UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

भारत में कृषि जिंसों की माँग और आपूर्ति (यूपीएससी अर्थव्यवस्था)

भारत में कृषि जिंसों की माँग-आपूर्ति 2025: फ़सल प्रतिरूप, MSP, निर्यात माँग, बजट 2025-26 और यूपीएससी के लिए तैयार विश्लेषण।

Supply and Demand of Agricultural Commodities in India (UPSC Economy) — UPSC featured image

भारत में कृषि जिंसों के बाज़ार आपूर्ति-पक्ष की वास्तविकताओं (मिट्टी, जलवायु, तकनीक, खेतों का विखंडन) और माँग-पक्ष की शक्तियों (आय-वृद्धि, आहार-परिवर्तन, निर्यात, खरीद नीति) के बीच खींचतान से आकार लेते हैं। जब कोई भी पक्ष बहुत तेज़ी से बदलता है — मॉनसून की विफलता, MSP में परिवर्तन, निर्यात प्रतिबंध, उपभोक्ता की पसंद का स्थानांतरण — तब महँगाई उछलती है, किसानों की आय गिरती है और नीति आनन-फानन में प्रतिक्रिया करती है। कृषि माँग-आपूर्ति के निर्धारकों को समझना यूपीएससी के GS पेपर III — फ़सल प्रतिरूप, खाद्य मुद्रास्फीति, MSP और कृषि क्षेत्र के सुधार — के लिए आधारभूत है।

समस्या की रूपरेखा

भारतीय कृषि की तीन परिभाषक विशेषताएँ माँग-आपूर्ति की गतिकी को जटिल बनाए रखती हैं:

  • छोटी और सीमांत जोतें: 86% से अधिक जोतें 2 हेक्टेयर से छोटी हैं, जिससे पैमाने की मितव्ययिताएँ सीमित हो जाती हैं।
  • वर्षा पर निर्भरता: शुद्ध बोया गया लगभग 55% क्षेत्र वर्षा-आधारित है, जिससे आपूर्ति मॉनसून के प्रति संवेदनशील रहती है।
  • मुख्य खाद्यान्नों की क़ीमत-अप्रत्यास्थ माँग: चावल, गेहूँ, दालों और खाद्य तेलों की अल्पकालीन माँग क़ीमत के साथ शायद ही बदलती है, जिससे आपूर्ति घटने पर मुद्रास्फीति और अधिक बढ़ जाती है।

कृषि जिंसों की माँग को आकार देने वाले कारक

आय-आधारित आहार परिवर्तन

प्रति व्यक्ति आय बढ़ने के साथ आहार अनाजों से हटकर प्रोटीन, फलों और सब्ज़ियों की ओर जाता है (बेनेट नियम — Bennett’s Law)। भारत में:

  • प्रति व्यक्ति चावल और गेहूँ की खपत स्थिर हो गई है।
  • दालों, अंडों, दूध, मछली और माँस की माँग तेज़ी से बढ़ी है।
  • ताज़ा फल-सब्ज़ियों की माँग 5–6% प्रति वर्ष की दर से बढ़ रही है।

इसने फ़सल प्रतिरूप को बागवानी (horticulture) की ओर धकेला है — भारत अब फल-सब्ज़ियों का विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।

मोटे अनाज (मिलेट) का प्रतिस्थापन

PDS पर सब्सिडीकृत चावल-गेहूँ ने पारंपरिक मोटे अनाजों को विस्थापित कर दिया, जिससे दशकों तक मिलेट का क्षेत्र घटा। अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष 2023 और श्री अन्न योजना इस प्रवृत्ति को आंशिक रूप से पलट रही हैं — ओडिशा, कर्नाटक और महाराष्ट्र मिलेट के रक़बे का विस्तार कर रहे हैं।

जैविक और प्रीमियम खंड

जैविक खेती का शुद्ध क्षेत्र 2016 के 0.9% से बढ़कर 2023 में लगभग 4% हो गया। शहरी उपभोक्ता प्रमाणित जैविक फल-सब्ज़ियों की माँग बढ़ा रहे हैं, यद्यपि क़ीमत-प्रीमियम बड़े पैमाने पर अपनाने को सीमित करती है।

निर्यात माँग

1991 के सुधारों के बाद, निर्यात अवसरों के सहारे वाणिज्यिक फ़सलों का क्षेत्र बढ़ा। सकल फ़सली क्षेत्र में खाद्यान्न का हिस्सा तीन दशकों में 11% गिर गया — उसकी जगह तिलहन, फल-सब्ज़ियाँ और ग़ैर-खाद्य फ़सलों ने ली। बासमती चावल, समुद्री उत्पाद और मसाले अब अग्रणी कृषि-निर्यात हैं।

प्रसंस्करण माँग

खाद्य प्रसंस्करण — जमी हुई सब्ज़ियाँ, तत्काल उपभोग योग्य भोजन, ब्रांडेड डेयरी — के उदय ने मानकीकृत, श्रेणीबद्ध कच्चे माल की व्युत्पन्न (derived) माँग पैदा की है।

कृषि जिंसों की आपूर्ति को आकार देने वाले कारक

MSP और खरीद

चावल-गेहूँ की खुली-अंत (open-ended) MSP खरीद ने पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को भूजल के दोहन के बावजूद धान-गेहूँ की एक-फसली खेती में बाँध दिया है। 2025 का “दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन” तुअर, उड़द और मसूर के लिए आश्वस्त खरीद का विस्तार करके इसे सुधारने का प्रयास करता है।

इनपुट सब्सिडी

उर्वरक सब्सिडी (विशेषकर यूरिया) फ़सल चुनाव को नाइट्रोजन-प्रतिक्रियाशील फ़सलों — धान और गन्ने — की ओर झुकाती है और दलहन तथा मोटे अनाज को हतोत्साहित करती है। 2024 का उर्वरक सब्सिडी बिल ₹1.75 लाख करोड़ तक पहुँच गया।

गन्ना FRP

उचित और लाभकारी मूल्य (FRP) के साथ राज्य-परामर्शी मूल्यों (SAP) ने 1990-91 से 2020-21 के बीच गन्ने के क्षेत्र को लगभग दोगुना कर दिया, जिससे महाराष्ट्र और कर्नाटक में जल-संकट बढ़ा।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग और नई विपणन व्यवस्थाएँ

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग — पंजाब में चिकोरी, आंध्र प्रदेश में ककड़ी (gherkins), गुजरात में प्रसंस्करणकर्ताओं के लिए आलू — फ़सल-विविधीकरण करती है। निरस्त 2020 कृषि अधिनियमों ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर संस्थागत बनाने का प्रयास किया था; 2025 में नई सहमति के तहत पुनरुत्थान पर बहस जारी है।

जलवायु परिवर्तन

अनियमित मॉनसून, लू (heat waves) और बेमौसम वर्षा से उपज अत्यधिक अस्थिर हो गई है। मार्च 2022 की लू से गेहूँ की उपज गिरी; अक्टूबर 2023 की बेमौसम बारिश ने तुअर को नुक़सान पहुँचाया।

तकनीक और बीज

उच्च उत्पादकता वाली क़िस्में (HYV), जीएम फ़सलें (कपास और सरसों पर विवादित), परिशुद्ध सिंचाई और खेत-मशीनीकरण उत्पादकता बढ़ाते हैं। बीज प्रतिस्थापन दर (SRR) कम बनी हुई है — गेहूँ के लिए लगभग 35% और अधिकांश तिलहनों के लिए 30% से नीचे — जिससे लाभ सीमित हो जाते हैं।

नवीनतम घटनाक्रम (2024–26)

बजट 2025-26:

  • NAFED और NCCF द्वारा तुअर, उड़द और मसूर की असीमित MSP खरीद के साथ छह-वर्षीय “दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन”।
  • उच्च उत्पादकता वाले बीजों पर राष्ट्रीय मिशन।
  • कपास क्षेत्र के पुनरुद्धार हेतु कपास उत्पादकता मिशन।
  • बिहार में मखाना बोर्ड; PM धन-धान्य कृषि योजना के तहत यूरिया उत्पादन को बढ़ावा।
  • बागवानी की आपूर्ति स्थिर करने हेतु फल-सब्ज़ियों पर राष्ट्रीय मिशन।

PLI: प्रसंस्कृत खाद्य — तत्काल उपभोग योग्य भोजन, समुद्री उत्पाद और फल-सब्ज़ियों — की माँग-पक्षीय खिंचाव को लगातार मज़बूत कर रहा है।

GST परिषद: 2024 के युक्तिकरण निर्णयों ने मिलेट के आटे पर GST को 0–5% किया और ताज़े फल-सब्ज़ियों को छूट प्राप्त रखा, जिससे कर आहार-परिवर्तनों के अनुरूप हुआ।

16वाँ वित्त आयोग: संदर्भ-शर्तों के प्रारूप जलवायु-सहिष्णु कृषि और जल-उपयोग दक्षता पर बल देते हैं; वर्षा-आधारित खेती हेतु सम्बद्ध अनुदान (tied grants) संभावित हैं।

MPI 2024: NITI Aayog के अनुसार पोषण-संबंधी अभाव आधा हो गया है, परंतु आहार-विविधता असंतुलित बनी हुई है — यह दलहन, मिलेट और बागवानी को आपूर्ति-पक्षीय समर्थन देने का तर्क देता है।

निर्यात नीति की अस्थिरता: 2023 में ग़ैर-बासमती चावल पर निर्यात प्रतिबंध और प्याज़ पर 40% शुल्क (2024 में शिथिल) दर्शाते हैं कि आपूर्ति-झटके किस प्रकार तत्काल निर्यात प्रतिबंधों को जन्म देते हैं।

माँग-आपूर्ति का असंतुलन: महँगाई और किसान आय

जब आपूर्ति माँग से पीछे रह जाती है, तो खुदरा महँगाई उछलती है — हाल के वर्षों में टमाटर, प्याज़ और तुअर दाल में 30–80% तक की क़ीमत-वृद्धि देखी गई है। इसके विपरीत, बंपर फ़सल क़ीमतों को गिरा देती है और संकट-विक्रय को मजबूर करती है। दोनों ही परिणाम किसानों और उपभोक्ताओं को चोट पहुँचाते हैं, इसलिए नीति को चाहिए कि:

  • क़ीमतों को स्थिर करे — बफ़र स्टॉक (NAFED, FCI), मूल्य स्थिरीकरण कोष (PSF) और समायोजित आयात-निर्यात नीति के माध्यम से।
  • फ़सल विविधीकरण — जल-बहु-उपभोगी धान-गेहूँ से हटकर दलहन, मिलेट, तिलहन और बागवानी की ओर।
  • शीत-शृंखला (cold chain) में निवेश — नाशवान वस्तुओं की आपूर्ति को संतुलित करने हेतु; कृषि-अवसंरचना निधि (Agri-Infrastructure Fund) से कुछ हद तक पूर्ति हुई है।
  • मूल्य अन्वेषण सक्षम करे — e-NAM, एकीकृत राष्ट्रीय बाज़ारों और वायदा कारोबार (वर्तमान में प्रतिबंधित) के माध्यम से।

यूपीएससी प्रासंगिकता

  • GS III (कृषि): फ़सल प्रतिरूप, MSP, खरीद, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, e-NAM, खाद्य प्रसंस्करण में PLI।
  • GS III (अर्थव्यवस्था): मुद्रास्फीति प्रबंधन, व्यापार नीति, बजट की घोषणाएँ।
  • GS II (शासन): कृषि में सहकारी संघवाद; GST परिषद के निर्णय।
  • प्रीलिम्स बिंदु: बेनेट नियम (Bennett’s Law), एंगेल नियम (Engel’s Law), कॉबवेब प्रमेय, MSP फ़सलें, श्री अन्न योजना, NMEO-Oilseeds, दलहन में आत्मनिर्भरता।

संभावित प्रश्न: “भारत में कृषि जिंसों की माँग और आपूर्ति को आकार देने वाले कारकों का विश्लेषण कीजिए। बजट 2025-26 की पहलें निरंतर बने हुए असंतुलन को किस प्रकार सम्बोधित करती हैं?” (GS III, 250 शब्द)

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

Recognized as one of India’s best content marketers, Gaurav Tiwari is an SEO strategist, WordPress developer, and founder of Gatilab. He builds websites that load in under a second, creates content that ranks on Google’s first page, and develops WordPress plugins and tools used on thousands of live sites.

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