून इससे कोई बचाव नहीं देता था।
- दूल्हे मिलते ही नहीं थे, क्योंकि परिवारों को डर था कि बेटा किसी विधवा से शादी करेगा तो उनकी अपनी बेटियों के रिश्ते बिगड़ जाएंगे।
नतीजा यह हुआ कि 1900 तक पूरे ब्रिटिश भारत में इस अधिनियम के तहत लगभग 150 पुनर्विवाह ही हुए। वीरेशलिंगम का अभियान दूसरी और तीसरी समस्या पर था, यानी वे समस्याएं जिन्हें कोई कानून ठीक नहीं कर सकता था।
शादी से पहले का अभियान
वीरेशलिंगम ने वही तरीका अपनाया जो ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने बंगाल में अपनाया था। उन्होंने धर्मशास्त्रों से तर्क दिया कि शास्त्र विधवा को दोबारा शादी की इजाजत देते हैं, और यह बात रखने के लिए सार्वजनिक भाषण दिए। 1879 में उन्होंने एक विधवा विवाह संघ बनाया। उन्होंने अपने छात्रों को तेलुगु जिलों में भेजा, ताकि वे ऐसे नौजवान ढूंढ़ें जो विधवाओं से शादी करने को तैयार हों। विरोधियों ने सभाओं, जवाबी भाषणों और कभी-कभी शारीरिक धमकियों से जवाब दिया।
शादी और उसके बाद
हैदराबाद विश्वविद्यालय का अध्ययन दर्ज करता है कि पहली शादियों से पहले की रात राजमुंदरी में उनके लगभग 500 छात्रों ने रात भर पहरा दिया, क्योंकि हमले का डर था। उसी साल दूसरा विधवा पुनर्विवाह भी हुआ। इन शादियों से राजमुंदरी के कट्टरपंथी तबकों में तूफान खड़ा हो गया।
1856 के अधिनियम को एक ऐसे दरवाजे की तरह समझिए जिसका ताला 25 साल से खुला पड़ा था। वीरेशलिंगम का काम लोगों को उस दरवाजे से गुजरवाना था, जबकि पड़ोसी देख रहे थे। कानूनी सुधार और सामाजिक सुधार में यही फर्क है, और उन पर लिखे किसी भी उत्तर को यही बात कहनी चाहिए। उनके जीवन के विवरण बताते हैं कि अगले दशकों में उन्होंने ऐसी लगभग चालीस शादियां करवाईं।
बाल विवाह, दहेज और अंधविश्वास के खिलाफ
विधवा पुनर्विवाह वह लड़ाई थी जो सबको दिखती थी। लेकिन उनके सुधार संघ ने उस प्रथा पर भी हमला किया जिससे बाल विधवाएं पैदा होती थीं। राजमुंदरी सामाजिक सुधार संघ ने शिशु विवाह के खिलाफ अभियान चलाया और अपने सदस्यों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र तय की: लड़कियों के लिए 14 और लड़कों के लिए 18। यह नियम देखने में मामूली लगता है। लेकिन जिस इलाके में शिशु विवाह आम था, वहां इसने समस्या की जड़ पर चोट की।
उनके दूसरे निशाने भी साफ तय थे:
- दहेज और शादियों का भारी खर्च;
- शकुन, मुहूर्त, हस्तरेखा और ज्योतिष में अंधविश्वास, जिस पर उन्होंने पर्चों और प्रहसनों के जरिए हमला किया;
- सरकारी अफसरों का भ्रष्टाचार, जिसका पर्दाफाश विवेकवर्धिनी ने किया।
उन्होंने ऐसी संस्थाएं भी बनाईं जो उनके बाद भी चलती रहें। उन्होंने राजमुंदरी में विधवाओं के लिए एक आश्रम खोला। जीवन के आखिरी दौर में उन्होंने हितकारिणी समाज बनाया। यह एक धर्मार्थ संस्था थी, जिसे उन्होंने अपनी संपत्ति सौंप दी ताकि उनके स्कूलों और कल्याण के कामों का खर्च चलता रहे।
साहित्य एक हथियार: तेलुगु गद्य के जनक
वीरेशलिंगम लोगों को कायल करने के लिए लिखते थे, और इसी कोशिश में उन्होंने तेलुगु लेखन का रूप ही बदल दिया। उनसे पहले गंभीर तेलुगु साहित्य ज्यादातर शास्त्रीय भाषा में पद्य के रूप में था। उन्होंने सरल शैली में गद्य लिखा, जिसे आम पाठक समझ सकें। जो भी विधा उनके हाथ लगी, उन्होंने उसका इस्तेमाल किया।
पहला तेलुगु उपन्यास
राजशेखर चरित्रमु 1878 से किस्तों में छपा और 1880 में किताब के रूप में प्रकाशित हुआ। इसे आम तौर पर तेलुगु का पहला उपन्यास माना जाता है। यह आकलन साहित्य अकादमी की किताब ए हिस्ट्री ऑफ इंडियन लिटरेचर 1800-1910 में शिशिर कुमार दास ने दर्ज किया है। कहानी की प्रेरणा ओलिवर गोल्डस्मिथ की द विकार ऑफ वेकफील्ड से मिली थी। लेकिन यह पूरी तरह तेलुगु समाज में रची गई है और उन अंधविश्वासों और कर्मकांडों पर हमला करती है जो किसी घर को खोखला कर देते थे। यह उपन्यास कहानी के रूप में लिखा गया सुधार का पर्चा है, और वे इसे ठीक यही बनाना चाहते थे।
बाकी “पहली” उपलब्धियां
उनके बाकी लेखन ने तेलुगु को कई नई विधाएं दीं:
- उनकी आत्मकथा स्वीय चरित्रमु, जिसे तेलुगु की पहली आत्मकथा बताया जाता है;
- प्रहसन, जिनमें धार्मिक पाखंड और अंधविश्वास का मजाक उड़ाया गया;
- आम पाठकों के लिए नाटक, निबंध और विज्ञान और इतिहास पर किताबें;
- विवेकवर्धिनी और सतीहितबोधिनी के जरिए पत्रकारिता।
उनके प्रशंसकों ने उन्हें गद्य तिक्कना यानी “गद्य का तिक्कना” की उपाधि दी। तिक्कना तेरहवीं सदी के वे कवि थे जिन्होंने महाभारत को तेलुगु पद्य में ढालने में मदद की थी। यह उपाधि एक श्रद्धांजलि है, कोई आधिकारिक पदवी नहीं। जो अभ्यर्थी तेलुगु साहित्य वैकल्पिक विषय ले रहे हैं, वे साहित्य परंपरा में उनकी जगह साइट की तेलुगु साहित्य वैकल्पिक विषय गाइड में देख सकते हैं।
वीरेशलिंगम को लेकर इतिहासकार किन बातों पर बंटे हैं
दो सवाल उठते हैं, और दोनों का सधा हुआ जवाब नंबर दिलाता है।
पहला सवाल यह है कि शुरुआत किसने की। एन. पुतली कृष्णमूर्ति ने आंध्र की महिलाओं पर 1980 के एक अध्ययन में तर्क दिया कि वीरेशलिंगम को शायद मुद्दु नरसिंहम नायडु से प्रेरणा मिली थी। नायडु एक पुराने तेलुगु लेखक थे, जिन्होंने विधवा पुनर्विवाह और तर्कसंगत सोच के पक्ष में लिखा था। यानी वीरेशलिंगम वह व्यक्ति थे जिन्होंने आंदोलन खड़ा किया और शादियां करवाईं। वे आंध्र में इसके पक्ष में तर्क देने वाले पहले व्यक्ति नहीं थे।
दूसरा सवाल पहुंच का है। हैदराबाद विश्वविद्यालय का अध्ययन बताता है कि आंदोलन काफी हद तक उन पर निजी तौर पर टिका था। जब वे 1897 से 1904 तक मद्रास में रहे, तब आंदोलन ढीला पड़ गया। 1910 के बाद, जब वे हितकारिणी समाज को खड़ा करने में लग गए, तब फिर ऐसा ही हुआ। नेताओं की कोई मजबूत दूसरी पंक्ति नहीं थी। यह एक असली सीमा है। इसका जिक्र करने से उत्तर कमजोर नहीं, बल्कि ज्यादा भरोसेमंद बनता है।
तारीखों पर भी ध्यान देना पड़ता है। विवेकवर्धिनी का साल हैदराबाद विश्वविद्यालय के अध्ययन में 1874 है और कई लोकप्रिय विवरणों में 1876। शक हो तो “1870 का दशक” लिखिए और जोर इस पर दीजिए कि पत्रिका ने क्या किया।
वीरेशलिंगम आज
2024 से 2026 के बीच वीरेशलिंगम से जुड़ा कोई बड़ा आधिकारिक घटनाक्रम नहीं हुआ जिसकी यह नोट पुष्टि कर सके। उनकी विरासत लोगों की यादों में दूसरे तरीकों से बसी है। भारतीय डाक ने 1974 में स्मारक डाक टिकट जारी किया। राजमुंदरी का टाउन हॉल उनके नाम पर है। सुधार परंपरा में उनकी जगह साइट के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों और प्रार्थना समाज वाले नोट्स में दर्ज है। प्रार्थना समाज वाला नोट बताता है कि वे बंबई के सुधारकों का काम तेलुगु इलाके तक ले गए।
परीक्षा के लिए कंदुकुरी वीरेशलिंगम कैसे पढ़ें
वीरेशलिंगम GS पेपर I में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों और महिलाओं के सवाल के तहत आते हैं। कला और संस्कृति में वे आधुनिक भारतीय साहित्य के जरिए आते हैं। मुख्य परीक्षा ने यह विषय सीधे पूछा है, जैसे मुख्य परीक्षा 2017, GS पेपर I में: “आधुनिक भारत में महिलाओं के प्रश्न 19वीं शताब्दी के सामाजिक सुधार आंदोलन के एक हिस्से के रूप में उठे। उस काल में महिलाओं से जुड़े प्रमुख मुद्दे और बहसें क्या थीं?” उस उत्तर में आप जिन क्षेत्रीय उदाहरणों का इस्तेमाल कर सकते हैं, उनमें वे सबसे मजबूत उदाहरणों में से एक हैं।
एक काम का उत्तर ढांचा तीन कदमों में चलता है। पहले मुद्दा बताइए (वैधव्य, बाल विवाह, शिक्षा)। फिर तरीका दिखाइए (शास्त्रीय तर्क, संघ, सार्वजनिक समारोह)। फिर सीमा बताइए (एक नेता पर निर्भरता, धीमी स्वीकृति)। वीरेशलिंगम हर कदम के लिए तारीख वाला उदाहरण देते हैं, जो ज्यादातर पाठ्यपुस्तकों के पैराग्राफ से ज्यादा है। तुलना के लिए उन्हें विद्यासागर के साथ रखिए, तो उत्तर एक ही सुधार के कानूनी और सामाजिक दोनों पहलू कवर कर लेता है। साइट के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक के 1,403 प्रश्नों में से 184 इतिहास के हैं, और सुधारक को इलाके से मिलाने वाले प्रश्न बार-बार आते हैं।
दोहराने के लिए पक्के तथ्य:
- जन्म 16 अप्रैल 1848, राजमुंदरी में; निधन 1919।
- धवलेश्वरम में बालिका स्कूल, 1874, सभी जातियों की लड़कियों के लिए खुला।
- विवेकवर्धिनी (1870 का दशक) और सतीहितबोधिनी (1883), आंध्र की पहली महिला पत्रिका।
- विधवा विवाह संघ, 1879; पहला विधवा पुनर्विवाह, 11 दिसंबर 1881, राजमुंदरी।
- राजमुंदरी सामाजिक सुधार संघ: शादी की न्यूनतम उम्र लड़कियों के लिए 14, लड़कों के लिए 18।
- राजशेखर चरित्रमु (किताब 1880), पहला तेलुगु उपन्यास; स्वीय चरित्रमु, पहली तेलुगु आत्मकथा।
- हितकारिणी समाज, उनकी धर्मार्थ संस्था, जिसे उन्होंने अपनी संपत्ति सौंपी।
सबसे आम गड़बड़ी इलाके और सुधारक को मिलाने में होती है। इन जोड़ियों को अलग रखिए:
| सुधारक | इलाका | पहचान वाला सुधार | मुख्य तारीख |
|---|---|---|---|
| ईश्वर चंद्र विद्यासागर | बंगाल | विधवा पुनर्विवाह अधिनियम के लिए अभियान | 1856 |
| कंदुकुरी वीरेशलिंगम | आंध्र | तेलुगु इलाके का पहला विधवा पुनर्विवाह | 1881 |
| महादेव गोविंद रानडे | महाराष्ट्र | इंडियन नेशनल सोशल कॉन्फ्रेंस | 1887 |
| सावित्रीबाई फुले | महाराष्ट्र | भिडे वाडा, पुणे में बालिका स्कूल | 1848 |
उम्र वाली बात पर दोबारा नजर डालना फायदेमंद है। उनके संघ ने जो न्यूनतम उम्र अपनाई, यानी लड़कियों के लिए 14 और लड़कों के लिए 18, वही उम्र 1872 के नेटिव मैरिज एक्ट ने सिविल शादियों के लिए तय की थी। इससे पता चलता है कि 1929 के शारदा अधिनियम से काफी पहले ही अलग-अलग इलाकों के सुधारक एक साझा मानक की ओर बढ़ रहे थे।
दूसरी गड़बड़ी कानूनी है। वीरेशलिंगम ने कोई कानून पास नहीं करवाया; उन्होंने पहले से मौजूद कानून को जमीन पर चलवाया। अगर कोई विकल्प 1856 के अधिनियम का श्रेय उन्हें देता है, तो वह गलत है।
आपकी तैयारी के लिए वीरेशलिंगम वह उदाहरण हैं जो उन्नीसवीं सदी के सुधार पर एक आम उत्तर को खास उत्तर में बदल देते हैं। ज्यादातर उत्तर बंगाल और महाराष्ट्र पर रुक जाते हैं। तारीख और तरीके के साथ राजमुंदरी जोड़ने से दिखता है कि सुधार आंदोलन राष्ट्रीय था, और सबसे मुश्किल काम कानून बनने के बाद हुआ। ज्यादा संदर्भ के लिए साइट का सुधार आंदोलनों वाला सिंहावलोकन देखिए।
सामान्य प्रश्न
कंदुकुरी वीरेशलिंगम कौन थे?
कंदुकुरी वीरेशलिंगम (1848 से 1919) आज के आंध्र प्रदेश के राजमुंदरी के समाज सुधारक और लेखक थे। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह और महिला शिक्षा के लिए अभियान चलाया, लड़कियों के स्कूल खोले और पहला तेलुगु उपन्यास लिखा। उन्हें तेलुगु पुनर्जागरण का जनक कहा जाता है।
वीरेशलिंगम ने पहला विधवा पुनर्विवाह कब करवाया?
उन्होंने आंध्र का पहला विधवा पुनर्विवाह 11 दिसंबर 1881 को राजमुंदरी में करवाया। विरोधियों की धमकियों की वजह से उनके छात्रों ने समारोह से पहले रात भर पहरा दिया। उसी साल दूसरा पुनर्विवाह भी हुआ।
वीरेशलिंगम को दक्षिण का विद्यासागर क्यों कहा जाता है?
ईश्वर चंद्र विद्यासागर की तरह उन्होंने भी शास्त्रों से तर्क दिया कि विधवाएं दोबारा शादी कर सकती हैं, और कड़े विरोध के बावजूद असली पुनर्विवाह करवाए। फर्क यह है कि विद्यासागर के अभियान से 1856 का अधिनियम बना, जबकि वीरेशलिंगम ने एक पीढ़ी बाद तेलुगु इलाके में परिवारों से उस कानून का इस्तेमाल करवाने का काम किया।
पहला तेलुगु उपन्यास कौन-सा था?
कंदुकुरी वीरेशलिंगम का राजशेखर चरित्रमु आम तौर पर पहला तेलुगु उपन्यास माना जाता है। यह 1878 से किस्तों में छपा और 1880 में किताब के रूप में प्रकाशित हुआ। इसकी प्रेरणा ओलिवर गोल्डस्मिथ की द विकार ऑफ वेकफील्ड से मिली थी, लेकिन इसकी कहानी तेलुगु समाज में रची गई है।
विवेकवर्धिनी क्या थी?
विवेकवर्धिनी वह सुधारवादी पत्रिका थी जिसे वीरेशलिंगम ने 1870 के दशक में शुरू किया; स्रोत 1874 या 1876 बताते हैं। इसने महिलाओं के मुद्दों पर अभियान चलाया और सरकारी अफसरों के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया। इसी पत्रिका ने उन्हें तेलुगु जिलों में एक जानी-मानी सार्वजनिक हस्ती बना दिया।
हितकारिणी समाज क्या था?
हितकारिणी समाज एक धर्मार्थ संस्था थी, जिसे वीरेशलिंगम ने जीवन के आखिरी दौर में बनाया और अपनी संपत्ति सौंपी। इसका मकसद था कि उनके स्कूल, विधवा आश्रम और कल्याण के काम उनके बाद भी चलते रहें। 1910 के बाद उनकी ज्यादातर ऊर्जा इसे खड़ा करने में लगी।
वीरेशलिंगम ने महिला शिक्षा के लिए क्या किया?
उन्होंने 1874 में धवलेश्वरम में एक बालिका स्कूल खोला, जिसमें सभी जातियों की लड़कियों को दाखिला मिलता था। इसके बाद 1884 में राजमुंदरी में दूसरा स्कूल खोला। 1883 में उन्होंने सतीहितबोधिनी शुरू की, जो आंध्र की पहली महिला पत्रिका थी। उन्होंने अपने विधवा आश्रम से भी एक स्कूल जोड़ा, ताकि विधवाएं अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
1. कंदुकुरी वीरेशलिंगम के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. उन्होंने 1881 में राजमुंदरी में आंध्र का पहला विधवा पुनर्विवाह करवाया। 2. उन्होंने वह विधेयक पेश किया जो हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 बना। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a) 1856 का अधिनियम उनके अभियान से पहले का है; उन्होंने परिवारों से उसका इस्तेमाल करवाने का काम किया।
2. राजशेखर चरित्रमु, जिसे आम तौर पर तेलुगु का पहला उपन्यास माना जाता है, किसने लिखा था?
- (a) गुरजाड अप्पाराव
- (b) कंदुकुरी वीरेशलिंगम
- (c) चिलकमर्ति लक्ष्मीनरसिंहम
- (d) मुद्दु नरसिंहम नायडु
उत्तर: (b) वीरेशलिंगम ने इसे 1878 से किस्तों में छापा और 1880 में किताब के रूप में प्रकाशित किया।
3. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए: 1. विवेकवर्धिनी : कंदुकुरी वीरेशलिंगम 2. सतीहितबोधिनी : आंध्र की महिला पत्रिका 3. राजमुंदरी : इंडियन नेशनल सोशल कॉन्फ्रेंस का मुख्यालय। ऊपर दिए गए युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 1 और 2
- (c) केवल 2 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b) सोशल कॉन्फ्रेंस की स्थापना रानडे ने की थी और इसकी बैठकें कांग्रेस के साथ होती थीं, राजमुंदरी में नहीं।
4. राजमुंदरी सामाजिक सुधार संघ मुख्य रूप से किस बात के लिए जाना जाता है?
- (a) गैर-ब्राह्मणों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की मांग
- (b) अपने सदस्यों के बच्चों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र तय करना
- (c) मद्रास में मंदिर प्रवेश आंदोलन चलाना
- (d) वेदों का तेलुगु में अनुवाद
उत्तर: (b) इसने शिशु विवाह के खिलाफ अभियान चलाया और लड़कियों के लिए 14 और लड़कों के लिए 18 साल की न्यूनतम उम्र तय की।
5. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. वीरेशलिंगम ने 1874 में धवलेश्वरम में एक बालिका स्कूल खोला। 2. उनकी आत्मकथा को तेलुगु की पहली आत्मकथा माना जाता है। 3. वे आंध्र में विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में छपे रूप में तर्क देने वाले पहले व्यक्ति थे। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-से सही हैं?
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 2 और 3
- (c) केवल 1 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a) इतिहासकार मुद्दु नरसिंहम नायडु जैसे पहले के समर्थकों का जिक्र करते हैं, इसलिए कथन 3 को सही मानना सुरक्षित नहीं है।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- उन्नीसवीं सदी के ‘भारतीय पुनर्जागरण’ और राष्ट्रीय पहचान के उदय के बीच संबंधों का परीक्षण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2019, GS पेपर I।
- सामाजिक स्वीकृति के बिना कानूनी सुधार बहुत कम हासिल कर पाता है। कंदुकुरी वीरेशलिंगम के नेतृत्व वाले विधवा पुनर्विवाह आंदोलन के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- कंदुकुरी वीरेशलिंगम ने साहित्य को सामाजिक सुधार के औजार के रूप में कैसे इस्तेमाल किया? (10 अंक, 150 शब्द)
- वैधव्य की समस्या पर ईश्वर चंद्र विद्यासागर और कंदुकुरी वीरेशलिंगम के दृष्टिकोणों की तुलना कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
- उन्नीसवीं सदी के दक्षिण भारत में सामाजिक सुधार की नींव महिला शिक्षा थी। आंध्र क्षेत्र के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)