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अभिवृत्ति निर्माण, व्यवहार और अभिवृत्ति परिवर्तन (UPSC नीतिशास्त्र — GS-IV)

अभिवृत्ति (Attitude) कैसे बनती है, व्यवहार से उसका संबंध, उन्हें प्रभावित करने वाले कारक, सहसंबंध बढ़ाने के व्यावहारिक उपाय और UPSC GS-IV के लिए तीन प्रमुख अभिवृत्ति परिवर्तन सिद्धांत — विस्तृत हिंदी मार्गदर्शिका।

Attitude Formation, Behaviour and Attitude Change (UPSC Ethics — GS IV) — UPSC featured image

अभिवृत्तियाँ (Attitudes) स्थिर नहीं होतीं। वे अनुभव से बनती हैं, अलग-अलग शक्ति के साथ व्यवहार को प्रभावित करती हैं, और सुनियोजित विधि से उनमें परिवर्तन भी संभव है। UPSC GS-IV उम्मीदवार से इन तीनों चरणों — निर्माण, व्यवहार में रूपांतरण और परिवर्तन — की समझ अपेक्षित है। कारण स्पष्ट है: एक लोक सेवक का सम्पूर्ण व्यावसायिक जीवन इन्हीं तीन प्रक्रियाओं के इर्द-गिर्द घूमता है — चाहे वह स्वयं के संयम (self-management) की बात हो या जनसंचार (public communication) के माध्यम से समाज की मनोदशा बदलने की।

यह मार्गदर्शिका अभिवृत्ति निर्माण, अभिवृत्ति-व्यवहार संबंध, उनके सहसंबंध को प्रभावित करने वाले कारकों, इस सहसंबंध को मजबूत करने के व्यावहारिक चरणों, और अभिवृत्ति परिवर्तन के तीन प्रमुख सिद्धांतों को एक सूत्र में पिरोती है। साथ ही दो केस स्टडी (Case Study) इस सिद्धांत को नीति-निर्माण के यथार्थ से जोड़ती हैं — जो GS-IV के केस-स्टडी प्रश्नों में निर्णायक सिद्ध होती हैं।

अभिवृत्तियाँ कैसे बनती हैं

अभिवृत्ति-निर्माण की चार प्रमुख प्रक्रियाएँ हैं — ये चारों मिलकर यह स्पष्ट करती हैं कि एक नवजात शिशु से लेकर वयस्क नागरिक तक की अभिवृत्तियाँ किस प्रकार आकार लेती हैं। ये प्रक्रियाएँ एक-दूसरे की पूरक हैं और प्रायः समानांतर रूप से कार्य करती हैं।

1. शास्त्रीय / प्रत्युत्तर / पावलोवियन अनुबंधन (Classical Conditioning)

एक उद्दीपक (stimulus) को किसी प्राकृतिक प्रतिक्रिया से जोड़ने पर एक सीखी गई संगति (learned association) उत्पन्न होती है। एक बच्चा “लड़का” या “लड़की” होना तभी “सीखता” है जब विशेष वस्तुएँ, रंग और व्यवहार बार-बार स्वीकृति या अस्वीकृति से जोड़े जाते हैं। उदाहरण — गुलाबी रंग, गुड़िया और रसोई-खिलौनों के साथ बारंबार जुड़ी प्रशंसा एक “लड़की होने” की अभिवृत्ति गढ़ती है। भारतीय परिवारों में सामाजिक भूमिकाओं की लैंगिक रूढ़ियाँ इसी अनुबंधन का परिणाम हैं — और इन्हें बदलना नीतिगत हस्तक्षेप की चुनौती है।

2. क्रियाप्रसूत अनुबंधन / साधनात्मक अधिगम (Operant Conditioning)

पुनर्बलन (reinforcement) — वांछित व्यवहार को पुरस्कृत करना — और दंड (punishment) — अवांछित व्यवहार को हतोत्साहित करना — के माध्यम से सीखना। जिस बच्चे को “धन्यवाद” कहने पर सराहना मिलती है, उसमें शिष्टाचार के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति विकसित होती है। B. F. स्किनर (B. F. Skinner) के प्रयोग इसी सिद्धांत के मूल हैं। शासकीय स्तर पर “स्वच्छ पंचायत पुरस्कार” और कर-अनुपालन प्रोत्साहन इसी तर्क पर आधारित हैं।

3. प्रत्यक्ष शिक्षण (Direct Instruction)

स्पष्ट नियम और उनके पीछे कारण — “हम सुबह 5 बजे उठते हैं क्योंकि प्रातः-दिनचर्या अनुशासन गढ़ती है।” केवल नियम बताने से अभिवृत्ति धीरे बनती है; नियम के साथ तर्क जुड़ने पर वह तीव्र और स्थायी होती है। यही कारण है कि UPSC तैयारी में मेंटॉर अक्सर “क्यों” समझाते हैं — केवल “क्या” नहीं। शिक्षा-नीति 2020 का “रटंत-विरोधी, समझ-केंद्रित” बल इसी सिद्धांत को मान्यता देता है।

4. आवश्यकताओं की संतुष्टि (Satisfaction of Wants)

अनुकूल अभिवृत्तियाँ उन व्यक्तियों और वस्तुओं के प्रति विकसित होती हैं जो हमारी आवश्यकताएँ पूरी करते हैं; प्रतिकूल अभिवृत्तियाँ उन के प्रति जो उन्हें कुंठित करते हैं। यह अधिकांश रोज़मर्रा की अभिवृत्तियों की उपयोगितावादी (utilitarian) जड़ है। राशन कार्ड वितरण की कार्यप्रणाली से लेकर प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि तक — जो सरकारी कार्यक्रम लाभार्थी की आवश्यकता पूरी करते हैं, वे संस्था के प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति बनाते हैं; जो अड़चन डालते हैं, वे विमुखता पैदा करते हैं।

अभिवृत्ति बनाम व्यवहार — एक स्पष्ट विभेद

आधारअभिवृत्ति (Attitude)व्यवहार (Behaviour)
अर्थकिसी विषय के बारे में व्यक्ति के सोचने या महसूस करने का मानसिक दृष्टिकोणदूसरों के प्रति वास्तविक क्रिया, गति और आचरण
यह क्या है?व्यक्ति की मानसिकताव्यक्ति का आचरण
प्रतिबिंबआप क्या सोचते या महसूस करते हैंआप क्या करते हैं
निर्धारकआप वस्तुओं को कैसे देखते हैंसामाजिक मानदंड और परिस्थितिजन्य दबाव
अवलोकनीयताआंतरिक — सीधे नहीं देखी जा सकतीबाह्य — दूसरों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से देखी जा सकती है
परिवर्तन की गतिधीमी; गहरी जड़ों वालीतीव्र; सामाजिक परिस्थिति के साथ बदलती

यह संबंध असमरूप (asymmetric) है। अभिवृत्ति व्यवहार की भविष्यवाणी केवल प्रायिकता के आधार पर करती है। सशक्त अभिवृत्ति उपयुक्त परिस्थितियों में अनुरूप व्यवहार उत्पन्न करती है; कमज़ोर अभिवृत्ति या प्रतिकूल परिस्थितियाँ विसंगति पैदा करती हैं। यही “अभिवृत्ति-व्यवहार अंतराल” (attitude-behaviour gap) UPSC नीति-निर्माण के लगभग प्रत्येक विषय की केन्द्रीय चुनौती है — चाहे वह कर-अनुपालन हो, टीकाकरण, अथवा खुले में शौच का त्याग।

अभिवृत्ति-व्यवहार सहसंबंध को प्रभावित करने वाले कारक

तीन कारक-समूह यह तय करते हैं कि अभिवृत्ति व्यवहार में कितनी मजबूती से अनूदित होगी।

व्यक्ति के गुण

  • आत्म-जागरूकता (Self-awareness)। अपनी भावनाओं के प्रति सजग व्यक्ति उन लोगों की तुलना में अधिक अभिवृत्ति-व्यवहार सामंजस्य दिखाते हैं जो निर्णय के लिए परिस्थिति पर निर्भर रहते हैं।
  • सत्यनिष्ठा (Integrity)। उच्च सत्यनिष्ठा वाले व्यक्तियों में सशक्त सहसंबंध दिखाई देता है — उनके वचन और कर्म एक-दूसरे से मेल खाते हैं।
  • व्यक्तिवादी बनाम सामूहिक समाज। व्यक्तिवादी समाजों में अभिवृत्ति-व्यवहार सामंजस्य अधिक होता है; सामूहिक समाजों में सामाजिक दबाव व्यक्तिगत अभिवृत्ति को दबा सकता है। भारत मूलतः सामूहिकतावादी समाज है — यही कारण है कि निजी विचार और सार्वजनिक आचरण में अंतर रहना यहाँ सामान्य है।
  • आत्म-निगरानी (Self-monitoring)। उच्च आत्म-निगरानी वाले लोग परिस्थिति के अनुसार आचरण ढालते हैं; निम्न आत्म-निगरानी वाले अपनी आंतरिक अभिवृत्ति के प्रति निष्ठावान रहते हैं।

अभिवृत्ति के गुण

  • शक्ति (Strength)। सशक्त अभिवृत्तियाँ उच्च सहसंबंध उत्पन्न करती हैं; कमज़ोर अभिवृत्तियाँ निम्न।
  • सुलभता (Accessibility)। जिन अभिवृत्तियों पर नियमित रूप से कार्य किया जाता है वे स्मृति में अधिक सुलभ रहती हैं और व्यवहार को अधिक प्रभावित करती हैं।
  • विशिष्टता (Specificity)। “स्वास्थ्य अच्छा है” जैसी सामान्य अभिवृत्ति की तुलना में “मुझे रोज़ 30 मिनट टहलना चाहिए” जैसी विशिष्ट अभिवृत्ति व्यवहार में अधिक प्रभावी होती है।
  • व्यक्तिगत अनुभव। प्रत्यक्ष अनुभव से बनी अभिवृत्तियाँ — मात्र सुनी गई जानकारी से बनी अभिवृत्तियों की तुलना में — व्यवहार पर अधिक प्रभाव डालती हैं।

परिस्थिति

  • मानदंड (Norms)। किसी परिस्थिति में “कैसे आचरण करना चाहिए” — इसकी सामाजिक अपेक्षाएँ व्यक्तिगत अभिवृत्ति को दबा सकती हैं।
  • समय का दबाव। समय के दबाव में अभिवृत्ति सीधे व्यवहार को संचालित करती है; तर्कपूर्ण संयम पर उत्तरजीविता-वृत्ति हावी हो जाती है।
  • सार्वजनिक बनाम निजी संदर्भ। सार्वजनिक स्थानों पर लोग सामाजिक मानदंडों के अनुरूप व्यवहार करते हैं; निजी स्थानों पर अभिवृत्ति प्रभावी हो जाती है। यह “सार्वजनिक-निजी विभाजन” भ्रष्टाचार-निरोधक रणनीति का केन्द्रीय बिंदु है।

अभिवृत्ति और व्यवहार के बीच सहसंबंध बढ़ाने के व्यावहारिक चरण

निम्नलिखित सात चरण व्यावहारिक आत्म-विकास अनुशासन हैं — एक गंभीर सिविल-सेवा अभ्यर्थी इन्हें तत्काल आरंभ कर सकता है। ये चरण न केवल साक्षात्कार में “व्यक्तित्व” का आधार बनते हैं, बल्कि भविष्य के लोक-सेवक की दैनिक नैतिक दृढ़ता की भी नींव हैं।

  • संवेगात्मक बुद्धिमत्ता विकसित करें। भावनाओं की बेहतर आत्म-जागरूकता और बेहतर आत्म-नियमन।
  • नियमित आत्मचिंतन (introspection) करें। दिन के अंत में 10 मिनट का संक्षिप्त मनन।
  • अभिवृत्ति-साक्षरता का अभ्यास करें। सीखें कि अभिवृत्तियाँ क्या हैं। अपनी अच्छी और बुरी अभिवृत्तियों को ईमानदारी से पहचानें।
  • अंतरात्मा (conscience) से जुड़ें। किसी विशिष्ट अभिवृत्ति के पीछे के कारणों को समझने का प्रयास करें।
  • सत्यनिष्ठा एवं सत्यवादिता के मूल्य विकसित करें। मूल्य भावना और कार्य के बीच निरंतरता को स्थिरता प्रदान करते हैं।
  • स्वयं को अभिप्रेरित करने के तरीक़े खोजें। अंतर्निहित अभिप्रेरणा बाह्य पुरस्कारों की तुलना में सतत व्यवहार को अधिक टिकाऊ बनाती है।
  • परिवर्तन को अवसर के रूप में देखें। परिवर्तन का स्वागत अहं-रक्षात्मक प्रतिक्रियाओं को कम करता है, जो अभिवृत्ति-व्यवहार अंतराल का प्रमुख कारण हैं।

“अपने विचारों पर ध्यान दीजिए, वे शब्द बन जाते हैं; अपने शब्दों पर ध्यान दीजिए, वे कर्म बन जाते हैं; अपने कर्मों पर ध्यान दीजिए, वे आदत बन जाते हैं; अपनी आदतों पर ध्यान दीजिए, वे चरित्र बन जाती हैं।” — लाओ त्ज़ु (Lao Tzu)

अभिवृत्ति परिवर्तन के सिद्धांत

अभिवृत्ति परिवर्तन तब होता है जब कोई अभिवृत्ति संशोधित होती है — सकारात्मक से नकारात्मक, हल्की सकारात्मक से प्रबल सकारात्मक, अथवा अभिवृत्तिहीनता से एक स्पष्ट अभिवृत्ति की ओर। तीन सैद्धांतिक रूपरेखाएँ GS-IV उत्तर लेखन में निर्णायक हैं।

1. अभिवृत्ति परिवर्तन का अधिगम सिद्धांत (Learning Theory)

अभिवृत्तियाँ चूँकि सीखी गई होती हैं, अतः उन्हीं अनुबंधन प्रक्रियाओं से उन्हें अनसीखा (unlearn) और पुनः सीखा (re-learn) जा सकता है, जिनसे वे बनी हैं।

  • शास्त्रीय अनुबंधन। लक्ष्य-वस्तु को बारंबार सकारात्मक उद्दीपकों से जोड़कर सकारात्मक संवेगात्मक प्रतिक्रिया पैदा करना। धूम्रपान-विरोधी अभियान सिगरेट को दाँतों के दाग और साँस की तकलीफ़ से जोड़कर इसी सिद्धांत का उपयोग करते हैं।
  • क्रियाप्रसूत अनुबंधन। वांछित अभिवृत्तियों को पुनर्बलन देना; अवांछित को गैर-पुनर्बलन या सुधारात्मक प्रतिक्रिया से कमज़ोर करना।
  • अवलोकनात्मक अधिगम (Observational learning)। दृश्यमान व्यवहार के माध्यम से वांछित अभिवृत्तियों का प्रदर्शन — सहकर्मी मॉडलिंग, नेतृत्व आदर्श-स्थापना। अल्बर्ट बंडुरा (Albert Bandura) के “बोबो डॉल” प्रयोग इसी का आधार हैं।

2. विस्तरण संभाव्यता मॉडल — अभिवृत्ति परिवर्तन (Elaboration Likelihood Model)

रिचर्ड पेटी और जॉन कैसिओप्पो (Richard Petty & John Cacioppo) द्वारा विकसित यह सिद्धांत मानता है कि लोग अभिवृत्ति-परिवर्तन दो मार्गों में से किसी एक से करते हैं।

  • केन्द्रीय मार्ग (Central route)। व्यक्ति संदेश सुनने और सोचने के लिए अभिप्रेरित होता है। तर्कपूर्ण, साक्ष्य-आधारित अपील स्थायी अभिवृत्ति परिवर्तन लाती है।
  • परिधीय मार्ग (Peripheral route)। व्यक्ति संकेतों (cues) से प्रभावित होता है — वक्ता की विशेषताएँ, संवेगात्मक अपील, प्रस्तुति। इस मार्ग से हुआ परिवर्तन अस्थायी होता है।

लोक-सेवक के लिए निहितार्थ: दीर्घकालिक अभिवृत्ति परिवर्तन के लिए केन्द्रीय-मार्ग संप्रेषण आवश्यक है। संवेगात्मक अभियान अल्पकाल में सूई हिला सकते हैं; दीर्घकाल में टिकाऊ परिवर्तन तर्कसंगत, साक्ष्य-आधारित संवाद से ही आता है। यही कारण है कि नीति-संप्रेषण में डेटा, उदाहरण और स्पष्ट तर्क — मात्र भावनात्मक नारों से अधिक — महत्व रखते हैं।

3. संज्ञानात्मक विसंवादिता सिद्धांत (Cognitive Dissonance Theory — Festinger, 1957)

जब लोग परस्पर विरोधी विश्वास या व्यवहार के विरुद्ध विश्वास रखते हैं, तो वे मनोवैज्ञानिक असुविधा का अनुभव करते हैं — विसंवादिता (dissonance)। इस असुविधा को कम करने के लिए वे प्रायः अपनी अभिवृत्ति को व्यवहार के अनुरूप ढाल लेते हैं, अथवा व्यवहार को अभिवृत्ति के अनुरूप।

यही कारण है कि क्रमिक व्यावहारिक परिवर्तन प्रायः अभिवृत्ति परिवर्तन उत्पन्न करता है — जो लोग किसी नए व्यवहार का अभ्यास आरंभ करते हैं, वे धीरे-धीरे उस पर विश्वास करने लगते हैं ताकि उनके कर्मों और अभिवृत्तियों के बीच की विसंवादिता कम हो।

उत्कृष्ट उदाहरण: हेलमेट-धारण अभियान — जो आरंभ में केवल व्यवहार अनिवार्य कर रहे थे — समय के साथ युवा पीढ़ी में सड़क सुरक्षा के प्रति वास्तविक अभिवृत्ति परिवर्तन ले आए। यह “व्यवहार पहले, अभिवृत्ति बाद में” का सिद्धांत भारत के अनेक सामाजिक सुधार आंदोलनों — सती प्रथा निषेध, बाल विवाह निषेध, अस्पृश्यता उन्मूलन — की कानूनी रणनीति के मूल में है।

तीनों सिद्धांतों की तुलना

आयामअधिगम सिद्धांतELM (अनुनय)संज्ञानात्मक विसंवादिता
मूल विचारकपावलोव, स्किनर, बंडुरापेटी, कैसिओप्पोलियोन फेस्टिंगर
परिवर्तन का तंत्रसंगति, पुनर्बलन, अनुकरणसंदेश-प्रसंस्करणआंतरिक मनोवैज्ञानिक तनाव
स्थायित्वमध्यम — दोहराव पर निर्भरकेन्द्रीय: स्थायी; परिधीय: अस्थायीउच्च — स्व-न्यायीकरण से
प्रमुख अनुप्रयोगस्वच्छ भारत, टीकाकरणनीति-संवाद, पर्यावरण अभियानहेलमेट क़ानून, सीट-बेल्ट

अनुप्रयोग — सार्वजनिक नीति में अभिवृत्ति परिवर्तन

लोक-सेवक का व्यावसायिक जीवन बड़े पैमाने पर सुनियोजित अभिवृत्ति परिवर्तन से जुड़ा होता है।

  • स्वच्छ भारत मिशन। शास्त्रीय अनुबंधन (स्वच्छता को राष्ट्रीय गौरव से जोड़ना), क्रियाप्रसूत अनुबंधन (स्वच्छ पंचायतों के लिए पुरस्कार), और अवलोकनात्मक अधिगम (प्रमुख जन-नायकों द्वारा शौचालय का प्रत्यक्ष उपयोग) — तीनों का संयोजन।
  • बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ। केन्द्रीय-मार्ग अनुनय (लिंगानुपात विकृति पर साक्ष्य) और अवलोकनात्मक अधिगम (सफल बेटियों की कहानियाँ)।
  • सड़क सुरक्षा। क्रियाप्रसूत अनुबंधन (जुर्माना), शास्त्रीय अनुबंधन (दृश्यात्मक अभियान), और हाल ही में संज्ञानात्मक विसंवादिता (सीट-बेल्ट के व्यवहार से अभिवृत्ति बदलना)।
  • पल्स पोलियो। शास्त्रीय अनुबंधन (पोलियो-बूँद के साथ सकारात्मक संगति) और व्यावहारिक आदत-निर्माण।
  • तंबाकू उत्पादों पर सचित्र चेतावनी। शास्त्रीय अनुबंधन का प्रत्यक्ष उपयोग।

नैतिक चेतावनी: अभिवृत्ति परिवर्तन अभियानों को व्यक्तिगत स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिए। नज (nudge) और अनुनय वैध हैं; हेरफेर (manipulation) नहीं। यह सीमा-रेखा अनुनय, नज सिद्धांत और हेरफेर पर अलग अध्याय में विस्तार से वर्णित है।

केस स्टडी संकेत

केस 1: ज़िला स्वच्छता अभियान

आप ज़िला कलेक्टर हैं और 12 महीनों में ज़िले को खुले में शौच मुक्त घोषित करना है। वर्तमान दर: 70% घरों में शौचालय बने होने के बावजूद 40% परिवार खुले में शौच करते हैं।

समाधान-रूपरेखा — अभिवृत्ति-व्यवहार अंतराल।

  1. निदान। समस्या अवसंरचना की नहीं, अभिवृत्ति की है। शौचालय रखने वाले परिवार उनका उपयोग नहीं कर रहे।
  2. हस्तक्षेप।
  • केन्द्रीय-मार्ग अनुनय — आशा कार्यकर्ताओं द्वारा सामुदायिक बैठकें: रोग-संक्रमण और आर्थिक प्रभाव की व्याख्या।
  • अवलोकनात्मक अधिगम — महिला स्वयं-सहायता समूह शौचालयों का दृश्यमान उपयोग और रखरखाव करते हुए।
  • संज्ञानात्मक विसंवादिता — प्रत्येक परिवार से ODF घोषणा और सहकर्मी जवाबदेही जोड़कर प्रतिबद्ध व्यवहार।
  • क्रियाप्रसूत अनुबंधन — सर्वोत्तम-प्रदर्शन वाले गाँवों को ज़िला-स्तरीय मान्यता।
  1. कार्ययोजना। 12 महीनों में स्तरीय हस्तक्षेप; आधार, मध्य और अंतिम सर्वेक्षण; छह माह पर पाठ्यक्रम-संशोधन।

केस 2: पुलिस थाने में लैंगिक संवेदनशीलता

आप पुलिस महानिरीक्षक (Inspector-General) हैं। लिखित SOPs के बावजूद महिला शिकायतकर्ताओं के प्रति असंवेदनशील व्यवहार की शिकायतें बनी हुई हैं। आपसे केवल लिखित प्रक्रियाएँ नहीं — अधिकारियों की अभिवृत्ति बदलने को कहा गया है।

समाधान-रूपरेखा।

  1. व्यवहार पहले, अभिवृत्ति बाद में। दृश्यमान व्यवहार-मानक स्थापित करें (समर्पित महिला डेस्क, विशिष्ट अभिवादन और दर्ज़-प्रोटोकॉल, अनिवार्य अंत:क्रिया रिकॉर्डिंग)।
  2. अधिगम सिद्धांत। मॉडलिंग प्रशिक्षण — अनुभवी महिला अधिकारी और सफल पुरुष अधिकारी श्रेष्ठ अभ्यासों का प्रदर्शन करते हुए।
  3. विसंवादिता सिद्धांत। प्रत्येक संवेदनशील प्रकरण के बाद लिखित आत्म-समीक्षा अनिवार्य — स्वयं के आचरण का वर्णन ही अभिवृत्ति-जागरूकता पैदा करता है।
  4. अनुनय, केन्द्रीय मार्ग। उत्तरजीवियों और एनजीओ के साथ संरचित सत्र — असंवेदनशील व्यवहार के प्रणालीगत प्रभाव की व्याख्या।
  5. परिणाम। उत्कृष्ट आचरण के लिए मान्यता; गंभीर उल्लंघन पर दंडात्मक कार्रवाई।

UPSC प्रासंगिकता

GS-IV मानचित्रण। अभिवृत्ति निर्माण एवं परिवर्तन सीधे पाठ्यक्रम में नामित है — “अभिवृत्ति — विषयवस्तु, संरचना, प्रकार्य; विचार और व्यवहार से इसका प्रभाव और संबंध; नैतिक एवं राजनीतिक अभिवृत्तियाँ; सामाजिक प्रभाव एवं अनुनय।”

उत्तर लेखन के मूल शब्द। शास्त्रीय अनुबंधन, क्रियाप्रसूत अनुबंधन, अवलोकनात्मक अधिगम, प्रत्यक्ष शिक्षण, पावलोव, स्किनर, बंडुरा, लियोन फेस्टिंगर, संज्ञानात्मक विसंवादिता, विस्तरण संभाव्यता मॉडल, केन्द्रीय मार्ग, परिधीय मार्ग, अभिवृत्ति-व्यवहार सहसंबंध, अभिवृत्ति सुलभता, परिस्थितिजन्य मानदंड, नज।

प्रारंभिक परीक्षा बिंदु

  • शास्त्रीय अनुबंधन — पावलोव; क्रियाप्रसूत — स्किनर; अवलोकनात्मक — बंडुरा।
  • संज्ञानात्मक विसंवादिता सिद्धांत — लियोन फेस्टिंगर, 1957।
  • विस्तरण संभाव्यता मॉडल — पेटी और कैसिओप्पो; दो मार्ग — केन्द्रीय (स्थायी), परिधीय (अस्थायी)।
  • अभिवृत्ति के तीन घटक — संज्ञानात्मक (Cognitive), संवेगात्मक (Affective), व्यवहारात्मक (Behavioural) — ABC मॉडल।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न

  1. “अभिवृत्ति व्यवहार की भविष्यवाणी प्रायिकता के आधार पर ही करती है।” अभिवृत्ति-व्यवहार सहसंबंध को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों की चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
  2. संज्ञानात्मक विसंवादिता सिद्धांत किस प्रकार सार्वजनिक नीति में व्यवहार-परिवर्तन की रणनीति को सूचित करता है? भारतीय उदाहरणों सहित विवेचना कीजिए। (250 शब्द)
  3. विस्तरण संभाव्यता मॉडल के केन्द्रीय एवं परिधीय मार्गों की तुलना कीजिए। एक लोक-सेवक के लिए कौन-सा मार्ग दीर्घकालिक अभिवृत्ति-परिवर्तन हेतु अधिक उपयुक्त है? (150 शब्द)

अभिवृत्ति सीखी जाती है; अतः उसे पुनः सीखा भी जा सकता है। एक लोक-सेवक के लिए यह दोहरा अनुशासन है — अपनी अभिवृत्तियों की निरंतर परीक्षा एवं परिष्कार, और जनसामान्य की अभिवृत्तियों का सुनियोजित परिवर्तन। अभिवृत्तियों के निर्माण, अनुवाद और रूपांतरण की समझ इसलिए केवल अकादमिक अभ्यास नहीं है — यह लोक-सेवा का सबसे शक्तिशाली, अहिंसक, गैर-दबावकारी उपकरण है, जिसके माध्यम से समाज की दिशा बदली जाती है।

सामान्य प्रश्न

अभिवृत्ति क्या है और यह व्यवहार से कैसे भिन्न है?

अभिवृत्ति किसी विषय के प्रति व्यक्ति का स्थायी मानसिक और संवेगात्मक दृष्टिकोण है — आंतरिक मानसिकता। व्यवहार उस अभिवृत्ति की बाहरी अभिव्यक्ति है। दोनों के बीच संबंध असमरूप है — सशक्त अभिवृत्ति प्रायः अनुरूप व्यवहार उत्पन्न करती है, परंतु सामाजिक दबाव, समय और परिस्थिति के कारण अंतराल भी संभव है।

अभिवृत्ति-निर्माण की चार प्रमुख प्रक्रियाएँ कौन-सी हैं?

शास्त्रीय अनुबंधन (पावलोवियन संगति), क्रियाप्रसूत अनुबंधन (पुनर्बलन/दंड), प्रत्यक्ष शिक्षण (नियम के साथ कारण), और आवश्यकताओं की संतुष्टि (उपयोगितावादी आधार) — ये चारों प्रक्रियाएँ बचपन से वयस्कता तक समानांतर रूप से कार्य करती हैं।

संज्ञानात्मक विसंवादिता सिद्धांत क्या है?

लियोन फेस्टिंगर (1957) द्वारा प्रस्तुत यह सिद्धांत बताता है कि परस्पर विरोधी विश्वास या व्यवहार-विश्वास टकराव से उत्पन्न मनोवैज्ञानिक तनाव को कम करने हेतु व्यक्ति या तो अपनी अभिवृत्ति बदलता है या व्यवहार। हेलमेट क़ानून के बाद युवा पीढ़ी की सड़क-सुरक्षा अभिवृत्ति में परिवर्तन इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।

विस्तरण संभाव्यता मॉडल के दो मार्ग कौन-से हैं?

केन्द्रीय मार्ग — तर्क और साक्ष्य आधारित गहन प्रसंस्करण से स्थायी परिवर्तन; परिधीय मार्ग — वक्ता की विशेषता, संवेग और प्रस्तुति जैसे संकेतों से अस्थायी परिवर्तन। पेटी और कैसिओप्पो ने इसे विकसित किया।

अभिवृत्ति-व्यवहार सहसंबंध को कौन-से कारक प्रभावित करते हैं?

तीन कारक-समूह — व्यक्ति के गुण (आत्म-जागरूकता, सत्यनिष्ठा, आत्म-निगरानी), अभिवृत्ति के गुण (शक्ति, सुलभता, विशिष्टता, व्यक्तिगत अनुभव), और परिस्थिति (सामाजिक मानदंड, समय का दबाव, सार्वजनिक-निजी संदर्भ)।

क्या अभिवृत्ति को बदला जा सकता है?

हाँ। चूँकि अभिवृत्ति सीखी जाती है, उसे पुनः सीखा जा सकता है। तीन प्रमुख विधियाँ — अधिगम सिद्धांत (पुनर्बलन और मॉडलिंग), अनुनय (केन्द्रीय या परिधीय मार्ग) और संज्ञानात्मक विसंवादिता (पहले व्यवहार, फिर अभिवृत्ति) — का संयोजन सबसे प्रभावी है।

लोक-सेवक के लिए अभिवृत्ति परिवर्तन क्यों महत्वपूर्ण है?

लोक-सेवा का सार जनता का व्यवहार बदलना है — चाहे टीकाकरण हो, कर-अनुपालन या स्वच्छता। दबाव या क़ानून सीमित प्रभावी हैं; दीर्घकालिक टिकाऊ परिवर्तन तभी आता है जब जनता की अभिवृत्ति बदले। इसलिए अभिवृत्ति-विज्ञान की समझ नीति-निर्माण का अनिवार्य उपकरण है।

स्वच्छ भारत मिशन में किन-किन सिद्धांतों का प्रयोग हुआ?

शास्त्रीय अनुबंधन (स्वच्छता को राष्ट्रीय गौरव से जोड़ना), क्रियाप्रसूत अनुबंधन (ODF पंचायत पुरस्कार), अवलोकनात्मक अधिगम (प्रधानमंत्री और जन-नायकों का दृश्यमान भागीदारी), और संज्ञानात्मक विसंवादिता (शौचालय बने तो उपयोग की प्रतिबद्धता) — चारों का समवेत प्रयोग।

अभिवृत्ति-व्यवहार सहसंबंध बढ़ाने के व्यक्तिगत चरण क्या हैं?

संवेगात्मक बुद्धिमत्ता विकसित करना, नियमित आत्मचिंतन, अभिवृत्ति-साक्षरता, अंतरात्मा से जुड़ाव, सत्यनिष्ठा-सत्यवादिता के मूल्य, अंतर्निहित अभिप्रेरणा, और परिवर्तन को अवसर के रूप में देखना — ये सात अनुशासन एक UPSC अभ्यर्थी से लेकर वरिष्ठ अधिकारी तक के लिए समान रूप से उपयोगी हैं।

अनुनय और हेरफेर में अंतर क्या है?

अनुनय (persuasion) पारदर्शी, साक्ष्य-आधारित और स्वायत्तता-सम्मत प्रक्रिया है — व्यक्ति स्वयं निर्णय करता है। हेरफेर (manipulation) में सूचना छिपाई जाती है या भ्रम पैदा किया जाता है, स्वायत्तता का उल्लंघन होता है। नैतिक नीति-निर्माण की सीमा-रेखा यही है — नज वैध है, हेरफेर नहीं।

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

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