हाल के वर्षों में बहुत कम कानूनों पर इतनी तीखी बहस हुई है, जितनी अप्रैल 2025 के पहले सप्ताह में संसद से पारित इस कानून पर हुई। लोकसभा ने आधी रात के बाद तक चली लंबी बहस के बाद वक्फ (संशोधन) विधेयक को मंजूरी दी। अगले दिन राज्यसभा ने भी इसे पारित कर दिया। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के कुछ ही घंटों बाद देश में करीब 10 लाख एकड़ में फैली लगभग 8.5 लाख संपत्तियों को नियंत्रित करने वाला नया कानून लागू हो गया। सरकार ने इसे उम्मीद भरा नया नाम दिया, UMEED अधिनियम। इसका पूरा नाम एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तीकरण, दक्षता और विकास अधिनियम (Unified Waqf Management, Empowerment, Efficiency and Development Act) है। आलोचकों ने इसे बिल्कुल अलग नजर से देखा।
इस विषय को ठीक वैसे ही समझना होगा जैसे परीक्षक अपेक्षा करता है: तथ्य साफ हों और दोनों पक्षों की बात सामने आए। वक्फ कानून उस जगह खड़ा है जहाँ UPSC के सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 में बार-बार सवाल बनते हैं। यहाँ मौलिक अधिकार, अल्पसंख्यक संस्थाएँ, संघवाद और प्रशासनिक सुधार एक साथ मिलते हैं। सवाल यह है कि क्या राज्य धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता में दखल दिए बिना धार्मिक संपत्ति को नियंत्रित कर सकता है? रिकॉर्ड दुरुस्त करना कहाँ खत्म होता है और किसी समुदाय में हस्तक्षेप कहाँ से शुरू होता है? इनके जवाब किसी नारे में नहीं मिलते। दोनों पक्षों के तर्क समझने पड़ते हैं।
वक्फ क्या है और पहले इसका प्रबंधन कैसे होता था?
सबसे पहले वक्फ शब्द को समझिए, क्योंकि पूरी बहस इसी पर टिकी है। इस्लामी कानून में जब कोई मुसलमान अपनी जमीन, इमारत, नकद राशि या दूसरी कीमती संपत्ति को हमेशा के लिए धार्मिक, पवित्र या जन-कल्याण के काम में लगा देता है, तो उसे वक्फ कहते हैं। वक्फ बनने के बाद मान्यता यह होती है कि संपत्ति ईश्वर की है। आम तौर पर उसे बेचा, उपहार में दिया या विरासत में बाँटा नहीं जा सकता। उससे होने वाली आय हमेशा तय उद्देश्य पर खर्च होनी चाहिए। वक्फ बनाने वाला व्यक्ति वाकिफ कहलाता है और रोजमर्रा का प्रबंधन करने वाला मुतवल्ली। आम तौर पर यह आय मस्जिदों, दरगाहों, कब्रिस्तानों, मदरसों, अनाथालयों और गरीबों की मदद पर लगती है। इसे हिंदू मंदिर की धार्मिक संपदा या ईसाई धर्मार्थ न्यास के इस्लामी रूप की तरह समझ सकते हैं: निजी व्यक्ति संपत्ति देता है, लेकिन उसका उद्देश्य सार्वजनिक भलाई होता है और व्यवस्था स्थायी रहती है।
भारत में वक्फ संपत्तियों का दायरा बहुत बड़ा है। सरकार के आँकड़ों के अनुसार करीब 8.7 लाख पंजीकृत वक्फ संपत्तियाँ लगभग 9.4 लाख एकड़ में फैली हैं। इनकी अनुमानित कीमत लाखों करोड़ रुपये है। रेलवे और रक्षा मंत्रालय के बाद वक्फ व्यवस्था देश के सबसे बड़े जमीन धारकों में गिनी जाती है। लेकिन यही आँकड़े एक अव्यवस्थित तस्वीर भी दिखाते हैं। करीब 59,000 संपत्तियाँ अतिक्रमण में दर्ज थीं, 13,000 से अधिक मुकदमों में फँसी थीं और चार लाख से अधिक की स्थिति तय ही नहीं थी। संपत्ति बहुत बड़ी थी, लेकिन रिकॉर्ड कमजोर थे। इसी फर्क से सुधार की माँग निकली।
2025 तक इस पूरी व्यवस्था का आधार वक्फ अधिनियम, 1995 (Waqf Act, 1995) था। उसने 1954 के पुराने कानून की जगह ली थी और तीन स्तरों वाली व्यवस्था बनाई थी, जो आज भी काम करती है। सबसे ऊपर केंद्रीय वक्फ परिषद (Central Waqf Council) है। यह वैधानिक सलाहकार संस्था 1964 में बनी थी और केंद्र सरकार को वक्फ प्रबंधन पर सलाह देती है। इसके नीचे हर राज्य में एक या अधिक राज्य वक्फ बोर्ड (State Waqf Boards) होते हैं। वे अपने क्षेत्र की संपत्तियों की देखरेख करते हैं और मुतवल्लियों की नियुक्ति और अनुशासन का काम संभालते हैं। विवादों के लिए 1995 के कानून ने वक्फ न्यायाधिकरण (Waqf Tribunal) बनाए। ये अर्ध-न्यायिक निकाय थे और इनके फैसले लगभग अंतिम माने जाते थे। उच्च न्यायालय केवल सीमित निगरानी कर सकते थे। पुरानी व्यवस्था की दो बातें आगे की बहस में सबसे जरूरी हैं। पहली थी इस्तेमाल से वक्फ (waqf by user) की मान्यता। इसके तहत बिना लिखित दस्तावेज के भी लंबे समय से धार्मिक उपयोग में रही संपत्ति को वक्फ माना जा सकता था। दूसरी थी न्यायाधिकरण के फैसले की लगभग अंतिम स्थिति, जिसके कारण ज्यादातर विवाद सामान्य अदालतों की पूरी प्रक्रिया से बाहर रहते थे।
2025 का अधिनियम वास्तव में क्या बदलता है?
वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 (Waqf (Amendment) Act, 2025) ने 1995 के कानून को खत्म नहीं किया। उसने उसके बड़े हिस्से बदल दिए और पूरे कानून का नाम UMEED अधिनियम, 1995 कर दिया। कानून बनने से पहले 31 सदस्यों वाली संयुक्त संसदीय समिति (Joint Parliamentary Committee) ने इसकी जाँच की, संबंधित पक्षों को सुना और अंतिम विधेयक में कई बदलाव जोड़े। संशोधन बहुत हैं, लेकिन बहस मुख्य रूप से छह बदलावों पर टिकी है।
पहला और सबसे विवादित बदलाव इस्तेमाल से वक्फ की मान्यता खत्म करना है। अब कोई संपत्ति तभी वक्फ बनेगी जब उसे औपचारिक रूप से समर्पित किया गया हो। व्यवहार में इसके लिए लिखित और पंजीकृत वक्फ दस्तावेज जरूरी होगा। केवल लंबे धार्मिक उपयोग से संपत्ति को वक्फ मान लेने का पुराना रास्ता बंद हो गया। दूसरा, कानून ने वक्फ संस्थाओं की सदस्यता बदली। केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य वक्फ बोर्डों में अब मुस्लिम समुदाय से बाहर के सदस्य भी होंगे। मुस्लिम महिलाओं की तय संख्या और शिया, सुन्नी और दूसरे मतों का प्रतिनिधित्व भी जरूरी किया गया है। यानी केवल समुदाय के सदस्यों वाले बोर्ड अब मिश्रित सदस्यता वाले बनेंगे। तीसरा, वाकिफ के लिए धार्मिक आचरण की शर्त जोड़ी गई है। नई धारा 3(आर) (Section 3(r)) के अनुसार कम से कम पाँच वर्ष से इस्लाम का पालन करने वाला व्यक्ति ही वक्फ बना सकता है। पुराने वक्फ और विरासत जैसी वक्फ-अलल-औलाद व्यवस्था को इससे सुरक्षा दी गई है।
चौथा बदलाव संघवाद की बहस का केंद्र है। कानून ने सरकारी अधिकारियों को यह तय करने में बड़ी भूमिका दी कि कोई संपत्ति वक्फ है या नहीं। अगर किसी संपत्ति पर वक्फ का दावा हो, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में वह सरकारी जमीन दर्ज हो, तो नया कानून वरिष्ठ राजस्व अधिकारी को जाँच और मालिकाना हक तय करने का अधिकार देता है। नई धारा 3सी (Section 3C) के तहत यह अधिकारी जिलाधिकारी या उससे ऊपर के पद का होना चाहिए। जाँच चलने तक संपत्ति को वक्फ नहीं माना जाएगा। पाँचवाँ, विवाद निपटाने की व्यवस्था बदली गई। वक्फ न्यायाधिकरण की बनावट में बदलाव के साथ उसके आदेश के खिलाफ 90 दिनों के भीतर उच्च न्यायालय में अपील का अधिकार दिया गया। इस तरह पहले की लगभग अंतिम व्यवस्था की जगह सामान्य न्यायिक समीक्षा आई। वक्फ दावों पर परिसीमा अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) भी लागू किया गया। इससे वह पुरानी छूट खत्म हुई जिसके कारण कुछ वक्फ विवाद बिना किसी समय सीमा के उठाए जा सकते थे। छठा, तय समय में केंद्रीय डिजिटल पोर्टल पर पंजीकरण जरूरी किया गया। हर वक्फ का सर्वेक्षण होगा, उसे भौगोलिक चिन्हांकन (geo-tagging) के साथ खोजे जा सकने वाले एक रिकॉर्ड में जोड़ा जाएगा। अनुसूचित और जनजातीय इलाकों की जमीन को वक्फ घोषित करने से रोकने की साफ सुरक्षा भी जोड़ी गई है। इसका उद्देश्य संवैधानिक सुरक्षा वाली जनजातीय जमीन को बचाना है।


सरकार का पक्ष क्या है?
तीखी राजनीतिक बहस से अलग देखें तो सरकार की पूरी दलील एक शब्द पर टिकी है: पारदर्शिता। सरकार के अनुसार पुरानी व्यवस्था एक बंद डिब्बे जैसी थी। लगभग 8.5 लाख संपत्तियों में लाखों का सही दस्तावेज नहीं था और हजारों पर अतिक्रमण था। इस्तेमाल से वक्फ की मान्यता के कारण, सरकार के अनुसार, कब्र या लंबे धार्मिक उपयोग वाली लगभग किसी भी जमीन पर वक्फ का दावा किया जा सकता था। इसमें कभी-कभी सरकारी और निजी जमीन भी शामिल हो जाती थी, जबकि दावे की जाँच के लिए कागज बहुत कम होते थे। लगभग अंतिम माने जाने वाले न्यायाधिकरण और समय सीमा न होने से ऐसे दावों को बाद में पलटना मुश्किल था। इसलिए सरकार सुधार को आस्था का मामला नहीं, बल्कि संपत्ति रिकॉर्ड, जाँच की साफ कड़ी और जवाबदेही का मामला बताती है। उसका तर्क है कि इतनी बड़ी संपदा का सही दस्तावेज होना चाहिए और उसका हिसाब लिया जा सके।
सरकार इसके समर्थन में कुछ साफ तर्क देती है। पहला, गलत इस्तेमाल रोकना। जरूरी पंजीकरण, भौगोलिक चिन्हांकन, लेखा जाँच और डिजिटल पोर्टल से अतिक्रमित जमीन वापस लेने और नए झूठे दावे रोकने की बात कही गई है। दूसरा, सशक्तीकरण। सरकार बोर्डों में मुस्लिम महिलाओं और पसमांदा मुसलमानों के प्रतिनिधित्व पर जोर देती है। उसका कहना है कि पिछड़े और हाशिए पर रहे मुसलमानों को पहले अभिजात वर्ग के दबदबे वाले बोर्डों में जगह नहीं मिलती थी। तीसरा, बेहतर न्यायिक निपटारा। उच्च न्यायालय में अपील और परिसीमा अधिनियम लागू होने से वक्फ विवाद समानांतर व्यवस्था के बजाय सामान्य न्याय प्रणाली में आएँगे। जनजातीय जमीन की सुरक्षा को भी इस बात के प्रमाण के रूप में पेश किया जाता है कि कानून का उद्देश्य कब्जा करना नहीं, बल्कि सीमाएँ साफ करना और निष्पक्षता लाना है। संक्षेप में, सरकार इसे धर्मार्थ संपदा का प्रशासनिक सुधार बताती है। उसका कहना है कि राज्य हिंदू मंदिर न्यासों को नियंत्रित करते समय भी यही तर्क अपनाता है।
याचिकाकर्ताओं का पक्ष क्या है?
दूसरा पक्ष इन्हीं प्रावधानों को संवैधानिक अधिकार में दखल मानता है। चुनौती का मुख्य आधार अनुच्छेद 26 है, जो हर धार्मिक संप्रदाय को अपने धार्मिक मामलों और संपत्ति का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता देता है। इसे अनुच्छेद 25 की धार्मिक स्वतंत्रता के साथ पढ़ा जाता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि वक्फ धार्मिक संस्था है और उसका प्रबंधन इसी सुरक्षित स्वतंत्रता का हिस्सा है। उनके अनुसार वक्फ चलाने वाली संस्थाओं में गैर-मुस्लिम सदस्यों को रखना और सरकारी अधिकारी को यह तय करने की शक्ति देना कि कोई संपत्ति वक्फ है या नहीं, समुदाय का अपनी धार्मिक संपत्ति पर नियंत्रण कमजोर करता है। उनका कहना है कि दूसरे धर्मों पर ऐसा नियम नहीं लगाया गया। वे सीधी तुलना करते हैं: कई हिंदू मंदिर बोर्ड उसी धर्म के सदस्य चलाते हैं, तो वक्फ बोर्डों में बाहरी सदस्य रखना जरूरी क्यों किया गया?
कुछ धाराओं पर आपत्ति और तीखी है। आलोचकों का कहना है कि इस्तेमाल से वक्फ की मान्यता खत्म करने से सदियों पुराने मस्जिद और कब्रिस्तान खतरे में पड़ सकते हैं, जिनके लिखित दस्तावेज कभी बने ही नहीं। उस समय दस्तावेज की जरूरत भी नहीं थी, क्योंकि लंबे उपयोग से वक्फ मान लेने का नियम मौजूद था। धारा 3सी में राजस्व अधिकारी को मालिकाना हक तय करने और जाँच के दौरान वक्फ का दर्जा रोकने की शक्ति देने को शक्तियों के अलगाव (separation of powers) के खिलाफ बताया गया है। आपत्ति है कि विवादित जमीन पर कार्यपालिका खुद ही न्यायाधीश बन जाएगी। इससे अनुच्छेद 300ए के संपत्ति अधिकार और अनुच्छेद 14 की समानता से जुड़े सवाल भी उठते हैं। पाँच वर्ष से इस्लाम का पालन करने वाली शर्त को अस्पष्ट और लागू करना मुश्किल बताया गया है। याचिकाकर्ता पूछते हैं कि कौन और किस कसौटी पर तय करेगा कि कोई व्यक्ति इस्लाम का पालन करता है। संघवाद का प्रश्न भी है, क्योंकि वक्फ प्रबंधन में राज्यों की भूमिका होती है और कुछ लोगों का मानना है कि केंद्र ने संतुलन अपने पक्ष में झुका दिया। अनुच्छेद 30 की बारीकी भी याद रखनी चाहिए। अनुच्छेद 30 धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थान बनाने और चलाने का अधिकार देता है। वक्फ स्वयं अनुच्छेद 30 की संस्था नहीं है, लेकिन अपनी संस्थाओं पर अल्पसंख्यकों की स्वायत्तता का व्यापक सिद्धांत याचिकाकर्ताओं के तर्क में आता है। यहाँ बात किसने कही है, यह साफ लिखना जरूरी है। ये याचिकाकर्ताओं और विपक्ष के तर्क हैं, अदालत के तय निष्कर्ष नहीं।
यह विवाद अब सर्वोच्च न्यायालय में है। AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी, कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिंद सहित अलग-अलग पक्षों की 60 से अधिक याचिकाएँ एक साथ सुनी जा रही हैं। 15 सितंबर 2025 को मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता और न्यायमूर्ति ए. जी. मसीह की सदस्यता वाली पीठ ने अंतरिम आदेश दिया। न्यायालय ने पूरे अधिनियम पर रोक लगाने से इनकार किया, क्योंकि उसे पूरा कानून रोकने का आधार नहीं मिला। लेकिन चुनौती की पूरी सुनवाई तक कुछ प्रावधानों पर रोक लगाई या उनका दायरा सीमित किया। सरकार द्वारा योग्यता तय करने के नियम बनने तक पाँच वर्ष से इस्लाम का पालन करने की शर्त रोक दी गई। धारा 3सी का वह हिस्सा भी रोका गया, जिसमें केवल अधिकारी की रिपोर्ट पर किसी संपत्ति का वक्फ दर्जा खत्म हो सकता था। न्यायालय ने कहा कि संपत्ति विवाद का फैसला न्यायाधिकरण और अदालतें करेंगी, किसी अधिकारी का एकतरफा निर्णय नहीं। न्यायालय ने संकेत दिया कि केंद्रीय परिषद में गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या चार और राज्य बोर्ड में तीन से अधिक नहीं होनी चाहिए। बोर्डों को कोशिश करनी चाहिए कि पद के आधार पर अध्यक्ष बनने वाला व्यक्ति मुस्लिम हो। यह भी दर्ज किया गया कि अंतिम फैसला आने तक किसी वक्फ को कब्जे से नहीं हटाया जाएगा और मालिकाना रिकॉर्ड नहीं बदले जाएँगे। पंजीकरण और इस्तेमाल से वक्फ की मान्यता खत्म करने पर रोक नहीं लगी। उत्तर में सबसे जरूरी बात यही है: फिलहाल अधिनियम की संवैधानिक वैधता न्यायालय में विचाराधीन (sub judice) है। अंतिम फैसला अभी नहीं आया है, इसलिए अनुमान लगाकर कोई निर्णय न लिखें।
महत्त्व और आगे किन बातों पर नजर रखें?
भारत में धर्म के प्रबंधन के लंबे इतिहास में 2025 का अधिनियम बड़ा मोड़ है, चाहे सर्वोच्च न्यायालय आखिर में कोई भी निर्णय दे। भारत के तरीके को अक्सर सिद्धांत आधारित दूरी (principled distance) कहा जाता है। राज्य धर्म से सम्मानजनक दूरी रखता है, लेकिन सार्वजनिक हित में किसी धार्मिक प्रथा या संस्था में सुधार के लिए दखल दे सकता है। हिंदू मंदिरों की संपत्ति और सिख गुरुद्वारा संस्थाओं को नियंत्रित करने में भी यही तरीका दिखता है। वक्फ संशोधन इस बात की सबसे बड़ी हालिया परीक्षा है कि सुधार की यह शक्ति अल्पसंख्यक समुदाय की संस्थाओं में कितनी दूर तक जा सकती है और अनुच्छेद 25-26 की स्वतंत्रताओं के साथ इसका संतुलन कैसे बनेगा। सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम उत्तर केवल वक्फ नहीं, बल्कि कानून और धर्म के पूरे रिश्ते के लिए उदाहरण बनेगा।
व्यावहारिक दाँव भी बड़ा है। अगर दस्तावेज और डिजिटल पोर्टल से जुड़े सुधार अपने उद्देश्य के अनुसार काम करते हैं, तो भारत के पास वक्फ जमीन का कहीं अधिक साफ और भौगोलिक चिन्हांकन वाला रिकॉर्ड हो सकता है। इससे प्रशासन और उन लाभार्थियों दोनों को फायदा होगा जिनकी मदद के लिए ये संपत्तियाँ बनाई गई थीं। अगर याचिकाकर्ताओं की आशंकाएँ सही साबित होती हैं, तो यही व्यवस्था लंबे समय से समुदाय के पास रही संपत्तियों को अस्थिर कर सकती है और भरोसा कमजोर हो सकता है। एक ही कानून से दोनों नतीजे संभव हैं। इसलिए लागू करने वाले नियम और अंतिम फैसला बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। तीन बातों पर नजर रखें: इस्लाम का पालन करने की पाँच वर्ष वाली शर्त और जिलाधिकारी की जाँच के लिए सरकार कौन से नियम बनाती है; जमीन पर पंजीकरण अभियान कैसे चलता है; और सबसे बढ़कर सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 14, 25, 26 और 300ए की कसौटी पर पूरे या कुछ हिस्सों के बारे में क्या अंतिम फैसला देता है।
मुख्य परीक्षा के उत्तर में कैसे इस्तेमाल करें?
यह विषय सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 के लिए बहुत उपयोगी है। इसमें संविधान के मौलिक अधिकार, अनुच्छेद 25, 26, 14 और अनुच्छेद 300ए का संपत्ति अधिकार; वैधानिक निकायों का काम; केंद्र-राज्य संबंध; अल्पसंख्यकों का कल्याण; और शासन और प्रशासनिक सुधार शामिल हैं। धर्मनिरपेक्षता, राज्य और धर्म, या सुधार बनाम अधिकार पर निबंध में भी इसका प्रयोग हो सकता है। अच्छे उत्तर में बदलाव ठीक-ठीक बताए जाएँ और बिना पक्षपाती हुए दोनों तरफ के तर्क तौले जाएँ।
उत्तर का ढाँचा कैसे बनाएँ?
शुरुआत वक्फ की परिभाषा से करें। फिर पुरानी व्यवस्था की समस्या बताएँ: संपत्ति बहुत बड़ी थी, लेकिन रिकॉर्ड कमजोर थे। इसके बाद प्रमुख बदलाव संक्षेप में लिखें: इस्तेमाल से वक्फ, बोर्डों की सदस्यता, पाँच वर्ष की धार्मिक शर्त, धारा 3सी में अधिकारी की भूमिका, उच्च न्यायालय में अपील, परिसीमा अधिनियम और जरूरी डिजिटल पंजीकरण। बीच के हिस्से में समर्थन के तर्क दें: पारदर्शिता, महिलाओं और पसमांदा मुसलमानों की आवाज, और सामान्य न्यायिक समीक्षा। फिर विरोध के तर्क रखें: अनुच्छेद 26 की स्वायत्तता, धारा 3सी पर शक्तियों के अलगाव की चिंता, पाँच वर्ष वाली अस्पष्ट शर्त और संघवाद। अंत में संवैधानिक महत्त्व बताएँ और ईमानदारी से लिखें कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है। यह क्रम हर ऐसे सवाल में काम करेगा: वक्फ क्या है → क्या बदला → दोनों पक्ष → महत्त्व → मौजूदा स्थिति।
इन आम गलतियों से बचें
किसी एक पक्ष के समर्थन में न लिखें। संवेदनशील कानून पर सरकार समर्थक या सरकार विरोधी दिखने वाला उत्तर अंक गँवा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला अपनी ओर से न बनाएँ। लिखें कि मामला विचाराधीन है और सितंबर 2025 के अंतरिम आदेश को ठीक से बताएँ। अंतरिम रोक को उन प्रावधानों से न मिलाएँ जिन पर रोक नहीं लगी। पाँच वर्ष वाली शर्त और धारा 3सी के एक हिस्से पर रोक लगी, लेकिन पंजीकरण और इस्तेमाल से वक्फ खत्म करने पर नहीं। अनुच्छेद 30 को वक्फ प्रबंधन से सीधे न जोड़ें, क्योंकि वह अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं से जुड़ा है। इस बारीकी को साफ लिखें। उत्तर को आँकड़ों से न भरें। एक या दो सही आँकड़े काफी हैं।
उत्तर का संक्षिप्त आधार
वक्फ = धार्मिक काम के लिए संपत्ति का स्थायी समर्पण, 1995 के कानून में परिषद-बोर्ड-न्यायाधिकरण के जरिए प्रबंधन → समस्या: करीब 8.7 लाख संपत्तियाँ, कमजोर रिकॉर्ड और अतिक्रमण → 2025 का UMEED अधिनियम प्रमुख नियम बदलता है: इस्तेमाल से वक्फ खत्म, मिश्रित बोर्ड, पाँच वर्ष की शर्त, धारा 3सी में अधिकारी की भूमिका, उच्च न्यायालय में अपील और परिसीमा अधिनियम, डिजिटल पंजीकरण, जनजातीय जमीन की सुरक्षा → समर्थन में: पारदर्शिता, महिलाओं और पसमांदा मुसलमानों का प्रतिनिधित्व, सामान्य न्यायिक समीक्षा → विरोध में: अनुच्छेद 26 की स्वायत्तता, शक्तियों का अलगाव, अस्पष्ट शर्त, संघवाद → महत्त्व: अल्पसंख्यक संस्थाओं पर राज्य के नियंत्रण की सीमा की परीक्षा → स्थिति: सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती, सितंबर 2025 का अंतरिम आदेश, मामला विचाराधीन।
चित्र या प्रवाह-चित्र का सुझाव
दो खानों में पहले और बाद की तुलना बनाएँ। बाएँ खाने में 1995 की स्थिति लिखें: इस्तेमाल से वक्फ मान्य, समुदाय के बोर्ड, न्यायाधिकरण का लगभग अंतिम फैसला, कोई समय सीमा नहीं। दाएँ खाने में 2025 की स्थिति लिखें: पंजीकृत दस्तावेज जरूरी, मिश्रित बोर्ड, धारा 3सी में अधिकारी की जाँच, उच्च न्यायालय में अपील, परिसीमा अधिनियम और डिजिटल पोर्टल। ऐसी साफ तुलना जल्दी बनती है और परीक्षक को तुरंत दिखाती है कि आपको बदलाव समझ में आया है।
संतुलित निष्कर्ष की एक पंक्ति
फैसला सुनाने के बजाय संवैधानिक तनाव पर उत्तर खत्म करें: “वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 यह परखता है कि धार्मिक संपत्तियों में सुधार की राज्य की शक्ति कहाँ तक जा सकती है और किस बिंदु पर वह समुदाय के अपने मामलों के प्रबंधन की अनुच्छेद 26 वाली स्वतंत्रता को छूने लगती है। मामला अभी विचाराधीन है और इस संतुलन पर सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम फैसला आना बाकी है।”
आँकड़े कैसे इस्तेमाल करें ताकि उत्तर बोझिल न हो?
दो आँकड़े चुनें और उन्हें तर्क के रूप में इस्तेमाल करें, सजावट के लिए नहीं। “करीब 8.7 लाख वक्फ संपत्तियाँ लगभग 9.4 लाख एकड़ में फैली हैं” लिखकर उस बड़े दायरे को दिखाएँ जो नियंत्रण की जरूरत का आधार बनता है। “करीब 59,000 पर अतिक्रमण है और चार लाख से अधिक की स्थिति तय नहीं” लिखकर रिकॉर्ड की वह समस्या बताएँ जिसका सरकार हवाला देती है। हर आँकड़े के साथ यह जरूर बताएँ कि वह किस बात को साबित करता है। बाकी आँकड़े छोड़ सकते हैं।
सामान्य प्रश्न
वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 क्या है और इसे UMEED अधिनियम क्यों कहा जाता है? संसद ने अप्रैल 2025 में यह कानून पारित किया। इसने धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्य के लिए मुसलमानों द्वारा स्थायी रूप से दी गई वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन वाले वक्फ अधिनियम, 1995 में संशोधन किया। सरकार ने बदले हुए कानून का नाम एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तीकरण, दक्षता और विकास अधिनियम (Unified Waqf Management, Empowerment, Efficiency and Development Act), 1995 रखा। UMEED नाम से पारदर्शिता और प्रबंधन सुधार पर जोर दिखाया गया।
अधिनियम के सबसे अहम बदलाव क्या हैं? इस्तेमाल से वक्फ की मान्यता खत्म की गई, इसलिए अब संपत्ति को वक्फ मानने के लिए औपचारिक पंजीकृत दस्तावेज चाहिए। केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्य जोड़े गए और मुस्लिम महिलाओं की सदस्यता जरूरी की गई। वक्फ बनाने वाले व्यक्ति के लिए कम से कम पाँच वर्ष से इस्लाम का पालन करने की शर्त रखी गई। सरकार और वक्फ के बीच विवादित जमीन में वरिष्ठ राजस्व अधिकारी को भूमिका मिली। वक्फ न्यायाधिकरण के आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील और परिसीमा अधिनियम लागू किया गया। डिजिटल पंजीकरण जरूरी हुआ और जनजातीय और अनुसूचित इलाकों की जमीन को सुरक्षा दी गई।
अधिनियम विवादित क्यों है और सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा? समर्थकों का कहना है कि इससे बहुत बड़ी और कमजोर रिकॉर्ड वाली संपदा में पारदर्शिता आएगी, महिलाओं और हाशिए पर रहे मुसलमानों को आवाज मिलेगी। आलोचकों के अनुसार इससे धार्मिक संपत्ति पर समुदाय का नियंत्रण कमजोर होता है और अनुच्छेद 26 में दिए गए धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता में दखल पड़ता है। इसके खिलाफ 60 से अधिक याचिकाएँ दायर हुईं। 15 सितंबर 2025 को मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने अंतरिम आदेश दिया। पूरे अधिनियम पर रोक नहीं लगी, लेकिन पाँच वर्ष से इस्लाम का पालन करने की शर्त और विवादित जमीन पर अधिकारी की शक्ति के एक हिस्से को रोक दिया गया। संवैधानिक चुनौती अभी लंबित है, इसलिए मामला न्यायालय में विचाराधीन है।
यह विषय UPSC के सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 में कैसे जुड़ता है? यह मौलिक अधिकारों, अनुच्छेद 25, 26, 14 और अनुच्छेद 300ए के संपत्ति अधिकार; केंद्रीय वक्फ परिषद जैसे वैधानिक निकायों; केंद्र-राज्य संबंधों; अल्पसंख्यक कल्याण; और प्रशासनिक सुधार से जुड़ता है। परीक्षा में बदलावों को ठीक-ठीक समझाइए, दोनों पक्षों के तर्क दीजिए और कानूनी चुनौती को अनसुलझा ही बताइए।
अभ्यास प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा बहुविकल्पीय प्रश्न
- भारत में वक्फ के संदर्भ में नीचे दिए कथनों पर विचार कीजिए। कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) वक्फ किसी मुसलमान द्वारा धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्य के लिए संपत्ति का स्थायी समर्पण है
(b) वक्फ का प्रबंधन करने वाला व्यक्ति मुतवल्ली कहलाता है
(c) केंद्रीय वक्फ परिषद 1964 में वैधानिक सलाहकार संस्था के रूप में बनी थी
(d) ऊपर के सभी।
उत्तर: (d) तीनों कथन सही हैं। वक्फ स्थायी समर्पण है, प्रबंधक मुतवल्ली कहलाता है और केंद्रीय वक्फ परिषद 1964 में बनी थी। - वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 ने किस पुराने कानून में संशोधन किया?
(a) वक्फ अधिनियम, 1954
(b) वक्फ अधिनियम, 1995
(c) मुसलमान वक्फ अधिनियम, 1923
(d) धार्मिक संपदा अधिनियम, 1863।
उत्तर: (b) 2025 के अधिनियम ने वक्फ अधिनियम, 1995 में संशोधन किया और उसका नाम बदला। 1995 के कानून ने ही 1954 के कानून की जगह ली थी। - नीचे में से कौन-सा बदलाव वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 ने किया?
(a) इस्तेमाल से वक्फ की मान्यता खत्म करना
(b) वक्फ न्यायाधिकरण के आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील का अधिकार
(c) केंद्रीय डिजिटल पोर्टल पर वक्फ संपत्तियों का जरूरी पंजीकरण
(d) ऊपर के सभी।
उत्तर: (d) अधिनियम ने इस्तेमाल से वक्फ खत्म किया, उच्च न्यायालय में अपील खोली और दूसरे बदलावों के साथ डिजिटल पंजीकरण जरूरी किया। - बदले हुए वक्फ कानून को दिए गए UMEED नाम का पूरा रूप क्या है?
(a) एकीकृत अल्पसंख्यक शिक्षा और संपदा विकास अधिनियम (Unified Minority Education and Endowment Development Act)
(b) एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तीकरण, दक्षता और विकास अधिनियम (Unified Waqf Management, Empowerment, Efficiency and Development Act)
(c) संयुक्त मुस्लिम संपदा और शैक्षणिक विकास अधिनियम (United Muslim Endowments and Educational Development Act)
(d) सार्वभौमिक संपदा प्रबंधन और विकास अधिनियम (Universal Management of Endowments and Development Act)।
उत्तर: (b) UMEED का पूरा रूप एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तीकरण, दक्षता और विकास है। - वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 पर सर्वोच्च न्यायालय के सितंबर 2025 के अंतरिम आदेश के बारे में कौन-सा कथन सही है?
(a) न्यायालय ने पूरा अधिनियम रद्द कर दिया
(b) न्यायालय ने वक्फ बनाने वाले व्यक्ति के लिए कम से कम पाँच वर्ष से इस्लाम का पालन करने वाली शर्त रोक दी
(c) न्यायालय ने सभी विवादित वक्फ संपत्तियों से तुरंत कब्जा हटाने का आदेश दिया
(d) न्यायालय ने वक्फ जमीन को सरकारी जमीन घोषित करने की अधिकारी की शक्ति कायम रखी।
उत्तर: (b) न्यायालय ने पूरे अधिनियम पर रोक लगाने से इनकार किया, लेकिन पाँच वर्ष वाली शर्त और विवादित जमीन पर अधिकारी की शक्ति के एक हिस्से को रोक दिया। चुनौती अभी लंबित है।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
- “वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 धार्मिक संपत्तियों में सुधार करने की राज्य की शक्ति और समुदाय के अपने मामलों का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता के बीच तनाव दिखाता है।” संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के संदर्भ में इस कथन की चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- भारत में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 द्वारा किए गए प्रमुख बदलावों की जाँच कीजिए और पारदर्शिता और सशक्तीकरण के सरकारी तर्क का आकलन कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- विवादित वक्फ संपत्तियों का दर्जा तय करने में राजस्व अधिकारियों की भूमिका की शक्तियों के अलगाव के आधार पर आलोचना हुई है। संवैधानिक सिद्धांतों की रोशनी में इस चिंता का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- चर्चा कीजिए कि वक्फ संपत्तियों का नियंत्रण भारत के धर्मनिरपेक्षता के तरीके और धार्मिक संस्थाओं के साथ राज्य के संबंध में कैसे बैठता है। (10 अंक, 150 शब्द)
- “धार्मिक संपत्तियों के सुधार में प्रशासनिक दक्षता और अल्पसंख्यक संस्थाओं की स्वायत्तता के बीच संतुलन होना चाहिए।” वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के संदर्भ में संबंधित संवैधानिक और संघीय पहलुओं की जाँच कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)