भारत का ढाँचा संघीय है और झुकाव एकात्मक। इन दोनों के बीच का संतुलन संविधान के शब्दों ने नहीं, दलीय व्यवस्था ने तय किया है। जब केंद्र और राज्यों, दोनों में एक ही पार्टी का दबदबा रहा, संविधान एकात्मक की तरह चला; जब ऐसा नहीं रहा, वही संविधान संघीय की तरह चला।
यह PSIR Optional Notes का 28वाँ अध्याय है, जो पेपर I के भारतीय शासन और राजनीति वाले हिस्से से आता है। पूरी किताब मुफ़्त डाउनलोड की जा सकती है।
UPSC पाठ्यक्रम
संघवाद: संवैधानिक प्रावधान; केंद्र-राज्य संबंधों का बदलता स्वरूप; एकीकरण की प्रवृत्तियाँ और क्षेत्रीय आकांक्षाएँ; अंतर-राज्यीय विवाद।
एक पन्ने में
- अनुच्छेद 1 भारत को राज्यों का संघ कहता है, फ़ेडरेशन नहीं। आंबेडकर की व्याख्या: यह संघ किसी समझौते से नहीं बना, और किसी राज्य को अलग होने का हक़ नहीं है।
- संघीय ख़ूबियाँ: लिखित संविधान, तीन सूचियों में शक्तियों का बँटवारा, दो सदन वाली संसद, स्वतंत्र न्यायपालिका, और संघीय प्रावधानों के लिए कठिन संशोधन प्रक्रिया।
- एकात्मक ख़ूबियाँ: मज़बूत केंद्र, जिसके पास बची हुई शक्तियाँ हैं, इकहरी नागरिकता, एक ही जुड़ी हुई न्यायपालिका, अखिल भारतीय सेवाएँ, केंद्र से नियुक्त राज्यपाल, अनुच्छेद 356, और अनुच्छेद 3, जिसके तहत संसद राज्य की सहमति के बिना उसकी सीमाएँ बदल सकती है।
- अर्ध-संघीय व्हेयर का शब्द है; सहकारी संघवाद ग्रैनविल ऑस्टिन का; और बाद के लेखकों ने असल कामकाज को सौदेबाज़ी वाला संघवाद कहा है।
- विधायी संबंध: सातवीं अनुसूची, जिसमें संशोधनों के बाद संघ सूची (98 विषय), राज्य सूची (59) और समवर्ती सूची (52) हैं; अनुच्छेद 254 के तहत समवर्ती सूची पर केंद्र का क़ानून ऊपर; और पाँच हालात, जिनमें संसद राज्य सूची के विषय पर क़ानून बना सकती है।
- प्रशासनिक संबंध अनुच्छेद 256 और 257 के निर्देशों पर टिके हैं। वित्तीय संबंध अनुच्छेद 268 से 293 पर, और वित्त आयोग पर।
- एस.आर. बोम्मई (1994) निर्णायक मोड़ है: संघवाद संविधान की मूल विशेषता है, अनुच्छेद 356 की उद्घोषणा अदालत में जाँची जा सकती है, और बहुमत सदन के पटल पर परखा जाएगा।
- आज की खींचतान दो तरह की है — वित्तीय, यानी बँटवारे से बाहर रखे गए उपकर और अधिभार, GST मुआवज़ा, केंद्र प्रायोजित योजनाएँ; और संस्थाओं से जुड़ी, यानी राज्यपाल का पद और केंद्रीय एजेंसियाँ।
संवैधानिक डिज़ाइन
संघीय और एकात्मक ख़ूबियाँ
| संघीय ख़ूबियाँ | एकात्मक ख़ूबियाँ | |
|---|---|---|
| लिखित और सर्वोच्च संविधान; सातवीं अनुसूची में शक्तियों का बँटवारा; दो सदन वाली संसद, जिसका एक सदन राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है; स्वतंत्र न्यायपालिका, जो झगड़ों में फ़ैसला करती है; और संघीय ढाँचे को छूने वाले प्रावधान, जो आधे राज्यों की मंज़ूरी के बिना बदले नहीं जा सकते | मज़बूत केंद्र, जिसके पास बड़ी सूची और बची हुई शक्तियाँ हैं (अनुच्छेद 248); इकहरी नागरिकता; एक ही जुड़ी हुई न्यायपालिका; अखिल भारतीय सेवाएँ (अनुच्छेद 312); केंद्र से नियुक्त राज्यपाल; आपात प्रावधान और अनुच्छेद 356; अनुच्छेद 3, जो राज्य की सहमति के बिना उसका क्षेत्र, सीमा और नाम बदलने देता है; राज्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने और अनुच्छेद 200 के तहत रोके गए राज्य विधेयकों पर केंद्र का नियंत्रण |
अनुच्छेद 3 पर ज़ोर देना चाहिए, क्योंकि शास्त्रीय संघवाद से सबसे तीखा हटाव यही है: राज्य की राय पूछनी ज़रूरी है, मानना ज़रूरी नहीं, और संसद साधारण बहुमत से नया राज्य बना सकती है, राज्यों को मिला सकती है, बाँट सकती है या उनका नाम बदल सकती है। 2014 में आंध्र प्रदेश का बँटवारा और 2019 में जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन, दोनों राज्य के स्तर पर आपत्ति के बावजूद हुए।
विधायी संबंध
अनुच्छेद 245 से 255। संसद पूरे भारत या उसके किसी हिस्से के लिए क़ानून बनाती है, राज्य विधानमंडल अपने इलाक़े के लिए। सातवीं अनुसूची विषयों को संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची में बाँटती है। अनुच्छेद 254 के तहत, समवर्ती विषय पर टकराव हो तो केंद्र का क़ानून ऊपर रहता है — सिवाय तब, जब राज्य का क़ानून राष्ट्रपति के पास रखा गया हो और उन्हें मंज़ूरी मिली हो। उस हालत में भी संसद बाद में उसे पलट सकती है।
संसद राज्य सूची के विषय पर पाँच हालात में क़ानून बना सकती है, और यह सूची याद रहनी चाहिए: राष्ट्रीय हित में राज्यसभा के प्रस्ताव पर, जिसे उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों में से दो-तिहाई का समर्थन हो (अनुच्छेद 249); राष्ट्रीय आपात के दौरान (250); जब दो या ज़्यादा राज्य ख़ुद यह माँगें (252); अंतरराष्ट्रीय संधियाँ और समझौते लागू करने के लिए (253); और राज्य में राष्ट्रपति शासन के दौरान (356)।
बची हुई शक्तियाँ अनुच्छेद 248 और संघ सूची की प्रविष्टि 97 के तहत संघ के पास हैं, यानी यहाँ अमेरिकी नहीं, कनाडाई मॉडल अपनाया गया है।
प्रशासनिक और वित्तीय संबंध
प्रशासनिक: अनुच्छेद 256 और 257 राज्यों से यह सुनिश्चित कराते हैं कि संसद के क़ानूनों का पालन हो, और संघ को निर्देश देने की शक्ति देते हैं; पालन न होने पर अनुच्छेद 365 के तहत कार्रवाई का आधार बनता है। अनुच्छेद 312 वाली अखिल भारतीय सेवाएँ दोनों स्तरों पर काम करती हैं, पर नियुक्ति और अनुशासन के मामले में केंद्र के हाथ में रहती हैं। आंबेडकर ने इसे जोड़ने वाले औज़ार के रूप में सही ठहराया था, और राज्य समय-समय पर इसका विरोध करते रहते हैं।
वित्तीय: कर किसे मिलेंगे, कौन वसूलेगा और बँटवारा कैसे होगा, यह अनुच्छेद 268 से 281 तय करते हैं, जिसमें हर पाँच साल पर वित्त आयोग हस्तांतरण की सिफ़ारिश करता है, और अनुच्छेद 275 सहायता अनुदान देता है। अनुच्छेद 293 राज्यों के क़र्ज़ लेने पर रोक लगाता है, अगर राज्य पर संघ का क़र्ज़ हो — और व्यवहार में यह हमेशा ही होता है।
2016 में 101वें संशोधन से आया GST 1950 के बाद वित्तीय संघवाद में सबसे बड़ा बदलाव है। इसने दोनों स्तरों की कर लगाने की शक्ति एक साथ GST परिषद में डाल दी, जहाँ भारित वोटों का एक-तिहाई केंद्र के पास है और सारे राज्यों के पास मिलाकर दो-तिहाई, और कोई फ़ैसला तीन-चौथाई से होता है। यानी केंद्र के पास असरदार वीटो है, और राज्यों का कोई भी समूह उसके बिना कुछ पास नहीं करा सकता। मोहित मिनरल्स (2022) ने कहा कि परिषद की सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं, सिर्फ़ मानने लायक़ राय हैं, और GST पर क़ानून बनाने की शक्ति संसद के पास भी है, राज्य विधानमंडलों के पास भी — इससे सिद्धांत रूप में राज्यों की कुछ स्वायत्तता लौटी।
केंद्र-राज्य संबंधों का बदलता स्वरूप
चार दौर
- 1950–67, कांग्रेस का दबदबा। दोनों स्तरों पर एक ही पार्टी होने का मतलब था कि झगड़े सरकारों के बीच नहीं, पार्टी के भीतर ही निपट जाते थे। संघवाद काग़ज़ पर असली था, इस्तेमाल कम ही होता था।
- 1967–89, टकराव। 1967 के बाद राज्यों में ग़ैर-कांग्रेस सरकारें आईं और लगातार टकराव शुरू हुआ। विपक्षी सरकारों के ख़िलाफ़ अनुच्छेद 356 बार-बार इस्तेमाल हुआ; 1977 में और फिर 1980 में नौ-नौ राज्य सरकारों की बर्ख़ास्तगी इसका मानक उदाहरण है। तमिलनाडु की राजामन्नार समिति (1969), पश्चिम बंगाल का ज्ञापन (1977) और आनंदपुर साहिब प्रस्ताव (1973), सब इसी दौर के हैं।
- 1989–2014, गठबंधन वाला संघवाद। केंद्र के गठबंधनों में बैठी क्षेत्रीय पार्टियों ने राज्यों को वह मोलभाव की ताक़त दी जो पहले कभी नहीं थी। बोम्मई (1994) के बाद अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल गिरकर लगभग ख़त्म हो गया, और अंतर-राज्य परिषद आख़िरकार 1990 में बन गई।
- 2014 के बाद। केंद्र में एक दल का बहुमत, और साथ ही सचमुच संघीय वित्तीय औज़ार। खींचतान अब सरकारें गिराने की नहीं रही; अब वह पैसे के बँटवारे, राज्यपाल के पद, केंद्रीय जाँच एजेंसियों और केंद्र प्रायोजित योजनाओं के ढाँचे पर है।
आयोग और समितियाँ
प्रशासनिक सुधार आयोग (सीतलवाड़, 1969) ने अंतर-राज्य परिषद बनाने और अनुच्छेद 356 पर संयम बरतने की सिफ़ारिश की। राजामन्नार समिति (1969), जिसे तमिलनाडु ने बैठाया था, ने अनुच्छेद 356, 357 और 365 हटाने, समवर्ती सूची के विषय राज्य सूची में भेजने और अंतर-राज्य परिषद बनाने की सिफ़ारिश की। सरकारिया आयोग (1988) ने बड़े फेरबदल से इनकार किया, पर कहा कि अनुच्छेद 356 सिर्फ़ आख़िरी उपाय के तौर पर और पहले चेतावनी देकर इस्तेमाल हो, राज्यपाल बाहरी व्यक्ति हो और मुख्यमंत्री से सलाह के बाद नियुक्त हो, अंतर-राज्य परिषद बने, और कर के अलावा बची हुई शक्तियाँ समवर्ती सूची में जाएँ। पुंछी आयोग (2010) ने इसमें यह जोड़ा कि आपातकाल पूरे राज्य के बजाय किसी ज़िले या राज्य के हिस्से तक सीमित रखा जाए, राज्यपाल के विवेक की प्रक्रिया तय हो, और विधेयकों पर राज्यपाल के फ़ैसले के लिए समय सीमा हो।
बोम्मई ने क्या तय किया
एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) संघवाद का अकेला सबसे अहम मुक़दमा है।
- संघवाद संविधान की मूल विशेषता है।
- अनुच्छेद 356 की उद्घोषणा अदालत में जाँची जा सकती है; अदालत देख सकती है कि जिस सामग्री के आधार पर संतुष्टि बनी, उसका कार्रवाई से तार्किक रिश्ता है या नहीं।
- मंत्रिपरिषद का बहुमत सदन के पटल पर परखा जाएगा, राज्यपाल की अपनी राय से तय नहीं होगा।
- जब तक संसद के दोनों सदन उद्घोषणा को मंज़ूरी न दे दें, विधानसभा भंग नहीं की जा सकती; तब तक उसे सिर्फ़ निलंबित रखा जा सकता है।
- उद्घोषणा रद्द हो जाए तो अदालत बर्ख़ास्त सरकार को बहाल कर सकती है।
- धर्मनिरपेक्षता मूल विशेषता है, और उसके ख़िलाफ़ काम करने वाली राज्य सरकार बर्ख़ास्त की जा सकती है — दिसंबर 1992 की घटनाओं के बाद हुई बर्ख़ास्तगियों को सही ठहराने का आधार यही था।
एकीकरण की प्रवृत्तियाँ और क्षेत्रीय आकांक्षाएँ
पाठ्यक्रम इन दोनों को जान-बूझकर साथ रखता है। एकीकरण के औज़ारों में आते हैं: 1956 से राज्यों का भाषा के आधार पर पुनर्गठन, जिसने भाषा की माँग मानकर उलटे संघ को मज़बूत ही किया; अखिल भारतीय सेवाएँ; एक ही न्यायपालिका और इकहरी नागरिकता; राष्ट्रीय संस्थाएँ और वह राष्ट्रीय बाज़ार जो GST से पूरा हुआ; और आपात प्रावधान।
क्षेत्रीय आकांक्षाएँ चार शक्लों में आई हैं, और हर एक से अलग तरह से निपटा गया है। अलग राज्य की माँगें (झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड 2000 में, तेलंगाना 2014 में) आम तौर पर मान ली गई हैं। राज्य के भीतर स्वायत्तता की माँगें संवैधानिक असमानता से पूरी की गईं: पूर्वोत्तर में छठी अनुसूची की स्वायत्त परिषदें, ग्यारह राज्यों के लिए अनुच्छेद 371 के विशेष प्रावधान, और पहले अनुच्छेद 370। संस्कृति और भाषा की रक्षा की माँगें आठवीं अनुसूची और राज्यों की भाषा नीति से पूरी हुईं। अलगाव की माँगों का जवाब पहले बल रहा, फिर बातचीत से समझौता — मिज़ोरम में 1986 के समझौते के बाद यह सबसे कामयाब रहा।
2019 में जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन, जिस पर अध्याय 33 में बात है, हाल की सबसे बड़ी कसौटी है: अनुच्छेद 370 हटाने और एक राज्य को घटाकर दो केंद्रशासित प्रदेश बनाने को इन रे: अनुच्छेद 370 (2023) में सही ठहराया गया, और अदालत ने सॉलिसिटर जनरल का यह बयान दर्ज किया कि राज्य का दर्जा लौटाया जाएगा।
अंतर-राज्यीय विवाद तीन तरह के हैं। नदी जल विवाद, जो अनुच्छेद 262 और अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम 1956 के तहत आते हैं, जहाँ सुप्रीम कोर्ट का दायरा हटा देने के बावजूद मुक़दमेबाज़ी सालों खिंची है — कावेरी और कृष्णा इसके उदाहरण हैं। सीमा विवाद, जैसे बेलगावी पर महाराष्ट्र-कर्नाटक और असम-मिज़ोरम। और साझा संस्थाओं या संसाधनों पर झगड़े। अनुच्छेद 263 वाली अंतर-राज्य परिषद, जिसकी सिफ़ारिश बार-बार हुई और जो आख़िरकार 1990 में बनी, बहुत कम बैठती है — आलोचना भी यही है।
बहस: क्या भारतीय संघवाद का असल कामकाज केंद्र की तरफ़ झुकाव की पुष्टि करता है?
हाँ। डिज़ाइन ही केंद्र की तरफ़ झुका है: बची हुई शक्तियाँ संघ के पास, संघ सूची लंबी, अनुच्छेद 3 के तहत राज्यों की सहमति के बिना उनकी लकीरें फिर से खींच देना, नियुक्त राज्यपाल, अखिल भारतीय सेवाएँ, और अनुच्छेद 356। चार दशकों तक अमल भी इसी के मुताबिक़ रहा — अनुच्छेद 356 सौ से भी ज़्यादा बार लगा, और लगभग हमेशा विपक्षी सरकारों पर। वित्त की तरफ़ देखें तो राज्य क़रीब एक-तिहाई राजस्व जुटाते हैं और क़रीब दो-तिहाई ख़र्च करते हैं, और बँटवारे से बाहर रखे गए उपकर-अधिभार बढ़ने से उनका हिस्सा और सिकुड़ा है। नहीं। वही संविधान दलीय व्यवस्था बदलते ही अलग तरह से चला है। बोम्मई (1994) के बाद अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल लगभग ख़त्म हो गया, और गठबंधन के दशकों ने राज्यों को उससे ज़्यादा ताक़त दी जितनी संविधान बनाने वालों ने सोची थी। भाषा के आधार पर पुनर्गठन, अनुच्छेद 371 और छठी अनुसूची वाला असमान संघवाद, और GST परिषद का वह वोटिंग ढाँचा जिसमें केंद्र भी ख़ासे राज्यों के बिना कुछ नहीं कर सकता — ये सब सचमुच के संघीय इंतज़ाम हैं। परीक्षक के लिए लाइन। तय करने वाली चीज़ संविधान का पाठ नहीं, दलीय व्यवस्था है। यही लिखिए, और सबूत दीजिए: वही प्रावधान 1950–67 और 1977–80 में एकात्मक बरताव लाए, और 1989–2014 में संघीय। सही सूत्र यह है कि भारत का ढाँचा केंद्रीकृत संघीय है, जिसका असल कामकाज राजनीति तय करती है, और 1994 से न्यायपालिका एक फ़र्श बना देती है जिससे नीचे केंद्रीकरण नहीं जा सकता। आज की खींचतान बर्ख़ास्तगी से हटकर पैसे के ढाँचे पर आ गई है — यही इस बात का सबूत है कि बोम्मई वाला फ़र्श टिका हुआ है।
जहाँ उत्तर नंबर गँवाते हैं
- भारत को बिना किसी शर्त के फ़ेडरेशन कह देना। अनुच्छेद 1 कहता है राज्यों का संघ, और आंबेडकर ने वजह बताई थी: न कोई समझौता, न अलग होने का हक़।
- राज्य सूची पर संसद के क़ानून बनाने के पाँचों हालात अधूरे लिख देना। अनुच्छेद 249, 250, 252, 253 और 356, पाँचों चाहिए।
- संघवाद पर बोम्मई (1994) के बिना लिख देना। अदालत में जाँच, पटल पर बहुमत की परीक्षा, और भंग न करने का नियम — यही जान है।
- GST को सीधे-सीधे केंद्रीकरण मान लेना। परिषद का वोटिंग ढाँचा केंद्र को वीटो देता है, पर राज्यों की सहमति भी माँगता है, और मोहित मिनरल्स (2022) ने सिफ़ारिशों को बाध्यकारी नहीं, सिर्फ़ मानने लायक़ राय बताया।
- वित्तीय संघवाद छोड़ देना। बँटवारे से बाहर रखे उपकर और अधिभार, और मिलान की शर्त वाली केंद्र प्रायोजित योजनाएँ — असली शिकायतें यही हैं।
- असमान संघवाद की अनदेखी करना। अनुच्छेद 371 के प्रावधान और छठी अनुसूची ऐसे संघीय इंतज़ाम हैं जिन्हें सिर्फ़ केंद्रीकरण वाली कहानी समझा ही नहीं सकती।
पहले पूछा जा चुका है
- क्या भारतीय संघवाद का असल कामकाज भारतीय राज्यव्यवस्था में केंद्र की तरफ़ झुकाव के अनुरूप है? अपने उत्तर के कारण दीजिए। (2023, पेपर I, 20 अंक)
- भारतीय राजनीति के हाल के घटनाक्रम ने भारत में संघवाद की असली भावना को कमज़ोर नहीं किया है। उपयुक्त उदाहरणों से इस कथन की आलोचनात्मक जाँच कीजिए। (2025, पेपर I, 15 अंक)
उत्तर का ढाँचा
भारतीय राजनीति के हाल के घटनाक्रम ने भारत में संघवाद की असली भावना को कमज़ोर नहीं किया है। आलोचनात्मक जाँच कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
शुरुआत। यह कथन जाँचने के लिए है, मान लेने के लिए नहीं। पहले बताइए कि भारतीय संघवाद की असली भावना है क्या: दोनों स्तरों की बराबरी नहीं, बल्कि केंद्र की तरफ़ झुके ढाँचे के भीतर राज्यों के लिए एक पक्का दायरा, जिसके नीचे बोम्मई (1994) के बाद अदालत ने एक फ़र्श बना दिया है।
कथन के पक्ष में सबूत। अनुच्छेद 356 अब कम ही लगता है और अदालत में जाँचा जा सकता है; GST परिषद में राज्यों की सहमति चाहिए; पंद्रहवें वित्त आयोग ने हस्तांतरण का हिस्सा ऊँचा बनाए रखा; अनुच्छेद 371 और छठी अनुसूची वाले असमान इंतज़ाम बने हुए हैं; और राज्य केंद्र के क़ानून के ख़िलाफ़ क़ानून बनाते और मुक़दमे लड़ते हैं, जैसा कृषि क़ानूनों के वक़्त हुआ।
ख़िलाफ़ में सबूत। बँटवारे से बाहर रखे उपकर और अधिभार राज्यों का हिस्सा घटाते हैं; मिलान की शर्त वाली केंद्र प्रायोजित योजनाएँ राज्यों का बजट पहले से बाँध देती हैं; राज्यपालों का विधेयकों पर मंज़ूरी रोके रखना, जिस पर पंजाब राज्य (2023) में बात हुई; केंद्रीय एजेंसियों का उन राज्यों में काम करना जिनमें से कई ने आम सहमति वापस ले ली है; और 2019 में जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन, जब वहाँ काम करती हुई विधानसभा थी ही नहीं।
विश्लेषण की बात। दबाव संवैधानिक औज़ारों से हटकर वित्तीय और प्रशासनिक औज़ारों पर आ गया है, और ऐसा तब होता है जब अदालती सिद्धांत संवैधानिक रास्ता बंद कर देता है।
निष्कर्ष। संवैधानिक जड़ के मामले में यह कथन टिकता है, वित्तीय व्यवहार के मामले में संदिग्ध है। जहाँ भावना को अदालत की सुरक्षा मिली है वहाँ वह बची हुई है, और जहाँ वह सिर्फ़ परंपरा पर टिकी है वहाँ कमज़ोर पड़ी है — यही इस बात की दलील है कि मंज़ूरी की समय सीमा और बँटवारे लायक़ रक़म को भी अदालत के दायरे में लाया जाए।
आख़िरी दौर का रिवीज़न
- अनुच्छेद 1 राज्यों का संघ; व्हेयर का अर्ध-संघीय; ऑस्टिन का सहकारी संघवाद।
- संघीय: लिखित संविधान, तीन सूचियाँ, दो सदन, न्यायपालिका का फ़ैसला करना, राज्यों की मंज़ूरी वाला कठिन संशोधन। एकात्मक: बची शक्तियाँ संघ के पास (248, प्रविष्टि 97), इकहरी नागरिकता, जुड़ी हुई न्यायपालिका, अखिल भारतीय सेवाएँ (312), नियुक्त राज्यपाल, अनुच्छेद 356, अनुच्छेद 3।
- राज्य सूची पर संसद: अनुच्छेद 249, 250, 252, 253, 356। टकराव पर अनुच्छेद 254।
- प्रशासनिक: 256, 257, 365। वित्तीय: 268–281, 275, 293। GST 101वें संशोधन 2016 से; परिषद में वोट — केंद्र एक-तिहाई, राज्य दो-तिहाई, पास होने के लिए तीन-चौथाई; मोहित मिनरल्स (2022)।
- दौर: 1950–67 दबदबा, 1967–89 टकराव, 1989–2014 गठबंधन, 2014 के बाद वित्तीय और संस्थाओं वाली खींचतान।
- आयोग: ARC 1969, राजामन्नार 1969, सरकारिया 1988, पुंछी 2010। अनुच्छेद 263 वाली अंतर-राज्य परिषद, बनी 1990 में।
- बोम्मई (1994): संघवाद मूल विशेषता, अदालत में जाँच, पटल पर बहुमत, मंज़ूरी से पहले भंग नहीं, बहाली, और धर्मनिरपेक्षता एक आधार के रूप में।
- क्षेत्रीय आकांक्षाएँ: राज्य बनना 2000 और 2014; अनुच्छेद 371 और छठी अनुसूची वाली असमानता; नदी विवादों के लिए अनुच्छेद 262 और 1956 का अधिनियम।
आगे पढ़िए। यह अध्याय पूरी PSIR Optional Notes के 58 अध्यायों में से एक है, जिसमें पेपर I और पेपर II दोनों पूरे कवर हैं — मुफ़्त डाउनलोड।