UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947: विवाद निपटान तंत्र, हड़ताल और IR संहिता 2020

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 UPSC के लिए: कार्य समिति, सुलह, श्रम न्यायालय और अधिकरण, हड़ताल-तालाबंदी, ले-ऑफ़, छँटनी, बंदी, बड़े फ़ैसले और IR संहिता 2020 के बदलाव।

Industrial Disputes Act 1947 five-tier dispute resolution ladder

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 (Industrial Disputes Act 1947) आज़ादी के बाद के भारतीय श्रम क़ानून की रीढ़ है। अठहत्तर साल तक इसी ने तय किया कि मालिक और कामगार के बीच का झगड़ा किस नाम से पुकारा जाएगा, कहाँ-कहाँ आगे बढ़ेगा, और आख़िर में कैसे निपटेगा। इसी ने फ़ैक्टरी मालिक को बताया कि हड़ताल क्या है और तालाबंदी क्या। इसी ने कामगार को बताया कि छँटनी का मुआवज़ा कब बनता है और किसी इकाई को बंद करने के लिए सरकार की इजाज़त कब चाहिए। इसी ने फ़ैसले की पाँच सीढ़ियों वाली वह सीढ़ी बनाई जो कारख़ाने के भीतर से शुरू होकर दिल्ली के राष्ट्रीय अधिकरण पर ख़त्म होती है।

अब औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 औपचारिक रूप से औद्योगिक संबंध संहिता 2020 (Industrial Relations Code 2020) में समा चुका है, जिसे केंद्र सरकार ने 21 नवंबर 2025 से लागू किया। यह संहिता तीन पुराने क़ानूनों को एक जगह लाती है: ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926, औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम 1946, और औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947। लेकिन संहिता 1947 वाले क़ानून का ज़्यादातर ढाँचा आगे ले जाती है, इसलिए संहिता को ठीक से समझने का रास्ता आज भी मूल क़ानून से ही निकलता है।

यह लेख उस पूरे तंत्र से गुज़रता है जो औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 ने खड़ा किया, हड़ताल, तालाबंदी, ले-ऑफ़, छँटनी और बंदी की परिभाषाएँ खोलता है, बड़े अदालती फ़ैसले गिनाता है, और बताता है कि संहिता ने क्या बदल दिया। यह UPSC मेन्स GS-II और GS-III, प्रीलिम्स की राजव्यवस्था, और समाजशास्त्र व राजनीति विज्ञान वैकल्पिक के श्रम क़ानून वाले हिस्से को ध्यान में रखकर लिखा गया है।

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947: एक नज़र में ज़रूरी बातें

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की पाँच सीढ़ियों वाली विवाद निपटान व्यवस्था
  • कब बना। 11 मार्च 1947, लागू 1 अप्रैल 1947 से।
  • कुल धाराएँ। सात अध्यायों में 40 धाराएँ और पाँच अनुसूचियाँ।
  • मक़सद। औद्योगिक विवादों की जाँच और निपटारा, और अनुचित श्रम व्यवहार रोकना।
  • कौन-कौन से मंच बने। कार्य समिति, सुलह अधिकारी, सुलह बोर्ड, जाँच न्यायालय, श्रम न्यायालय, औद्योगिक अधिकरण, राष्ट्रीय अधिकरण।
  • मुख्य अवधारणाएँ। औद्योगिक विवाद, हड़ताल, तालाबंदी, ले-ऑफ़, छँटनी, बंदी, कामगार, मज़दूरी।
  • किसने जगह ली। औद्योगिक संबंध संहिता 2020, जो 21 नवंबर 2025 से लागू हुई।
  • किन पर लागू। धारा 2(j) में परिभाषित उद्योगों के कामगारों पर, जिसे अब बैंगलोर वाटर सप्लाई कसौटी (1978) के साथ पढ़ा जाता है।
  • मुआवज़ा। छँटनी पर हर पूरे साल के लिए 15 दिन का औसत वेतन; एक महीने का नोटिस या उसके बदले वेतन (धारा 25F)।

यह क़ानून किस काम के लिए बनाया गया था

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 दो पुराने क़ानूनों से निकला: व्यापार विवाद अधिनियम 1929 और दूसरे विश्व युद्ध के समय की भारत रक्षा नियम अधिसूचनाएँ। दोनों भारतीय उद्योग को झगड़े निपटाने की कोई जमी-जमाई व्यवस्था नहीं दे पाए थे। 1947 के क़ानून ने कई परतों वाले मंच बनाकर और सुलह में हुए या फ़ैसले से थोपे गए समझौतों को क़ानूनी ताक़त देकर यह कमी भरने की कोशिश की।

क़ानून के चार मक़सद हैं। पहला, औद्योगिक विवादों की जाँच और निपटारे के लिए तंत्र देना। दूसरा, कारख़ाने के भीतर कार्य समितियों के ज़रिए मालिक और कामगार के रिश्ते सुधारना। तीसरा, नोटिस और ठंडा होने की मियाद तय करके ग़ैर-क़ानूनी हड़ताल और तालाबंदी रोकना। चौथा, ले-ऑफ़, छँटनी और बंदी से प्रभावित कामगारों को तय मुआवज़े के ज़रिए राहत दिलाना।

यह क़ानून 1946 में बंबई, कलकत्ता और कानपुर में उठी युद्ध के बाद की औद्योगिक बेचैनी का जवाब था। संसद ने विवाद निपटाने को अलग-अलग मौक़ों पर बने अधिकरणों के भरोसे छोड़ने की जगह उसे क़ानून की शक्ल दे दी, और इसी फ़ैसले ने भारत की श्रम न्यायशास्त्र की दिशा तय कर दी।

विवाद निपटाने की पाँच सीढ़ियाँ

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की सबसे ख़ास देन इसी परतदार व्यवस्था है। हर सीढ़ी का अपना काम है, अपनी बनावट है, और अपना वह मौक़ा है जब उसे बुलाया जा सकता है।

कार्य समिति (धारा 3)। जहाँ 100 या उससे ज़्यादा कामगार हों, वहाँ यह बनानी ही होगी। इसमें कामगारों और मालिक की बराबर नुमाइंदगी रहती है। इसका काम है रिश्ते अच्छे रखना और मतभेद को विवाद बनने से पहले सुलझा देना। क़ानून में यही अकेला भीतरी मंच है।

सुलह अधिकारी (धारा 4)। विवाद में बीच-बचाव के लिए नियुक्त सरकारी कर्मचारी। यह अधिकारी दोनों पक्षों की साझा बैठकें कराता है, समझौते की तरफ़ धकेलता है, और अपनी रिपोर्ट देता है। जन उपयोगिता सेवाओं में हड़ताल या तालाबंदी से पहले सुलह की प्रक्रिया से गुज़रना ज़रूरी है।

सुलह बोर्ड (धारा 5)। यह बड़ा निकाय है, जिसमें एक अध्यक्ष और दोनों पक्षों से बराबर संख्या में दो या चार सदस्य होते हैं। जब कोई विवाद अकेले सुलह अधिकारी से नहीं सुलझता तो इसे उसी मौक़े के लिए बनाया जाता है। यह जाँच करके सरकार को रिपोर्ट देता है।

जाँच न्यायालय (धारा 6)। यह तथ्य जुटाने वाला निकाय है, जो औद्योगिक विवाद से जुड़ी किसी भी बात पर रिपोर्ट देता है। यह फ़ैसला नहीं सुनाता। इसकी रिपोर्ट छापी जाती है और सरकार उसी के आधार पर तय करती है कि विवाद को अनिवार्य फ़ैसले के लिए भेजा जाए या नहीं।

श्रम न्यायालय, औद्योगिक अधिकरण, राष्ट्रीय अधिकरण (धारा 7, 7A, 7B)। फ़ैसला सुनाने वाली सीढ़ियाँ यही हैं। श्रम न्यायालय दूसरी अनुसूची के मामले सुनता है, जैसे स्थायी आदेशों के तहत दिए गए किसी आदेश की वैधता या किसी कामगार को हटाया जाना। औद्योगिक अधिकरण तीसरी अनुसूची के मामले सुनता है, जिनमें मज़दूरी, बोनस, काम के घंटे और छँटनी आते हैं। राष्ट्रीय अधिकरण उन विवादों को देखता है जो राष्ट्रीय महत्व के हों या जिनका असर एक से ज़्यादा राज्यों की इकाइयों पर पड़ता हो।

धारा 2(k) में “औद्योगिक विवाद” की परिभाषा

धारा 2(k) औद्योगिक विवाद को इस तरह परिभाषित करती है: “मालिकों और मालिकों के बीच, या मालिकों और कामगारों के बीच, या कामगारों और कामगारों के बीच कोई भी ऐसा विवाद या मतभेद जो किसी व्यक्ति के रोज़गार, रोज़गार न मिलने, रोज़गार की शर्तों या काम की परिस्थितियों से जुड़ा हो।”

शब्द मायने रखते हैं, क्योंकि इस क़ानून के हर मंच को सुनवाई का अधिकार तभी मिलता है जब मामला औद्योगिक विवाद की परिभाषा में आ जाए। पहले सिर्फ़ एक व्यक्ति की शिकायत इससे बाहर मानी जाती थी, लेकिन 1965 में जोड़ी गई धारा 2A ने किसी अकेले कामगार को हटाने, बर्ख़ास्त करने, छँटनी करने या सेवा ख़त्म करने के विवाद को भी इसी क़ानून के दायरे में ला दिया, चाहे कोई यूनियन उसका मामला उठाए या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने वर्कमेन ऑफ़ डिमाकुची टी एस्टेट बनाम मैनेजमेंट (1958) में धारा 2(k) में तीन शर्तें पढ़ीं: विवाद असली और ठोस होना चाहिए, तय पक्षों के बीच होना चाहिए, और ऐसे व्यक्ति से जुड़ा होना चाहिए जिसके रोज़गार में दोनों पक्षों का सीधा और ठोस हित हो। यही कसौटी आज भी चलती है।

हड़ताल और तालाबंदी: हक़ भी, शर्तें भी

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के तहत हड़ताल और तालाबंदी के प्रकार

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 कामगार के हड़ताल के हक़ और मालिक के तालाबंदी के हक़, दोनों को मानता है। और दोनों के चारों तरफ़ शर्तों की बाड़ भी लगाता है।

धारा 2(q) के मुताबिक़ हड़ताल का मतलब है किसी उद्योग में काम करने वाले लोगों के समूह का मिलकर काम रोक देना, या मिलकर यह इनकार कर देना कि वे काम जारी रखेंगे या काम पर आएँगे। अदालतों ने इसके कई रूप माने हैं, जैसे बैठकर की जाने वाली हड़ताल, औज़ार रख देने वाली हड़ताल, नियम-दर-नियम काम करना, और काम की रफ़्तार जान-बूझकर धीमी कर देना। हालाँकि रफ़्तार धीमी करने को असली हड़ताल नहीं, कदाचार माना जाता है।

धारा 2(l) के मुताबिक़ तालाबंदी का मतलब है काम की जगह को कुछ समय के लिए बंद कर देना, या काम रोक देना, या मालिक का यह इनकार कि वह अपने यहाँ लगे कितने ही लोगों से आगे काम कराएगा।

क़ानून दोनों पर रोक लगाता है। धारा 22 के तहत जन उपयोगिता सेवा में छह हफ़्ते का नोटिस दिए बिना, नोटिस देने के चौदह दिन के भीतर, नोटिस में लिखी तारीख़ बीतने से पहले, या सुलह की कार्यवाही चलते हुए न हड़ताल हो सकती है न तालाबंदी। जो इकाई जन उपयोगिता सेवा में नहीं आती, वहाँ सुलह, फ़ैसले या समझौते की कार्यवाही चलने के दौरान और उसके बाद दो महीने तक हड़ताल और तालाबंदी ग़ैर-क़ानूनी हैं। औद्योगिक संबंध संहिता 2020 ने जन उपयोगिता वाला नोटिस नियम सभी औद्योगिक इकाइयों पर लागू कर दिया है।

ले-ऑफ़: धारा 2(kkk) और धारा 25A से 25E

ले-ऑफ़ का मतलब है मालिक का हाज़िरी रजिस्टर में दर्ज किसी कामगार को काम न दे पाना या काम देने से इनकार करना, और वजह हो कोयले, बिजली या कच्चे माल की कमी, माल का ढेर लग जाना, मशीन ख़राब हो जाना, कुदरती आफ़त, या इनसे जुड़ी कोई और वजह। कामगार रजिस्टर पर बना रहता है, बस उसे काम नहीं मिलता।

मुआवज़े का हिसाब धारा 25A से 25E में है। जिस कामगार ने कम से कम एक साल लगातार काम किया हो और जिस इकाई में 50 या उससे ज़्यादा कामगार हों, वहाँ उसे ले-ऑफ़ के हर दिन का मुआवज़ा मिलता है, जो मूल मज़दूरी और महँगाई भत्ते का 50 प्रतिशत होता है, और साल में ज़्यादा से ज़्यादा 45 दिन तक मिलता है। 45 दिन के बाद मालिक ले-ऑफ़ का मुआवज़ा देते रहने की जगह धारा 25F के तहत छँटनी कर सकता है।

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 ले-ऑफ़ को एक तय घटना बनाता है जिसकी एक तय क़ीमत है। इससे मालिक यह नहीं कर सकता कि इकाई चालू बताता रहे और कामगारों को बिना पैसे के अनिश्चित समय तक घर बिठाए रखे।

छँटनी: धारा 25F और “जो बाद में आया, वह पहले जाएगा”

धारा 2(oo) के तहत छँटनी का मतलब है किसी कामगार की सेवा ख़त्म करना, बशर्ते वजह अनुशासनात्मक कार्रवाई, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति, उम्र पूरी होने पर सेवानिवृत्ति, लगातार ख़राब सेहत, या ठेके का नवीनीकरण न होना न हो।

धारा 25F वैध छँटनी के लिए तीन शर्तें रखती है: एक महीने का लिखित नोटिस या उसके बदले मज़दूरी, लगातार सेवा के हर पूरे साल के लिए पंद्रह दिन का औसत वेतन छँटनी मुआवज़े के तौर पर, और छँटनी के नोटिस की एक प्रति उचित सरकार को।

धारा 25G छँटनी का क्रम तय करती है: जो कामगार सबसे बाद में आया, वह सबसे पहले जाएगा, और इससे हटना हो तो वजह लिखकर देनी होगी। धारा 25H छँटनी झेल चुके कामगारों को दोबारा काम पर रखे जाने में पहला हक़ देती है, अगर मालिक बाद में फिर से कामगार रखने की सोचे।

स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया बनाम एन. सुंदर मनी (1976) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि तय अवधि के ठेके का नवीनीकरण न होना भी छँटनी ही है, जब तक साफ़ शब्दों में इसे बाहर न रखा गया हो। बाद में 1984 के संशोधन ने धारा 2(oo)(bb) में ठेके के नवीनीकरण वाला अपवाद जोड़कर इस स्थिति को कुछ हद तक पलट दिया।

बंदी: धारा 25-O और सरकार की इजाज़त

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 से औद्योगिक संबंध संहिता 2020 तक की समयरेखा

धारा 2(cc) के तहत बंदी का मतलब है काम की जगह को या उसके किसी हिस्से को हमेशा के लिए बंद कर देना। 1976 के संशोधन से जुड़ी धारा 25-O कहती है कि जिस औद्योगिक इकाई में 100 या उससे ज़्यादा कामगार हों, उसका मालिक बंद करने से पहले सरकार से इजाज़त लेगा और 90 दिन का नोटिस देगा।

सुप्रीम कोर्ट ने एक्सेल वेयर बनाम भारत संघ (1978) में मूल धारा 25-O को अनुच्छेद 19(1)(g) के मौलिक अधिकार पर ग़ैर-वाजिब रोक मानकर रद्द कर दिया, और उसके बाद यह प्रावधान नए सिरे से लिखा गया। अगर इकाई तय सीमा से बड़ी है और बिना इजाज़त बंद कर दी जाती है, तो वह बंदी ग़ैर-क़ानूनी है और कामगार सेवा में बने हुए माने जाते हैं।

औद्योगिक संबंध संहिता 2020 बंदी के लिए इजाज़त वाली व्यवस्था बनाए रखती है, लेकिन सीमा 100 से बढ़ाकर 300 कामगार कर देती है। इसी बदलाव की सबसे ज़्यादा आलोचना हुई है।

इस क़ानून के बड़े अदालती फ़ैसले

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 पर आए फ़ैसले कई खंडों में भरे पड़े हैं, और इनमें से कई फ़ैसलों की संवैधानिक पृष्ठभूमि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20 और मौलिक अधिकारों के बड़े ढाँचे से जुड़ती है। पाँच फ़ैसले पूरी अवधारणा को ढक लेते हैं।

बैंगलोर वाटर सप्लाई बनाम ए. राजप्पा (1978)। सात जजों की पीठ ने धारा 2(j) में “उद्योग” की परिभाषा दोबारा गढ़ी और उसमें मालिक और कर्मचारी के आपसी सहयोग से चलने वाली लगभग हर व्यवस्थित गतिविधि को शामिल कर लिया, जो सामान या सेवाएँ बनाती या बाँटती हो। व्यवस्थित गतिविधि, सहयोग, और सामान या सेवा का उत्पादन — यह तिहरी कसौटी आज भी उद्धृत होती है, हालाँकि विधायिका ने इसके कुछ हिस्सों को पलटने की कोशिश की है।

वर्कमेन ऑफ़ डिमाकुची टी एस्टेट बनाम मैनेजमेंट (1958)। इसने तय किया कि कोई विवाद औद्योगिक विवाद कब कहलाएगा, और इसके लिए पक्षों का सीधा और ठोस हित होना ज़रूरी बताया।

एक्सेल वेयर बनाम भारत संघ (1978)। इसने माना कि कारोबार बंद करने का हक़ अनुच्छेद 19(1)(g) का हिस्सा है और बंदी पर ग़ैर-वाजिब रोक मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

पंजाब नेशनल बैंक बनाम ऑल इंडिया PNB एम्प्लॉइज़ फ़ेडरेशन (1960)। इसने तय किया कि ग़ैर-क़ानूनी हड़ताल में शामिल होना कदाचार है, लेकिन सज़ा ग़लती के अनुपात में होनी चाहिए।

स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया बनाम नेशनल यूनियन वॉटरफ़्रंट वर्कर्स (2001)। इसने साफ़ किया कि ठेका मज़दूरी की प्रथा ख़त्म कर देने भर से ठेके के मज़दूर अपने आप सीधे कर्मचारी नहीं बन जाते।

अनुचित श्रम व्यवहार और पाँचवीं अनुसूची

1982 में जोड़ी गई पाँचवीं अनुसूची मालिकों और कामगारों, दोनों के लिए अनुचित श्रम व्यवहार गिनाती है। मालिक की तरफ़ से यूनियन के कामकाज में दख़ल देना, पदाधिकारियों को निशाना बनाना, ईमानदारी से सामूहिक सौदेबाज़ी से इनकार करना, और क़ानून से बचने के लिए ठेके पर मज़दूर लगाना इसमें आते हैं। कामगारों की तरफ़ से दबाव डालने वाली हरकतें, घेराव, जान-बूझकर काम धीमा करना, और ईमानदारी से सौदेबाज़ी से इनकार करना इसमें आते हैं।

सूची में दर्ज कोई भी अनुचित श्रम व्यवहार करना धारा 25U के तहत सज़ा वाला अपराध है, जिसमें छह महीने तक की क़ैद या एक हज़ार रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। औद्योगिक संबंध संहिता 2020 यह सूची और सज़ा का ढाँचा, दोनों बनाए रखती है।

औद्योगिक संबंध संहिता 2020 तक का सफ़र

औद्योगिक संबंध संहिता 2020 ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926, औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम 1946 और औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 को मिलाकर चौदह अध्यायों और 104 धाराओं की एक ही संहिता बना देती है। यह संहिता 21 नवंबर 2025 को लागू हुई। इस सुधार का बड़ा आर्थिक संदर्भ, जिसमें भारत का राजकोषीय घाटा और उत्पादकता बढ़ाने की कोशिश शामिल हैं, मेन्स के आम ढाँचे का हिस्सा है।

संहिता ने 1947 के क़ानून में जो बड़े बदलाव किए, वे पाँच जगहों पर दिखते हैं। ले-ऑफ़, छँटनी और बंदी के लिए सरकार से पहले इजाज़त लेने की सीमा 100 से बढ़कर 300 कामगार हो गई है। तय अवधि के रोज़गार को औपचारिक मान्यता मिल गई है और संहिता ऐसे कामगारों को स्थायी कामगारों जैसे ही क़ानूनी लाभ अनुपात के हिसाब से देती है। हड़ताल के नोटिस की जो शर्त पहले सिर्फ़ जन उपयोगिता सेवाओं पर थी, वह अब हर औद्योगिक इकाई पर लागू है, जिसमें 60 दिन की खिड़की के भीतर 14 दिन का नोटिस देना होता है। दोबारा हुनर सिखाने के लिए एक री-स्किलिंग फ़ंड बनाया गया है, जिसमें मालिक हर छँटनी किए गए कामगार के 15 दिन की मज़दूरी के बराबर पैसा देगा। श्रम न्यायालय अलग सीढ़ी के तौर पर ख़त्म कर दिया गया है और उसे एक ही औद्योगिक अधिकरण में मिला दिया गया है, जो पहले श्रम न्यायालय और औद्योगिक अधिकरण के बीच बँटे सारे मामले सुनेगा।

सुलह अधिकारी, सुलह बोर्ड, जाँच न्यायालय, राष्ट्रीय अधिकरण और कार्य समिति संहिता में लगभग उसी शक्ल में बचे हुए हैं। हड़ताल, तालाबंदी, ले-ऑफ़, छँटनी और बंदी की परिभाषाएँ भी छोटे-मोटे भाषाई सुधार के साथ आगे ले ली गई हैं।

UPSC के लिहाज़ से इस क़ानून के पहलू

प्रीलिम्स में इस क़ानून पर कार्य समिति की बनावट, क़ानून के तहत बने मंचों की संख्या, छँटनी मुआवज़े की सीमा, और श्रम न्यायालय व औद्योगिक अधिकरण के बीच दूसरी बनाम तीसरी अनुसूची के बँटवारे पर सवाल आ चुके हैं। UPSC ने इस क़ानून को भारत के बेरोज़गारी आँकड़ों जैसे बड़े आर्थिक संकेतकों के साथ मिलान वाले सवालों में भी जोड़ा है।

मेन्स GS-II में यह क़ानून और इसकी उत्तराधिकारी संहिता कल्याणकारी राज्य की ज़िम्मेदारी, अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत बंदी पर रोक की संवैधानिकता, संगठन बनाने की आज़ादी और सामूहिक सौदेबाज़ी पर ILO संधियों से तुलना, और उस संसदीय प्रक्रिया के नज़रिए से पूछे जाते हैं जिससे तीनों संहिताएँ राज्यसभा और लोकसभा से होकर क़ानून बनीं। GS-III में उत्पादकता का तर्क, 2020 से पहले के श्रम क़ानून पर कारोबार में आसानी वाली आलोचना, और वह गिग और प्लेटफ़ॉर्म अर्थव्यवस्था आती है जो औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के दायरे में आती ही नहीं थी। एक मानक उत्तर 1947 के क़ानून के संरक्षण वाले ढाँचे को 2020 की संहिता के लचीलेपन वाले झुकाव के सामने रखता है, और पूछता है कि बंदी की इजाज़त के लिए 300 कामगार की नई सीमा सही संतुलन बिठाती है या नहीं।

समाजशास्त्र वैकल्पिक में सवाल श्रम को वर्ग संघर्ष की जगह मानकर चलते हैं, जहाँ औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 को पूँजी और संगठित मज़दूरी के बीच तालमेल बिठाने वाले राज्य के औज़ार की तरह पढ़ा जाता है।

सामान्य प्रश्न

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 क्या है?

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 एक केंद्रीय क़ानून है, जो भारत में औद्योगिक विवादों की जाँच और निपटारे का तंत्र खड़ा करता है और हड़ताल, तालाबंदी, ले-ऑफ़, छँटनी और बंदी को परिभाषित करता है। यह 1 अप्रैल 1947 से लागू हुआ था और 21 नवंबर 2025 से औद्योगिक संबंध संहिता 2020 में समा चुका है।

यह क़ानून कौन-कौन से मंच बनाता है?

यह क़ानून सात मंच बनाता है: कार्य समिति, सुलह अधिकारी, सुलह बोर्ड, जाँच न्यायालय, श्रम न्यायालय, औद्योगिक अधिकरण और राष्ट्रीय अधिकरण। विवाद निपटने के अलग-अलग पड़ाव पर हर एक का अपना तय काम है।

इस क़ानून में ले-ऑफ़ और छँटनी में क्या फ़र्क़ है?

ले-ऑफ़ का मतलब है तय वजहों से कुछ समय के लिए काम न दे पाना, जिसमें कामगार रजिस्टर पर बना रहता है और उसे 50 प्रतिशत मुआवज़ा मिलता है। छँटनी का मतलब है अनुशासनात्मक कार्रवाई के अलावा किसी भी वजह से सेवा ख़त्म करना, जिसमें एक महीने का नोटिस और हर पूरे साल के लिए 15 दिन का वेतन मुआवज़े के तौर पर देना होता है।

औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 25F क्या कहती है?

धारा 25F वैध छँटनी के लिए तीन शर्तें रखती है: एक महीने का लिखित नोटिस या उसके बदले मज़दूरी, हर पूरे साल के लिए पंद्रह दिन का औसत वेतन छँटनी मुआवज़े के तौर पर, और उचित सरकार को नोटिस। इनमें से कोई शर्त न मानी जाए तो छँटनी रद्द मानी जाती है।

औद्योगिक संबंध संहिता 2020 ने इस क़ानून में क्या बदला?

संहिता 1947 के क़ानून समेत तीन श्रम क़ानूनों को एक जगह लाती है, बंदी की इजाज़त वाली सीमा 100 से बढ़ाकर 300 कामगार करती है, तय अवधि के रोज़गार को औपचारिक मान्यता देती है, हड़ताल का नोटिस हर उद्योग पर लागू करती है, एक री-स्किलिंग फ़ंड बनाती है, और श्रम न्यायालय व औद्योगिक अधिकरण को मिलाकर एक ही औद्योगिक अधिकरण बना देती है।

क्या भारत में हड़ताल करना मौलिक अधिकार है?

नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने टी.के. रंगराजन बनाम तमिलनाडु सरकार (2003) में कहा था कि सरकारी कर्मचारियों को हड़ताल का न मौलिक अधिकार है, न क़ानूनी, न नैतिक। बाक़ी कामगारों के लिए यह हक़ क़ानून से मिलता है, पहले औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 से और अब औद्योगिक संबंध संहिता 2020 से। इस पर नोटिस और सुलह की शर्तें लागू रहती हैं।

इस क़ानून में जन उपयोगिता सेवा किसे कहते हैं?

धारा 2(n) में रेलवे, डाक, तार, टेलीफ़ोन, बिजली, रोशनी या पानी देने वाले उद्योग, सार्वजनिक सफ़ाई और स्वच्छता, और पहली अनुसूची में गिनाया गया कोई भी उद्योग शामिल है। इन सेवाओं में हड़ताल और तालाबंदी के लिए धारा 22 के तहत छह हफ़्ते का नोटिस देना ज़रूरी है।

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

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