73वें और 74वें संविधान संशोधन ने पंचायतों और नगरपालिकाओं को काम सौंपे। उन्हें पैसा देने की व्यवस्था अनुच्छेद 243-I के तहत बना राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission) थी। तीन दशक बाद हालत यह है कि काम तो पहुँच गए, पैसा बड़े हिस्से में नहीं पहुँचा। इसकी वजह एक के बाद एक होने वाली चार नाकामियों की कड़ी है, जिनमें हर नाकामी अगली को आसान बना देती है।
अनुच्छेद 243-I क्या माँगता है
हर राज्य के राज्यपाल को हर पाँच साल पर एक राज्य वित्त आयोग बनाना ज़रूरी है, जो पंचायतों और नगरपालिकाओं की वित्तीय हालत की समीक्षा करे और सुझाए कि राज्य के कर, शुल्क, पथकर और फ़ीस राज्य और उसके स्थानीय निकायों के बीच कैसे बाँटे जाएँ। यह अनुच्छेद 280 के तहत बने केंद्रीय वित्त आयोग का राज्य स्तरीय रूप है।
नाकामी की चार चरणों वाली कड़ी
पहला चरण: गठन में देरी। कई राज्य पाँच साल की संवैधानिक समय-सीमा के बरसों बाद आयोग बनाते हैं, और कुछ तो बनाते ही नहीं।
दूसरा चरण: रिपोर्ट देने में देरी। जो आयोग बन भी जाते हैं, वे रिपोर्ट देर से देते हैं, अक्सर तब जब अवार्ड अवधि शुरू हो चुकी होती है। जिस आयोग की सिफ़ारिशें बीच अवधि में आएँ, वह उन वित्तीय इंतज़ामों को दिशा नहीं दे सकता जो पहले ही तय हो चुके हैं।
तीसरा चरण: न सदन में रखी गई, न मानी गई, न लागू हुई। ये लगातार तीन और नाकामियाँ हैं। राज्य सरकारें SFC की सिफ़ारिशों को सलाह भर मानती हैं, उन्हें लागू करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है, और संसद में विभागीय स्थायी समिति की रिपोर्टों के लिए जिस तरह की “मानो या कारण बताओ” व्यवस्था सुझाई गई है, वैसी कोई शर्त यहाँ नहीं है।
चौथा चरण: तालमेल का अभाव। केंद्रीय वित्त आयोग और राज्य वित्त आयोग अलग-अलग समय-चक्रों पर चलते हैं और उनके बीच कोई समन्वय व्यवस्था नहीं है। नतीजा यह कि राज्य स्तर के हस्तांतरण के फ़ैसले उन केंद्रीय अवार्डों से नहीं जुड़ पाते जो उन्हें आंशिक रूप से पैसा देते हैं।
हर चरण अगले चरण को सही ठहराना आसान बना देता है। देर से बना आयोग देर से रिपोर्ट देगा; देर से आई रिपोर्ट को सदन में न रखना आसान है; और जो रिपोर्ट सदन में रखी ही न जाए, उसे कभी ठुकराया नहीं जाता, बस अनदेखा कर दिया जाता है।
इसे नाकाम होने क्यों दिया गया
सीधी बात यह है कि SFC राज्य सरकार से कहता है कि वह उन निर्वाचित स्थानीय निकायों को पैसा और कामकाजी स्वायत्तता दे, जिन पर अक्सर विरोधी दलों का कब्ज़ा होता है, और यह काम एक तय कानूनी अंतराल पर बार-बार दोहराए।
केंद्रीय वित्त आयोग इसलिए चलता है कि संघ एक स्थापित प्रक्रिया से संवैधानिक रूप से बँधा है, उसके अवार्ड संसद में रखे जाते हैं, और उन्हें लागू न करना सबको दिखता है। राज्य स्तर पर इन तीनों में से एक भी शर्त पूरी नहीं होती। SFC का संवैधानिक ढाँचा वही है, पर उसे लागू कराने वाला पूरा तंत्र गायब है।
16वें वित्त आयोग का दख़ल
16वें वित्त आयोग ने स्थानीय निकाय अनुदानों को SFC के समय पर गठन से जोड़ दिया। पालन के साथ आर्थिक नतीजा जोड़ने की यह पहली ढाँचागत कोशिश है, और यह सचमुच एक आगे बढ़ा कदम है।
इसमें एक साफ़ दिखती दिक्कत भी है, जिसे मान लेना चाहिए। यह शर्त सबसे ज़्यादा उन्हीं राज्यों पर भारी पड़ती है जो वित्तीय संकट में हैं, और वही राज्य हैं जिनके SFC सबसे ज़्यादा देर से बनते हैं। स्थानीय निकाय अनुदान रोककर दंडित करना उस राज्य सरकार को नहीं, बल्कि स्थानीय निकायों को सज़ा देता है, जबकि चूक सरकार की है। प्रोत्साहन सही व्यवहार की ओर तना है, पर उसका असर आंशिक रूप से ग़लत पक्ष पर गिरता है।
आगे का रास्ता
- गठन की कानूनी समय-सीमा। तय अवधि में SFC बनाने की कानूनी बाध्यता हो, न कि ऐसी संवैधानिक अपेक्षा जिसे तोड़ने पर कुछ नहीं होता।
- सदन में रखना अनिवार्य हो। रिपोर्ट और कृत कार्रवाई रिपोर्ट राज्य विधानमंडल के सामने रखना ज़रूरी किया जाए, जिससे चुप्पी एक दिखने वाला काम बन जाती है।
- मानो या कारण बताओ। कोई सिफ़ारिश ठुकराने वाले राज्य को उसकी वजह दर्ज करनी पड़े, जैसा दूसरे ARC और पंचायती राज मंत्रालय, दोनों ने सुझाया है।
- चक्रों में तालमेल बिठाएँ। संबंधित केंद्रीय वित्त आयोग की अवार्ड अवधि से करीब 18 महीने पहले SFC का गठन हो, ताकि दोनों एक-दूसरे में बैठ सकें।
- दंड की दिशा बदलें। जहाँ राज्य SFC नहीं बनाता, वहाँ अनुदान रोकने के बजाय सीधे स्थानीय निकायों को भेजे जाएँ, ताकि नियम न मानने की कीमत पंचायत नहीं, राज्य सरकार चुकाए।
भारत में स्थानीय स्वशासन संवैधानिक अधिकार की कमी से नाकाम नहीं हो रहा। वह इसलिए नाकाम हो रहा है कि जिस निकाय को उसे पैसा दिलाना था, उसे बिना किसी नतीजे के अनदेखा किया जा सकता है।
सामान्य प्रश्न
राज्य वित्त आयोग क्या है?
अनुच्छेद 243-I के तहत हर राज्य के राज्यपाल को हर पाँच साल पर गठित करना पड़ने वाला निकाय, जो पंचायतों और नगरपालिकाओं की वित्तीय हालत की समीक्षा करता है और सुझाता है कि राज्य के कर, शुल्क, पथकर और फ़ीस राज्य और उसके स्थानीय निकायों के बीच कैसे बाँटे जाएँ। यह केंद्रीय वित्त आयोग का राज्य स्तरीय रूप है।
नाकामी की चार चरणों वाली कड़ी क्या है?
पहला, SFC के गठन में देरी, जहाँ कई राज्य पाँच साल की संवैधानिक समय-सीमा चूक जाते हैं या आयोग बनाते ही नहीं। दूसरा, रिपोर्ट देने में देरी, जो अक्सर अवार्ड अवधि शुरू होने के बाद आती है। तीसरा, सिफ़ारिशों का न सदन में रखा जाना, न स्वीकार होना, न लागू होना, यानी लगातार तीन नाकामियाँ। चौथा, केंद्रीय वित्त आयोग के चक्र के साथ तालमेल का न होना।
देर से आई रिपोर्ट पूरा मक़सद क्यों चौपट कर देती है?
क्योंकि जिस आयोग की सिफ़ारिशें अवार्ड अवधि के आधे रास्ते में आएँ, वह उन्हीं वित्तीय इंतज़ामों को तय नहीं कर सकता जिनके लिए उसे बनाया गया था। राज्य अपने आवंटन तब तक कर चुका होता है, इसलिए रिपोर्ट ऐसी अवधि का दस्तावेज़ बनकर रह जाती है जो आंशिक रूप से बीत चुकी है।
SFC की सिफ़ारिशें लागू क्यों नहीं होतीं?
क्योंकि राज्य सरकारें उन्हें सलाह भर मानती हैं और उन्हें लागू करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। संसदीय स्तर पर विभागीय स्थायी समिति की रिपोर्टों के लिए जिस तरह की मानो या कारण बताओ व्यवस्था सुझाई गई है, वैसी कोई शर्त यहाँ नहीं है, इसलिए राज्य कुछ भी न करके निकल सकता है।
16वें वित्त आयोग ने इस बारे में क्या किया?
उसने स्थानीय निकाय अनुदानों को राज्य वित्त आयोग के समय पर गठन की शर्त से बाँध दिया, जो पालन के लिए पहला आर्थिक प्रोत्साहन है। दिक्कत यह है कि यह शर्त सबसे ज़्यादा उन्हीं वित्तीय संकट वाले राज्यों पर भारी पड़ती है, जिनके SFC सबसे ज़्यादा देर से बनते हैं।
तालमेल की समस्या क्या है?
केंद्रीय वित्त आयोग और राज्य वित्त आयोग अलग-अलग समय-चक्रों पर चलते हैं और उनके बीच कोई समन्वय व्यवस्था नहीं है। ठीक तालमेल के लिए SFC का गठन संबंधित केंद्रीय वित्त आयोग की अवार्ड अवधि से करीब 18 महीने पहले होना चाहिए, जो अनुशासन ज़्यादातर राज्य नहीं निभा सके हैं।
स्थानीय शासन के लिए यह क्यों मायने रखता है?
क्योंकि 73वें और 74वें संशोधन ने पंचायतों और नगरपालिकाओं को काम तो सौंप दिए, पर पैसा अपने आप नहीं सौंपा। SFC वही संवैधानिक ज़रिया है जिससे पैसे को काम के पीछे-पीछे पहुँचना था। वह नाकाम होता है तो स्थानीय निकायों के पास ज़िम्मेदारियाँ रह जाती हैं, संसाधन नहीं।
कौन से सुधार सुझाए गए हैं?
तय समय-सीमा में SFC गठित करने की कानूनी बाध्यता, रिपोर्ट को राज्य विधानमंडल में रखना अनिवार्य करना, सिफ़ारिशों पर मानो या कारण बताओ की शर्त, और SFC के चक्र को केंद्रीय वित्त आयोग के चक्र से जोड़ना। ये सब मिलकर एक ढीली परंपरा को लागू कराने लायक बाध्यता में बदल देंगे।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
- राज्य वित्त आयोग का प्रावधान किस अनुच्छेद में है?
(a) अनुच्छेद 243-I
(b) अनुच्छेद 243K
(c) अनुच्छेद 280
(d) अनुच्छेद 243ZD
उत्तर: (a) अनुच्छेद 243-I राज्यपाल से हर पाँच साल पर राज्य वित्त आयोग गठित करने को कहता है; अनुच्छेद 280 केंद्रीय वित्त आयोग से जुड़ा है। - 16वें वित्त आयोग ने स्थानीय निकाय अनुदानों को किससे जोड़ा?
(a) संपत्ति कर वसूली की दर
(b) राज्य वित्त आयोग के समय पर गठन
(c) जनसंख्या का आकार
(d) शहरीकरण का स्तर
उत्तर: (b) उसने स्थानीय निकाय अनुदानों को SFC के समय पर गठन की शर्त से बाँधा, जो पालन के लिए पहला आर्थिक प्रोत्साहन है। - ठीक तालमेल के लिए SFC का गठन केंद्रीय वित्त आयोग की अवार्ड अवधि से लगभग कितने समय पहले होना चाहिए?
(a) 6 महीने
(b) 12 महीने
(c) 18 महीने
(d) 36 महीने
उत्तर: (c) करीब 18 महीने, जो अनुशासन ज़्यादातर राज्य नहीं निभा सके हैं। - राज्य सरकारें SFC की सिफ़ारिशों को किस रूप में लेती हैं?
(a) बाध्यकारी
(b) सलाहकारी, जिन्हें लागू करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं
(c) राष्ट्रपति की मंज़ूरी पर निर्भर
(d) उच्च न्यायालय में लागू कराने योग्य
उत्तर: (b) मानो या कारण बताओ जैसी कोई बाध्यता नहीं है, इसलिए सिफ़ारिशों पर कोई कार्रवाई न करना भी चल जाता है। - SFC का संवैधानिक उद्देश्य क्या है?
(a) स्थानीय निकायों के खातों का ऑडिट करना
(b) राज्य के करों और शुल्कों के राज्य और स्थानीय निकायों के बीच बँटवारे की सिफ़ारिश करना
(c) स्थानीय निकाय चुनाव कराना
(d) नगरपालिका के कर्ज़ को मंज़ूरी देना
उत्तर: (b) यह स्थानीय निकायों की वित्तीय हालत की समीक्षा करता है और सुझाता है कि राज्य का राजस्व उनके साथ कैसे बाँटा जाए।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- राज्य वित्त आयोग हस्तांतरित कार्यों और हस्तांतरित वित्त के बीच संवैधानिक कड़ी है। परीक्षण कीजिए कि यह नाकाम क्यों रहा। (250 शब्द)
- भारत में स्थानीय निकायों के पास ज़िम्मेदारियाँ हैं, संसाधन नहीं। राज्य वित्त आयोगों की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)
- स्थानीय निकाय अनुदानों को SFC के समय पर गठन से जोड़ने के 16वें वित्त आयोग के फ़ैसले का मूल्यांकन कीजिए। (150 शब्द)
- राज्य वित्त आयोग की सिफ़ारिशों को लागू कराने योग्य बनाने के लिए कानूनी सुधार सुझाइए। (250 शब्द)
- राज्य और केंद्रीय वित्त आयोग के चक्रों में तालमेल बिठाने के पक्ष में तर्कों पर चर्चा कीजिए। (150 शब्द)