घृणा भाषण (Hate Speech) लोकतंत्र, सामाजिक सद्भाव और संवैधानिक मूल्यों के लिए एक गंभीर चुनौती है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, जहाँ जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र आधारित पहचान गहरी है, घृणा भाषण की रोकथाम और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
घृणा भाषण की परिभाषा
घृणा भाषण वह वाणी या लेखन है जो किसी व्यक्ति या समूह के विरुद्ध उनकी जाति, धर्म, लिंग, राष्ट्रीयता या यौन अभिमुखता के आधार पर घृणा, हिंसा या भेदभाव को प्रोत्साहित करे।
संवैधानिक ढाँचा
भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। परंतु अनुच्छेद 19(2) इस पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है — भारत की संप्रभुता, सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता, नैतिकता और न्यायालय की अवमानना के आधार पर।
प्रमुख कानूनी प्रावधान
- IPC धारा 153A: धर्म, जाति, भाषा आदि के आधार पर वैमनस्य फैलाना।
- IPC धारा 153B: राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकर कार्य।
- IPC धारा 295A: धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुँचाना। IPC धारा 505: सार्वजनिक रिश्वतखोरी के लिए उत्तेजक कथन।
- IT Act धारा 66A: 2015 में श्रेया सिंघल मामले में असंवैधानिक घोषित।
- BNS (भारतीय न्याय संहिता) 2023 में भी संबंधित प्रावधान।
प्रमुख न्यायिक निर्णय
- श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015): IT Act धारा 66A असंवैधानिक।
- तहसीन पूनावाला मामला (2018): मॉब लिंचिंग पर सख्त दिशानिर्देश।
- Pravasi Bhalai Sangathan बनाम UOI (2014): घृणा भाषण पर कड़े कानून की माँग।
सुधार की आवश्यकता
- घृणा भाषण की स्पष्ट परिभाषा — वर्तमान कानूनों में अस्पष्टता।
- ऑनलाइन घृणा भाषण के लिए विशेष तंत्र।
- विधि आयोग रिपोर्ट 267 (2017): IPC में नई धाराएँ जोड़ने की सिफारिश।
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही।
यूपीएससी के लिए महत्त्वपूर्ण बिंदु
- अनुच्छेद 19(1)(a) + 19(2): स्वतंत्रता और प्रतिबंध का संतुलन।
- IPC 153A, 153B, 295A: प्रमुख धाराएँ।
- श्रेया सिंघल 2015: 66A असंवैधानिक।
- विधि आयोग 267: घृणा भाषण पर सुझाव।
- BNS 2023: IPC का प्रतिस्थापन।
सामान्य प्रश्न
घृणा भाषण पर भारत में कौन-से प्रमुख कानून हैं?
IPC धारा 153A (वैमनस्य फैलाना), 153B, 295A और 505 प्रमुख कानून हैं। IT Act 66A को 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक घोषित किया।
श्रेया सिंघल मामले का क्या महत्त्व है?
श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने IT Act की धारा 66A को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध बताते हुए असंवैधानिक घोषित किया।