राष्ट्रीय अवसंरचना वित्तपोषण और विकास बैंक (NaBFID) की स्थापना 2021 में एक सांविधिक विकास वित्त संस्थान (DFI) के रूप में की गई, ताकि यह भारत के विशाल अवसंरचना निर्माण के लिए वित्तदाता, सक्षमकर्ता और उत्प्रेरक की भूमिका निभाए। 1.11 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन (NIP) और 5-10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा के साथ, भारत को धैर्यपूर्ण, दीर्घकालिक पूँजी चाहिए जो वाणिज्यिक बैंक — परिसंपत्ति-देयता असमानता से जूझते हुए — आसानी से नहीं दे सकते। NaBFID इसका उत्तर है — लेकिन इसकी सफलता शासन, पूँजीकरण और पारिस्थितिकी-तंत्र सुधारों पर निर्भर है।
पृष्ठभूमि: फिर से DFI क्यों?
सफल DFIs के वैश्विक उदाहरण:
- चाइना डेवलपमेंट बैंक (CDB) — विश्व का सबसे बड़ा DFI।
- KfW (जर्मनी) — हरित और अवसंरचना वित्तपोषण।
- जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन (JBIC)।
- कोरिया डेवलपमेंट बैंक (KDB)।
- UK ग्रीन इन्वेस्टमेंट बैंक।
भारतीय DFIs (अतीत और वर्तमान):
- NABARD — कृषि और ग्रामीण विकास।
- IFCI — भारत का पहला DFI (1948)।
- ICICI, IDBI — मूल रूप से DFI, बाद में नरसिम्हन समिति की सिफारिशों पर वाणिज्यिक बैंकों में परिवर्तित।
- SIDBI, MUDRA — MSME विकास।
- एक्ज़िम बैंक — व्यापार वित्त।
- राष्ट्रीय आवास बैंक (NHB) — आवास।
IFCI और IDBI के रूपांतरण के बाद भारत के पास दो दशकों तक समर्पित अवसंरचना DFI नहीं था। NaBFID उस शून्य को भरता है।
विकास बैंकों द्वारा प्रदत्त सहायता
DFIs आमतौर पर प्रदान करते हैं:
- रियायती या बाज़ार दरों पर दीर्घकालिक वित्त (15-30 वर्ष)।
- रणनीतिक क्षेत्रों में इक्विटी सदस्यता।
- कॉर्पोरेट/अवसंरचना बांडों पर आंशिक ऋण गारंटी।
- टेक-आउट फाइनेंसिंग — जहाँ बैंक दीर्घकालिक ऋण DFI को हस्तांतरित करते हैं।
- परामर्श और मूल्यांकन।
NaBFID की संरचना
- NaBFID अधिनियम, 2021 के तहत स्थापित।
- अधिकृत पूँजी: 1 लाख करोड़ रुपये।
- प्रदत्त पूँजी: 20,000 करोड़ रुपये (केंद्र)।
- प्रारंभिक अनुदान: 5,000 करोड़ रुपये (केंद्र)।
- लक्षित ऋण पुस्तक: 3 वर्षों में 5 लाख करोड़ रुपये।
- अध्यक्ष: K.V. कामत (संस्थापक) — ICICI और BRICS बैंक के पूर्व CEO।
NaBFID से भारतीय अर्थव्यवस्था को कैसे लाभ होगा?
निवेश आवश्यकताएँ पूरी करता है: विकसित भारत 2047 और NIP के लिए भारत को 111 लाख करोड़ रुपये से अधिक की अवसंरचना चाहिए। NaBFID दीर्घकालिक पूँजी प्रदान करता है।
वाणिज्यिक बैंकों पर दबाव घटाता है: बैंक अल्पकालिक जमा पर निर्भर हैं; दीर्घकालिक अवसंरचना ऋण परिसंपत्ति-देयता असमानता और NPA का कारण बनते हैं। NaBFID की दीर्घकालिक देयताएँ अवसंरचना के साथ मेल खाती हैं।
पूँजी की लागत कम करता है: ऋण-वर्धन और प्रतिस्पर्धी मूल्य निर्धारण उधारी लागत घटाते हैं।
विदेशी मुद्रा जोखिम घटाता है: वर्तमान में कई अवसंरचना कंपनियाँ ECB उधार लेती हैं जो रुपये के अवमूल्यन के लिए उजागर हैं; NaBFID रुपये में वित्त देता है।
उत्प्रेरक भूमिका: निजी, पेंशन, बीमा और सार्वभौम सम्पदा पूँजी को आकर्षित करता है।
NaBFID की सफलता के लिए आवश्यक रणनीतियाँ
स्वतंत्रता और स्वायत्तता
पेशेवर प्रबंधन, स्वतंत्र शासन और मज़बूत लेखापरीक्षा। अन्यथा NaBFID किसी अपारदर्शी PSU की तरह बन सकता है।
दीर्घकालिक पूँजी तक पहुँच
- RBI से रियायती दरों पर दीर्घकालिक रेपो परिचालन (LTRO)।
- NaBFID बांडों के लिए SLR पात्रता — बैंकों को खरीदने के लिए प्रोत्साहन।
- कर-मुक्त बांड और जीरो-कूपन बांड।
- विश्व बैंक, ADB, AIIB, JICA से विदेशी उधार।
- हरित बांड, सामाजिक बांड, मसाला बांड।
निवेशक आधार विस्तार
- पेंशन फंड (NPS, EPFO), बीमाकर्ता (LIC) और म्यूचुअल फंड को NaBFID बांडों में निवेश की अनुमति।
- खुदरा निवेशकों के लिए कर प्रोत्साहन।
नवीनतम घटनाक्रम (2024-26)
2025 की शुरुआत तक NaBFID ने सड़कों, बंदरगाहों, हवाई अड्डों, नवीकरणीय ऊर्जा, पारेषण, शहरी अवसंरचना, मेट्रो जैसी परियोजनाओं में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक ऋण स्वीकृत किए। इसने घरेलू बाज़ारों से कर-मुक्त और करयोग्य बांड भी जारी किए।
केंद्रीय बजट 2024-25 और 2025-26 में:
- केंद्र का 11.2 लाख करोड़ रुपये का पूँजी व्यय।
- मुख्य अवसंरचना परियोजनाओं के लिए VGF वृद्धि।
- परिसंपत्ति मुद्रीकरण पाइपलाइन 2.0 (2025-30: 10 लाख करोड़ रुपये)।
RBI और NITI Aayog के अनुमान के अनुसार भारत की अवसंरचना वित्तपोषण आवश्यकता 2040 तक 4.5 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है। NaBFID की सफलता इस अंतर को पाटने के लिए अनिवार्य है।
यूपीएससी प्रासंगिकता
GS III के सीधे जुड़े विषय: अवसंरचना; निवेश मॉडल; संसाधन जुटाना; बैंकिंग; PPP।
संभावित प्रश्न:
- NaBFID की स्थापना के औचित्य की चर्चा करें। यह पुराने DFIs से कैसे अलग है?
- NaBFID के सामने चुनौतियों की समीक्षा करें। इसकी सफलता के लिए उपाय सुझाएँ।
- "अवसंरचना वित्तपोषण के लिए दीर्घकालिक धैर्यपूर्ण पूँजी चाहिए जो केवल DFI दे सकते हैं।" समालोचनात्मक मूल्यांकन करें।
सामान्य प्रश्न
NaBFID क्या है और इसकी स्थापना कब हुई?
NaBFID (राष्ट्रीय अवसंरचना वित्तपोषण और विकास बैंक) एक सांविधिक DFI है जो NaBFID अधिनियम, 2021 के तहत स्थापित हुई। इसका उद्देश्य भारत की अवसंरचना परियोजनाओं को दीर्घकालिक वित्त देना है। इसकी अधिकृत पूँजी 1 लाख करोड़ रुपये है।
NaBFID और वाणिज्यिक बैंकों में क्या अंतर है?
वाणिज्यिक बैंक अल्पकालिक जमा पर निर्भर होते हैं, इसलिए दीर्घकालिक अवसंरचना ऋण उनके लिए परिसंपत्ति-देयता असमानता उत्पन्न करते हैं। NaBFID विशेष रूप से 15-30 वर्ष की दीर्घकालिक पूँजी प्रदान करने के लिए बनाया गया है जो अवसंरचना परियोजनाओं के लिए उपयुक्त है।
NaBFID अपनी पूँजी कहाँ से जुटाता है?
NaBFID कर-मुक्त बांड, मसाला बांड, हरित बांड, RBI के LTRO, विश्व बैंक/ADB/AIIB जैसे बहुपक्षीय संस्थानों से उधार, और घरेलू पेंशन-बीमा निधियों के माध्यम से पूँजी जुटाता है।
भारत में DFI का इतिहास क्या रहा है?
IFCI (1948) भारत का पहला DFI था। बाद में ICICI और IDBI को नरसिम्हन समिति की सिफारिश पर वाणिज्यिक बैंकों में बदल दिया गया। 2 दशकों के शून्य के बाद 2021 में NaBFID की स्थापना की गई। NABARD, SIDBI, EXIM बैंक और NHB विशेष उद्देश्यों के लिए अलग DFI हैं।