UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

भारतीय कृषि में कारक के रूप में भूमि (यूपीएससी अर्थव्यवस्था)

भारतीय कृषि में भूमि संबंधी मुद्दे — विखंडन, काश्तकारी सुधार, आदर्श कृषि भूमि पट्टा अधिनियम 2016, भू-अभिलेख डिजिटलीकरण, SVAMITVA और जीएस-III दृष्टि।

Land as a Factor of Agriculture in India (UPSC Economy) — UPSC featured image

उत्पादन के चार पारंपरिक कारकों — भूमि, श्रम, पूँजी और उद्यम — में से भूमि भारतीय कृषि की आधारशिला है। भूमि का स्वामित्व, पट्टे, अभिलेखन और लेन-देन का ढंग ही कृषि-उत्पादकता, काश्तकारों की सुरक्षा, ऋण-पहुँच और ग्रामीण गरीबी के परिणाम तय करता है। स्वतंत्रता के बाद भूमि-सुधारों की तीन लहरों के बावजूद, भारत आज भी विखंडित जोतों, अनौपचारिक काश्तकारी, कमज़ोर अभिलेखों और प्रतिबंधक पट्टा-कानूनों से जूझ रहा है। यह मार्गदर्शिका उस परिदृश्य और सुधार-एजेंडे को खोलती है।

कृषि भूमि की वर्तमान स्थिति

  • शुद्ध बोया गया क्षेत्र: कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 328 मिलियन हेक्टेयर (मि.हे.) में से लगभग 141 मि.हे.
  • प्रचालित जोतें: लगभग 14.6 करोड़ (कृषि जनगणना 2015-16 का प्रक्षेपण)।
  • औसत जोत का आकार: 2015-16 की कृषि जनगणना में घटकर 1.08 हेक्टेयर — जो 1970-71 में 2.28 हेक्टेयर था।
  • लघु और सीमांत किसान (2 हेक्टेयर से कम जोत): कुल किसानों का 86%, कृषि भूमि का लगभग 47% स्वामित्व।
  • बड़े किसान (10 हेक्टेयर से अधिक): कुल किसानों का 1% से भी कम, भूमि का लगभग 9%।
जोत-श्रेणीआकारकिसान-%क्षेत्र-%
सीमांत<1 हेक्टेयर~68%~24%
लघु1-2 हेक्टेयर~18%~24%
अर्ध-मध्यम2-4 हेक्टेयर~10%~24%
मध्यम4-10 हेक्टेयर~4%~20%
बड़ा>10 हेक्टेयर<1%~9%

स्पष्ट प्रारूप: उच्च विखंडन, जहाँ औसत जोत एक छोटे कस्बे के प्लॉट के बराबर है। इससे कई संरचनात्मक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं:

  • यांत्रिकीकरण के लिए न्यून पैमाना-अर्थव्यवस्था।
  • बाज़ार में कमज़ोर सौदेबाजी शक्ति।
  • ऋण पर उच्च निर्भरता।
  • अकुशल भू-उपयोग।

कृषि भूमि में काश्तकारी

काश्तकारी की अवधारणा

भूमि-पट्टा (Land Leasing) किसानों को अपनी कृषि भूमि दूसरे किसानों, भूमिहीन मज़दूरों, बटाईदारों या काश्तकारों को पट्टे पर देने की सुविधा देता है। सुव्यवस्थित रूप से अपनाए जाने पर यह कृषि-दक्षता, समता और गरीबी-उन्मूलन को बढ़ाता है — क्योंकि भूमि उसके हाथ पहुँचती है जो उसका सर्वोत्तम उपयोग कर सकता है।

भूमि सुधारों की पृष्ठभूमि

स्वतंत्रता के बाद भारत के भूमि-सुधारों के तीन प्रमुख लक्ष्य थे:

  • मध्यस्थों का उन्मूलन (ज़मींदार, जागीरदार, इनामदार)।
  • काश्तकारी का उन्मूलन या विनियमन
  • जोतों पर सीमाओं का आरोपण तथा अधिशेष भूमि का पुनर्वितरण

पहला और तीसरा उद्देश्य आंशिक रूप से सफल हुए; दूसरा — काश्तकारी का विनियमन — प्रायः उलटा परिणाम लाया।

काश्तकारी की वर्तमान स्थिति

  • अधिकांश राज्यों में कृषि भूमि का पट्टा कानूनी रूप से प्रतिबंधित या भारी नियमन में है
  • प्रतिबंधक धाराओं में शामिल हैं: पट्टे की निश्चित अवधि, किराए का विनियमन, समाप्ति की कठोर शर्तें और निश्चित वर्षों के बाद काश्तकार को स्वतः स्वामित्व प्रदान करना।
  • परिणाम: औपचारिक काश्तकारी लगभग लुप्त हो गई, अनौपचारिक मौखिक काश्तकारी फैल गई
  • NSS आँकड़े बताते हैं कि वास्तविक अनौपचारिक काश्तकारी प्रकाशित आँकड़ों से 3-4 गुना अधिक हो सकती है।

भूमि-पट्टे को वैध बनाने के पक्ष में तर्क

प्रतिबंधक कानून वृद्धि-विरोधी और निर्धन-विरोधी सिद्ध हुए हैं।

  • अनौपचारिक व मौखिक काश्तकारी — काश्तकार संस्थागत ऋण, फसल बीमा, MSP-खरीद और सब्सिडियों से वंचित रहते हैं। वे शोषण और असुरक्षा झेलते हैं।
  • निवेश का कोई प्रोत्साहन नहीं — मौखिक काश्तकार भूमि-सुधार, सिंचाई या मृदा-संरक्षण में निवेश नहीं करते।
  • व्यावसायिक गतिशीलता में बाधा — गैर-कृषि रोज़गार में रुचि रखने वाले भूस्वामी भूमि-अधिकार खोने के भय से कृषि में बंधे रहते हैं।
  • पड़त भूमि — कानूनी जोखिम से बचने के लिए अनेक भूस्वामी भूमि को पट्टे देने के बजाय पड़त छोड़ देते हैं। प्रतिबंध हटाने से भू-उपयोग और कृषि-उत्पादन दोनों बढ़ेंगे।
  • उच्च समता — वैध पट्टे से भूमिहीन वर्ग भूमि तक पहुँच पाता है और आय सुधार सकता है।

नीति आयोग का कथन है: “पट्टा-कृषि आर्थिक आवश्यकता है, सामंतवाद का प्रतीक नहीं।” सशक्त पंचायती राज संस्थाओं के साथ अब काश्तकार राजनीतिक सामर्थ्य रखते हैं। औपचारिक काश्तकारी सौदेबाजी-शक्ति बढ़ाएगी, शोषण नहीं।

आदर्श कृषि भूमि पट्टा अधिनियम, 2016

नीति आयोग ने राज्यों के मार्गदर्शन के लिए आदर्श कृषि भूमि पट्टा अधिनियम, 2016 का प्रारूप तैयार किया। प्रमुख विशेषताएँ:

  • स्वामित्व खोने के भय के बिना कृषि भूमि-पट्टे को कानूनी मान्यता
  • पट्टा-अवधि की समाप्ति पर स्वामी को स्वतः अधिकार वापस
  • काश्तकारों को संस्थागत ऋण, बीमा, आपदा राहत तक पहुँच।
  • किराए, अवधि और शर्तों पर परस्पर सहमति से तय नियम
  • सरकार के पास अनिवार्य पंजीकरण नहीं; एक साधारण लिखित अनुबंध पर्याप्त।

अनेक राज्य — मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र — इसके रूपांतर अपना चुके हैं। किंतु व्यापक अंगीकरण अभी असमान है।

क्या किया जाना चाहिए?

  • प्रदर्शन-आधारित अनुदानों के माध्यम से राज्यों को आदर्श कृषि भूमि पट्टा अधिनियम, 2016 अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना।
  • भू-अभिलेखों का आधुनिकीकरण — डिजिटल, सत्यापित और स्थानिक रूप से सटीक अभिलेख पट्टे के जोखिम घटाते हैं। DILRMP (डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइज़ेशन प्रोग्राम) इसका मुख्य वाहक है।
  • काश्तकार किसानों को किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) में संगठित कर 10,000 FPO योजना के अंतर्गत अनुबंध कृषि को प्रोत्साहन।
  • योजनाओं के लाभ काश्तकारों तक पहुँचाना — वर्तमान में काश्तकार PM-KISAN, फसल बीमा, KCC से बाहर हैं। राज्य-स्तर पर काश्तकारों का डिजिटल डेटाबेस उन्हें सम्मिलित करने में सहायक होगा।
  • ग्राम-स्तर पर भूमि बैंक — विखंडित पार्सलों को उत्पादक पट्टे हेतु एकत्र करना, स्पष्ट स्वामित्व अभिलेखों के साथ।
  • SVAMITVA योजना — ग्रामीण आबादी क्षेत्रों का सर्वेक्षण, सम्पत्ति कार्ड जारी; 2024 तक 2 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को सम्पत्ति कार्ड।

सम्बद्ध कार्यक्रम और योजनाएँ

योजना/कानूनउद्देश्य
DILRMPभू-अभिलेखों का डिजिटलीकरण व आधुनिकीकरण
SVAMITVAआबादी क्षेत्रों के लिए सम्पत्ति कार्ड
आदर्श कृषि भूमि पट्टा अधिनियम, 2016कृषि भूमि-पट्टे के लिए कानूनी ढाँचा
वन अधिकार अधिनियम, 2006वनवासी समुदायों के वन-भूमि अधिकारों की पहचान
भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 (RFCTLARR)सहमति, SIA और R&R — अनिवार्य अधिग्रहण हेतु
PM किसान सम्मान निधिभूस्वामी किसानों को 6,000 रुपये प्रतिवर्ष (काश्तकार बाहर)

नवीनतम घटनाक्रम (2024-26)

  • SVAMITVA योजना — 2025 तक 3.15 लाख गाँवों के 2.42 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को सम्पत्ति कार्ड; संपूर्णता लक्ष्य 2026।
  • DILRMP — भू-अभिलेखों का आधार व रजिस्ट्रेशन-अभिलेखों से एकीकरण प्रगति पर; भूमि पोर्टल (कर्नाटक), धरणी (तेलंगाना), भुलेख (ओडिशा/उ.प्र.) मॉडल अग्रणी।
  • डिजिटल इंडिया भूमि सम्मान — भू-अभिलेख डिजिटलीकरण में शीर्ष जिलों को वार्षिक पुरस्कार।
  • बजट 2025-26 ने राज्यों को दिए जाने वाले 1.5 लाख करोड़ रुपये के ब्याज-मुक्त पूँजीगत व्यय ऋणों से जुड़ा भूमि-डिजिटलीकरण और सुधार प्रोत्साहन घोषित किया।
  • PM-KISAN की 19वीं किस्त 2025 में जारी; काश्तकार किसानों को भी प्रत्यक्ष आय-समर्थन देने की बहस जारी।
  • FPO योजना — वित्त वर्ष 2027-28 तक के 10,000 के लक्ष्य के विरुद्ध 8,875+ FPOs पंजीकृत; आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश में काश्तकार-किसान FPOs ज़ोर पकड़ रहे हैं।
  • नीति आयोग का कार्य-पत्र (2024) कृषि भूमि-पट्टे पर — राज्यों से आदर्श अधिनियम अपनाने की आवश्यकता दोहराई।
  • कृषि जनगणना 2021-22 का क्षेत्र-कार्य प्रगति पर; परिणाम 2025-26 में प्रतीक्षित।

यूपीएससी प्रासंगिकता

जीएस-III मानचित्रण

  • कृषि — भूमि सुधार, काश्तकारी, फसल-प्रतिरूप।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था — कारक-बाज़ार, ग्रामीण ऋण, FPO-पारितंत्र।
  • समावेशी वृद्धि — काश्तकार किसान, भूमिहीन, समता।

जीएस-II मानचित्रण

  • अभिशासन — भू-अभिलेख डिजिटलीकरण, SVAMITVA, पंचायती राज।

प्रारंभिक परीक्षा के बिंदु

  • औसत जोत का आकार (2015-16 कृषि जनगणना): ~1.08 हेक्टेयर
  • लघु व सीमांत किसान — कुल किसानों का 86%; भूमि का लगभग 47%।
  • आदर्श कृषि भूमि पट्टा अधिनियम — प्रारूप नीति आयोग, 2016 द्वारा।
  • SVAMITVA — ग्रामीण आबादी क्षेत्रों का सर्वेक्षण; पंचायती राज मंत्रालय।
  • DILRMP — डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइज़ेशन प्रोग्राम।
  • RFCTLARR अधिनियम, 2013 — 1894 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम का प्रतिस्थापन।
  • FPO योजना — 10,000 FPO लक्ष्य; क्रियान्वयन MoA&FW, NABARD, SFAC, NCDC द्वारा।
  • PM-KISANभूस्वामी किसान परिवारों को 6,000 रुपये प्रतिवर्ष (काश्तकार बाहर)।

मुख्य परीक्षा के दृष्टिकोण

  • “भारतीय कृषि का आधुनिकीकरण काश्तकारी को वैध किए बिना संभव नहीं।” आदर्श अधिनियम के संदर्भ में चर्चा कीजिए।
  • “भू-अभिलेखों का डिजिटलीकरण केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, एक संरचनात्मक आर्थिक हस्तक्षेप है।” परीक्षण कीजिए।

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

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