भारत में समलैंगिक विवाह (Same-Sex Marriage) का प्रश्न अक्टूबर 2023 में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के बाद एक नए मोड़ पर आ गया। सुप्रियो @ सुप्रियो चक्रवर्ती बनाम भारत संघ में पाँच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इनकार किया, लेकिन साथ ही LGBTQ+ समुदाय के अधिकारों पर महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं।
सुप्रियो निर्णय (अक्टूबर 2023): मुख्य बिंदु
- 5-0 निर्णय: समलैंगिक विवाह को विवाह के मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती।
- विवाह एक सांविधानिक अधिकार नहीं है — यह कानून द्वारा बनाई गई संस्था है।
- विशेष विवाह अधिनियम (SMA), 1954 को समलैंगिक जोड़ों के लिए लागू करना संसद का काम है, न्यायालय का नहीं।
- LGBTQ+ व्यक्तियों को भेदभाव से सुरक्षा और सम्मान के साथ जीने का अधिकार है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
| निर्णय | महत्त्व |
|---|---|
| नाज फाउंडेशन बनाम NCT दिल्ली (2009) | दिल्ली HC ने IPC धारा 377 को असंवैधानिक माना |
| सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज फाउंडेशन (2013) | SC ने 2009 के निर्णय को पलटा |
| नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018) | SC ने सहमति वाले समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटाया |
| सुप्रियो बनाम भारत संघ (2023) | समलैंगिक विवाह को मान्यता देने से इनकार |
संवैधानिक प्रश्न
- क्या समलैंगिक जोड़ों को विवाह का मौलिक अधिकार है? — नहीं (5-0)।
- क्या SMA को अर्थ-विस्तार देकर लागू किया जा सकता है? — नहीं (न्यायालय का काम नहीं)।
- क्या LGBTQ+ जोड़ों को बच्चा गोद लेने का अधिकार है? — बहुमत ने नहीं कहा (3-2)।
अंतर्राष्ट्रीय तुलना
2023 तक 30 से अधिक देशों ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दी है — अमेरिका (2015), कनाडा (2005), फ्रांस (2013), ऑस्ट्रेलिया (2017)। एशिया में ताइवान (2019) और नेपाल (2023) ने भी ऐसा किया।
UPSC के लिए प्रासंगिकता
GS II में यह विषय मौलिक अधिकार, न्यायिक समीक्षा, LGBTQ+ अधिकार, भारतीय समाज और संवैधानिक नैतिकता के अंतर्गत प्रासंगिक है। सुप्रियो निर्णय न्यायपालिका और विधायिका के शक्ति-पृथक्करण का उत्कृष्ट उदाहरण है।