समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन (Community-Based Disaster Management) का मतलब है — तैयारी, बचाव और पुनर्वास की क्षमता उसी समुदाय के भीतर खड़ी करना जिस पर आपदा गिरती है। इसकी बुनियाद एक ढाँचागत सच्चाई है: किसी भी आपदा में पहला बचावकर्ता कभी सरकार नहीं होती। वह पड़ोसी होता है। सरकारी टीमें तब पहुँचती हैं जब वह समय-खिड़की बंद हो चुकी होती है जिसमें सबसे ज़्यादा जानें बचती हैं। यही वजह है कि सामुदायिक भागीदारी आपदा प्रबंधन की नींव है, कोई ऊपर से जोड़ी गई चीज़ नहीं।
समुदाय ही नींव क्यों है
- गोल्डन आवर (golden hour) समुदाय का होता है। भूकंपों पर हुए अध्ययन बार-बार यही दिखाते हैं कि ज़िंदा निकाले गए लोगों में से ज़्यादातर को पहले कुछ घंटों में वही लोग बाहर खींचते हैं जो पहले से वहीं मौजूद थे।
- स्थानीय जानकारी कहीं और से नहीं आ सकती। गाँव या मोहल्ले के लोग जानते हैं कि कौन-सा नाला पहले भरता है, कौन-सी ढलान खिसकती है, और कितनी बारिश में कौन-सी गली डूब जाती है। बाहर से आई कोई एजेंसी यह जानकारी साथ लेकर नहीं आती।
- कमज़ोर लोगों की सूची स्थानीय स्तर पर ही रहती है। कौन दिव्यांग है, कौन गर्भवती है, कौन बुज़ुर्ग अकेला रहता है — यह सूची सिर्फ़ पड़ोस के पास होती है।
- चेतावनी को आख़िरी छोर तक पहुँचाना पड़ता है। पूर्व चेतावनी (early warning) तभी काम करती है जब कोई घर-घर जाकर बताए और लोग उस संदेश पर इतना भरोसा करें कि घर छोड़ दें।
- पुनर्निर्माण राहत दलों के जाने के बाद भी चलता रहता है। बाहरी एजेंसियाँ लौट जाती हैं; समुदाय वहीं रहता है, इसलिए लंबी अवधि का पुनर्निर्माण उसी के कंधों पर टिकता है।
भारत से मिले प्रमाण
ओडिशा की चक्रवात तैयारी
पूरे भारत में सबसे साफ़ उदाहरण यही है। 1999 के महाचक्रवात में मौतें लगभग 10,000 थीं, जबकि उसी ताक़त के बाद के चक्रवातों में यह संख्या गिनी-चुनी रह गई। एक ही अभियान में करीब दस लाख लोगों को सुरक्षित हटाया जा चुका है।
- ओडिशा राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अंतर्गत गाँव स्तर की आपदा प्रबंधन समितियाँ।
- शेल्टर प्रबंधन समितियाँ, जो बहुउद्देश्यीय चक्रवात आश्रयों की देखरेख सिर्फ़ चेतावनी के समय नहीं, पूरे साल करती हैं।
- प्रशिक्षित सामुदायिक स्वयंसेवक और ओडिशा आपदा त्वरित कार्य बल (ODRAF)।
- नियमित मॉक ड्रिल और ऐसी चेतावनी श्रृंखला जो घर तक पहुँचती है।
भारत के दूसरे उदाहरण
- केरल बाढ़, 2018। मछुआरा समुदाय की नावें ही बचाव बेड़ा बन गईं और उन्होंने कई हज़ार लोगों को निकाला — पानी और इलाक़े की वह समझ किसी बाहरी एजेंसी के पास नहीं थी।
- भुज, 2001। मालिक-संचालित पुनर्निर्माण (owner-driven reconstruction), जिसमें परिवारों को पैसा और तकनीकी मदद देकर ख़ुद घर बनवाए गए, ठेकेदार वाले मॉडल से बेहतर निकला — भूकंपरोधी मानकों का पालन ज़्यादा हुआ।
- आपदा मित्र। NDMA की यह योजना सबसे ज़्यादा आपदा-प्रवण ज़िलों में सामुदायिक स्वयंसेवकों को खोज, बचाव और प्राथमिक उपचार का प्रशिक्षण देती है। मक़सद साफ़ है — क्षमता गाँव में ही बने, बाहर से आए नहीं।
- पारंपरिक ज्ञान। असम के खंभों पर बने घर और सामुदायिक नाव नेटवर्क, सुंदरबन में तटबंधों की देखरेख, और हिमालय की वे बस्तियाँ जो हिमस्खलन के जाने-पहचाने रास्तों से हटकर बसाई जाती हैं।
- शहरी। मुंबई के वार्ड स्तर के मानसून स्वयंसेवक और रेज़िडेंट वेलफ़ेयर एसोसिएशन के नेटवर्क।
संस्थाओं का ढाँचा
- आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 NDMA-SDMA-DDMA का ढाँचा बनाता है, और ज़िला आपदा प्रबंधन योजना वह जगह है जहाँ सामुदायिक भागीदारी को औपचारिक रूप से रखा गया है।
- सेंडाई फ़्रेमवर्क की प्राथमिकता 4 — बेहतर बचाव के लिए तैयारी बढ़ाना और पुनर्निर्माण को पहले से मज़बूत बनाना — सीधे-सीधे समुदाय पर टिकी है, और भारत ने इस पर दस्तख़त किए हैं।
- आपदा मित्र, नागरिक सुरक्षा (Civil Defence), NCC, NSS और नेहरू युवा केंद्र संगठन स्वयंसेवकों का आधार देते हैं।
- पंचायतें और शहरी स्थानीय निकाय वे संवैधानिक इकाइयाँ हैं जिनके ज़रिए यह भागीदारी चलनी चाहिए।
- कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल (Common Alerting Protocol) और सचेत प्लेटफ़ॉर्म तय इलाक़े के हर मोबाइल पर कई भाषाओं में चेतावनी भेज देते हैं, लेकिन वह चेतावनी लोगों के घर छोड़ने में तभी बदलती है जहाँ पहले से सामुदायिक ड्रिल होती रही हो।
चुनौतियाँ
- दिखावे की भागीदारी। अक्सर भागीदारी का मतलब होता है — योजना लिख लेने के बाद एक सलाह-बैठक करा लेना और उसे काग़ज़ पर दर्ज कर देना। यही सबसे आम नाकामी है।
- क्षमता और प्रशिक्षण की कमी। गाँव की आपदा प्रबंधन योजनाएँ काग़ज़ पर मौजूद रहती हैं, पर ड्रिल और उपकरण के बिना निष्क्रिय पड़ी रहती हैं।
- आपदा की याद का मिट जाना। किसी बड़ी घटना के कुछ साल बाद स्वयंसेवक नेटवर्क बिखर जाते हैं, क्योंकि तैयारी के लिए लगातार पैसा नहीं मिलता।
- सामाजिक बहिष्कार। महिलाएँ, दलित, दिव्यांग और प्रवासी मज़दूर सबसे ज़्यादा असुरक्षित होते हैं, फिर भी गाँव की समितियों में अक्सर उनका प्रतिनिधित्व नहीं होता।
- पलायन और जनसंख्या का ढाँचा। कामकाजी उम्र के पुरुषों के बाहर चले जाने से पहाड़ी और तटीय गाँवों में बचाव क्षमता पतली पड़ जाती है।
- शहरों का अजनबीपन। शहरों में पड़ोस के रिश्ते कमज़ोर होते हैं, इसलिए गाँव वाला मॉडल सीधे वहाँ नहीं चलता।
- पैसा और संस्थाओं में जगह। ज़िला प्राधिकरणों के पास सामुदायिक कार्यक्रमों के लिए अलग बजट मद शायद ही होती है, और आपदा कोष तैयारी से ज़्यादा राहत की तरफ़ झुके रहते हैं।
- चेतावनी से ऊब। बार-बार झूठे अलार्म बजने पर परिवार घर छोड़ने से मना करने लगते हैं — ओडिशा और आंध्र दोनों तटों पर यह देखा गया है।
इसे मज़बूत करने के उपाय
- गाँव और वार्ड की आपदा प्रबंधन योजनाएँ अनिवार्य हों, उनके लिए अलग पैसा तय हो, और हर साल ड्रिल से उन्हें जाँचा जाए — वे सिर्फ़ फ़ाइल में रखी न रह जाएँ।
- आपदा मित्र का विस्तार हो और प्रशिक्षित स्वयंसेवकों को मानदेय मिले, ताकि नेटवर्क दो आपदाओं के बीच के सालों में भी ज़िंदा रहे।
- समितियों में महिलाओं, दिव्यांगों और हाशिये के समूहों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया जाए, और घर-स्तर पर कमज़ोर लोगों का रजिस्टर रखा जाए।
- आपदा शिक्षा स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम में आए, और NCC, NSS और नेहरू युवा केंद्र संगठन को ज़िला योजनाओं से औपचारिक रूप से जोड़ा जाए।
- पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों को तैयारी के लिए अलग बजट मद मिले, ताकि भागीदारी को संस्थाओं के भीतर पक्का आर्थिक आधार मिल सके।
- प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान (impact-based forecasting) और साफ़ स्थानीय भाषा के संदेशों से चेतावनी की विश्वसनीयता बढ़ाई जाए।
- पारंपरिक ज्ञान को औपचारिक योजनाओं में दर्ज किया जाए, क्योंकि वह अक्सर वैज्ञानिक ख़तरा-नक़्शे से भी ज़्यादा जगह-विशेष होता है।
- शहरों के लिए अलग मॉडल बने, जिसमें प्रशिक्षण की इकाई रेज़िडेंट वेलफ़ेयर एसोसिएशन, बाज़ार संघ और हाउसिंग सोसाइटी हों।
तकनीक चेतावनी बनाती है; उस पर काम समुदाय करता है। जो चेतावनी पहुँच तो जाए पर जिस पर भरोसा न हो, वह किसी की जान नहीं बचाती। इसीलिए आख़िरी छोर तक पहुँचाने वाले प्लेटफ़ॉर्म उतने ही क़ीमती हैं जितनी उनसे पहले की गई ड्रिल।
सामान्य प्रश्न
समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन क्या है?
यह तैयारी, बचाव और पुनर्वास की क्षमता उसी समुदाय के भीतर खड़ी करने की पद्धति है जिस पर आपदा गिरती है। इसका आधार यह है कि किसी भी आपदा में पहला बचावकर्ता सरकार नहीं, पड़ोसी होता है, और सरकारी टीमें तब पहुँचती हैं जब सबसे ज़्यादा जानें बचाने वाली समय-खिड़की बंद हो चुकी होती है।
सामुदायिक भागीदारी के लिए ओडिशा को ही मॉडल क्यों माना जाता है?
क्योंकि 1999 के महाचक्रवात में लगभग 10,000 मौतों के मुक़ाबले उसी ताक़त के बाद के चक्रवातों में मौतें गिनी-चुनी रह गईं। इसके साधन सामुदायिक थे: गाँव की आपदा प्रबंधन समितियाँ, चक्रवात आश्रयों की पूरे साल देखरेख करने वाली शेल्टर समितियाँ, प्रशिक्षित स्वयंसेवक और घर तक पहुँचने वाली चेतावनी श्रृंखला।
आपदा मित्र क्या है?
NDMA की एक योजना, जो सबसे ज़्यादा आपदा-प्रवण ज़िलों में सामुदायिक स्वयंसेवकों को खोज, बचाव और प्राथमिक उपचार का प्रशिक्षण देती है। मक़सद यह है कि बचाव क्षमता गाँव के भीतर ही रहे, आपदा के बाद बाहर से आने का इंतज़ार न करना पड़े।
भारत के क़ानूनी ढाँचे में सामुदायिक भागीदारी कहाँ बैठती है?
आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 में, जो NDMA-SDMA-DDMA का ढाँचा बनाता है और जिसमें ज़िला आपदा प्रबंधन योजना सामुदायिक भागीदारी की औपचारिक जगह है। सेंडाई फ़्रेमवर्क की प्राथमिकता 4, जिस पर भारत ने दस्तख़त किए हैं, भी सीधे समुदाय पर टिकी है।
सामुदायिक भागीदारी की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
दिखावे की भागीदारी। अक्सर इसका मतलब होता है — योजना लिख लेने के बाद एक सलाह-बैठक करा लेना। इसके साथ जुड़ती हैं दो आपदाओं के बीच स्वयंसेवक नेटवर्क का बिखरना, समितियों से महिलाओं और हाशिये के समूहों का बाहर रह जाना, और ऐसी फ़ंडिंग जो तैयारी से ज़्यादा राहत पर जाती है।
क्या तकनीक आपदा प्रबंधन में सामुदायिक भागीदारी की जगह ले सकती है?
नहीं। तकनीक चेतावनी बनाती और पहुँचाती है, पर उस पर काम समुदाय करता है। जो चेतावनी घर तक पहुँचकर भी भरोसा न जगाए, वह किसी की जान नहीं बचाती। इसीलिए आख़िरी छोर तक अलर्ट भेजने वाले प्लेटफ़ॉर्म वहीं काम के साबित होते हैं जहाँ ड्रिल और आश्रय-योजना पहले से मौजूद हों।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
1. सामुदायिक स्वयंसेवक प्रशिक्षण योजना “आपदा मित्र” किसके द्वारा चलाई जाती है?
- (a) राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF)
- (b) राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA)
- (c) ग्रामीण विकास मंत्रालय
- (d) राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (NIDM)
उत्तर: (b) राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA)
2. 1999 के ओडिशा महाचक्रवात में मृतकों की संख्या लगभग कितनी थी?
- (a) 1,000
- (b) 5,000
- (c) 10,000
- (d) 50,000
उत्तर: (c) 10,000
3. सेंडाई फ़्रेमवर्क की कौन-सी प्राथमिकता सबसे साफ़ तौर पर समुदाय पर टिकी है?
- (a) प्राथमिकता 1
- (b) प्राथमिकता 2
- (c) प्राथमिकता 3
- (d) प्राथमिकता 4
उत्तर: (d) प्राथमिकता 4
4. आख़िरी छोर तक आपदा चेतावनी पहुँचाने वाला “सचेत” प्लेटफ़ॉर्म किस पर आधारित है?
- (a) कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल
- (b) इंसिडेंट रिस्पॉन्स सिस्टम
- (c) सेंडाई मॉनिटर
- (d) ह्योगो प्रोटोकॉल
उत्तर: (a) कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल
5. मालिक-संचालित पुनर्निर्माण, जिसने भूकंपरोधी मानकों के पालन में ठेकेदार वाले मॉडल को पीछे छोड़ा, किस आपदा के बाद के पुनर्वास से जुड़ा है?
- (a) लातूर भूकंप, 1993
- (b) भुज भूकंप, 2001
- (c) कश्मीर भूकंप, 2005
- (d) सिक्किम भूकंप, 2011
उत्तर: (b) भुज भूकंप, 2001
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- “सामुदायिक भागीदारी प्रभावी आपदा प्रबंधन की आधारशिला है।” भारत से उपयुक्त उदाहरण देते हुए इस कथन का विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- भारत में आपदा प्रबंधन में सामुदायिक भागीदारी के सामने आने वाली चुनौतियों पर चर्चा कीजिए और इसे मज़बूत करने के उपाय सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)
- परीक्षण कीजिए कि चक्रवात तैयारी का ओडिशा मॉडल वहाँ क्यों सफल रहा जहाँ दूसरे तटीय राज्य पिछड़ गए। (10 अंक, 150 शब्द)
- “तकनीक चेतावनी बनाती है; उस पर काम समुदाय करता है।” पूर्व चेतावनी प्रणालियों और सामुदायिक तैयारी के संबंध पर चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
- गाँवों के लिए बने समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन मॉडल शहरों में वैसे के वैसे नहीं चलते। इस कथन का परीक्षण कीजिए और एक शहरी विकल्प सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)