UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

UPSC 2025: कवच ATP, 15वाँ वित्त आयोग और BRSR — प्रीलिम्स और मुख्य परीक्षा के पूरे नोट्स

UPSC प्रीलिम्स 2025 में पूछे गए तीन विषय एक जगह — स्वदेशी कवच ATP और राष्ट्रीय रेल योजना, 15वें वित्त आयोग का बँटवारा और अनुदान, और SEBI का BRSR ढाँचा।

Complete UPSC notes on Kavach Automatic Train Protection, the 15th Finance Commission devolution and grants, and SEBI's BRSR framework — with comparison tables, MCQs and FAQs.

UPSC प्रीलिम्स 2025 के सामान्य अध्ययन पेपर-I में तीन ऐसे मौजूदा नीति विषय पूछे गए जो शासन, तकनीक और आर्थिक नियमन के जोड़ पर बैठते हैं — स्वदेशी ट्रेन सुरक्षा प्रणाली कवच, जिसके साथ राष्ट्रीय रेल योजना जुड़ी है; 15वें वित्त आयोग की राज्यों को अनुदान पर सिफ़ारिशें; और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) की बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्ट (BRSR)। ये तीनों सवाल (ज़्यादातर बुकलेट में Q34, Q62 और Q76) मिलकर एक साफ़ संकेत देते हैं: विषय से वाक़फ़ियत से ज़्यादा तथ्यों की बारीक़ी काम आती है। जिस छात्र को यह पता था कि कवच स्वदेशी है, लेकिन यह चूक गया कि राष्ट्रीय रेल योजना का लक्ष्य 2030 है — 2028 नहीं — उसका नंबर फिर भी कटा। और जिसने BRSR के नियामक के तौर पर SEBI की जगह RBI समझ लिया, उसका एक और नंबर गया।

यह नोट तीनों विषयों को मुख्य परीक्षा के निबंध जितनी गहराई से खोलता है, और प्रीलिम्स के काम के आँकड़े सामने रखता है। आगे तुलना वाली तालिकाएँ, आख़िर में आठ अभ्यास MCQ और दस FAQ मिलेंगे जो जल्दी रिवीज़न के फ़्लैशकार्ड की तरह भी काम करते हैं।

भाग 1: कवच — भारत की स्वदेशी ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन प्रणाली

कवच, यानी संस्कृत में “कवच” या बचाव का ख़ोल, भारत में ही बनी ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन (ATP) प्रणाली का ब्रांड नाम है। इसे तीन काम करने के लिए बनाया गया है, जो कोई भी लोको-पायलट बारह घंटे की शिफ़्ट में लगातार नहीं कर सकता: सिग्नल पास्ड ऐट डेंजर (SPAD) यानी लाल सिग्नल पार होने की घटना रोकना, स्थायी और अस्थायी स्पीड सीमाएँ ख़ुद-ब-ख़ुद लागू करना, और टक्कर का ख़तरा पकड़ते ही इमरजेंसी ब्रेक लगा देना। इस प्रणाली को सेफ़्टी इंटेग्रिटी लेवल 4 (SIL-4) का दर्जा मिला है — IEC 61508 फ़ंक्शनल सेफ़्टी मानक के चार स्तरों में सबसे ऊँचा, जिसका मतलब है दस अरब घंटे के संचालन में सिर्फ़ एक बार ख़तरनाक ख़राबी की छूट।

तकनीक कहाँ से आई और किसकी है

काम 2011-12 में ट्रेन कोलिजन अवॉइडेंस सिस्टम (TCAS) नाम से शुरू हुआ था, और इसे आगे बढ़ाया अनुसंधान अभिकल्प एवं मानक संगठन (RDSO) ने — रेल मंत्रालय की तकनीकी शाखा, जिसका मुख्यालय लखनऊ में है। हार्डवेयर RDSO ने अकेले नहीं बनाया। तीन भारतीय निजी कंपनियों को डिज़ाइन पार्टनर के तौर पर जोड़ा गया: मेधा सर्वो ड्राइव्स (हैदराबाद), कर्नेक्स माइक्रोसिस्टम्स (हैदराबाद) और HBL पावर सिस्टम्स (हैदराबाद)। बौद्धिक संपदा भारतीय रेल के पास है। 2020 में इसे कवच ब्रांड के तहत राष्ट्रीय ATP के रूप में औपचारिक तौर पर अपनाया गया, और साफ़ मक़सद यह था कि भारतीय पटरियों से यूरोपियन ट्रेन कंट्रोल सिस्टम (ETCS) जैसे आयातित विकल्प हटा दिए जाएँ।

यही शुरुआती कहानी इसे UPSC के लिहाज़ से अहम बनाती है। कवच आत्मनिर्भर भारत वाले औद्योगिक-नीति ढाँचे का नमूना है, और वह भी एक ऐसे क्षेत्र में जहाँ सुरक्षा सबसे ऊपर है: एक सरकारी शोध संस्था ढाँचा डिज़ाइन करती है, उसे अंतरराष्ट्रीय मानकों पर प्रमाणित कराती है, और तीन आपस में मुक़ाबला करती भारतीय कंपनियों को लाइसेंस देती है — इससे मुक़ाबला भी बना रहता है और आयात पर निर्भरता ख़त्म हो जाती है।

कवच असल में कैसे काम करता है

कवच दो हिस्सों के बीच लगातार चलने वाला, फ़ेल-सेफ़ संवाद है। लोको कवच इंजन पर लगा होता है — एक मज़बूत ऑनबोर्ड कंप्यूटर, जो ब्रेक पाइप, थ्रॉटल और केबिन में लगे ड्राइवर-मशीन इंटरफ़ेस से जुड़ा रहता है। स्टेशनरी कवच हर ब्लॉक स्टेशन पर और रास्ते के सिग्नल वाली जगहों पर लगा होता है, और पटरी के स्लीपरों के बीच तय दूरी पर RFID टैग जड़े होते हैं जिनकी भौगोलिक स्थिति पहले से दर्ज होती है। दोनों 435 MHz UHF रेडियो लिंक पर बात करते हैं।

ट्रेन चलते-चलते इंजन का RFID रीडर पटरी के टैग पढ़ता जाता है, पूरी रफ़्तार पर — और उसे अपनी ठीक जगह, ढलान का ब्यौरा और आगे वाले ब्लॉक के सिग्नल की स्थिति मिलती रहती है। स्टेशनरी कवच मूवमेंट ऑथॉरिटी भेजता है, यानी एक तरह की इजाज़त पर्ची जो बताती है कि ट्रेन कितनी दूर तक और किस रफ़्तार से जा सकती है। अगर लोको-पायलट लाल सिग्नल पर ध्यान नहीं देता, सेक्शन की स्पीड सीमा तोड़ता है, या ऐसे लेवल क्रॉसिंग की तरफ़ बढ़ता है जिसका फाटक अब भी खुला है, तो कवच पहले आवाज़ और स्क्रीन से चेतावनी देता है। और फिर, अगर तय वक़्त में इंसान कुछ नहीं करता, तो सर्विस ब्रेक और ज़रूरत पड़ने पर पूरा इमरजेंसी ब्रेक लगा देता है। एक ही पटरी पर आमने-सामने आ रही दो कवच वाली ट्रेनों में एक-दूसरे के दिखने से पहले ही ब्रेक ख़ुद लग जाएँगे।

सुरक्षा की मुख्य ख़ूबियाँ एक नज़र में

  • ब्रेक ख़ुद लगाकर सिग्नल पास्ड ऐट डेंजर (SPAD) की घटना रोकना।
  • हर सेक्शन के हिसाब से स्थायी और अस्थायी स्पीड सीमाएँ लागू कराना।
  • केबिन में ही सिग्नल दिखाना, जिससे कोहरे या घुमावदार पटरी पर लोको-पायलट को दूर के सिग्नल देखने पर निर्भर न रहना पड़े।
  • लगातार अपनी जाँच करते रहना, फ़ेल-सेफ़ तरीक़े से — कोई भी अंदरूनी ख़राबी चुपचाप बैठी नहीं रहती, बल्कि ब्रेक लगवा देती है।
  • लेवल क्रॉसिंग और स्टेशन के पास ख़ुद-ब-ख़ुद हॉर्न बजना।
  • एक ही पटरी पर कवच लगे दो इंजनों के बीच दोनों तरफ़ से टक्कर से बचाव।
  • SoS (Save our Souls) संदेश — लोको-पायलट रेडियो की पहुँच में आ रही सभी कवच वाली ट्रेनों को आपात संदेश भेज सकता है।

कवच 4.0 — आपसी तालमेल वाली छलाँग

शुरुआती तैनाती (वर्ज़न 3.2 और उससे नीचे) में ख़रीद से जुड़ी एक जानी-पहचानी दिक़्क़त थी: वेंडर A का लगाया इंजन हर बार वेंडर B के दिए पटरी वाले उपकरण नहीं पढ़ पाता था। भारतीय रेल पूरे ज़ोन को अगले तीस साल के लिए एक ही सप्लायर से बाँध देने का जोखिम नहीं ले सकती थी। जुलाई 2024 में RDSO ने कवच वर्ज़न 4.0 को मंज़ूरी दी, जो इसे सख़्ती से लागू होने वाले एक साझा स्पेसिफ़िकेशन, खुले ऐप्लिकेशन-लेयर प्रोटोकॉल और वेंडरों के बीच अनिवार्य तालमेल जाँच से ठीक करता है। मेधा 4.0 वाले इंजन को कर्नेक्स या HBL के पटरी वाले उपकरण के साथ बिना अड़चन चलना होगा, और उलटा भी। वर्ज़न 4.0 रेडियो की पहुँच भी बढ़ाता है, आगे चलकर 4G/5G बैकहॉल का विकल्प जोड़ता है, और उन समर्पित मालगाड़ी कॉरिडोर और हाई-स्पीड कॉरिडोर के लिए साफ़ सहारा देता है जहाँ ट्रेनें 160 किमी प्रति घंटे से ऊपर चलेंगी।

अब तक कितना लगा और 2030 तक का रास्ता

2024 के आख़िर तक कवच क़रीब 1,548 रूट किलोमीटर पर चालू था — मुख्य रूप से दक्षिण मध्य रेलवे ज़ोन में (लिंगमपल्ली-विकाराबाद-वाडी, विकाराबाद-बीदर, मनमाड-मुदखेड़) और दिल्ली-मुंबई और दिल्ली-हावड़ा मुगलसराय सेक्शन के जिन हिस्सों पर काम चालू हो रहा था। केंद्रीय बजट 2024-25 में मुख्य रूटों पर कवच से जुड़े पूँजी ख़र्च के लिए 1,12,500 करोड़ रुपये रखे गए। राष्ट्रीय रेल योजना का लक्ष्य है कि 2030 तक ज़्यादा भीड़ और ज़्यादा इस्तेमाल वाले क़रीब 44,000 किमी नेटवर्क पर यह लग जाए, और पूरे भारतीय रेल नेटवर्क को इससे ढँकने का लक्ष्य उससे लंबे समय के लिए रखा गया है।

UPSC 2025 का सवाल इसी एक आँकड़े पर टिका था। Q62 के कथन-I में कहा गया था कि राष्ट्रीय रेल योजना 2028 तक पूरे नेटवर्क पर कवच का लक्ष्य रखती है। यह ग़लत है — प्राथमिकता वाले नेटवर्क के लिए सरकारी लक्ष्य 2030 है, और पूरा नेटवर्क उससे आगे जाता है। कथन-II में कहा गया था कि कवच स्वदेशी रूप से बनी ATP प्रणाली है। यह सही है। इसलिए सही जवाब “सिर्फ़ II” है, यानी आम UPSC बुकलेट में विकल्प (b)।

तैनाती में तेज़ी क्यों आई — बालासोर हादसा

2 जून 2023 को ओडिशा के बालासोर ज़िले के बहानगा बाज़ार स्टेशन पर कोरोमंडल एक्सप्रेस एक खड़ी मालगाड़ी से टकरा गई, और उसके बाद यशवंतपुर-हावड़ा एक्सप्रेस उसी मलबे में जा घुसी। इस हादसे में 296 लोग मारे गए और 1,200 से ज़्यादा घायल हुए। रेलवे सुरक्षा आयुक्त की जाँच में तुरंत की वजह इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग सिस्टम की ख़राबी से हुई ग़लत सिग्नलिंग निकली — यह उसी तरह की गड़बड़ी है जिसे कवच झेलने लायक़ बनाने के लिए बनाया गया है, क्योंकि लोको कवच किसी भरे हुए ब्लॉक में जाने की मूवमेंट ऑथॉरिटी देने से मना कर देता। बालासोर ने कवच नहीं बनाया, लेकिन उसने राजनीतिक और बजट की जल्दी को तेज़ी से बढ़ा दिया और जो रोलआउट योजना ढीली-ढाली चल रही थी, वह सिकुड़कर तेज़ हो गई।

कवच और दुनिया की दूसरी ATP प्रणालियाँ

पहलूकवच (भारत)ETCS L2 (यूरोप)ATC (जापान / शिंकानसेन)CTCS-3 (चीन)
बनाने वालाRDSO + 3 भारतीय कंपनियाँUNISIG कंसोर्टियमJR ग्रुप + जापानी OEMचीन रेलवे + CRSC
कब से चालू2020 (राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया गया)2005 से आगे1964 (पहला रूप)2008
सुरक्षा स्तरSIL-4SIL-4SIL-4 के बराबरSIL-4
जगह पता करने का तरीक़ापटरी पर RFID टैगयूरोबैलाइज़कोडेड ट्रैक सर्किटबैलाइज़ + ट्रैक सर्किट
रेडियोUHF 435 MHz (FRMCS के लिए तैयार)GSM-R / FRMCSट्रैक-सर्किट कोडेडGSM-R
मूवमेंट ऑथॉरिटीलगातारलगातारलगातारलगातार
प्रति किमी अनुमानित लागतपटरी की तरफ़ 50 लाख रुपयेपटरी की तरफ़ 1.5-2 करोड़ रुपयेसार्वजनिक तौर पर तुलना योग्य नहींपटरी की तरफ़ 1.2 करोड़ रुपये
किस रफ़्तार तक ठीक160 किमी प्रति घंटा (4.0), 250+ की योजना320 किमी प्रति घंटा320 किमी प्रति घंटा350 किमी प्रति घंटा

राष्ट्रीय रेल योजना और मिशन रफ़्तार

कवच एक बहुत बड़े आधुनिकीकरण कार्यक्रम का एक हिस्सा है। राष्ट्रीय रेल योजना (NRP) 2024 — जिसे रेल मंत्रालय ने विज़न-2030 ढाँचे के साथ अंतिम रूप दिया — के तीन बड़े मक़सद हैं: माल ढुलाई में रेल का हिस्सा क़रीब 27 प्रतिशत से बढ़ाकर 2030 तक 45 प्रतिशत करना, ठसाठस भरे ज़्यादा-घनत्व वाले नेटवर्क का बोझ हल्का करना, और यात्री गाड़ियाँ ऐसी औसत रफ़्तार पर चलाना जो सड़क और छोटी दूरी की हवाई यात्रा से मुक़ाबला कर सकें। योजना में छह नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर (मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन के अलावा, जो बन रही है), 19 ज़्यादा-घनत्व वाले नेटवर्क कॉरिडोर और तीन समर्पित मालगाड़ी कॉरिडोर गिनाए गए हैं — पूर्वी DFC (लुधियाना-सोननगर), पश्चिमी DFC (दादरी-JNPT) और प्रस्तावित पूर्वी-तट DFC।

रफ़्तार बढ़ाने वाले कार्यक्रम मिशन रफ़्तार का लक्ष्य मुख्य रूटों पर यात्री गाड़ियों की औसत रफ़्तार 160 किमी प्रति घंटा (अभी सिरे से सिरे तक क़रीब 60-70) और मालगाड़ियों की 100 किमी प्रति घंटा (अभी क़रीब 25) करना है। इस कोशिश का दिखने वाला चेहरा वंदे भारत सेमी-हाई-स्पीड ट्रेनसेट है — 2025 के मध्य तक 102 सेवाएँ चल रही थीं। रफ़्तार के ये लक्ष्य कवच के बिना पूरे नहीं हो सकते: 160 किमी प्रति घंटा से ऊपर इंसानी आँख पटरी किनारे लगे सिग्नल भरोसे से पढ़ ही नहीं सकती, और केबिन में सिग्नल दिखाना क़ानूनी शर्त बन जाता है।

कार्यक्रमलक्ष्य वर्षपैमाना2025 तक स्थिति
कवच की तैनाती2030मुख्य नेटवर्क के ~44,000 किमी~1,500 किमी चालू
100 प्रतिशत विद्युतीकरण2024-25ब्रॉड-गेज रूट किमी~96 प्रतिशत पूरा
पूर्वी DFC का चालू होना2024लुधियाना-सोननगरबड़े हिस्से में चालू
पश्चिमी DFC का चालू होना2025दादरी-JNPTआख़िरी हिस्से जाँच में
मुंबई-अहमदाबाद HSR2026 (आंशिक)पहले सूरत-बिलिमोरासिविल काम आगे बढ़ा
वंदे भारत बेड़ा2027400 ट्रेनसेट~100 चालू
माल ढुलाई में हिस्सा2030टन-किमी का 45 प्रतिशत~27 प्रतिशत

मुख्य परीक्षा के स्तर की आलोचना

कवच तकनीकी रूप से ठोस है, लेकिन तीन अड़चनें उसे ज़मीन पर बाँधे रखती हैं। पहली, पटरी की तरफ़ लगाने की रफ़्तार टेंडर देने की रफ़्तार से पीछे रह गई है — RFID टैग लगाना और टावर चालू करना ज़मीन की पट्टी तक पहुँच और ज़ोनल रेलवे के सहयोग पर टिका है, और दोनों नई जगह पर काम करने से धीमे हैं। दूसरी, इंजनों में उपकरण लगने की रफ़्तार असंतुलित है: जितने रूट किमी पर पटरी वाले उपकरण लग चुके हैं, उन पर चलाने के लिए कवच लगे इंजन उतने नहीं हैं, जिससे मक़सद अधूरा रह जाता है। तीसरी, 435 MHz बैंड को लेकर दूरसंचार विभाग के साथ स्पेक्ट्रम प्रबंधन की जो प्रक्रिया है, उसने नए ज़ोन की मंज़ूरी पहले भी टाली है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने भारतीय रेल की सुरक्षा पर अपने 2022 के निष्पादन ऑडिट में इनमें से हर अड़चन गिनाई थी। मुख्य परीक्षा के उत्तर में कामयाबी मानते हुए भी इन कमियों का नाम लेना चाहिए।

भाग 2: 15वाँ वित्त आयोग — 2021-26 के लिए बँटवारे का ढाँचा

संविधान का अनुच्छेद 280 राष्ट्रपति से कहता है कि हर पाँच साल में (या उससे पहले) एक वित्त आयोग बनाया जाए, जो केंद्र और राज्यों के बीच करों की शुद्ध आय का बँटवारा, भारत की संचित निधि से राज्यों को सहायता अनुदान देने के सिद्धांत, और पंचायतों-नगरपालिकाओं के संसाधन बढ़ाने के लिए राज्यों की संचित निधियों को मज़बूत करने के उपाय सुझाए। 27 नवंबर 2017 के राष्ट्रपति आदेश से बना 15वाँ वित्त आयोग, जिसके अध्यक्ष एन. के. सिंह थे, हाल के दशकों में राजनीतिक रूप से सबसे विवादित रहा — और वजह एक ख़ास थी: यह पहला आयोग था जिससे आबादी के पैमाने के लिए 1971 की जनगणना की जगह 2011 की जनगणना इस्तेमाल करने को कहा गया।

आयोग में कौन थे और काम क्या था

आयोग के सदस्य थे शक्तिकांत दास (RBI गवर्नर बनने के बाद उनकी जगह अजय नारायण झा आए), अनूप सिंह, अशोक लाहिड़ी और रमेश चंद। सचिव अरविंद मेहता थे। दो रिपोर्ट दी गईं — एक अंतरिम रिपोर्ट, जो सिर्फ़ 2020-21 के एक साल के लिए थी (क्योंकि 14वें वित्त आयोग की अवधि 31 मार्च 2020 को ख़त्म हो रही थी), और मुख्य रिपोर्ट, जो 2021-22 से 2025-26 की पाँच साल की अवधि के लिए थी। मुख्य रिपोर्ट 1 फ़रवरी 2021 को केंद्रीय बजट के साथ संसद में रखी गई।

ऊर्ध्वाधर बँटवारा — बाँटने लायक़ पूल का 41 प्रतिशत

आयोग ने सिफ़ारिश की कि 2021-26 की अवधि के लिए केंद्रीय करों की शुद्ध आय — यानी बाँटने लायक़ पूल — का 41 प्रतिशत राज्यों को दिया जाए। कागज़ पर यह 14वें वित्त आयोग के सुझाए 42 प्रतिशत से एक प्रतिशत अंक कम था। यह कटौती सज़ा के तौर पर नहीं थी; यह हिसाब का समायोजन था, क्योंकि जम्मू-कश्मीर 31 अक्तूबर 2019 को राज्य नहीं रहा और दो केंद्रशासित प्रदेश बन गया। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के नए केंद्रशासित प्रदेशों को पैसा अब सीधे केंद्र से जाता है, इसलिए पुराने जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए तय पूल का हिस्सा (क़रीब एक प्रतिशत) अलग निकाल दिया गया।

सेस और सरचार्ज बाँटने लायक़ पूल से बाहर रहते हैं — यह राज्यों की पुरानी शिकायत है, क्योंकि केंद्र का सेस पर बढ़ता भरोसा (GST मुआवज़ा सेस, स्वास्थ्य एवं शिक्षा सेस, सड़क एवं बुनियादी ढाँचा सेस, कृषि बुनियादी ढाँचा एवं विकास सेस) केंद्रीय कर राजस्व के उस हिस्से को छोटा करता गया है जो असल में बाँटा जाता है। 15वें वित्त आयोग ने अपने विश्लेषण में इसका ज़िक्र किया, लेकिन उसके पास यह आदेश देने का संवैधानिक अधिकार नहीं है कि सेस को बाँटने लायक़ पूल में लाया जाए।

क्षैतिज बँटवारा — छह पैमानों वाला फ़ॉर्मूला

क्षैतिज फ़ॉर्मूला तय करता है कि यह 41 प्रतिशत 28 राज्यों में कैसे बाँटा जाए। 15वें वित्त आयोग ने छह पैमाने इस भार के साथ इस्तेमाल किए:

पैमाना14वें वित्त आयोग का भार15वें वित्त आयोग का भारतर्क
आय की दूरी50.0%45.0%समता — राज्य की प्रति व्यक्ति आय और सबसे ऊँची आय वाले राज्य के बीच का फ़र्क़
आबादी (1971)17.5%0%हटा दिया गया
आबादी (2011)10.0%15.0%आज की ज़रूरत
क्षेत्रफल15.0%15.0%बड़े इलाक़े का इंतज़ाम चलाने की लागत
आबादी के मोर्चे पर प्रदर्शन12.5%जिन राज्यों ने आबादी बढ़ना रोका, उन्हें इनाम — 2011 की जनगणना वाले बदलाव की चोट कम करता है
वन और पारिस्थितिकी7.5%10.0%जंगल बचाए रखने की भरपाई, संरक्षण में गँवाया मौक़ा
कर वसूली की कोशिश2.5%वित्तीय रूप से मुस्तैद राज्यों को इनाम

आबादी के मोर्चे पर प्रदर्शन का पैमाना आयोग का कूटनीतिक जवाब था एक असली राजनीतिक दिक़्क़त का: 1970 के दशक से परिवार नियोजन में कामयाब रहे दक्षिणी राज्यों का हिस्सा घट जाता, अगर 2011 की जनगणना सीधे-सीधे लगा दी जाती। यह पैमाना कुल प्रजनन दर के उलटे के आधार पर निकाला जाता है और 1971 की आबादी से नापा जाता है — यानी असर में उन राज्यों को इनाम मिलता है जिन्होंने TFR सबसे तेज़ी से नीचे लाया। केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना को इस भरपाई से फ़ायदा हुआ।

अनुदान का ढाँचा — 10.33 लाख करोड़ रुपये का हस्तांतरण

कर बँटवारे के ऊपर, संविधान के अनुच्छेद 275 के तहत मिलने वाले अनुदान वित्त आयोग के हस्तांतरण की दूसरी भुजा हैं। 15वें वित्त आयोग ने 2021-26 की अवधि के लिए क़रीब 10.33 लाख करोड़ रुपये के अनुदान की सिफ़ारिश की, जो इस तरह बँटे:

अनुदान की श्रेणीरकम (करोड़ रुपये)मक़सद
राजस्व घाटा अनुदान (अनुच्छेद 275)2,94,514बँटवारे के बाद भी घाटे में रहने वाले 17 राज्य
स्थानीय निकाय — ग्रामीण पंचायतें2,36,805आधा (50%) पानी/सफ़ाई के लिए बँधा; आधा (50%) खुला
स्थानीय निकाय — शहरी1,21,055बँधा + खुला; दस लाख से बड़ी आबादी वाले शहरों में प्रदर्शन से जुड़ा
स्वास्थ्य (क्षेत्र अनुदान)70,051प्राथमिक इलाज, शहरी HWC, ब्लॉक स्तर की जाँच, ट्रेनिंग
आपदा प्रबंधन (SDRMF + NDRMF)1,60,153राहत, न्यूनीकरण, बहाली और क्षमता वाली निधियाँ शामिल
क्षेत्र-विशेष (शिक्षा, कृषि, न्यायपालिका, सांख्यिकी)~1,29,987प्रदर्शन से जुड़ा
राज्य-विशेष अनुदान49,599इलाक़े से जुड़ी परियोजनाएँ
स्थानीय निकाय के शहरी स्वास्थ्य और साझा सफ़ाई अनुदानऊपर शामिल

UPSC 2025 के सवाल (Q76) में तीन कथन यह पूछे गए थे कि 15वें वित्त आयोग ने 2022-23 से 2025-26 की अवधि के लिए स्वास्थ्य क्षेत्र, स्थानीय सरकारों और आपदा प्रबंधन के लिए अनुदान की सिफ़ारिश की। तीनों सही हैं, इसलिए विकल्प (d)।

स्वास्थ्य क्षेत्र का अनुदान — ढाँचे में बदलाव

70,051 करोड़ रुपये का स्वास्थ्य अनुदान अपने आकार के लिए नहीं — वह तो केंद्र और राज्यों के मिले-जुले स्वास्थ्य ख़र्च के एक साल भर के बराबर है — बल्कि अपने डिज़ाइन के लिए ख़ास है। यह पहला वित्त आयोग अनुदान है जो बड़े हिस्से में राज्य के स्वास्थ्य विभागों की जगह स्थानीय निकायों से होकर जाता है। इसके अंदर 13,192 करोड़ रुपये ब्लॉक स्तर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में जाँच की सुविधा के लिए, 27,272 करोड़ रुपये शहरी हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों के भवन-ढाँचे के लिए, 5,047 करोड़ रुपये ग्रामीण इलाक़ों में उप-केंद्रों और PHC के भवनों के लिए, और 4,800 करोड़ रुपये सहयोगी स्वास्थ्यकर्मियों की ट्रेनिंग के लिए हैं। ये अनुदान इस शर्त पर मिलते हैं कि राज्य अपने स्वास्थ्य ख़र्च में हर साल कम से कम 8 प्रतिशत की बढ़त बनाए रखें और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को ठीक तरह से इसमें समेटा जाए।

स्थानीय निकाय अनुदान — सबसे बड़ी एक थैली

कुल 4,36,361 करोड़ रुपये (ग्रामीण 2,36,805 करोड़ + शहरी 1,21,055 करोड़, और बाक़ी हिस्सा स्वास्थ्य व दूसरे बँधे हस्तांतरण से) के साथ स्थानीय निकायों को वित्त आयोग अनुदान का अब तक का सबसे बड़ा हिस्सा मिला। ग्रामीण अनुदान का आधा हिस्सा खुला है। बाक़ी आधा पीने के पानी और सफ़ाई से बँधा है। शहरी अनुदान दो हिस्सों में बँटा है — दस लाख से कम आबादी वाले शहरों के लिए (पीने का पानी, सफ़ाई और ठोस कचरा से बँधा) और दस लाख से बड़े शहरों के लिए, जहाँ पूरा अनुदान हवा की गुणवत्ता के नतीजों और सेवा-स्तर के पैमानों से जुड़ा है। पात्र बनने के लिए पंचायतों और शहरी निकायों को ऑडिट किए हिसाब छापने होंगे और संपत्ति कर की न्यूनतम दरें अधिसूचित करनी होंगी।

आपदा प्रबंधन — चार खिड़कियों वाला ढाँचा

1,60,153 करोड़ रुपये के आपदा अनुदान ने ढाँचे को राज्य आपदा जोखिम प्रबंधन निधि (1,28,122 करोड़ रुपये) और राष्ट्रीय आपदा जोखिम प्रबंधन निधि (32,031 करोड़ रुपये), दोनों के तहत चार खिड़कियों में फिर से गढ़ा। चार खिड़कियाँ हैं — राहत (पुरानी SDRF), बहाली और पुनर्निर्माण, तैयारी और क्षमता निर्माण, और आपदा जोखिम न्यूनीकरण। न्यूनीकरण वाली खिड़की 15वें वित्त आयोग की नई चीज़ थी, जो राज्यों से कहती है कि वे सिर्फ़ आपदा के बाद की राहत पर नहीं, ख़तरा कम करने वाले ढाँचे पर भी ख़र्च करें।

रक्षा और आंतरिक सुरक्षा निधि — जो बनी नहीं

संदर्भ की शर्तों में 15वें वित्त आयोग से कहा गया था कि वह “जाँचे कि रक्षा और आंतरिक सुरक्षा के लिए पैसे का अलग तंत्र बनाया जाना चाहिए या नहीं”। आयोग ने इस सवाल को देखा और 2.38 लाख करोड़ रुपये की एक ऐसी रक्षा एवं आंतरिक सुरक्षा आधुनिकीकरण निधि (MFDIS) सुझाई जिसका पैसा साल के अंत में ख़त्म न हो, और जो संचित निधि से हस्तांतरण, विनिवेश की कमाई और रक्षा भूमि के मुद्रीकरण से भरी जाए। केंद्र सरकार ने इस निधि को उस रूप में चालू नहीं किया, जिससे यह पुरानी आलोचना फिर उठती है कि केंद्र की अपनी वित्तीय व्यवस्था पर वित्त आयोग की सिफ़ारिशों को लगातार सलाह भर माना जाता है, बाध्यकारी नहीं।

वित्तीय रोडमैप और FRBM

आयोग ने वित्तीय घाटे के लिए एक ढलान वाला रास्ता सुझाया — केंद्र के लिए 2021-22 में GDP का 6 प्रतिशत, जो 2025-26 तक घटकर 4 प्रतिशत पर आए, और राज्यों का कुल वित्तीय घाटा 4 प्रतिशत (जिसमें 2021-22 में 4.5 प्रतिशत से घटकर 2024-25 तक 3 प्रतिशत की उप-सीमाएँ हों, और बिजली क्षेत्र के सुधारों से जुड़ी अतिरिक्त उधारी की गुंजाइश मिले)। आयोग ने यह भी सुझाया कि FRBM क़ानून में बदलाव कर उसे घाटे के नियम की जगह क़र्ज़ के नियम की तरह चलाया जाए, और उसे GDP के 60 प्रतिशत के क़र्ज़ अनुपात (40 केंद्र + 20 राज्य) से बाँधा जाए। यह सिफ़ारिश लागू नहीं हुई।

16वाँ वित्त आयोग

31 दिसंबर 2023 को अरविंद पनगड़िया की अध्यक्षता में बना 16वाँ वित्त आयोग 2026-27 से 2030-31 की अवधि के लिए अपनी रिपोर्ट 31 अक्तूबर 2025 तक देगा। सदस्य हैं ऐनी जॉर्ज मैथ्यू, मनोज पांडा, सौम्य कांति घोष और निरंजन राजाध्यक्ष; सचिव ऋत्विक पांडे हैं। जो सवाल विवाद खड़े कर सकते हैं: सेस के बढ़ने को देखते हुए राज्यों का पूल में हिस्सा 41 प्रतिशत से ऊपर लौटाया जाए या नहीं; 2021 की जनगणना टल जाने के बाद 2011 की जनगणना ही सही आधार रहती है या नहीं; GST को टिकाने के लिए 15वें वित्त आयोग की अवधि से आगे कोई अलग मुआवज़ा तंत्र चाहिए या नहीं; और क्षैतिज फ़ॉर्मूले में मुफ़्त रेवड़ियों की बहस को कैसे जगह दी जाए।

भाग 3: बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्ट (BRSR)

BRSR सूचीबद्ध कंपनियों के लिए SEBI का तय किया सालाना टिकाऊपन प्रकटीकरण ढाँचा है। यह पूँजी बाज़ार में आए एक वैश्विक बदलाव पर भारतीय नियामक का जवाब है, जिसमें संस्थागत निवेशक — पेंशन फंड, सॉवरेन वेल्थ फंड, बड़े एसेट मैनेजर — अब पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) जोखिम को शेयर के मूल्यांकन में जोड़ते हैं, और इसके लिए तुलना योग्य, ऑडिट किया गैर-वित्तीय ब्यौरा माँगते हैं। UPSC 2025 के सवाल (Q34) में यही जाँचा गया कि छात्र सही नियामक (SEBI, RBI नहीं) को सही दायरे (बाज़ार पूँजी के हिसाब से शीर्ष 1000 सूचीबद्ध कंपनियाँ) के साथ जोड़ पाते हैं या नहीं।

नियमन का सिलसिला

SEBI का इससे पहले वाला प्रकटीकरण बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी रिपोर्ट (BRR) था, जो 2012 में बाज़ार पूँजी के हिसाब से शीर्ष 100 सूचीबद्ध कंपनियों के लिए आया, 2015 में शीर्ष 500 तक और 2019 में शीर्ष 1000 तक बढ़ा। BRR सिद्धांतों पर चलने वाला और बड़े हिस्से में गुणात्मक ढाँचा था। अगस्त 2020 में कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय की BRR समिति (अध्यक्ष ज्ञानेश्वर कुमार सिंह) ने सुझाया कि BRR की जगह ज़्यादा आँकड़ों वाला ढाँचा — BRSR — लाया जाए। SEBI ने यह सुझाव माना और 10 मई 2021 को SEBI (सूचीबद्धता दायित्व एवं प्रकटीकरण अपेक्षाएँ) विनियम 2015 के विनियम 34(2)(f) में बदलाव करके बाज़ार पूँजी के हिसाब से शीर्ष 1000 सूचीबद्ध कंपनियों के लिए BRSR ज़रूरी कर दिया — वित्त वर्ष 2021-22 से मर्ज़ी पर, और 2022-23 से अनिवार्य।

जुलाई 2023 में SEBI ने BRSR कोर लाया — BRSR के मुख्य प्रदर्शन पैमानों का एक हिस्सा, जिस पर किसी स्वतंत्र आश्वासन देने वाले से रीज़नेबल एश्योरेंस लेना ज़रूरी है। इसका दायरा नीचे बताए रास्ते पर बढ़ता जा रहा है।

NGRBC के नौ सिद्धांत

BRSR का ढाँचा ज़िम्मेदार कारोबारी आचरण पर राष्ट्रीय दिशानिर्देशों (NGRBC) के नौ सिद्धांतों पर खड़ा है, जो कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय ने मार्च 2019 में जारी किए — और जो ख़ुद 2011 के राष्ट्रीय स्वैच्छिक दिशानिर्देशों का नया रूप हैं।

सिद्धांतविषयBRSR में यह क्या समेटता है
P1नैतिकता, पारदर्शिता और जवाबदेहीआचरण संहिता, भ्रष्टाचार-रोधी ट्रेनिंग, शिकायतें
P2टिकाऊ और सुरक्षित सामान-सेवाएँटिकाऊपन पर R&D ख़र्च, उत्पादों का जीवन-चक्र आकलन, रीसाइकल की गई सामग्री
P3कर्मचारियों की भलाईवेतन, सुविधाएँ, पहुँच, टिके रहना, ट्रेनिंग
P4हितधारकों की सुननाहितधारकों की पहचान, ख़ासकर कमज़ोर तबक़ों की
P5मानवाधिकारट्रेनिंग, शिकायतें, आपूर्ति शृंखला की जाँच-परख
P6पर्यावरण की रक्षाऊर्जा, उत्सर्जन, पानी, कचरा, जैव विविधता
P7ज़िम्मेदार नीति पैरवीव्यापार संगठनों की सदस्यता, मुक़ाबला-विरोधी आचरण
P8समावेशी विकासCSR परियोजनाएँ, सामाजिक असर का आकलन, MSME से ख़रीद
P9उपभोक्ता के लिए मूल्यउत्पाद की जानकारी, डेटा निजता, विज्ञापन के मानक

BRSR कोर — आश्वासन वाले नौ पैमाने

BRSR कोर इसलिए लाया गया क्योंकि निवेशक ख़ुद कंपनी के बताए, बिना ऑडिट टिकाऊपन आँकड़ों पर भरोसा नहीं कर रहे थे। कोर नौ ऐसे आँकड़ों वाले समूह निकालता है जिन पर किसी स्वतंत्र आश्वासन देने वाले से रीज़नेबल एश्योरेंस लेना ज़रूरी है। नौ पैमाने ये हैं: ग्रीनहाउस गैस (स्कोप 1 और स्कोप 2) उत्सर्जन की तीव्रता, पानी की खपत और निकासी की तीव्रता, ऊर्जा खपत की तीव्रता और नवीकरणीय हिस्सा, कचरा पैदा होने की तीव्रता और उसकी वापसी दर, चक्रीय अर्थव्यवस्था को अपनाना, कर्मचारियों की भलाई और सुरक्षा बढ़ाना, कारोबार में लैंगिक विविधता, कर्मचारियों के वेतन में बराबरी, कारोबार में खुलापन जिसमें MSME के साथ क़ीमत की शर्तें साझा करना शामिल है, और महिलाओं को दिया गया कुल वेतन।

वित्त वर्षBRSR (पूरा) किन पर लागूBRSR कोर (आश्वासन वाला) किन पर लागू
वित्त वर्ष 2021-22शीर्ष 1000 के लिए मर्ज़ी परलागू नहीं
वित्त वर्ष 2022-23अनिवार्य — शीर्ष 1000लागू नहीं
वित्त वर्ष 2023-24शीर्ष 1000अनिवार्य — शीर्ष 150
वित्त वर्ष 2024-25शीर्ष 1000अनिवार्य — शीर्ष 250
वित्त वर्ष 2025-26शीर्ष 1000अनिवार्य — शीर्ष 500
वित्त वर्ष 2026-27शीर्ष 1000अनिवार्य — शीर्ष 1000

SEBI ने BRSR के तहत आपूर्ति शृंखला की रिपोर्टिंग भी शुरू की — शीर्ष 250 सूचीबद्ध कंपनियों को अपने उन ऊपर और नीचे के साझेदारों के ESG आँकड़े देने होंगे जो मूल्य के हिसाब से उनकी कम से कम 75 प्रतिशत ख़रीद और बिक्री बनाते हैं। यह वित्त वर्ष 2024-25 से “मानो या वजह बताओ” के आधार पर शुरू हुआ और 2025-26 से अनिवार्य है।

BRSR और दुनिया के ESG प्रकटीकरण ढाँचे

ढाँचाजारी करने वालादायराआश्वासनभारत से मेल
BRSR (भारत)SEBIसूचीबद्ध कंपनियाँ — शीर्ष 1000कोर: रीज़नेबल एश्योरेंसघरेलू आधार
GRI मानकग्लोबल रिपोर्टिंग इनिशिएटिवस्वैच्छिक, सभी कंपनियाँमर्ज़ी परBRSR इसका सिद्धांत वाला ढाँचा लेता है
SASB मानकIFRS फ़ाउंडेशन (ISSB के ज़रिए)उद्योग के हिसाब से पैमानेमर्ज़ी परउद्योग के पैमानों पर BRSR कोर से ओवरलैप
TCFD सिफ़ारिशेंवित्तीय स्थिरता बोर्डजलवायु जोखिम — शासन, रणनीति, जोखिम, पैमानेस्थानीय नियमों के मुताबिक़BRSR का सेक्शन A और P6 इन्हीं विषयों को छूते हैं
IFRS S1 / S2 (ISSB)IFRS फ़ाउंडेशनसामान्य + जलवायु प्रकटीकरणदेश के हिसाब सेभारत अपनाने का रास्ता देख रहा है
CDPCDP (NGO)जलवायु, पानी, जंगल की प्रश्नावलीमर्ज़ी परBRSR के P6 से ओवरलैप
CSRD / ESRS (यूरोपीय संघ)यूरोपीय आयोगEU की बड़ी कंपनियाँ + EU में मौजूदगी वाली ग़ैर-EU कंपनियाँपहले सीमित, फिर रीज़नेबलEU समूहों की भारतीय सहायक कंपनियाँ इसके दायरे में

BRSR कोर में आगे चल रही भारतीय कंपनियाँ

रिलायंस इंडस्ट्रीज़, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़, इंफ़ोसिस, ITC, HDFC बैंक, टाटा स्टील, JSW स्टील, अल्ट्राटेक सीमेंट, महिंद्रा एंड महिंद्रा और हिंदुस्तान यूनिलीवर उन शुरुआती कंपनियों में हैं जिन्होंने वित्त वर्ष 2023-24 से आश्वासन वाला BRSR कोर आँकड़ा छापा है। टाटा स्टील और JSW स्टील ने अपने हरित-स्टील बदलाव के लिए पैसा जुटाने में BRSR प्रकटीकरण को आधार बनाया है; इंफ़ोसिस और TCS SBTi ढाँचे के तहत 2040 तक नेट ज़ीरो के अपने वादों को BRSR आँकड़ों से टिकाते हैं। ITC की BRSR पर ESG विश्लेषक ख़ास नज़र रखते हैं, क्योंकि समूह का तंबाकू कारोबार सिद्धांत 9 के इर्द-गिर्द शासन की उलझन पैदा करता है।

BRSR नियम मानने से आगे क्यों मायने रखता है

मुख्य परीक्षा के लिहाज़ से तीन जोड़ हैं। पहला, BRSR वह प्रकटीकरण की रीढ़ है जो भारत के COP वादों को सहारा देगी — ख़ासकर उस राष्ट्रीय स्तर पर तय योगदान को, जिसमें 2005 के स्तर से 2030 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता 45 प्रतिशत घटानी है, और COP27 में दी गई दीर्घकालिक कम-उत्सर्जन विकास रणनीति को। कंपनी स्तर के आँकड़ों के बिना क्षेत्रवार रास्तों पर नज़र ही नहीं रखी जा सकती। दूसरा, BRSR सरकारी हरित बॉन्ड और कंपनियों के हरित बॉन्ड की नियामकीय पाइपलाइन है — निवेशक पैसे के इस्तेमाल की जाँच के लिए BRSR जैसा ब्यौरा माँगते हैं। तीसरा, BRSR कोर का आपूर्ति शृंखला वाला हिस्सा भारतीय नियामकों को उन शृंखलाओं में झाँकने देता है जिनका हिसाब यूरोपीय संघ की कॉर्पोरेट सस्टेनेबिलिटी ड्यू डिलिजेंस डायरेक्टिव (CSDDD) और कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (CBAM) 2026 से भारतीय निर्यातकों से माँगेंगे।

अभ्यास MCQ

Q1. कवच के बारे में नीचे दिए कथनों पर विचार कीजिए:

  • यह स्वदेशी रूप से बनी ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन (ATP) प्रणाली है।
  • राष्ट्रीय रेल योजना 2028 तक पूरे भारतीय रेल नेटवर्क पर कवच लगाने की बात करती है।

इनमें कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) सिर्फ़ I (b) सिर्फ़ II (c) दोनों (d) कोई नहीं
उत्तर: (a) — कथन II ग़लत है; लक्ष्य प्राथमिकता वाले क़रीब 44,000 किमी नेटवर्क के लिए 2030 है।

Q2. निजी कंपनियों के साथ मिलकर कवच किस संगठन ने बनाया?
(a) DMRC (b) RDSO (c) IRCTC (d) CRIS
उत्तर: (b) RDSO।

Q3. बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्ट के बारे में नीचे दिए कथनों पर विचार कीजिए:

  • सूचीबद्ध कंपनियों के लिए BRSR ढाँचा भारतीय रिज़र्व बैंक अधिसूचित करता है।
  • बाज़ार पूँजी के हिसाब से शीर्ष 1000 सूचीबद्ध कंपनियों के लिए BRSR अनिवार्य है।

ऊपर दिए कथनों में कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) सिर्फ़ I (b) सिर्फ़ II (c) दोनों (d) कोई नहीं
उत्तर: (b) BRSR SEBI अधिसूचित करता है, RBI नहीं।

Q4. 15वें वित्त आयोग ने केंद्रीय करों के बाँटने लायक़ पूल में राज्यों का हिस्सा कितना सुझाया?
(a) 32 प्रतिशत (b) 41 प्रतिशत (c) 42 प्रतिशत (d) 50 प्रतिशत
उत्तर: (b) 41 प्रतिशत, जो 42 प्रतिशत से घटाया गया क्योंकि जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश बन गया।

Q5. इनमें से कौन-कौन से पैमाने 15वें वित्त आयोग ने क्षैतिज बँटवारे के लिए इस्तेमाल किए?

  • आय की दूरी
  • आबादी के मोर्चे पर प्रदर्शन
  • वन और पारिस्थितिकी
  • आबादी (1971 की जनगणना)

नीचे दिए कोड से चुनिए:
(a) सिर्फ़ 1, 2 और 3 (b) सिर्फ़ 2, 3 और 4 (c) सिर्फ़ 1, 3 और 4 (d) चारों
उत्तर: (a) 1971 की जनगणना वाली आबादी को 15वें वित्त आयोग ने हटा दिया था।

Q6. 15वें वित्त आयोग ने 2022-23 से 2025-26 की अवधि के लिए इनमें से किनके लिए अनुदान सुझाया?

  • स्वास्थ्य क्षेत्र
  • स्थानीय सरकारें
  • आपदा प्रबंधन

(a) सिर्फ़ 1 और 2 (b) सिर्फ़ 2 और 3 (c) सिर्फ़ 1 और 3 (d) तीनों
उत्तर: (d)

Q7. BRSR कोर इनमें से किससे जुड़ा है?
(a) मर्ज़ी से हर तिमाही ब्यौरा देना (b) आँकड़ों वाले मुख्य पैमानों पर अनिवार्य रीज़नेबल एश्योरेंस (c) CSR ख़र्च का आंतरिक ऑडिट (d) निदेशक स्तर के वेतन का ब्यौरा
उत्तर: (b)

Q8. 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष हैं:
(a) एन. के. सिंह (b) अरविंद पनगड़िया (c) बिबेक देबरॉय (d) सुमन बेरी
उत्तर: (b) अरविंद पनगड़िया, जिनकी नियुक्ति 31 दिसंबर 2023 को हुई।

तीनों को जोड़ने वाला विश्लेषण — संघवाद, तकनीक, नियमन

2025 के पेपर की एक ऐसी बात, जिस पर कम ध्यान गया, यह है कि तीनों सवालों की रीढ़ एक ही है: वे यह जाँचते हैं कि केंद्र सरकार बड़े पैमाने पर सार्वजनिक सुविधाएँ देने के लिए दूसरे दर्जे के किरदारों — राज्यों, सूचीबद्ध कंपनियों, और अपनी ही इंजीनियरिंग संस्थाओं — से कैसे मोल-तोल करती है। कवच में केंद्र एक सरकारी शोध संस्था से कहता है कि वह निजी कंपनियों को साथ लाए। 15वाँ वित्त आयोग केंद्र की वह संवैधानिक ज़िम्मेदारी है जिसके तहत उसे राज्यों के साथ वित्तीय गुंजाइश बाँटनी होती है। BRSR में केंद्र का बाज़ार नियामक निजी सूचीबद्ध कंपनियों पर पारदर्शिता थोपता है। हर एक अलग तरीक़ा दिखाता है कि सरकार पालन कैसे करवाती है: मालिकाना हक़ से (कवच), पैसा देकर (वित्त आयोग अनुदान), और ब्यौरा माँगकर (BRSR)।

केंद्रीय हस्तांतरण की राजनीतिक अर्थव्यवस्था

मुख्य परीक्षा में एक आम सवाल यह पूछता है कि केंद्र-राज्य वित्तीय रिश्ता केंद्र की तरफ़ खिंचता जा रहा है या नहीं। सबूत मिले-जुले हैं। एक तरफ़, 15वें वित्त आयोग की अवधि में कुल वित्तीय हस्तांतरण (बँटवारा + अनुदान + केंद्र प्रायोजित योजनाएँ) रुपये के हिसाब से बढ़ा है। दूसरी तरफ़, इस हस्तांतरण में वित्त आयोग के बँटवारे से आने वाला हिस्सा — जो खुला और पहले से तय होता है — घटा है, जबकि बँधी केंद्र प्रायोजित योजनाओं से आने वाला हिस्सा (जिनमें राज्य को अपना पैसा भी लगाना पड़ता है और जो केंद्र की प्राथमिकताओं पर चलती हैं) बढ़ा है। बाँटने लायक़ पूल से बाहर बैठे सेस और सरचार्ज 2023-24 में केंद्र के कुल कर राजस्व का लगभग 18 प्रतिशत थे — जो 2014-15 में क़रीब 10 प्रतिशत था। यानी बँटवारे का हिसाब चुपचाप उन बदलावों से घिस गया है जिन्हें पलटने की ताक़त किसी वित्त आयोग के पास नहीं है।

मुख्य परीक्षा के उत्तर में तीन कोणों को जोड़िए

इन तीनों विषयों पर सबसे मज़बूत उत्तर उस जाल से बचेंगे जिसमें नीति का ब्यौरा देकर बात ख़त्म कर दी जाती है। कवच पर ज़्यादा नंबर वाला उत्तर पहले तकनीक बताएगा, फिर 2030 के लक्ष्य के मुक़ाबले तैनाती की देरी की आलोचना करेगा, और फिर सवाल को आत्मनिर्भर भारत की उस बड़ी बहस में रखेगा कि सरकारी ख़रीद से चलने वाली औद्योगिक नीति सुरक्षा-प्रधान क्षेत्रों के लिए टिकाऊ मॉडल है या नहीं। 15वें वित्त आयोग पर ज़्यादा नंबर वाला उत्तर पहले फ़ॉर्मूला बताएगा, फिर आबादी वाले पैमाने के बदलाव पर दक्षिणी राज्यों और हिंदी पट्टी की राजनीति खोलेगा, और फिर 16वें वित्त आयोग के सामने आने वाली सेस और रेवड़ियों की बहस से जोड़ेगा। BRSR पर ज़्यादा नंबर वाला उत्तर पहले नौ सिद्धांत बताएगा, फिर यूरोपीय संघ के CSRD के रीज़नेबल-और-सीमित मॉडल के मुक़ाबले सिर्फ़ सीमित आश्वासन वाले डिज़ाइन की आलोचना करेगा, और फिर CBAM से, और भारतीय निर्यातकों पर यूरोपीय नियमों के बड़े असर से जोड़ेगा।

तीनों विषयों के लिए जल्दी रिवीज़न की तालिका

विषयज़िम्मेदार संस्थामुख्य आँकड़ाअवधि / संचालन का दायराUPSC 2025 का उत्तर
कवचRDSO + मेधा, कर्नेक्स, HBL2030 तक ~44,000 किमी का लक्ष्यराष्ट्रीय रेल योजना विज़न-2030Q62: सिर्फ़ II — विकल्प (b)
15वाँ वित्त आयोगअध्यक्ष एन. के. सिंह41% बँटवारा; 10.33 लाख करोड़ रुपये अनुदान2021-22 से 2025-26Q76: तीनों — विकल्प (d)
BRSRSEBI (मई 2021 का LODR संशोधन)बाज़ार पूँजी से शीर्ष 1000 सूचीबद्ध कंपनियाँवित्त वर्ष 2022-23 से अनिवार्यQ34: सिर्फ़ II — विकल्प (b)
BRSR कोर आश्वासनSEBI (जुलाई 2023)शीर्ष 150 → 1000 तक का रास्तावित्त वर्ष 2023-24 से
16वाँ वित्त आयोगअध्यक्ष अरविंद पनगड़ियारिपोर्ट 31 अक्तूबर 2025 तकअवधि 2026-27 से 2030-31

निष्कर्ष — तीनों धागों को जोड़ते हुए

देखने में तीन अलग-अलग विषय, लेकिन नीचे एक ही बात: भारत इक्कीसवीं सदी की एक ज़्यादा उलझी अर्थव्यवस्था के लिए संस्थाओं की पाइपलाइन बिछा रहा है। कवच तकनीक से चलने वाला सुरक्षा ढाँचा है, जो रेल को ज़्यादा यात्री और ज़्यादा माल तेज़ी से ढोने देता है, वह भी मौतों की गिनती बढ़ाए बिना। 15वाँ वित्त आयोग वित्तीय ढाँचा है, जो केंद्र की वसूली को राज्यों और स्थानीय निकायों तक बाँटता है, और स्वास्थ्य, सफ़ाई और आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर नई शर्तें लगाता है। BRSR सूचना का ढाँचा है, जो कंपनी स्तर के टिकाऊपन वाले बर्ताव को निवेशकों के काम के आँकड़ों में बदल देता है। तीनों अभी अधूरे हैं — कवच 44,000 किमी से बहुत दूर है, वित्त आयोग के अनुदान पंचायतें अब भी पूरे इस्तेमाल नहीं कर पातीं, BRSR कोर का आश्वासन अभी शुरू ही हुआ है। प्रीलिम्स का सवाल तथ्य जाँचता है; मुख्य परीक्षा के उत्तर को दिशा जाँचनी चाहिए।

तैयारी के लिहाज़ से इन तीन सवालों का सबक़ यह है कि UPSC का पेपर बनाने वाला अब मौजूदा नीति पर कथन-जोड़ी वाले सवाल पूछने में पहले से ज़्यादा सहज है। जो छात्र सिर्फ़ ख़बर की हेडलाइन पढ़ता है (“सरकार ने कवच शुरू किया”, “16वाँ वित्त आयोग बना”, “SEBI ने ESG ज़रूरी किया”), वह यह तय नहीं कर पाएगा कि कौन-सा साल, कौन-सी संस्था, कौन-सी सीमा। जो छात्र मूल दस्तावेज़ पढ़ता है — राष्ट्रीय रेल योजना का सार, 15वें वित्त आयोग का खंड I, SEBI का BRSR परिपत्र — उसे हर सवाल पर चार नंबर मिलते हैं, और यह भरोसा भी कि अगले पेपर के घुमावदार सवाल भी इसी आदत से हल हो जाएँगे। तीन विषय, एक तरीक़ा।

सामान्य प्रश्न

कवच क्या है और इसे बनाया किसने?

कवच भारत में ही बनी ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन (ATP) प्रणाली का ब्रांड नाम है; संस्कृत में कवच का मतलब बचाव का ख़ोल होता है। काम 2011-12 में ट्रेन कोलिजन अवॉइडेंस सिस्टम (TCAS) नाम से शुरू हुआ था, और इसे आगे बढ़ाया रेल मंत्रालय की तकनीकी शाखा RDSO ने, जिसका मुख्यालय लखनऊ में है। तीन भारतीय निजी कंपनियाँ डिज़ाइन पार्टनर के तौर पर जुड़ीं: मेधा सर्वो ड्राइव्स, कर्नेक्स माइक्रोसिस्टम्स और HBL पावर सिस्टम्स, तीनों हैदराबाद की। बौद्धिक संपदा भारतीय रेल के पास है, और 2020 में इसे कवच नाम से राष्ट्रीय ATP के रूप में अपना लिया गया, ताकि यूरोपियन ट्रेन कंट्रोल सिस्टम (ETCS) जैसे आयातित विकल्प भारतीय पटरियों से हट सकें।

कवच चलती ट्रेन में करता क्या है, और काम कैसे करता है?

यह तीन काम करता है जो कोई लोको-पायलट बारह घंटे की शिफ़्ट में लगातार नहीं कर सकता: लाल सिग्नल पार होने यानी सिग्नल पास्ड ऐट डेंजर (SPAD) की घटना रोकना, स्थायी और अस्थायी स्पीड सीमाएँ ख़ुद-ब-ख़ुद लागू करना, और टक्कर का ख़तरा पकड़ते ही इमरजेंसी ब्रेक लगा देना। इंजन पर लगा लोको कवच और ब्लॉक स्टेशनों व सिग्नल की जगहों पर लगा स्टेशनरी कवच 435 MHz के अलग UHF रेडियो लिंक पर आपस में बात करते रहते हैं, और पटरी में तय दूरी पर गड़े RFID टैग से इंजन को उसकी सटीक जगह, ढलान और आगे वाले ब्लॉक का सिग्नल मिलता रहता है। स्टेशनरी कवच मूवमेंट अथॉरिटी भेजता है, यानी यह इजाज़त कि ट्रेन कितनी दूर और किस रफ़्तार से जा सकती है। पायलट न माने तो कवच पहले चेतावनी देता है, फिर सर्विस ब्रेक और ज़रूरत पड़ने पर पूरा इमरजेंसी ब्रेक लगा देता है। इसके अलावा कैब सिग्नलिंग, लेवल क्रॉसिंग पर अपने-आप हॉर्न, रेडियो रेंज की सभी कवच वाली ट्रेनों तक SoS संदेश, और ऐसी ख़ुद-जाँच जिसमें अंदरूनी ख़राबी पर चुपचाप फ़ेल होने के बजाय ब्रेक लग जाते हैं। इस प्रणाली को IEC 61508 फ़ंक्शनल सेफ़्टी मानक के चार स्तरों में सबसे ऊँचा दर्जा SIL-4 मिला है।

2023 के बाद कवच लगाने की रफ़्तार क्यों बढ़ी?

बालासोर हादसे की वजह से। 2 जून 2023 को ओडिशा के बालासोर ज़िले के बहनागा बाज़ार स्टेशन पर कोरोमंडल एक्सप्रेस खड़ी मालगाड़ी से टकराई, और फिर यशवंतपुर-हावड़ा एक्सप्रेस उसी मलबे में जा घुसी। 296 लोगों की जान गई और 1,200 से ज़्यादा घायल हुए। रेलवे सुरक्षा आयुक्त की जाँच ने तात्कालिक वजह इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग की ख़राबी से हुई ग़लत सिग्नलिंग को बताया, और यह ठीक वही किस्म की गड़बड़ी है जिसे कवच झेलने लायक़ बनाता है, क्योंकि लोको कवच पहले से भरे हुए ब्लॉक में जाने की मूवमेंट अथॉरिटी देता ही नहीं। बालासोर ने कवच बनाया नहीं, पर उसकी तैनाती पर राजनीतिक और बजटीय दबाव ज़रूर बढ़ा दिया।

कवच अब तक कितनी दूर तक लग चुका है, और पूरा नेटवर्क कब तक ढँकना है?

2024 के आख़िर तक कवच क़रीब 1,548 रूट किलोमीटर पर चालू था, ज़्यादातर दक्षिण मध्य रेलवे ज़ोन में, और दिल्ली-मुंबई तथा दिल्ली-हावड़ा मुगलसराय सेक्शन के कुछ हिस्सों पर काम चल रहा था। राष्ट्रीय रेल योजना का लक्ष्य है कि ज़्यादा भीड़ और ज़्यादा इस्तेमाल वाले क़रीब 44,000 किमी नेटवर्क पर यह 2030 तक लगे, 2028 तक नहीं, और पूरे भारतीय रेल नेटवर्क के लिए समय-सीमा उससे भी आगे की है। पिछड़ने की तीन वजहें हैं: पटरी के किनारे लगने वाला काम टेंडर से पीछे चल रहा है; जितने रूट-किमी पर ट्रैकसाइड उपकरण लग चुके हैं, उतने कवच लगे इंजन नहीं हैं; और 435 MHz बैंड की स्पेक्ट्रम मंज़ूरी में देरी होती रही है। नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की 2022 की रेल सुरक्षा ऑडिट ने इन तीनों को उठाया था। जुलाई 2024 में RDSO से मंज़ूर वर्ज़न 4.0 ने कम से कम यह दिक़्क़त दूर कर दी कि एक कंपनी के लगाए इंजन दूसरी कंपनी के ट्रैकसाइड उपकरण नहीं पढ़ पाते थे।

राज्यों का हिस्सा 41 प्रतिशत ही क्यों रखा गया, 42 प्रतिशत क्यों नहीं?

14वें वित्त आयोग ने 42 प्रतिशत सुझाया था। 2021-26 के लिए एक प्रतिशत अंक की कमी सज़ा नहीं, हिसाब का समायोजन थी: जम्मू-कश्मीर 31 अक्तूबर 2019 को राज्य नहीं रहा और दो केंद्रशासित प्रदेश बन गया, इसलिए पुराने राज्य के नाम पर तय क़रीब एक प्रतिशत हिस्सा अलग निकाल दिया गया, क्योंकि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को पैसा अब सीधे केंद्र से जाता है। सेस और सरचार्ज बाँटने लायक़ पूल से बाहर ही रहते हैं, और उन्हें पूल में लाने का आदेश देने का संवैधानिक अधिकार आयोग के पास नहीं था। 31 दिसंबर 2023 को अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता में बना 16वाँ वित्त आयोग इसी सवाल पर लौटेगा; उसे 2026-27 से 2030-31 की अवधि के लिए 31 अक्तूबर 2025 तक रिपोर्ट देनी है।

क्षैतिज बँटवारे के फ़ॉर्मूले में छह पैमाने कौन से हैं?

आय की दूरी 45 प्रतिशत, 2011 की जनगणना वाली आबादी 15 प्रतिशत, क्षेत्रफल 15 प्रतिशत, आबादी के मोर्चे पर प्रदर्शन 12.5 प्रतिशत, वन और पारिस्थितिकी 10 प्रतिशत, और कर वसूली की कोशिश 2.5 प्रतिशत। 1971 की जनगणना वाली आबादी, जिसका भार 14वें वित्त आयोग में 17.5 प्रतिशत था, पूरी तरह हटा दी गई। नए पैमाने दो हैं: आबादी के मोर्चे पर प्रदर्शन, और कर वसूली की कोशिश। पहला आयोग का कूटनीतिक जवाब था एक असली राजनीतिक दिक़्क़त का, क्योंकि 1970 के दशक से परिवार नियोजन में कामयाब रहे दक्षिणी राज्यों का हिस्सा 2011 की जनगणना सीधे-सीधे लगाने पर घट जाता। यह पैमाना कुल प्रजनन दर (TFR) के उलटे से निकाला जाता है और 1971 की आबादी से नापा जाता है, इसलिए केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना को इस भरपाई का फ़ायदा मिला।

15वें वित्त आयोग ने कौन-कौन से अनुदान सुझाए और उनका ढाँचा क्या है?

संविधान के अनुच्छेद 275 के तहत 2021-26 के लिए क़रीब 10.33 लाख करोड़ रुपये के अनुदान। राजस्व घाटा अनुदान 2,94,514 करोड़ रुपये, बँटवारे के बाद भी घाटे में रहने वाले 17 राज्यों के लिए; ग्रामीण पंचायतों को 2,36,805 करोड़ और शहरी स्थानीय निकायों को 1,21,055 करोड़; आपदा प्रबंधन को 1,60,153 करोड़; शिक्षा, कृषि, न्यायपालिका और सांख्यिकी जैसे क्षेत्र-विशेष अनुदान क़रीब 1,29,987 करोड़; स्वास्थ्य क्षेत्र को 70,051 करोड़; और राज्य-विशेष अनुदान 49,599 करोड़। स्वास्थ्य अनुदान पहला ऐसा वित्त आयोग अनुदान है जो बड़े हिस्से में राज्य के स्वास्थ्य विभागों की जगह स्थानीय निकायों से होकर जाता है। आपदा अनुदान को राज्य और राष्ट्रीय आपदा जोखिम प्रबंधन निधि, दोनों के तहत चार खिड़कियों में बाँटा गया: राहत, बहाली और पुनर्निर्माण, तैयारी और क्षमता निर्माण, तथा न्यूनीकरण, जिसमें आख़िरी खिड़की 15वें आयोग की नई पहल थी।

BRSR क्या है, इसे अनिवार्य कौन करता है और किन कंपनियों पर लागू होता है?

BRSR यानी बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्ट, सूचीबद्ध कंपनियों के लिए हर साल दी जाने वाली टिकाऊपन प्रकटीकरण रिपोर्ट है, जिसे SEBI अनिवार्य करता है, RBI नहीं। SEBI ने 10 मई 2021 को सूचीबद्धता दायित्व एवं प्रकटीकरण अपेक्षाएँ (LODR) विनियम 2015 के विनियम 34(2)(f) में बदलाव करके बाज़ार पूँजी के हिसाब से शीर्ष 1000 सूचीबद्ध कंपनियों पर BRSR लागू किया, वित्त वर्ष 2021-22 में मर्ज़ी पर और 2022-23 से अनिवार्य। इससे पहले बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी रिपोर्ट (BRR) चलती थी, जो 2012 में शीर्ष 100 कंपनियों के लिए आई, 2015 में शीर्ष 500 और 2019 में शीर्ष 1000 तक बढ़ी, और सिद्धांतों पर चलने वाला बड़े हिस्से में गुणात्मक ढाँचा थी। बदलाव अगस्त 2020 में कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय की BRR समिति के सुझाव पर हुआ, जिसके अध्यक्ष ज्ञानेश्वर कुमार सिंह थे।

NGRBC के वे नौ सिद्धांत कौन से हैं जिन पर BRSR खड़ा है?

ज़िम्मेदार कारोबारी आचरण पर राष्ट्रीय दिशानिर्देश (NGRBC) कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय ने मार्च 2019 में जारी किए, जो ख़ुद 2011 के राष्ट्रीय स्वैच्छिक दिशानिर्देशों का नया रूप हैं। नौ सिद्धांत ये हैं: नैतिकता, पारदर्शिता और जवाबदेही (P1); टिकाऊ और सुरक्षित सामान-सेवाएँ (P2); कर्मचारियों की भलाई (P3); हितधारकों की सुनना (P4); मानवाधिकार (P5); पर्यावरण की रक्षा (P6); ज़िम्मेदार नीति पैरवी (P7); समावेशी विकास (P8); और उपभोक्ता के लिए मूल्य (P9)। BRSR में ये सिद्धांत ठोस आँकड़ों में बदल जाते हैं, जैसे भ्रष्टाचार-रोधी ट्रेनिंग और उत्पादों का जीवन-चक्र आकलन, ऊर्जा, उत्सर्जन, पानी, कचरा और जैव विविधता के आँकड़े, MSME से ख़रीद, तथा डेटा निजता और विज्ञापन के मानक।

BRSR कोर BRSR से अलग कैसे है और किस पर कब लागू होता है?

SEBI जुलाई 2023 में BRSR कोर लाया। यह BRSR के मुख्य प्रदर्शन पैमानों का वह हिस्सा है जिस पर किसी स्वतंत्र आश्वासन देने वाले से रीज़नेबल एश्योरेंस लेना ज़रूरी है, और यह इसलिए लाया गया क्योंकि निवेशक कंपनियों के ख़ुद बताए, बिना ऑडिट टिकाऊपन आँकड़ों पर भरोसा नहीं कर रहे थे। यह वित्त वर्ष 2023-24 से शीर्ष 150, 2024-25 से शीर्ष 250, 2025-26 से शीर्ष 500 और 2026-27 से शीर्ष 1000 कंपनियों पर अनिवार्य होता जाएगा, जबकि पूरा BRSR पूरे दौर में शीर्ष 1000 पर लागू रहता है। इसके अलावा SEBI ने शीर्ष 250 कंपनियों से कहा है कि वे अपनी आपूर्ति शृंखला के उन साझेदारों के ESG आँकड़े भी दें जो उनकी ख़रीद और बिक्री का कम से कम 75 प्रतिशत हिस्सा हैं, वित्त वर्ष 2024-25 से इस शर्त पर कि या तो पालन करें या वजह बताएँ, और 2025-26 से अनिवार्य रूप से।

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Gaurav Tiwari

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Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

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