नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) सूर्य को ऊर्जा देता है। इसे पृथ्वी पर पुन: उत्पन्न करना लगभग असीमित, स्वच्छ और मूलतः सुरक्षित ऊर्जा देगा — और जलवायु संकट को समाप्त करेगा। दशकों की धीमी प्रगति के बाद अब ब्रिटेन के JET और अमेरिका के नेशनल इग्निशन फैसिलिटी जैसी सुविधाओं पर रिकॉर्ड ऊर्जा-प्राप्ति हो रही है। भारत ITER — विश्व के सबसे बड़े संलयन प्रयोग — में पूर्ण भागीदार है। यूपीएससी GS पेपर III के लिए संलयन ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु क्रिया और अग्रवर्ती विज्ञान को जोड़ता है।
नाभिकीय संलयन क्या है?
नाभिकीय संलयन एक नाभिकीय अभिक्रिया है जिसमें छोटे नाभिक मिलकर एक बड़ा नाभिक बनाते हैं और विशाल ऊर्जा मुक्त करते हैं। यह विखंडन (Fission — भारी नाभिकों का टूटना) के विपरीत है। संलयन सूर्य को प्रोटॉन-प्रोटॉन शृंखला और CNO चक्र के माध्यम से ऊर्जा देता है। पृथ्वी पर सबसे सुलभ अभिक्रिया ड्यूटेरियम (Deuterium) और ट्रिटियम (Tritium) — हाइड्रोजन के दो भारी समस्थानिक — के बीच होती है।
ड्यूटेरियम-ट्रिटियम अभिक्रिया
D + T -> He-4 + न्यूट्रॉन + 17.6 MeV
ड्यूटेरियम और ट्रिटियम का संलयन एक हीलियम नाभिक और एक उच्च-ऊर्जा न्यूट्रॉन उत्पन्न करता है, जो अधिकांश ऊर्जा को गतिज ऊर्जा के रूप में ले जाता है। हीलियम निष्क्रिय है; न्यूट्रॉन की ऊर्जा ऊष्मा के रूप में ग्रहण की जाती है।
प्लाज़्मा: पदार्थ की चौथी अवस्था
संलयन प्लाज़्मा अवस्था में होता है — मुक्त आयनों और इलेक्ट्रॉनों का गर्म, आवेशित द्रव। संलयन के लिए नाभिकों को विद्युत-स्थैतिक प्रतिकर्षण पार करना होता है, जिसके लिए लगभग 10 करोड़ डिग्री सेल्सियस तापमान चाहिए — सूर्य के केंद्र से दस गुना अधिक गर्म, क्योंकि पृथ्वी पर प्लाज़्मा का दाब कम होता है।
प्लाज़्मा का परिरोध: टोकामैक
टोकामैक (Tokamak) एक डोनट के आकार (टोरॉइडल) का उपकरण है जो शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्रों से प्लाज़्मा को बाँधता है। अति-चालक विद्युत-चुम्बक प्लाज़्मा को उसी स्थान पर रखते हैं, जहाँ वह घूमता है, गरम होता है, संलयन करता है और ऊर्जा को ऊष्मा के रूप में मुक्त करता है। नेशनल इग्निशन फैसिलिटी जैसे लेज़र-जड़त्वीय परिरोध (Inertial Confinement) में सैकड़ों लेज़र एक साथ ईंधन की गोलियों को संलयन-स्थितियों तक संपीड़ित करते हैं।
नाभिकीय संलयन का महत्त्व
- विशाल ऊर्जा घनत्व — रासायनिक अभिक्रिया से प्रति इकाई द्रव्यमान लगभग 1 करोड़ गुना अधिक ऊर्जा, और विखंडन से चार गुना अधिक।
- प्रचुर ईंधन — ड्यूटेरियम समुद्री जल से प्राप्त होता है; ट्रिटियम लीथियम से उत्पन्न किया जा सकता है।
- पर्यावरण-अनुकूल — मुख्य उपोत्पाद निष्क्रिय हीलियम है।
- दीर्घकालिक रेडियोधर्मी अपशिष्ट नहीं — रिएक्टर संरचना सक्रिय अवश्य होती है, परंतु विखंडन उत्पादों की तुलना में इसकी अर्ध-आयु बहुत कम होती है।
- मेल्टडाउन का जोखिम नहीं — यदि कोई गड़बड़ी हो, तो प्लाज़्मा सेकंडों में ठंडा हो जाता है और अभिक्रिया रुक जाती है।
- प्रसार-जोखिम कम — कोई विखंडनीय यूरेनियम या प्लूटोनियम नहीं; ट्रिटियम रेडियोधर्मी है पर विखंडनीय नहीं।
- आर्थिक और सामाजिक लाभ — ग्रामीण विद्युतीकरण, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा, अति-चालक, क्रायोजेनिक्स, नैनो-सामग्री और AI नियंत्रण-प्रणालियों में नवाचार का प्रसार।
- अंतरिक्ष अन्वेषण को सक्षम बनाने वाला — खनिज खनन, He-3 की खोज, अंतर-ग्रहीय प्रणोदन।
वैश्विक उपलब्धियाँ
- JET (ज्वाइंट यूरोपियन टोरस), ब्रिटेन ने दिसंबर 2021 में 59 मेगाजूल सतत संलयन ऊर्जा उत्पन्न की — विश्व रिकॉर्ड, जिसे बाद में तोड़ा गया।
- नेशनल इग्निशन फैसिलिटी (NIF) — लॉरेंस लिवरमोर ने दिसंबर 2022 में संलयन इग्निशन प्राप्त किया — लेज़रों द्वारा ईंधन की गोली को दी गई ऊर्जा से अधिक ऊर्जा मुक्त की गई।
- KSTAR (दक्षिण कोरिया) ने 2024 में 100 मिलियन डिग्री प्लाज़्मा को 48 सेकंड तक बनाए रखा।
- EAST (चीन) ने 2023 में 403 सेकंड का स्थिर-अवस्था उच्च-परिरोध प्लाज़्मा प्राप्त किया।
- ITER का संयोजन कैडाराशे, फ़्रांस में जारी है।
भारत का संलयन कार्यक्रम
- पहली एटम्स फॉर पीस बैठक (जिनेवा, 1955) में होमी जे. भाभा ने भविष्यवाणी की कि थर्मो-न्यूक्लियर संलयन भविष्य की ऊर्जा का स्रोत होगा।
- प्लाज़्मा अनुसंधान संस्थान (IPR), गांधीनगर और साहा नाभिकीय भौतिकी संस्थान (SINP), कोलकाता भारतीय संलयन अनुसंधान का नेतृत्व करते हैं।
- ADITYA टोकामैक — भारत का पहला स्वदेशी टोकामैक, IPR में संचालित। 1989 में निर्मित, 0.4 सेकंड का प्लाज़्मा अवधि प्राप्त की; 2016 में ADITYA-U में उन्नयन।
- SST-1 (स्थिर-अवस्था टोकामैक) — IPR का अति-चालक टोकामैक, स्थिर-अवस्था स्थितियों में प्लाज़्मा का अध्ययन और स्थिर-अवस्था संचालन तकनीकें विकसित करने हेतु।
ITER परियोजना
- 1988 में आरंभ; निर्माण 2007 में कैडाराशे, फ़्रांस में शुरू हुआ।
- भारत 2005 में सदस्य बना। ITER में IPR भारत का प्रतिनिधित्व करता है।
- सदस्य: चीन, यूरोपीय संघ, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका।
- मिशन: संलयन ऊर्जा को बड़े पैमाने पर कार्बन-मुक्त ऊर्जा स्रोत के रूप में व्यवहार्य सिद्ध करना।
- लक्ष्य: संक्षिप्त समय के लिए ऐसा संलयन प्लाज़्मा उत्पन्न करना जिसकी ऊष्मीय शक्ति इंजेक्ट की गई ऊष्मीय शक्ति से 10 गुना अधिक हो (Q = 10)।
ITER में भारत का योगदान
भारत निम्नलिखित का निर्माण और आपूर्ति कर रहा है:
- क्रायोस्टैट — टोकामैक को घेरने वाला निर्वात कक्ष (भारत का सबसे बड़ा योगदान)।
- इन-वॉल शील्डिंग।
- शीतलन जल प्रणालियाँ।
- क्रायोजेनिक प्रणालियाँ।
- आयन-साइक्लोट्रॉन और इलेक्ट्रॉन-साइक्लोट्रॉन RF हीटिंग प्रणालियाँ।
- नैदानिक न्यूट्रल बीम प्रणालियाँ।
- विद्युत आपूर्ति प्रणालियाँ।
चुनौतियाँ
- निवल ऊर्जा-लाभ को इग्निशन से आगे बढ़ाकर वाणिज्यिक स्तर तक ले जाना।
- पदार्थ विज्ञान — प्लाज़्मा-संपर्क सामग्री जो न्यूट्रॉन-बमबारी और ऊष्मा-प्रवाह सहन कर सके।
- ट्रिटियम का प्रजनन और संचालन — ट्रिटियम रेडियोधर्मी और दुर्लभ है; सतत संलयन को अपने ट्रिटियम का स्वयं प्रजनन करना होगा।
- क्रायोजेनिक और अति-चालक चुम्बक तकनीक का बड़े पैमाने पर उत्पादन।
- लागत और समय-सीमा — ITER की समय-सीमा बार-बार आगे बढ़ी है; पहला प्लाज़्मा अब 2033 के बाद का लक्ष्य है।
- कार्यबल — संलयन इंजीनियरों और प्लाज़्मा भौतिकविदों की वैश्विक कमी।
नैतिक एवं नीतिगत चिंताएँ
- समतापूर्ण पहुँच — संलयन ऊर्जा का प्रथम लाभ किसे मिलेगा?
- तकनीक-हस्तांतरण के जोखिम यदि वाणिज्यिक संलयन एकाधिकार बन जाए।
- द्वि-उपयोग चिंताएँ — उच्च-ऊर्जा लेज़र और चुम्बकीय तकनीकें।
- अवसर-लागत — दशकों तक चलने वाले सार्वजनिक निवेश बनाम तत्काल नवीकरणीय विस्तार।
भारत की स्थिति
ITER में प्रवेश ने भारत को विश्व के नाभिकीय अभिजात देशों में स्थान दिया है। स्वदेशी ADITYA-U और SST-1 टोकामैक भविष्य के भारतीय DEMO रिएक्टर के लिए इंजीनियरिंग आधार बना रहे हैं। वैश्विक स्तर पर निजी संलयन उपक्रमों (Commonwealth Fusion, TAE, Helion, Tokamak Energy) ने अरबों डॉलर के निवेश आकर्षित किए हैं, और भारत को यह तय करना होगा कि ऐसे उद्यमिता को कैसे सक्षम बनाए।
हाल के घटनाक्रम (2024-26)
- AI Action Summit, पेरिस (फ़रवरी 2025) — AI-संचालित प्लाज़्मा नियंत्रण को संलयन इग्निशन-नियंत्रण के एक मुख्य मार्ग के रूप में चर्चित किया गया।
- इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन — चुम्बक और नैदानिक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए कस्टम चिप आपूर्ति को सशक्त करता है।
- चंद्रयान-4 और गगनयान — सामग्री और क्रायोजेनिक्स विशेषज्ञता को आगे बढ़ाते हैं, जो संलयन R&D में काम आती है।
- राष्ट्रीय क्वांटम मिशन — पूरक अग्रवर्ती-विज्ञान मिशन; संलयन निदान में क्वांटम सेंसरों का उपयोग सम्भव।
- DPDP अधिनियम का संलयन अनुसंधान पर सीधा प्रभाव सीमित है, परंतु यह कार्मिक डेटा को नियंत्रित करता है।
- ITER का पहला प्लाज़्मा 2033 के बाद के लिए स्थगित (2024 में घोषित)।
- NIF ने 2023-24 में बढ़ती उपज के साथ कई इग्निशन प्राप्त किए।
- निजी संलयन स्टार्ट-अप्स ने वैश्विक स्तर पर 7 अरब डॉलर से अधिक जुटाए हैं; भारत परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत निजी-क्षेत्र संलयन नीति पर विचार कर रहा है।
- SST-1 का उन्नयन और SST-2 (भारत की अगली पीढ़ी की स्थिर-अवस्था संलयन मशीन) की संकल्पनात्मक डिज़ाइन प्रगति पर है।
यूपीएससी प्रासंगिकता
प्रारंभिक परीक्षा के लिए ड्यूटेरियम-ट्रिटियम अभिक्रिया, टोकामैक, ITER के साझेदार देश, भारत का क्रायोस्टैट योगदान, और IPR तथा SINP संस्थान याद रखें। GS III मुख्य परीक्षा के लिए संलयन स्वदेशी विज्ञान, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, स्वच्छ ऊर्जा और दीर्घकालिक सामरिक निवेश का प्रदर्शन उदाहरण है। नीतिशास्त्र और निबंध में संलयन धैर्यपूर्ण, सहयोगात्मक वैश्विक विज्ञान का रूपक हो सकता है। समकालीन प्रासंगिकता के लिए ITER के मील के पत्थरों और उभरते निजी संलयन उद्योग पर नज़र रखें।