UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

अखिल भारतीय न्यायिक सेवा: पक्ष, विपक्ष और अब तक की स्थिति

अधीनस्थ अदालतों की 30 प्रतिशत रिक्तियाँ, भाषा और संघवाद की आपत्तियाँ, विधि आयोग की 116वीं रिपोर्ट और NCRWC का विकल्प, और आगे का व्यावहारिक रास्ता।

Law reports shelved behind a gavel

अधीनस्थ अदालतों में 5,000 से ज़्यादा पद खाली हैं, यानी 30 प्रतिशत से ऊपर की रिक्ति दर, और ये पद 28 अलग-अलग राज्य भर्ती व्यवस्थाओं से भरे जाते हैं, जिनके मानक, समय-सीमाएँ और कैलेंडर सब अलग हैं। कुल आँकड़ा कोई नहीं रखता और इसके लिए कोई जवाबदेह नहीं है। अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (All India Judicial Service) के पक्ष का तर्क यही है, और यह तर्क विधि आयोग की रिपोर्टों में छह दशक से बिना किसी नतीजे के दोहराया जा रहा है।

मौजूदा व्यवस्था की दिक्कतें

बिखरी भर्ती और गुणवत्ता में फ़र्क़। अलग-अलग मानकों, समय-सीमाओं और आरक्षण के अमल के साथ चलने वाली 28 राज्य स्तरीय प्रक्रियाएँ राज्य न्यायपालिकाओं की गुणवत्ता में भारी अंतर पैदा करती हैं, और पद भरने की न कोई केंद्रीय निगरानी है, न जवाबदेही।

रिक्तियाँ। अधीनस्थ अदालतों में 30 प्रतिशत से ऊपर, 2024 तक 5,000 से ज़्यादा पद खाली। ट्रायल स्तर पर मुक़दमों का अंबार, जहाँ ज़्यादातर भारतीय वादी न्याय व्यवस्था से पहली बार मिलते हैं, काफ़ी हद तक स्टाफ़ की कमी की समस्या है।

आपत्तियाँ, जो हल्की नहीं हैं

भाषा और स्थानीय कानून। न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर की चेतावनी आज भी सबसे मज़बूत विरोधी तर्क है। तमिलनाडु से केंद्र द्वारा असम भेजा गया न्यायाधीश असमिया, स्थानीय भूमि कानून और सांस्कृतिक संदर्भ से टकराता है। ट्रायल न्यायाधीशों को क्षेत्रीय भाषा में जो पकड़ चाहिए, केंद्रीय परीक्षा उसकी गारंटी नहीं दे सकती।

यह कोई छोटी-मोटी व्यावहारिक बात नहीं है। ट्रायल कोर्ट वही जगह है जहाँ गाँव का वादी अक्सर बिना असरदार वकील के, ख़ुद अपनी बात कहता है। जो न्यायाधीश उस गवाही को सीधे समझ ही न सके, वह उसी पहुँच को तोड़ देता है जिसे यह सुधार बेहतर करने चला था। AIJS के पक्ष में दिया जाने वाला न्याय तक पहुँच का तर्क यहाँ ख़ुद अपने ही ख़िलाफ़ चला जाता है।

अभिजात केंद्रीकरण। केंद्रीकृत भर्ती शहरी, अंग्रेज़ी माध्यम के उम्मीदवारों के पक्ष में जा सकती है और उन वंचित समुदायों का प्रतिनिधित्व घटा सकती है जो अभी राज्य भर्ती में स्थानीय स्तर पर तय आरक्षण के ज़रिए आते हैं। नतीजा ऐसी न्यायपालिका हो सकती है जो ज़्यादा योग्य हुए बिना ज़्यादा अभिजात हो जाए, और जिसका प्रतिनिधित्व पहले से भी कम हो।

संवैधानिक विरोध। उच्च न्यायालय AIJS को अनुच्छेद 233 से 235 के तहत अधीनस्थ न्यायपालिका पर अपने नियंत्रण में, ख़ासकर अनुच्छेद 235 की निगरानी शक्ति में, दख़ल मानते हैं। राज्य इसे संघवाद का उल्लंघन मानते हैं। अदालतों और राज्यों, दोनों की ओर से आया संस्थाओं का यह साझा विरोध ही वजह है कि छह दशक की सिफ़ारिशों से कुछ नहीं निकला।

मेज़ पर मौजूद बीच के रास्ते

विधि आयोग की 116वीं रिपोर्ट (1986)। इसने पक्षपात ख़त्म करने के लिए AIJS का ज़ोरदार समर्थन किया, पर साथ ही तैनाती से पहले अनिवार्य क्षेत्रीय भाषा प्रशिक्षण की शर्त रखी, और बदलाव की अवधि में गृह-भाषा वाले क्षेत्रों में तैनाती सुझाई। भाषा की आपत्ति का जवाब देते हुए मानकीकरण का लाभ बचाए रखने की यह सबसे गंभीर कोशिश है।

NCRWC (2002)। इसने भोपाल के राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को राज्यों द्वारा भर्ती किए गए न्यायाधीशों के लिए एक मानक प्रशिक्षण संस्था के रूप में मज़बूत करने की सिफ़ारिश की, जिससे केंद्रीकृत भर्ती के बिना ही गुणवत्ता का मानकीकरण हो जाए। यह कम विवाद वाला रास्ता है, और इसमें संघवाद का सवाल सुलझाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ बनाम भारत संघ (1992)। सर्वोच्च न्यायालय ने पहले कदम के रूप में एक समान सेवा शर्तों का समर्थन किया। मानकीकृत मूल्यांकन वाला राष्ट्रीय कैडर उच्च न्यायालय में पदोन्नति के लिए एक पारदर्शी, योग्यता आधारित रास्ता भी बनाएगा, जो मौजूदा बार-केंद्रित नामांकन व्यवस्था से आगे जाकर दायरा चौड़ा करेगा।

ईमानदार आकलन

AIJS के पक्ष में सबसे मज़बूत तर्क गुणवत्ता नहीं है। वह है रिक्तियों की जवाबदेही। 28 व्यवस्थाएँ और कोई कुल आँकड़ा नहीं, यानी 30 प्रतिशत रिक्ति दर का जवाब किसी को नहीं देना पड़ता, और अकेली यही बात लाखों वादियों के लिए नापी जा सकने वाली देरी पैदा करती है।

लेकिन भर्ती का केंद्रीकरण एक बड़ा संवैधानिक बदलाव है, जबकि जिस समस्या को हल करना है वह काफ़ी हद तक प्रशासनिक है। एक राष्ट्रीय भर्ती कैलेंडर, प्रकाशित रिक्ति आँकड़े और तय समय में पद भरने की बाध्यता, अनुच्छेद 233 से 235 को छुए बिना ही रिक्ति की ज़्यादातर समस्या हल कर देंगे।

वहीं भाषा की आपत्ति का जवाब अकेले प्रशिक्षण से नहीं मिलता। मुक़दमा चलाने लायक भाषा-पकड़ तैनाती से पहले के किसी कोर्स में नहीं आ जाती, और इसे मान लेने का दिखावा ही वह तरीका है जिससे सुधार सिद्धांत में नहीं, अमल में नाकाम होते हैं।

आगे का रास्ता

  • पहले रिक्ति की समस्या ठीक करें, राष्ट्रीय भर्ती कैलेंडर और प्रकाशित, समयबद्ध पद-भरने की बाध्यता के ज़रिए।
  • राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को मज़बूत करें, जो संवैधानिक टकराव के बिना मानकीकरण देती है।
  • अगर AIJS आगे बढ़े, तो 116वीं रिपोर्ट का सुरक्षा-उपाय अपनाएँ: तैनाती से पहले अनिवार्य क्षेत्रीय भाषा योग्यता, महज़ प्रशिक्षण नहीं।
  • राज्य स्तर पर तय आरक्षण की व्यवस्था बनी रहे, क्योंकि केंद्रीय भर्ती से प्रतिनिधित्व सिकुड़ने का ख़तरा है।
  • उच्च न्यायालय में पदोन्नति का दायरा चौड़ा करने के लिए मानकीकृत मूल्यांकन का इस्तेमाल हो, क्योंकि गुणवत्ता वाला तर्क वहीं सबसे मज़बूत और सबसे कम विवादित है।

सामान्य प्रश्न

अखिल भारतीय न्यायिक सेवा क्या है?

अधीनस्थ न्यायपालिका के लिए प्रस्तावित एक केंद्रीकृत भर्ती सेवा, मौजूदा अखिल भारतीय सेवाओं की तर्ज़ पर, जो उस मौजूदा व्यवस्था की जगह लेगी या उसे पूरक बनाएगी जिसमें हर राज्य अपने न्यायिक अधिकारी ख़ुद भर्ती करता है। विधि आयोग की रिपोर्टों में छह दशक से इसकी सिफ़ारिश होती रही है और यह आज तक लागू नहीं हुई।

मौजूदा भर्ती व्यवस्था में क्या ग़लत है?

28 राज्य स्तरीय भर्ती प्रक्रियाएँ अलग-अलग मानकों, समय-सीमाओं और आरक्षण के अमल के साथ चलती हैं, जिससे राज्य न्यायपालिकाओं की गुणवत्ता में बड़ा फ़र्क़ पैदा होता है। अधीनस्थ अदालतों में रिक्ति दर 30 प्रतिशत से ऊपर है, 2024 तक 5,000 से ज़्यादा पद खाली थे, और पद भरने की न कोई केंद्रीय निगरानी है, न जवाबदेही।

भाषा वाली आपत्ति क्या है?

न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर ने चेताया था कि तमिलनाडु से केंद्र द्वारा असम भेजा गया न्यायाधीश भाषा, स्थानीय भूमि कानून और सांस्कृतिक संदर्भ की बाधाओं से टकराएगा। ट्रायल न्यायाधीशों को क्षेत्रीय भाषा में जो पकड़ चाहिए, UPSC जैसी केंद्रीय परीक्षा उसकी गारंटी नहीं दे सकती। इसका मतलब है कि AIJS के पक्ष में दिया न्याय तक पहुँच का तर्क ख़ुद अपने ही ख़िलाफ़ चला जाता है, अगर नियुक्त न्यायाधीश गाँव के वादियों से बात ही न कर सकें।

अभिजात केंद्रीकरण का ख़तरा क्या है?

हद से ज़्यादा केंद्रीकृत भर्ती शहरी, अंग्रेज़ी माध्यम के उम्मीदवारों के पक्ष में जा सकती है और उन वंचित समुदायों का प्रतिनिधित्व घटा सकती है जो अभी राज्य स्तरीय भर्ती में स्थानीय स्तर पर तय आरक्षण से आते हैं। AIJS न्यायपालिका को एक प्रतिनिधिक संस्था के रूप में ज़्यादा योग्य बनाने के बजाय ज़्यादा अभिजात बना सकती है।

उच्च न्यायालय इस प्रस्ताव का विरोध क्यों करते हैं?

क्योंकि अनुच्छेद 233 से 235 उच्च न्यायालयों को अधीनस्थ न्यायपालिका पर नियंत्रण और निगरानी देते हैं, और केंद्रीकृत भर्ती को उस भूमिका में, ख़ासकर अनुच्छेद 235 की निगरानी शक्ति में, दख़ल माना जाता है। राज्य इसे संघवाद का उल्लंघन मानते हैं। उच्च न्यायालयों और राज्य सरकारों का साझा विरोध दशकों से इस प्रस्ताव को रोके हुए है।

विधि आयोग ने क्या सिफ़ारिश की?

1986 की 116वीं रिपोर्ट ने पक्षपात ख़त्म करने के लिए अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का ज़ोरदार समर्थन किया, पर तैनाती से पहले अनिवार्य क्षेत्रीय भाषा प्रशिक्षण की शर्त रखी और बदलाव की अवधि में गृह-भाषा वाले क्षेत्रों में तैनाती सुझाई। यह बीच का रास्ता भाषा की आपत्ति का जवाब देता है और योग्यता के मानकीकरण का लाभ भी बचाए रखता है।

AIJS का विकल्प क्या है?

NCRWC ने 2002 में भोपाल की राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को राज्यों द्वारा भर्ती किए गए न्यायाधीशों के लिए मानक प्रशिक्षण संस्था के रूप में मज़बूत करने की सिफ़ारिश की। इससे केंद्रीकृत भर्ती की संवैधानिक उथल-पुथल के बिना गुणवत्ता का मानकीकरण हो जाता है, और यह कम विवाद वाला रास्ता है।

AIJS का उच्च न्यायालय की नियुक्तियों पर क्या असर होगा?

अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ बनाम भारत संघ (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने पहले कदम के रूप में एक समान सेवा शर्तों का समर्थन किया था। मानकीकृत मूल्यांकन वाला राष्ट्रीय न्यायिक कैडर उच्च न्यायालयों में पदोन्नति के लिए पारदर्शी, योग्यता आधारित रास्ता बनाएगा और मौजूदा बार-केंद्रित नामांकन प्रक्रिया से आगे जाकर आँके जाने वाले दायरे को चौड़ा करेगा।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

  1. 2024 तक भारत में अधीनस्थ अदालतों की रिक्तियाँ लगभग कितनी थीं?
    (a) 1,000 से ज़्यादा
    (b) 5,000 से ज़्यादा
    (c) 12,000 से ज़्यादा
    (d) 25,000 से ज़्यादा
    उत्तर: (b) 5,000 से ज़्यादा रिक्तियाँ, यानी 30 प्रतिशत से ऊपर की दर, और भर्ती की कोई केंद्रीय निगरानी नहीं।
  2. अधीनस्थ न्यायपालिका पर उच्च न्यायालयों का नियंत्रण किन अनुच्छेदों से आता है?
    (a) अनुच्छेद 124 से 128
    (b) अनुच्छेद 233 से 235
    (c) अनुच्छेद 243 से 245
    (d) अनुच्छेद 315 से 320
    उत्तर: (b) ख़ासकर अनुच्छेद 235 उच्च न्यायालयों को निगरानी का नियंत्रण देता है, और यही AIJS के प्रति उनके विरोध का आधार है।
  3. भाषा से जुड़े सुरक्षा-उपाय के साथ AIJS का समर्थन करने वाली विधि आयोग की रिपोर्ट कौन सी थी?
    (a) 77वीं रिपोर्ट
    (b) 116वीं रिपोर्ट
    (c) 189वीं रिपोर्ट
    (d) 245वीं रिपोर्ट
    उत्तर: (b) 1986 की 116वीं रिपोर्ट ने तैनाती से पहले अनिवार्य क्षेत्रीय भाषा प्रशिक्षण के साथ AIJS की सिफ़ारिश की।
  4. न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर की AIJS पर मुख्य आपत्ति किससे जुड़ी थी?
    (a) लागत
    (b) भाषा और स्थानीय कानून की बाधाएँ
    (c) आरक्षण नीति
    (d) न्यायिक स्वतंत्रता
    उत्तर: (b) उन्होंने चेताया था कि केंद्र से भेजे गए न्यायाधीश भाषा, स्थानीय भूमि कानून और सांस्कृतिक बाधाओं से टकराएँगे।
  5. NCRWC ने 2002 में AIJS के विकल्प के रूप में किसे मज़बूत करने को कहा?
    (a) सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम
    (b) भोपाल की राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी
    (c) केवल राज्य न्यायिक अकादमियाँ
    (d) भारतीय बार काउंसिल
    उत्तर: (b) उसने केंद्रीकृत भर्ती के बिना मानकीकृत प्रशिक्षण के रास्ते के रूप में राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी का सुझाव दिया।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. अखिल भारतीय न्यायिक सेवा न्यायिक गुणवत्ता का मानकीकरण करेगी, पर संघीय और भाषाई पहलुओं की कीमत पर। समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)
  2. AIJS के पक्ष में दिया जाने वाला न्याय तक पहुँच का तर्क ख़ुद अपने ही ख़िलाफ़ जा सकता है। चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
  3. अनुच्छेद 233 से 235 के तहत AIJS के प्रति उच्च न्यायालयों के विरोध पर चर्चा कीजिए और उसकी संवैधानिक ठोसता का आकलन कीजिए। (250 शब्द)
  4. AIJS के विकल्प के रूप में राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को मज़बूत करने का मूल्यांकन कीजिए। (150 शब्द)
  5. अधीनस्थ अदालतों में रिक्तियाँ 30 प्रतिशत से ऊपर हैं। संस्थाओं में ज़रूरी सुधारों पर चर्चा कीजिए। (150 शब्द)

Share this

PDF

Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

Recognized as one of India’s best content marketers, Gaurav Tiwari is an SEO strategist, WordPress developer, and founder of Gatilab. He builds websites that load in under a second, creates content that ranks on Google’s first page, and develops WordPress plugins and tools used on thousands of live sites.

Specialises in · Writing, web development, design — UPSC prep tooling Experience · 16+ years Visit website ↗

UPSC की तैयारी हिंदी माध्यम में — एक निशुल्क डेमो क्लास

न कोई सेल्स कॉल, न कोई ब्रोशर। सोमवार सुबह की असली GS क्लास देखिए — हमारे अनुभवी शिक्षकों के साथ।