1978 में संसद ने अनुच्छेद 74 में संशोधन करके मंत्रिमंडल की सलाह को राष्ट्रपति पर बाध्यकारी बना दिया। अनुच्छेद 163 को उसने छुआ तक नहीं। केंद्र-राज्य टकराव के पचास साल इसी खाई से होकर गुज़रे हैं, क्योंकि राज्यपाल का विवेकाधिकार, राष्ट्रपति के उलट, न कभी परिभाषित हुआ और न कभी सीमित।
इसलिए राज्यपाल की भूमिका संवैधानिक अस्पष्टता का ऐसा नमूना है जिसे राजनीतिक फ़ायदे ने लगातार और चौड़ा किया है।
संवैधानिक विरोधाभास
अनुच्छेद 153 कहता है कि हर राज्य में एक राज्यपाल होगा। अनुच्छेद 155 नियुक्ति का अधिकार राष्ट्रपति को देता है, यानी व्यवहार में केंद्र सरकार को। अनुच्छेद 156 कहता है कि राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (during the President’s pleasure) पद पर रहता है।
तीनों को एक साथ रखिए और विरोधाभास सामने आ जाता है। राष्ट्रपति को महाभियोग के बिना हटाया नहीं जा सकता। राज्यपाल को कभी भी, बिना कोई वजह बताए हटाया जा सकता है। जिस पद को राज्य के भीतर संवैधानिक अंकुश का काम करना है, वह पूरी तरह केंद्र की मर्ज़ी पर टिका है।
इससे बनने वाला प्रोत्साहन साफ़ है, और यह व्यक्तिगत नहीं, ढाँचागत है। जो राज्यपाल केंद्र को नाराज़ करेगा, वह हटाया जा सकता है। इससे दबाव बनता है कि वह संविधान का प्रहरी नहीं, केंद्र का एजेंट बनकर काम करे।
संविधान सभा की बहसों में दिखने वाला आंबेडकर का इरादा इसका उलटा था: आपात स्थिति में केंद्र का प्रतिनिधि और बाकी समय संविधान का प्रहरी, न कि सत्ता का समानांतर केंद्र या चुनी हुई सरकार का राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी।
विवेकाधिकार की समस्या
अनुच्छेद 163 कहता है कि राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर काम करेगा, सिवाय उन मामलों के जिनमें संविधान उससे अपने विवेक से काम करने की अपेक्षा करता है।
यही अपवाद पूरी समस्या है। इसे कभी कानून बनाकर परिभाषित नहीं किया गया। शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974) में कहा गया कि राज्यपाल को लगभग हर मामले में मंत्रिमंडल की सलाह पर ही चलना है, लेकिन कोई फैसला हर संभावित स्थिति पहले से गिना नहीं सकता, और बची हुई जगह व्यवहार में लगातार बढ़ती गई: विधेयकों को स्वीकृति रोकना, विधेयकों को अनिश्चित काल तक दबाए रखना, कुलपतियों की नियुक्ति पर कब्ज़ा, पक्षपाती सार्वजनिक बयान।
अनुच्छेद 74 से तुलना ही सुधार का सबसे पैना तर्क है। संसद ने ठीक यही अस्पष्टता 1978 में संघ के स्तर पर दुरुस्त कर दी और राज्य के स्तर पर जस की तस छोड़ दी।
नियुक्ति: राजनीतिकरण का चक्र
अनुच्छेद 155 मुख्यमंत्री से किसी परामर्श की माँग नहीं करता। सरकारिया आयोग (1988) ने परामर्श की जो परंपरा सुझाई थी, उसका पालन कम और उल्लंघन ज़्यादा हुआ है। केंद्र में सरकार बदलने पर राज्यपालों की थोक बदली, 2004 में और फिर 2014 में, इस पद के दलगत चक्र का सबसे साफ़ उदाहरण है।
सरकारिया की पाँच कसौटियाँ: सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित हो, उस राज्य से बाहर का हो, हाल का सक्रिय राजनेता न हो, स्थानीय राजनीति से जुड़ा न हो, और नियुक्ति मुख्यमंत्री से अनिवार्य परामर्श के बाद हो। इनमें से किसी को कानूनी दर्जा नहीं मिला।
NCRWC (2002) ने नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, गृह मंत्री और संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री की समिति सुझाई, जिससे यह प्रक्रिया एक तय व्यवस्था बन जाती और मुख्यमंत्री को संवैधानिक रूप से अहम आवाज़ मिलती। किसी सरकार ने इसे लागू नहीं किया।
सरकारिया और पुंछी, दोनों ने साफ़ कहा कि सेवारत या हाल में सेवानिवृत्त हुए नौकरशाहों और सेना प्रमुखों को राज्यपाल न बनाया जाए। व्यवहार इसके ठीक उलट दिशा में गया है।
हटाना: प्रसादपर्यंत से सीमाओं तक
अनुच्छेद 156 में हटाने की कोई प्रक्रिया नहीं है, कोई तय आधार नहीं है और संसद की कोई भूमिका नहीं है।
बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ (2010) में कहा गया कि किसी राज्यपाल को सिर्फ़ वैचारिक असहमति या केंद्र का भरोसा खोने के आधार पर नहीं हटाया जा सकता, और प्रसादपर्यंत का सिद्धांत मनमाने ढंग से इस्तेमाल नहीं हो सकता। कोर्ट ने सिद्धांत को रूप में बनाए रखा और सार में सीमित कर दिया: बिना कारण बताए हटाना अब भी वैध है, पर राजनीतिक रूप से इसकी समीक्षा हो सकती है।
पुंछी आयोग (2010) इससे आगे गया और सुझाया कि अनुच्छेद 61 वाली महाभियोग प्रक्रिया राज्यपालों पर यथावश्यक परिवर्तन सहित (mutatis mutandis) लागू हो, जिसमें संसद का बहुमत, जाँच और तय आधार ज़रूरी हों। इससे यह पद केंद्र का औज़ार न रहकर एक स्वतंत्र संवैधानिक पद बन जाता।
सुधार क्यों नहीं हुआ
यही सवाल जवाब माँगता है, क्योंकि सिफ़ारिशें करीब चालीस साल से एक जैसी और सभी दलों के बीच साझा रही हैं।
वजह यह है कि हर दल को मौजूदा व्यवस्था तब फ़ायदा देती है जब वह केंद्र में सत्ता में हो, और वही दल राज्यों में विपक्ष में रहते हुए इस पर आपत्ति करता है। सुधार का मतलब है कि सत्ताधारी दल आज अपने हाथ में मौजूद औज़ार छोड़ दे, उस सुरक्षा के बदले जिसकी ज़रूरत उसे बाद में पड़ेगी। किसी भी सरकार के लिए यह कठिन सौदा है, और यही बताता है कि सरकारिया, NCRWC और पुंछी एक जैसे नतीजों तक पहुँचकर भी बेअसर क्यों रहे।
कसौटी का सबसे अच्छा बयान आज भी पुंछी का ही है: विवेकाधिकार का इस्तेमाल तर्क से तय हो, सद्भाव से चले और सावधानी से संयमित रहे।
आगे का रास्ता
- अनुच्छेद 163 का विवेकाधिकार कानून बनाकर परिभाषित हो, जिसमें वे सीमित स्थितियाँ गिनाई जाएँ जहाँ स्वतंत्र निर्णय लागू होता है।
- स्वीकृति के लिए समय-सीमा तय हो, क्योंकि अनिश्चित देरी आज का सबसे आम दुरुपयोग है और इसे सुधारना सबसे आसान भी।
- नियुक्ति एक तय व्यवस्था से हो, NCRWC वाली समिति के मॉडल से, ताकि मुख्यमंत्री को औपचारिक आवाज़ मिले।
- कार्यकाल की सुरक्षा मिले, पुंछी की महाभियोग जैसी प्रक्रिया के ज़रिए, जिससे केंद्र को खुश रखने की मजबूरी खत्म हो।
- कुलाधिपति की भूमिका राज्यपाल के पद से अलग हो, जिससे विश्वविद्यालय नियुक्तियों में बार-बार होने वाले टकराव की पूरी श्रेणी ही हट जाएगी।
यह पद इसलिए नाकाम नहीं हो रहा कि उस पर गलत लोग बैठे हैं। यह इसलिए नाकाम हो रहा है कि ढाँचा एक केंद्रीय नियुक्ति को अपरिभाषित अधिकार और शून्य सुरक्षा देता है, और फिर उससे स्वतंत्रता की उम्मीद करता है।
सामान्य प्रश्न
राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति क्या है?
अनुच्छेद 153 के अनुसार हर राज्य में एक राज्यपाल होगा, जिसकी नियुक्ति अनुच्छेद 155 के तहत राष्ट्रपति करते हैं और जो अनुच्छेद 156 के तहत राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर रहता है। व्यवहार में इसका मतलब है एक केंद्रीय नियुक्ति, जिसे कभी भी बिना कारण बताए हटाया जा सकता है, जबकि राष्ट्रपति को केवल महाभियोग से ही हटाया जा सकता है।
इस पद के मूल में विरोधाभास क्या है?
राज्यपाल एक संघीय पदाधिकारी है, पर उसे संघीय स्तर की कार्यकाल सुरक्षा नहीं मिली। इस पद को राज्य के भीतर संवैधानिक अंकुश का काम करना है, फिर भी उसका बने रहना पूरी तरह केंद्र सरकार की मर्ज़ी पर टिका है, जिससे यह प्रोत्साहन बनता है कि वह संविधान का प्रहरी नहीं, केंद्र का एजेंट बनकर काम करे।
अनुच्छेद 163 विवेकाधिकार के बारे में क्या कहता है?
राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर काम करता है, सिवाय उन मामलों के जिनमें संविधान उससे अपने विवेक से काम करने की अपेक्षा करता है। अनुच्छेद 74 में 1978 में संशोधन कर मंत्रिमंडल की सलाह राष्ट्रपति पर बाध्यकारी बना दी गई, लेकिन अनुच्छेद 163 का विवेकाधिकार वाला अपवाद कभी कानून बनाकर परिभाषित नहीं हुआ, और इसी अस्पष्ट जगह को राज्यपाल लगातार बढ़ाते रहे हैं।
शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य में क्या तय हुआ?
1974 के फैसले में कहा गया कि राज्यपाल को लगभग हर मामले में मंत्रिमंडल की सलाह पर ही चलना होगा, और विवेकाधिकार बहुत सीमित स्थितियों तक ही है। व्यावहारिक दिक्कत यह है कि फैसला उन स्थितियों की पूरी सूची न दे सका और न दे सकता था।
इस पद को लेकर आंबेडकर का इरादा क्या था?
संविधान सभा की बहसें दिखाती हैं कि आंबेडकर ने राज्यपाल को आपात स्थिति में केंद्र के प्रतिनिधि और बाकी समय संविधान के प्रहरी के रूप में देखा था, न कि सत्ता के समानांतर केंद्र या चुनी हुई राज्य सरकार के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में।
नियुक्तियों पर सरकारिया आयोग ने क्या सुझाया?
पाँच कसौटियाँ: राज्यपाल सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित हो, उस राज्य से बाहर का हो, हाल का सक्रिय राजनेता न हो, स्थानीय राजनीति से जुड़ा न हो, और नियुक्ति मुख्यमंत्री से अनिवार्य परामर्श के बाद ही हो। इन पाँच में से किसी को कानूनी दर्जा नहीं दिया गया।
NCRWC ने क्या सिफ़ारिश की?
संविधान के कामकाज की समीक्षा करने वाले राष्ट्रीय आयोग ने 2002 में सुझाया कि राज्यपालों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, गृह मंत्री और संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री की समिति करे, जिससे यह प्रक्रिया एक तय व्यवस्था बन जाए और मुख्यमंत्री को संवैधानिक रूप से अहम आवाज़ मिले। यह लागू नहीं हुआ।
बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ में क्या फैसला आया?
2010 के फैसले में कहा गया कि किसी राज्यपाल को सिर्फ़ वैचारिक असहमति की वजह से या इसलिए नहीं हटाया जा सकता कि केंद्र सरकार का उन पर भरोसा नहीं रहा, और अनुच्छेद 156 का प्रसादपर्यंत सिद्धांत मनमाने ढंग से इस्तेमाल नहीं हो सकता। कोर्ट ने सिद्धांत को रूप में बनाए रखा और सार में सीमित कर दिया।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
- किस अनुच्छेद के तहत राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर रहता है?
(a) अनुच्छेद 153
(b) अनुच्छेद 155
(c) अनुच्छेद 156
(d) अनुच्छेद 163
उत्तर: (c) अनुच्छेद 156 प्रसादपर्यंत का सिद्धांत तय करता है; अनुच्छेद 155 नियुक्ति और अनुच्छेद 153 पद की व्यवस्था करता है। - अनुच्छेद 163 अनुच्छेद 74 से किस बात में अलग है?
(a) यह मंत्रिमंडल की सलाह को बाध्यकारी बनाता है
(b) इसका विवेकाधिकार वाला अपवाद कभी कानून बनाकर परिभाषित नहीं हुआ
(c) यह सिर्फ़ आपातकाल में लागू होता है
(d) इसमें संसद की मंज़ूरी ज़रूरी है
उत्तर: (b) अनुच्छेद 74 में 1978 में संशोधन कर मंत्रिमंडल की सलाह राष्ट्रपति पर बाध्यकारी बनाई गई; अनुच्छेद 163 का विवेकाधिकार आज भी अपरिभाषित है। - शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974) में क्या तय हुआ?
(a) राज्यपाल के पास असीमित विवेकाधिकार है
(b) राज्यपाल को लगभग हर मामले में मंत्रिमंडल की सलाह माननी होगी
(c) राज्यपाल जब चाहे मुख्यमंत्री को हटा सकता है
(d) राज्यपाल राज्य विधानमंडल के प्रति जवाबदेह है
उत्तर: (b) इस फैसले ने राज्यपाल के विवेकाधिकार को बहुत सीमित स्थितियों तक बाँध दिया। - सरकारिया आयोग के अनुसार राज्यपाल कैसा होना चाहिए?
(a) सेवारत नौकरशाह
(b) उसी राज्य का निवासी
(c) हाल का सक्रिय राजनेता न हो और उस राज्य से बाहर का हो
(d) राज्य विधानमंडल द्वारा नामित
उत्तर: (c) सरकारिया की कसौटियों में सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठा, राज्य से बाहर का होना, हाल का सक्रिय राजनेता न होना और मुख्यमंत्री से अनिवार्य परामर्श शामिल थे। - बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ (2010) से क्या स्थापित हुआ?
(a) राज्यपालों को हटाया ही नहीं जा सकता
(b) सिर्फ़ वैचारिक असहमति के आधार पर हटाना जायज़ नहीं
(c) हर बर्खास्तगी को संसद की मंज़ूरी चाहिए
(d) राज्यपाल का कार्यकाल छह साल तय है
उत्तर: (b) कोर्ट ने कहा कि प्रसादपर्यंत का सिद्धांत मनमाने ढंग से इस्तेमाल नहीं हो सकता, हालाँकि सिद्धांत को रूप में बनाए रखा गया।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- राज्यपाल एक संघीय पदाधिकारी है, पर उसे संघीय स्तर की कार्यकाल सुरक्षा नहीं मिली। यह विरोधाभास केंद्र-राज्य संबंधों को कैसे गढ़ता है, परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)
- अनुच्छेद 163 का अपरिभाषित विवेकाधिकार भारतीय संघवाद में संवैधानिक टकराव का मुख्य स्रोत बन चुका है। आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)
- राज्यपाल के पद पर एक के बाद एक आयोगों ने लगभग एक जैसी सिफ़ारिशें दीं, फिर भी अमल नहीं हुआ। इसके कारणों पर चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
- राज्यपालों पर महाभियोग जैसी हटाने की प्रक्रिया लागू करने के पुंछी आयोग के प्रस्ताव का मूल्यांकन कीजिए। (150 शब्द)
- अनुच्छेद 156 के प्रसादपर्यंत सिद्धांत पर न्यायिक सीमाओं की चर्चा कीजिए। (150 शब्द)