पोषण अभियान, जिसका पूरा नाम प्रधानमंत्री समग्र पोषण योजना (Prime Minister’s Overarching Scheme for Holistic Nourishment, POSHAN) है, भारत का प्रमुख पोषण मिशन है। इसकी शुरुआत 8 मार्च 2018 को राजस्थान के झुंझुनू से हुई। मकसद है बच्चों, किशोरियों और गर्भवती व दूध पिलाने वाली महिलाओं में बौनापन (stunting), कुपोषण, खून की कमी (एनीमिया) और जन्म के समय कम वज़न को घटाना। यह मिशन समेकित बाल विकास सेवा (Integrated Child Development Services, ICDS) के पहले से चल रहे क़रीब 14 लाख आंगनवाड़ी केंद्रों के नेटवर्क पर टिका है। यह प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, किशोरियों के लिए योजना और राज्यों की अलग-अलग पोषण योजनाओं को एक साझा तकनीकी प्लेटफ़ॉर्म से जोड़ता है। UPSC भारत की लगातार बनी पोषण की कमी को पोषण अभियान के चश्मे से ही देखता है। दशकों की खाद्य सब्सिडी और ICDS के बाद भी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 5 (NFHS-5, 2019–21) में पाँच साल से कम उम्र के 35.5 प्रतिशत बच्चे बौने पाए गए, और 15–49 साल की 57 प्रतिशत महिलाओं में एनीमिया मिला।
UPSC की तैयारी करने वालों के लिए पोषण अभियान कई जगह एक साथ आता है: GS-II में कमज़ोर वर्गों की कल्याण योजनाएँ, GS-III में खाद्य सुरक्षा, और सामाजिक न्याय वाला वैकल्पिक विषय। निबंध और नीतिशास्त्र में भी यह कुपोषण, जीवन के पहले 1,000 दिन और जेंडर जैसे जुड़े विषयों के ज़रिए सामने आता है। 2025 के केंद्रीय बजट ने सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 के तहत एकीकृत आवंटन जारी रखा, जिससे साफ़ है कि यह मिशन अब स्थायी है।
पृष्ठभूमि: पोषण अभियान क्यों शुरू हुआ

भारत की पोषण कहानी एक उलटबाँसी है। एक तरफ़ अनाज के रिकॉर्ड भंडार हैं और 80 करोड़ लोगों तक पहुँचने वाली सार्वजनिक वितरण प्रणाली है, दूसरी तरफ़ दुनिया में बौने बच्चों की सबसे बड़ी आबादी में से एक भी यहीं है। नीति आयोग की 2017 की राष्ट्रीय पोषण रणनीति ने कहा कि असली रुकावट खाने की कमी नहीं है। रुकावट हैं बिखरी हुई योजनाएँ, अनियमित निगरानी और आख़िरी छोर पर कमज़ोर तालमेल। पोषण अभियान इसी का सरकारी जवाब था।
2018 में तय किए गए चार मुख्य लक्ष्य महत्वाकांक्षी थे, लेकिन साफ़ थे:
- बच्चों (0–6 साल) में बौनापन हर साल 2 प्रतिशत अंक घटाना
- कुपोषण (कम वज़न) हर साल 2 प्रतिशत अंक घटाना
- छोटे बच्चों, किशोरियों और महिलाओं में एनीमिया हर साल 3 प्रतिशत अंक घटाना
- जन्म के समय कम वज़न हर साल 2 प्रतिशत अंक घटाना
2022 तक मिशन को बौनेपन को NFHS-4 के 38.4 प्रतिशत के आधार स्तर से घटाकर 25 प्रतिशत पर लाना था। महामारी की रुकावट से यह लक्ष्य कुछ हद तक छूटता दिखा, फिर भी बाद के हर सर्वेक्षण को इसी पैमाने पर पढ़ा जाता है।
कुपोषण की पृष्ठभूमि
कुपोषण का बोझ कई तरह का है: बौनापन (लंबे समय की कमी), दुबलापन यानी वेस्टिंग (अचानक आई कमी), कम वज़न, एनीमिया और छिपी भूख (सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी)। भारत की चुनौती इन पाँचों में फैली है। इनके प्रकार समझने के लिए हमारा कुपोषण, अल्प-पोषण, अति-पोषण और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी वाला लेख देखिए।
ढाँचा: पोषण अभियान कैसे काम करता है
पोषण अभियान कोई नई कल्याण योजना नहीं है। यह एक तालमेल मिशन (convergence mission) है, यानी पहले से चल रहे कार्यक्रमों के ऊपर बैठी एक समन्वय की परत, जो उन्हें पोषण के ऐसे नतीजों की ओर धकेलती है जिन्हें मापा जा सके।
तालमेल: ICDS, PMMVY और किशोरियाँ
पहला स्तंभ तालमेल है। ICDS के तहत आंगनवाड़ी नेटवर्क पूरक पोषण, प्री-स्कूल शिक्षा, टीकाकरण और बढ़त की निगरानी (growth monitoring) देता है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY) पहले जीवित जन्म पर गर्भवती महिलाओं को ₹5,000 देती है (2022 के बदलाव के बाद दूसरी संतान बेटी होने पर ₹6,000)। किशोरियों के लिए योजना (Scheme for Adolescent Girls, SAG) मिशन की शुरुआत के समय 11–14 साल की स्कूल न जाने वाली लड़कियों को कवर करती थी; अप्रैल 2022 से यह आकांक्षी ज़िलों (Aspirational Districts) और पूर्वोत्तर के सभी ज़िलों में 14–18 साल की लड़कियों के लिए है। पहले हर कार्यक्रम का अपना रजिस्टर, अपना फ़ॉर्मेट और अपनी रिपोर्टिंग लाइन थी। पोषण अभियान इन्हें लाभार्थी के स्तर पर एक ही कामकाजी व्यवस्था में बाँध देता है, जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को भी दिखती है और ज़िला मजिस्ट्रेट को भी।
तकनीक: पोषण ट्रैकर
दूसरा स्तंभ पोषण ट्रैकर है, जो राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस प्रभाग (National e-Governance Division) का बनाया मोबाइल और वेब ऐप है। हर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता इसमें हाज़िरी, घर ले जाने वाले राशन, बढ़त की निगरानी (लंबाई, वज़न, MUAC) और घर के दौरों का डेटा उसी समय दर्ज करती है। इस प्लेटफ़ॉर्म पर अब 10 करोड़ से ज़्यादा पंजीकृत लाभार्थी और 13.7 लाख आंगनवाड़ी केंद्र हैं, जिससे यह दुनिया में कहीं भी मौजूद सबसे बड़े लाइव पोषण डेटासेट में से एक बन गया है। पोषण ट्रैकर गंभीर तीव्र कुपोषण (severe acute malnutrition) वाले बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्रों में भेजने के लिए चिह्नित भी करता है।
व्यवहार में बदलाव और जन आंदोलन
तीसरा स्तंभ समुदाय को साथ लाना है। हर सितंबर राष्ट्रीय पोषण माह के रूप में मनाया जाता है। इसमें राज्य-वार गतिविधियाँ होती हैं: शिशु और छोटे बच्चों को खिलाने के तरीक़े, एनीमिया, दस्त का इलाज और साफ़-सफ़ाई। मिशन पोषण को एक जन आंदोलन के रूप में पेश करता है, ताकि यह ऊपर से नीचे चलने वाली डिलीवरी योजना भर न रहे।
पोषण 2.0 और सक्षम आंगनवाड़ी
2021 में सरकार ने पोषण अभियान, आंगनवाड़ी सेवा योजना और किशोरियों के लिए योजना को मिलाकर एक एकीकृत पोषण सहायता कार्यक्रम बनाया, जिसका नाम है मिशन पोषण 2.0। इसकी धुरी सक्षम आंगनवाड़ी है।
सक्षम आंगनवाड़ी अगली पीढ़ी की आंगनवाड़ी है: बेहतर बुनियादी ढाँचा, LPG कनेक्शन, पानी और शौचालय की सुविधा, बढ़त नापने के उपकरण, और शुरुआती बचपन की देखभाल व शिक्षा के साधन। 15वें वित्त आयोग की अवधि में हर साल 40,000 के हिसाब से दो लाख आंगनवाड़ियों को सक्षम आंगनवाड़ी में बदला जाना है, और इसका पैसा मिशन सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 से आता है। पोषण 2.0 ज़ोर को साधनों (राशन) से हटाकर नतीजों (शरीर के माप में सुधार) पर ले जाता है। पूरक पोषण में मोटे अनाज (श्री अन्न) का इस्तेमाल होता है, और शिशु व माँ की देखभाल में AYUSH तरीक़े भी जोड़े गए हैं।
पोषण 2.0 के घटक
- आंगनवाड़ी सेवाएँ, जिनमें घर ले जाने वाला राशन और गरम पका भोजन शामिल है
- किशोरियों के लिए योजना (आकांक्षी ज़िलों और पूर्वोत्तर में 14–18 साल की लड़कियाँ)
- पोषण अभियान की तालमेल, तकनीक और जन आंदोलन वाली रणनीति
- सक्षम आंगनवाड़ी के बुनियादी ढाँचे का अपग्रेड
प्रदर्शन: NFHS-5 क्या बताता है
NFHS-5 का दौर (2019–21) पोषण अभियान की शुरुआत के बाद छपा पहला राष्ट्रव्यापी डेटा है। तस्वीर मिली-जुली है।
- पाँच साल से कम उम्र के बच्चों में बौनापन 38.4 प्रतिशत (NFHS-4, 2015–16) से घटकर 35.5 प्रतिशत हुआ, यानी लक्ष्य वाली रफ़्तार का क़रीब आधा
- कम वज़न वाले बच्चों का अनुपात 35.8 प्रतिशत से घटकर 32.1 प्रतिशत हुआ
- दुबलापन (wasting) 19.3 प्रतिशत पर लगभग वहीं का वहीं रहा
- 15–49 साल की महिलाओं में एनीमिया बिगड़ा, 53 प्रतिशत से बढ़कर 57 प्रतिशत हो गया
- 6–59 महीने के बच्चों में एनीमिया बिगड़ा, 58.6 प्रतिशत से बढ़कर 67.1 प्रतिशत हो गया
एनीमिया के इस उलटे रुझान के चलते एक समानांतर मिशन, एनीमिया मुक्त भारत, शुरू हुआ। इसे हमने अपने एनीमिया मुक्त भारत वाले लेख में समझाया है।
सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्य भी 20 प्रतिशत से नीचे नहीं हैं। NFHS-5 के मुताबिक़ बौनापन सिक्किम में 22.3 प्रतिशत, केरल में 23.4, तमिलनाडु में 25.0 और गोवा में 25.8 प्रतिशत है, और केरल व गोवा में तो यह NFHS-4 से बढ़ गया। बिहार, झारखंड, UP, मेघालय और गुजरात अब भी 35 प्रतिशत से ऊपर हैं। यह फ़र्क़ बताता है कि पोषण अभियान के नतीजे काफ़ी हद तक राज्य के शासन, महिला साक्षरता, साफ़-सफ़ाई और आंगनवाड़ी नेटवर्क की पहुँच पर टिके हैं।
पोषण अभियान के सामने चुनौतियाँ
पोषण अभियान का डिज़ाइन ठीक है। अड़चनें अमल और ढाँचे की हैं।
- आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के ख़ाली पद: राज्यों में AWW/AWH के 1.5 लाख से ज़्यादा पद ख़ाली बताए जाते हैं
- मानदेय और थकान: आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को महीने के ₹4,500–₹10,000 मिलते हैं, और अब पोषण ट्रैकर में डेटा भरने का काम भी उन्हीं पर है
- डिजिटल खाई: पोषण ट्रैकर स्मार्टफ़ोन और स्थिर नेटवर्क पर टिका है, और आदिवासी ब्लॉकों में दोनों ही कमज़ोर हैं
- पैसे का पूरा इस्तेमाल न होना: CAG की रिपोर्टों ने बताया कि कई राज्यों ने पोषण अभियान का पैसा लौटा दिया
- डेटा की गुणवत्ता: शरीर के माप में ग़लतियाँ बौनेपन और दुबलेपन के अनुमान बिगाड़ सकती हैं
- तालमेल की कमी: स्वास्थ्य (टीकाकरण), जल जीवन (पानी), स्वच्छ भारत (साफ़-सफ़ाई), शिक्षा (समग्र शिक्षा) और ग्रामीण विकास अब भी ब्लॉक स्तर पर अलग-अलग खाँचों में काम करते हैं
- एनीमिया का बिगड़ना: यह आयरन-फ़ोलिक एसिड की कमज़ोर सप्लाई चेन और किशोरों की कमज़ोर काउंसलिंग की ओर इशारा करता है
पोषण अभियान, शासन और संघवाद
पोषण अभियान केंद्र प्रायोजित योजना है। इसमें राज्यों के साथ लागत का बँटवारा 60:40 है, पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के साथ 90:10, और बिना विधानसभा वाले केंद्रशासित प्रदेशों के लिए 100 प्रतिशत। राज्य पोषण मिशन और ज़िला तालमेल कार्य योजनाएँ इसे ज़मीन पर उतारती हैं।
यह मिशन सहकारी संघवाद की मिसाल है: लक्ष्य केंद्र तय करता है, अमल राज्य करते हैं, और निगरानी पोषण ट्रैकर के ज़रिए साझा होती है। यह क्षमता के असंतुलन वाली समस्या भी दिखाता है। जिन राज्यों में आंगनवाड़ी नेटवर्क कमज़ोर है और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था और भी कमज़ोर, वे केंद्र का पैसा ठीक से ख़र्च ही नहीं कर पाते।
अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में पोषण अभियान
भारत ने 2025 तक के छह वैश्विक पोषण लक्ष्यों (Global Nutrition Targets) को अपनाया है, जिन्हें विश्व स्वास्थ्य सभा (World Health Assembly) ने 2012 में प्रस्ताव WHA65.6 से मंज़ूरी दी थी। भारत संयुक्त राष्ट्र के पोषण कार्रवाई दशक (UN Decade of Action on Nutrition, 2016–2025) से भी जुड़ा है, जिसका ऐलान संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2016 में किया था। ये ऐसी संधियाँ नहीं हैं जिन पर देश दस्तख़त करते हैं; ये प्रस्तावों के ज़रिए किए गए वादे हैं। सतत विकास लक्ष्य 2 (शून्य भूख) और SDG 3 (अच्छा स्वास्थ्य), ख़ासकर कुपोषण के हर रूप को ख़त्म करने वाले लक्ष्य 2.2 को पाने के लिए पोषण अभियान भारत का मुख्य घरेलू साधन है।
विश्व बैंक की भूमिका जितनी अक्सर बताई जाती है, उससे पहले की और छोटी थी। उसका ICDS सिस्टम्स स्ट्रेंथनिंग एंड न्यूट्रिशन इम्प्रूवमेंट प्रोजेक्ट (ISSNIP) 2012 में आठ राज्यों के लिए US$106 million के क़र्ज़ से शुरू हुआ, और 2018 में मंज़ूर US$200 million की अतिरिक्त रक़म ने पोषण अभियान के पहले चरण में 315 ज़िलों तक विस्तार में मदद की। यह प्रोजेक्ट 2022 में बंद हो गया; सक्षम आंगनवाड़ी का पैसा सरकार मिशन पोषण 2.0 से देती है। UNICEF और WFP पूरक पोषण के फ़ॉर्मूले और व्यवहार में बदलाव पर तकनीकी मदद देते हैं।
आगे की राह
नीति आयोग, विश्व बैंक और शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति की स्वतंत्र समीक्षाएँ पोषण अभियान के लिए लगभग एक जैसा नुस्ख़ा सुझाती हैं:
- आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के ख़ाली पद भरें और मानदेय बढ़ाएँ
- एनीमिया मुक्त भारत के तहत IFA की सप्लाई चेन और टेस्ट–ट्रीट–टॉक (Test–Treat–Talk) को मज़बूत करें
- पोषण ट्रैकर को स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली (HMIS) और आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट से जोड़ें
- पोषण 2.0 के तहत घर ले जाने वाले राशन से आगे बढ़कर फ़ोर्टिफ़ाइड अनाज और मोटे अनाज की ओर जाएँ
- जवाबदेही की इकाई राज्य का औसत नहीं, ज़िला पोषण योजना हो
- पहले 1,000 दिनों की काउंसलिंग मज़बूत करें: प्रसव से पहले की देखभाल, सिर्फ़ माँ का दूध, और ऊपरी आहार
- कामकाजी माँओं के लिए पालना योजना के तहत क्रेच बढ़ाएँ
निष्कर्ष
पोषण अभियान भारत की अब तक की सबसे बड़ी कोशिश है कि बिखरी हुई पोषण व्यवस्था को एक ऐसे मिशन में बदला जाए जो तकनीक पर चले, उसी समय की जानकारी दे और नतीजों से मापा जाए। NFHS-5 का डेटा बताता है कि सफ़र लंबा है: बौनापन घट रहा है लेकिन धीरे, और एनीमिया उलटी दिशा में जा रहा है। UPSC के लिए पोषण अभियान तालमेल वाले शासन का किताबी उदाहरण है: केंद्र का महत्वाकांक्षी डिज़ाइन, राज्यों का असमान अमल, और नतीजे मापने का ऐसा पैमाना जो किसी भी स्तर को बच निकलने नहीं देता।
सामान्य प्रश्न
पोषण अभियान क्या है?
पोषण अभियान प्रधानमंत्री समग्र पोषण योजना (Prime Minister’s Overarching Scheme for Holistic Nourishment) है, जो 8 मार्च 2018 को शुरू हुई। इसका मकसद ICDS, PMMVY, किशोरियों के कार्यक्रमों और उसी समय डेटा दर्ज करने वाले ट्रैकिंग प्लेटफ़ॉर्म के तालमेल से भारत में बौनापन, कुपोषण, एनीमिया और जन्म के समय कम वज़न को घटाना है।
पोषण अभियान कब और किस मंत्रालय ने शुरू किया?
पोषण अभियान 8 मार्च 2018 को राजस्थान के झुंझुनू से महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने शुरू किया।
पोषण अभियान के लक्ष्य क्या हैं?
लक्ष्य हैं: बौनापन और कम वज़न हर साल 2 प्रतिशत अंक घटाना, एनीमिया हर साल 3 प्रतिशत अंक घटाना, और जन्म के समय कम वज़न हर साल 2 प्रतिशत अंक घटाना।
पोषण ट्रैकर क्या है?
पोषण ट्रैकर NeGD का बनाया मोबाइल और वेब ऐप है। यह हर आंगनवाड़ी केंद्र से लाभार्थियों, बढ़त की निगरानी, घर ले जाने वाले राशन और घर के दौरों का डेटा उसी समय दर्ज करता है।
पोषण 2.0 और सक्षम आंगनवाड़ी क्या हैं?
पोषण 2.0 वह मिशन है जिसे 2021 में नए सिरे से बनाया गया। इसमें पोषण अभियान, आंगनवाड़ी सेवाएँ और किशोरियों के लिए योजना एक साथ जुड़ गए। सक्षम आंगनवाड़ी बेहतर बुनियादी ढाँचे वाला अपग्रेड किया गया आंगनवाड़ी केंद्र है, जिसका पैसा मिशन सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 से आता है।
NFHS-5 पोषण अभियान के नतीजों के बारे में क्या कहता है?
NFHS-5 (2019–21) के मुताबिक़ बौनापन 38.4 प्रतिशत से घटकर 35.5 प्रतिशत और कम वज़न 35.8 प्रतिशत से घटकर 32.1 प्रतिशत हुआ। लेकिन महिलाओं में एनीमिया बढ़कर 57 प्रतिशत और बच्चों में 67.1 प्रतिशत हो गया।
पोषण अभियान के लिए पैसा कैसे आता है?
यह केंद्र प्रायोजित योजना है। केंद्र और राज्य के बीच लागत का बँटवारा 60:40 है, पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10, और बिना विधानसभा वाले केंद्रशासित प्रदेशों के लिए पूरा 100 प्रतिशत पैसा केंद्र देता है।
पोषण अभियान को जन आंदोलन क्यों कहा जाता है?
इसे जन आंदोलन इसलिए कहा जाता है क्योंकि पोषण के नतीजे घर के व्यवहार पर टिके हैं: सिर्फ़ माँ का दूध, ऊपरी आहार, साफ़-सफ़ाई और खाने में विविधता। इसके लिए सिर्फ़ सामान पहुँचाना काफ़ी नहीं, पूरे समुदाय को साथ लाना पड़ता है।