भारत में उर्वरक (Fertilisers) और आधुनिक कृषि आदान कृषि उत्पादकता के अपरिहार्य आधार हैं। हालाँकि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मृदा स्वास्थ्य, पर्यावरण और राजकोषीय सब्सिडी — तीनों पर दबाव पड़ा है। नैनो यूरिया और नैनो DAP जैसी नवाचारी तकनीकें इस चुनौती का समाधान पेश करती हैं।
नैनो यूरिया
नैनो यूरिया IFFCO (Indian Farmers Fertiliser Cooperative) द्वारा विकसित एक तरल उर्वरक है। यह पारंपरिक यूरिया की जगह पर्णीय (foliar) छिड़काव के रूप में काम करता है।
- एक 500 ml बोतल एक बोरी (45 kg) यूरिया के बराबर काम करती है।
- नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (NUE) बढ़ती है।
- भूजल प्रदूषण और मृदा अम्लीकरण कम होता है।
- परिवहन और भंडारण लागत घटती है।
नैनो DAP
नैनो DAP (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) भी IFFCO द्वारा विकसित है। यह फॉस्फोरस उर्वरक का नैनो-तकनीक रूप है जो जड़ विकास और बीज अंकुरण में सहायता करता है।
फर्टिगेशन (Fertigation)
फर्टिगेशन वह प्रक्रिया है जिसमें उर्वरकों को सिंचाई जल के साथ ड्रिप/स्प्रिंकलर प्रणाली के माध्यम से सीधे पौधों की जड़ों तक पहुँचाया जाता है। इसके लाभ:
- उर्वरक का 20-30% कम उपयोग।
- जल उपयोग दक्षता बढ़ती है।
- फसल की गुणवत्ता और उपज में सुधार।
उर्वरक सब्सिडी सुधार
भारत सरकार उर्वरक सब्सिडी को पोषण-आधारित सब्सिडी (Nutrient Based Subsidy — NBS) प्रणाली की ओर ले जा रही है। DBT (Direct Benefit Transfer) के माध्यम से सब्सिडी सीधे किसानों को देने का प्रयास हो रहा है।
चुनौतियाँ
- यूरिया का अत्यधिक उपयोग: सब्सिडीयुक्त मूल्य के कारण किसान जरूरत से ज्यादा यूरिया डालते हैं।
- असंतुलित उर्वरक उपयोग: N:P:K अनुपात आदर्श 4:2:1 की जगह 8:3:1 तक असंतुलित है।
- आयात निर्भरता: भारत DAP और MOP का बड़ा हिस्सा आयात करता है।
UPSC के लिए प्रासंगिकता
GS III में उर्वरक नीति कृषि, मृदा स्वास्थ्य, सब्सिडी सुधार और पर्यावरण के अंतर्गत आती है। नैनो यूरिया, NBS, IFFCO और DBT — ये सभी परीक्षा में पूछे जाते हैं।