भारत में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का प्रश्न एक जटिल संवैधानिक, सामाजिक और नैतिक बहस है। 2023 में सर्वोच्च न्यायालय की पाँच-न्यायाधीशों की पीठ ने बहुमत से यह माना कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देना संसद का कार्य है, न्यायालय का नहीं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- IPC धारा 377 — 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने नवतेज जोहर बनाम भारत संघ में धारा 377 को आंशिक रूप से निरस्त कर सहमति से समलैंगिक संबंधों को अपराध से मुक्त किया।
- विशेष विवाह अधिनियम, 1954 — समलैंगिक जोड़ों ने इसके तहत विवाह की माँग की।
पक्ष में तर्क
- मौलिक अधिकार — अनुच्छेद 21 के तहत जीने का अधिकार और गरिमा।
- समानता — अनुच्छेद 14 के तहत विषमलैंगिक और समलैंगिक जोड़ों में भेदभाव।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता — अनुच्छेद 19।
- अंतर्राष्ट्रीय उदाहरण — 30 से अधिक देशों में समलैंगिक विवाह वैध।
- मनोवैज्ञानिक कल्याण — कानूनी मान्यता से मानसिक स्वास्थ्य में सुधार।
विपक्ष में तर्क
- धार्मिक और सामाजिक मानदंड — विवाह परंपरागत रूप से स्त्री-पुरुष के बीच।
- बच्चे का अधिकार — दो पिता या दो माताओं वाले परिवार में बच्चे की स्थिति।
- संसदीय अधिकार — इसे न्यायिक नहीं, विधायी निर्णय होना चाहिए।
- व्यापक सामाजिक सहमति की कमी।
सर्वोच्च न्यायालय का 2023 निर्णय
अक्टूबर 2023 में पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 3:2 के बहुमत से यह माना कि समलैंगिक विवाह को मान्यता देना संसद और राज्य विधानमंडलों का कार्यक्षेत्र है। न्यायालय ने समलैंगिक जोड़ों के मौलिक अधिकारों को स्वीकार किया किंतु विवाह का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं माना।
यूपीएससी प्रासंगिकता
GS II में यह विषय न्यायपालिका, मौलिक अधिकार और सामाजिक न्याय के प्रश्नों में महत्त्वपूर्ण है। GS IV में नैतिक दुविधा के रूप में भी पूछा जा सकता है।