कंवर झील, जिसे आधिकारिक रूप से कबरताल आर्द्रभूमि (Kabartal Wetland) कहा जाता है, बिहार के बेगूसराय जिले में स्थित एक मीठे पानी की झील है और इसे व्यापक रूप से एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की गोखुर झील (oxbow lake) माना जाता है। गोखुर झील अर्धचंद्राकार जलाशय होती है जो तब बनती है जब किसी नदी का विसर्प (meander) मुख्य धारा से अलग कट जाता है। कंवर झील का निर्माण बूढ़ी गंडक नदी — जो गंगा की एक सहायक नदी है — के विसर्प से हुआ है, और आज यह भारत-गंगा के मैदान (Indo-Gangetic floodplain) में लगभग 6,311 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है। 2020 में कबरताल को भारत का 41वाँ रामसर स्थल घोषित किया गया, जो बिहार का पहला रामसर स्थल है — यह इसकी अंतरराष्ट्रीय पारिस्थितिक महत्ता की औपचारिक स्वीकृति है। यूपीएससी अभ्यर्थियों के लिए कंवर झील आर्द्रभूमि भू-आकृति विज्ञान, पक्षीय जैव विविधता और उत्तर भारत में संरक्षण की राजनीति का एक आदर्श उदाहरण है।
परीक्षा की दृष्टि से इसे केवल “एशिया की सबसे बड़ी गोखुर झील” तक सीमित नहीं देखना चाहिए — कबरताल वास्तव में नदी विसर्प, बाढ़ क्षेत्र की पारिस्थितिकी और मानवजनित दबाव के संगम का सजीव अध्ययन है। यह झील इस बात का प्रमाण है कि छोटे आकार की आर्द्रभूमियाँ भी विशाल जैविक विविधता को सहारा दे सकती हैं।
भूगोल एवं निर्माण

कंवर झील बेगूसराय जिले के मंझौल क्षेत्र में स्थित है, जो बेगूसराय शहर से लगभग 22 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम और पटना से लगभग 160 किलोमीटर दूर है। यह गंगा के उत्तरी बाढ़ क्षेत्र में, मध्य गंगा मैदान में पड़ती है। झील का निर्माण बूढ़ी गंडक नदी के कटे हुए विसर्प से हुआ है, जो अपनी मुख्य धारा से अलग होकर इस अर्धचंद्राकार अवशिष्ट जलाशय को छोड़ गई — यह एक प्रामाणिक गोखुर झील का उदाहरण है।
गोखुर झीलों की विशेषता यह है कि वे नदी की पुरानी धारा का स्मारक होती हैं। बूढ़ी गंडक की अस्थिर प्रकृति और बार-बार दिशा बदलने की प्रवृत्ति ने उत्तर बिहार में अनेक छोटी-बड़ी गोखुरें छोड़ी हैं, परंतु कबरताल इनमें सबसे बड़ी और पारिस्थितिकीय रूप से सबसे महत्वपूर्ण है।
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| स्थान | मंझौल, बेगूसराय जिला, बिहार |
| निर्देशांक | 25.6° उत्तर, 86.1° पूर्व (लगभग) |
| प्रकार | मीठे पानी की गोखुर झील |
| क्षेत्रफल | 6,311 हेक्टेयर (रामसर अधिसूचित) |
| जलग्रहण नदी | बूढ़ी गंडक (गंगा की सहायक) |
| ऊँचाई | समुद्र तल से ~50 मीटर |
| आकार | अर्धचंद्राकार (गोखुर) |
| मौसमी विशेषता | मानसून में विस्तार, गर्मी में संकुचन |
बिहार के सरकारी दस्तावेज़ों में इसे प्रायः “कंवर झील” और रामसर सम्मेलन (Ramsar Convention) की अधिसूचना में “कबरताल” कहा गया है। इसका जल क्षारीय से उदासीन है, अधिकांश हिस्सों में 2 मीटर से कम गहरा है और तीव्र मौसमी उतार-चढ़ाव से प्रभावित होता है — मानसून में दोगुना विस्तार लेकर, गर्मियों के चरम में मात्र कुछ सौ हेक्टेयर तक सिमट जाता है।
यह मौसमी संकुचन-विस्तार ही कबरताल की पारिस्थितिकीय प्रजननशीलता का आधार है। बाढ़ के समय बहाव से पोषक तत्वों का प्रवेश, और शुष्क मौसम में उथलेपन से प्रकाश संश्लेषण की सघनता — यह दोनों मिलकर इसे मछलियों के अंडोत्सर्ग (spawning) और प्रवासी पक्षियों के लिए आदर्श स्थल बनाते हैं।
पारिस्थितिकीय चरित्र
कबरताल को रामसर सम्मेलन ने “अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि” (Wetland of International Importance) के रूप में मापदंड 2, 4 तथा 8 के अंतर्गत वर्गीकृत किया है — अर्थात् यहाँ संरक्षण-संबंधी चिंता वाली प्रजातियाँ रहती हैं, जीवन-चक्र के नाज़ुक चरणों में पक्षियों को आश्रय मिलता है, और यह मछलियों के बड़े अंडोत्सर्ग स्थलों में से एक है।
वनस्पति (फ्लोरा)

यह आर्द्रभूमि 165 से अधिक पौध-प्रजातियों को आश्रय देती है, जिनमें जलमग्न जलीय पौधे (Hydrilla, Vallisneria), तैरते हुए पौधे (Eichhornia, Pistia, Lemna), उत्थापित बड़ी जलीय वनस्पतियाँ (Typha, Phragmites) और उघड़ी हुई किनारों पर मौसमी दलदली घासें शामिल हैं।
यह वनस्पति-संरचना झील के खाद्य-जाल का आधार बनाती है — जलमग्न पौधे ऑक्सीजन उत्पादन और मछलियों के अंडे रखने के लिए सतह उपलब्ध कराते हैं, जबकि तैरते पौधे जल-पक्षियों को छिपने और घोंसला बनाने का आवरण देते हैं।
प्राणी (फॉना)
- मछलियाँ: 50 से अधिक प्रजातियाँ, जिनमें व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण कतला, रोहू, मृगल, और बाढ़ के समय प्रवास करने वाली हिल्सा शामिल हैं।
- उभयचर एवं सरीसृप: मेंढक, भारतीय कोमलकवच कछुआ (Indian softshell turtle), साँप।
- स्तनधारी: चिकनी-त्वचा वाला ऊदबिलाव (smooth-coated otter — संकटग्रस्त), सियार, जंगली बिल्ली।
- पक्षी: झील की सबसे प्रसिद्ध समूह।
पक्षीय विविधता
कबरताल मध्य एशियाई फ्लाईवे (Central Asian Flyway) पर स्थित है और सर्दियों (अक्टूबर–मार्च) में मध्य एशिया, यूरोप तथा आर्कटिक से आने वाली 60 से अधिक प्रवासी पक्षी प्रजातियों की मेजबानी करता है। कुल मिलाकर यहाँ 165 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ दर्ज की गई हैं।
| पक्षी समूह | उदाहरण |
|---|---|
| प्रवासी बत्तखें | नॉर्दर्न पिनटेल, गैडवॉल, गारगनी, कॉमन टील, नॉर्दर्न शॉवलर |
| स्थानीय जलपक्षी | लेसर व्हिसलिंग डक, कॉटन पिग्मी गूज़ |
| कीचड़-पक्षी (वेडर्स) | ब्लैक-टेल्ड गॉडविट, वुड सैंडपाइपर, कॉमन स्निप |
| शिकारी पक्षी | ग्रेटर स्पॉटेड ईगल (संकटग्रस्त), पल्लास का मछली-गरुड़ (संकटाधीन) |
| सारस एवं स्टॉर्क | ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क, सारस क्रेन (संकटग्रस्त) |
| कॉर्मोरेंट, बगुला, हेरॉन | लिटिल कॉर्मोरेंट, कैटल इग्रेट, पर्पल हेरॉन |
कबरताल भारत की उन गिनी-चुनी आर्द्रभूमियों में से एक है जहाँ पाँच विश्व-स्तर पर संकटग्रस्त प्रजातियाँ (पल्लास का मछली-गरुड़, ग्रेटर स्पॉटेड ईगल, ईस्टर्न इंपीरियल ईगल, बेयर्स पोचार्ड और सोशल लैपविंग) दर्ज की गई हैं।
इन पक्षियों की उपस्थिति झील की भूमिका को केवल “स्थानीय आवास” से बहुत आगे ले जाती है — कबरताल वास्तव में महाद्वीपीय प्रवास तंत्र की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, और इसका क्षरण पूरे फ्लाईवे को प्रभावित कर सकता है।
रामसर स्थल का दर्जा
कबरताल आर्द्रभूमि को 21 जुलाई 2020 को रामसर स्थल के रूप में अधिसूचित किया गया, जिसके साथ यह बन गई:
- भारत का 41वाँ रामसर स्थल
- बिहार का पहला रामसर स्थल
यह दर्जा इसकी अंतरराष्ट्रीय पक्षीय महत्ता तथा कृषि-विस्तार से उत्पन्न आवास-हानि के खतरे को देखते हुए प्रदान किया गया। 2024 तक भारत में 80 से अधिक रामसर स्थल हैं, और कबरताल उत्तर भारत की गोखुर आर्द्रभूमियों का प्रतीकात्मक प्रतिनिधि बना हुआ है — इस श्रेणी में बिहार की गोगाबील, और असम की दीपोर बील (जो स्वयं भी रामसर स्थल है) शामिल हैं।
रामसर का दर्जा केवल सम्मान नहीं — यह एक प्रतिबद्धता है। हर रामसर देश को आर्द्रभूमि के “बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग (wise use)” का सिद्धांत निभाना होता है। यदि स्थिति बिगड़ती है तो स्थल को मॉन्ट्रो रिकॉर्ड (Montreux Record) में डाला जाता है — जो अंतरराष्ट्रीय शर्मिंदगी का संकेत है।
कंवर झील पर मंडराते खतरे
कबरताल आर्द्रभूमि पाँच प्रमुख खतरों का सामना कर रही है, जिन्होंने पिछले चार दशकों में इसके जलमग्न क्षेत्र को लगभग दो-तिहाई तक कम कर दिया है।
- कृषि अतिक्रमण: किसानों ने आर्द्रभूमि के सूखे किनारों तक धान और गेहूँ की खेती बढ़ा दी है, जिससे झील का सक्रिय क्षेत्र वास्तविक रूप से सिकुड़ गया है।
- जलवैज्ञानिक विच्छेदन (hydrological disconnection): बूढ़ी गंडक पर बने तटबंध और प्रवेश-बिंदुओं पर गाद के जमाव के कारण मौसमी जल-प्रवाह कम हो गया है।
- सुपोषण (eutrophication): आसपास के गाँवों से बहकर आने वाले उर्वरक और सीवेज ने शैवाल-प्रस्फुटन को जन्म दिया है।
- आक्रामक प्रजातियाँ: जलकुम्भी (Water hyacinth, Eichhornia crassipes) और Ipomoea carnea खुले जल को घोंट देती हैं और पक्षियों के आवास को कम करती हैं।
- शिकार: कानूनी संरक्षण के बावजूद प्रवासी बत्तखें जाल और फंदों में पकड़ी जाती हैं — यह एक पुरानी समस्या है जिसे बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) ने भी रेखांकित किया है।
इन खतरों का संचयी प्रभाव विशेष रूप से चिंताजनक है। उदाहरणस्वरूप, अतिक्रमण से जल-क्षेत्र सिकुड़ने पर शेष जल पर दबाव बढ़ता है; सिकुड़ा जल जल्दी प्रदूषित होता है; प्रदूषण से शैवाल-प्रस्फुटन बढ़ता है; और शैवाल-प्रस्फुटन प्रवासी पक्षियों को दूर भगाता है। यह एक आत्म-प्रबल पतन-चक्र है।
संरक्षण स्थिति एवं शासन
- कानूनी संरक्षण: 1986 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (Wild Life Protection Act) के अंतर्गत कबरताल पक्षी अभयारण्य घोषित।
- रामसर अधिसूचना: 2020।
- राज्य प्राधिकरण: बिहार का राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण — आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत।
- केंद्रीय वित्त-पोषण: पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की जलीय पारितंत्रों के संरक्षण की राष्ट्रीय योजना (NPCA)।
- हितधारक: बिहार वन विभाग, बेगूसराय जिला प्रशासन, स्थानीय पंचायतें, समुदाय आधारित मछुआरे।
रामसर अधिसूचना के बाद एक “कबरताल संरक्षण एवं प्रबंधन योजना” तैयार की गई है, जिसमें जलवैज्ञानिक पुनर्स्थापन, अवैध-शिकार-विरोधी निगरानी, पारिस्थितिकी-पर्यटन (eco-tourism) और समुदाय-आधारित आजीविका-सहायता शामिल है।
समुदाय-आधारित संरक्षण की दिशा
केवल कानूनी संरक्षण और केंद्रीय वित्त पर्याप्त नहीं हैं। आसपास के 65 गाँवों की लगभग 5,000 मछुआरा परिवारों की आजीविका सीधे झील पर निर्भर है। यदि संरक्षण उन्हें पराया बना दे, तो “कागज़ी” अभयारण्य बनकर रह जाएगा। इसलिए नीति का जोर है कि पारंपरिक मछली-पकड़ने के अधिकार बनाए रखे जाएँ, अवैध जाल हटाए जाएँ और स्थानीय गाइडों के माध्यम से पक्षी-दर्शन पर्यटन को बढ़ावा दिया जाए।
भारत की गोखुर झीलें: व्यापक संदर्भ
गोखुर झीलें भारत-गंगा एवं ब्रह्मपुत्र के मैदानों में बिखरी हुई हैं। उल्लेखनीय उदाहरण:
| झील | नदी (पुराना विसर्प) | राज्य |
|---|---|---|
| कंवर (कबरताल) | बूढ़ी गंडक | बिहार |
| गोगाबील | कनकई / महानंदा | बिहार (कटिहार) |
| दीपोर बील | ब्रह्मपुत्र | असम |
| काज़ीरंगा बील | ब्रह्मपुत्र | असम |
| समासपुर पक्षी अभयारण्य की बीलें | गोमती | उत्तर प्रदेश |
| मांचर झील (ऐतिहासिक) | सिंधु | अब पाकिस्तान में |
गोखुर झीलें अपने आकार के अनुपात में पारिस्थितिकीय रूप से असंतुलित रूप से समृद्ध होती हैं — वे बड़े जलाशयों की तुलना में प्रति हेक्टेयर अधिक जैव विविधता सहारा देती हैं, क्योंकि उनमें प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र की गतिशीलता बनी रहती है।
कबरताल बनाम चिल्का बनाम लोकटक — एक तुलनात्मक झलक
| पक्ष | कबरताल (बिहार) | चिल्का (ओडिशा) | लोकटक (मणिपुर) |
|---|---|---|---|
| प्रकार | मीठे पानी की गोखुर | खारे पानी की लैगून | मीठे पानी की झील |
| विशेष आकर्षण | प्रवासी बत्तखें, ईगल | इरावदी डॉल्फ़िन, फ्लेमिंगो | फुम्डी एवं संगाई हिरण |
| रामसर वर्ष | 2020 | 1981 | 1990 |
| मुख्य खतरा | अतिक्रमण, सुपोषण | सिल्टेशन, पोचिंग | इथाई बाँध, पारा-प्रदूषण |
यह तुलना यूपीएससी प्रीलिम्स के लिए विशेष रूप से उपयोगी है — परीक्षक प्रायः इन तीनों के बीच का अंतर पूछते हैं और अभ्यर्थी “गोखुर” व “लैगून” को मिला बैठते हैं।
कंवर झील की पारितंत्र-सेवाएँ
- मानसून के समय बूढ़ी गंडक की बाढ़ का नियंत्रण।
- आसपास के गाँवों के लिए भूजल पुनर्भरण।
- बेगूसराय जिले के लगभग 5,000 लोगों के लिए मत्स्य आधारित आजीविका।
- आर्द्रभूमि अवसादों में कार्बन प्रच्छादन (carbon sequestration)।
- सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्ता — स्थानीय त्योहारों का झील से जुड़ाव।
- वैज्ञानिक मूल्य — पक्षीय पारिस्थितिकी का दीर्घकालिक निगरानी स्थल।
इन सेवाओं को आर्थिक भाषा में आँकें तो कबरताल का वार्षिक “पारितंत्र मूल्य” अनुमानतः ₹150–250 करोड़ प्रति वर्ष तक है — जो किसी भी “वैकल्पिक भू-उपयोग” (जैसे खेती में बदलना) से कहीं अधिक है। यही तर्क संरक्षण की आर्थिक नींव है।
प्रीलिम्स बिंदु — एक नज़र में याद रखने योग्य तथ्य
- स्थान: मंझौल, बेगूसराय जिला, बिहार।
- निर्माण नदी: बूढ़ी गंडक (गंगा की सहायक)।
- प्रकार: मीठे पानी की गोखुर झील — एशिया की सबसे बड़ी।
- क्षेत्रफल: 6,311 हेक्टेयर (रामसर अधिसूचित)।
- रामसर वर्ष: 2020 — भारत का 41वाँ, बिहार का पहला।
- फ्लाईवे: मध्य एशियाई फ्लाईवे।
- संकटग्रस्त ध्वजवाहक प्रजातियाँ: पल्लास का मछली-गरुड़, ग्रेटर स्पॉटेड ईगल, बेयर्स पोचार्ड, सोशल लैपविंग, ईस्टर्न इंपीरियल ईगल।
- 1986: कबरताल पक्षी अभयारण्य (वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972)।
- शासी नियम: आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017।
- योजना: NPCA — पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
- गोखुर झील के निर्माण की प्रक्रिया समझाते हुए कबरताल आर्द्रभूमि का उदाहरण लीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
- भारत में आर्द्रभूमि संरक्षण के लिए रामसर सम्मेलन और आर्द्रभूमि नियम, 2017 की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- “छोटी आर्द्रभूमियाँ अनुपातहीन रूप से अधिक पारिस्थितिकीय सेवाएँ प्रदान करती हैं।” कबरताल के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (15 अंक)
यूपीएससी के लिए प्रासंगिकता
कंवर झील (कबरताल आर्द्रभूमि) प्रीलिम्स और पर्यावरण-केंद्रित मेन्स दोनों में अक्सर पूछा जाने वाला विषय है। प्रीलिम्स के लिए याद रखें: बिहार का बेगूसराय जिला, बूढ़ी गंडक के विसर्प से निर्मित, एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की गोखुर झील, 2020 से रामसर स्थल — भारत का 41वाँ और बिहार का पहला। एक विशिष्ट MCQ कंवर को मध्य एशियाई फ्लाईवे या पल्लास के मछली-गरुड़ से जोड़ता है। GS पेपर I (भूगोल) के लिए यह नदी-कृत भू-आकृति विज्ञान (fluvial geomorphology) से बनी गोखुर झील का प्रामाणिक उदाहरण है — इसे ब्रह्मपुत्र की बीलों और डेल्टाई मृत-नदियों के साथ जोड़ें। GS पेपर III (पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी) में कबरताल आर्द्रभूमि-क्षरण के कारकों (अतिक्रमण, सुपोषण, आक्रामक प्रजातियाँ) और भारत में रामसर सम्मेलन 1971 के क्रियान्वयन का एक केस स्टडी है, जो आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 के अंतर्गत होता है। कबरताल को मॉन्ट्रो रिकॉर्ड (क्षरित रामसर स्थल), आर्द्रभूमियों के सतत प्रबंधन कार्यक्रम, MoEFCC के NPCA और वैश्विक विश्व आर्द्रभूमि दिवस (2 फरवरी) से जोड़ें। निबंध में, कंवर जैसी गोखुर झीलें यह दिखाती हैं कि कैसे छोटे, उपेक्षित आवास भी अनुपातहीन पारिस्थितिकीय मूल्य वहन करते हैं — यह दृष्टि परीक्षक नियमित रूप से पुरस्कृत करते हैं। आम भूल से बचें: कंवर “विवर्तनिक झील (tectonic lake)” नहीं है, यह नदी-कृत (fluvial) है; और कबरताल को चिल्का (खारे पानी की, ओडिशा) या लोकटक (तैरते फुम्डी, मणिपुर) से न मिलाएँ।
सामान्य प्रश्न
कंवर झील कहाँ स्थित है?
कंवर झील बिहार के बेगूसराय जिले के मंझौल क्षेत्र में स्थित है, जो बेगूसराय शहर से लगभग 22 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम और पटना से लगभग 160 किलोमीटर दूर है।
कंवर झील किस नदी से बनी है?
कंवर झील का निर्माण बूढ़ी गंडक नदी के विसर्प (meander) के मुख्य धारा से कट जाने से हुआ है। बूढ़ी गंडक गंगा की एक प्रमुख सहायक नदी है।
कंवर झील का रामसर वर्ष क्या है?
कबरताल आर्द्रभूमि (कंवर झील) को 21 जुलाई 2020 को रामसर स्थल अधिसूचित किया गया। यह भारत का 41वाँ और बिहार का पहला रामसर स्थल है।
गोखुर झील क्या होती है?
गोखुर झील (oxbow lake) अर्धचंद्राकार जलाशय होती है जो तब बनती है जब किसी नदी का विसर्प मुख्य धारा से कट जाता है और शेष जल एक स्वतंत्र झील बन जाता है।
कंवर झील पर मुख्य खतरे क्या हैं?
प्रमुख खतरे हैं — कृषि अतिक्रमण, तटबंधों के कारण जलवैज्ञानिक विच्छेदन, सुपोषण, जलकुम्भी जैसी आक्रामक प्रजातियों का फैलाव, और प्रवासी पक्षियों का अवैध शिकार।
कंवर झील किस फ्लाईवे पर स्थित है?
कंवर झील मध्य एशियाई फ्लाईवे (Central Asian Flyway) पर स्थित है, और सर्दियों में मध्य एशिया, यूरोप तथा आर्कटिक से 60 से अधिक प्रवासी पक्षी प्रजातियाँ यहाँ आती हैं।
कंवर झील की किस ध्वजवाहक प्रजाति को संकटग्रस्त माना गया है?
कबरताल में दर्ज पाँच विश्व-स्तर पर संकटग्रस्त प्रजातियों में पल्लास का मछली-गरुड़ (Endangered), ग्रेटर स्पॉटेड ईगल, ईस्टर्न इंपीरियल ईगल, बेयर्स पोचार्ड और सोशल लैपविंग शामिल हैं।
कबरताल और चिल्का में अंतर क्या है?
कबरताल मीठे पानी की गोखुर झील है (बिहार), जबकि चिल्का खारे पानी की लैगून है (ओडिशा)। कबरताल बूढ़ी गंडक के विसर्प से बनी है; चिल्का बंगाल की खाड़ी से जुड़ी ज्वारीय लैगून है।
क्या कंवर झील को विवर्तनिक झील कहा जा सकता है?
नहीं। कंवर एक नदी-कृत (fluvial) झील है जो विसर्प के कटने से बनी है। विवर्तनिक झीलें भू-गर्भीय बल जैसे फॉल्टिंग से बनती हैं — जैसे कश्मीर की वूलर। यह सामान्य परीक्षा-भूल है।
कंवर झील के संरक्षण के लिए कौन-सी केंद्रीय योजना उत्तरदायी है?
केंद्रीय स्तर पर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की “जलीय पारितंत्रों के संरक्षण की राष्ट्रीय योजना (NPCA)” इसका वित्त-पोषण करती है, और राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण कार्यान्वयन देखता है।