भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India, WII) वन्यजीव विज्ञान में देश का सबसे बड़ा शोध और प्रशिक्षण संस्थान है। यह देहरादून, उत्तराखंड में है और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के तहत एक स्वायत्त संस्था के तौर पर काम करता है। 1982 में बनने के बाद से WII ने वन्यजीवों से जुड़ा क़रीब हर बड़ा नीतिगत फ़ैसला गढ़ा है — बाघ गिनने के तरीक़े से लेकर संरक्षित इलाक़ों की प्रबंधन योजनाओं और प्रजातियों को बचाने के कार्यक्रमों तक। UPSC के उम्मीदवारों के लिए WII वहाँ बैठता है जहाँ पर्यावरण, शासन और विज्ञान तीनों मिलते हैं।
स्थापना और संस्था की हैसियत

WII पारिस्थितिकी विकास पर बनी कार्यबल समिति (Task Force on Eco-Development) और भारतीय वन्यजीव बोर्ड की सिफ़ारिशों पर खड़ा किया गया। इसकी औपचारिक स्थापना 1982 में हुई और यह पूरी तरह 1986 में चलने लगा।
| बात | ब्योरा |
|---|---|
| स्थापना | 1982 (1986 से पूरी तरह चालू) |
| जगह | चंद्रबनी, देहरादून, उत्तराखंड |
| परिसर का क्षेत्रफल | 180 एकड़ |
| मूल मंत्रालय | पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) |
| हैसियत | स्वायत्त संस्थान |
| संचालक निकाय | अध्यक्षता MoEFCC के केंद्रीय मंत्री करते हैं |
| निदेशक | भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी |
स्वायत्त संस्था होने के नाते WII अपनी शोध प्राथमिकताएँ ख़ुद तय करता है, जबकि उसका बुनियादी ख़र्च MoEFCC से आता है। यह राज्यों के वन विभागों, अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संगठनों और शैक्षिक संस्थानों के साथ मिलकर काम करता है।
ज़िम्मेदारी और मुख्य काम
स्थापना के समय के दस्तावेज़ ने WII को चार बुनियादी भूमिकाएँ दी थीं। आज भी इसका सारा काम इन्हीं पर टिका है।
- प्रशिक्षण — वन विभागों, NGO और शिक्षा जगत में वन्यजीव प्रबंधन की क़ाबिलियत खड़ी करना
- शोध — भारत की वनस्पतियों, जीवों, पारिस्थितिक तंत्रों और संरक्षण के ख़तरों पर वैज्ञानिक जानकारी जुटाना
- सलाह — वन्यजीव नीति पर केंद्र और राज्य सरकारों को तकनीकी मदद देना
- शिक्षा — वन्यजीव विज्ञान में स्नातकोत्तर डिग्री और छोटे कोर्स चलाना
शुरुआत से अब तक WII 1,500 से ज़्यादा प्रशिक्षित वन्यजीव प्रबंधक तैयार कर चुका है, जिनमें से ज़्यादातर भारतीय वन सेवा में हैं।
पढ़ाई के कार्यक्रम

WII सिर्फ़ शोध संस्था नहीं, पढ़ाने वाला संस्थान भी है। इसके कार्यक्रमों को देश और दुनिया, दोनों जगह मान्यता मिली हुई है।
| कार्यक्रम | अवधि | किसके लिए |
|---|---|---|
| M.Sc. वन्यजीव विज्ञान | 2 साल | स्नातकों के लिए खुला (प्रवेश परीक्षा से) |
| Ph.D. वन्यजीव विज्ञान | 3+ साल | सौराष्ट्र विश्वविद्यालय से संबद्ध |
| उन्नत वन्यजीव प्रबंधन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा | 9 महीने | बीच के दर्जे के वन अधिकारी |
| वन्यजीव प्रबंधन में प्रमाणपत्र कोर्स | 3 महीने | राज्य के वन अधिकारी |
| छोटे कोर्स | 1–4 हफ़्ते | क़ानून लागू कराने वाला अमला, NGO कर्मी, छात्र |
M.Sc. का कार्यक्रम भारत में पर्यावरण विज्ञान के सबसे मुश्किल दाख़िलों में गिना जाता है। यहाँ से निकले छात्र वन विभागों, अंतरराष्ट्रीय NGO (WWF, WCS) और शोध संगठनों में काम करते हैं।
शोध के बड़े विभाग
WII का शोध विषय के हिसाब से और प्रजाति के हिसाब से बँटा है। मुख्य विभाग ये हैं:
- संकटग्रस्त प्रजाति प्रबंधन
- आवास पारिस्थितिकी
- वन्यजीव स्वास्थ्य
- भू-दृश्य स्तर की योजना
- आबादी प्रबंधन, पकड़ना और पुनर्वास
- संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क, वन्यजीव प्रबंधन और संरक्षण शिक्षा
- फ़ॉरेंसिक सेल — दक्षिण एशिया की पहली वन्यजीव फ़ॉरेंसिक प्रयोगशाला
फ़ॉरेंसिक सेल जाँच एजेंसियों की मदद करता है कि ज़ब्त किए गए वन्यजीव उत्पादों से प्रजाति पहचानी जा सके — बाघ के अंगों, हाथीदाँत, पैंगोलिन के शल्कों और सरीसृपों की खाल के अवैध कारोबार पर लगाम लगाने के लिए यह क़ाबिलियत बेहद ज़रूरी है।
सबसे बड़ा शोध — प्रोजेक्ट टाइगर की निगरानी
WII का सबसे दिखने वाला योगदान है अखिल भारतीय बाघ आकलन, जो हर चार साल में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) और राज्यों के वन विभागों के साथ मिलकर किया जाता है। गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने इसे दुनिया का सबसे बड़ा वन्यजीव सर्वेक्षण माना है।
| चक्र | अनुमानित बाघ | तरीक़ा |
|---|---|---|
| 2006 | 1,411 | कैमरा ट्रैप + ऑक्यूपेंसी |
| 2010 | 1,706 | बेहतर की गई दोहरी नमूना पद्धति |
| 2014 | 2,226 | ज़्यादा फैला कैमरा ट्रैपिंग |
| 2018 | 2,967 | व्यवस्थित ग्रिड आधारित सर्वेक्षण |
| 2022 | 3,682 (न्यूनतम) | अब तक की सबसे बड़ी कवायद |
M-STrIPES (Monitoring System for Tigers, Intensive Protection and Ecological Status) ऐप, जिसे बनाने में WII साझीदार रहा, मैदान के कर्मचारियों को गश्त, चिह्नों के सर्वे और अवैध घटनाओं का रिकॉर्ड उसी वक़्त दर्ज करने देता है। यह पूरे भारत में टाइगर रिज़र्व चलाने का मानक तरीक़ा बन चुका है।
संरक्षण के दूसरे बड़े कार्यक्रम
WII ज़मीन, मीठे पानी और समुद्री, तीनों तरह के पारिस्थितिक तंत्रों में लंबे चलने वाले कार्यक्रमों से जुड़ा है।
- राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) — नदी डॉल्फ़िन पर शोध और गंगा की जैव विविधता का आधार आँकड़ा
- प्रोजेक्ट एलिफ़ेंट — आबादी का अनुमान, गलियारों की मैपिंग, इंसान और हाथी के टकराव को कम करना
- प्रोजेक्ट स्नो लेपर्ड — पूरी हिमालयी पट्टी में आबादी का आकलन
- चीता की वापसी — नामीबिया और दक्षिण अफ़्रीका से कुनो राष्ट्रीय उद्यान में चीते लाने की परियोजना का वैज्ञानिक साझीदार
- गोडावण (Great Indian Bustard) की वापसी — राजस्थान के साम में प्रजनन केंद्र (राजस्थान वन विभाग के साथ)
- गंगा नदी डॉल्फ़िन का संरक्षण — प्रोजेक्ट डॉल्फ़िन के तहत आकलन
- राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड — संरक्षित इलाक़ों से गुज़रने वाली बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं पर तकनीकी राय
प्रकाशन और आँकड़े
WII ऐसे संदर्भ ग्रंथ और खुले डेटासेट निकालता है जो नीति और शोध, दोनों को दिशा देते हैं।
| प्रकाशन | कितनी बार | किस पर |
|---|---|---|
| ENVIS Bulletin on Wildlife and Protected Areas | सालाना | अलग-अलग विषय (जैसे गंगा डॉल्फ़िन, हाथी) |
| Status of Tigers, Co-predators and Prey | हर 4 साल में | राष्ट्रीय बाघ गणना |
| National Studbook | प्रजाति के हिसाब से | पिंजरे में पली आबादी की आनुवंशिकी |
| Journal of Wildlife Research | तिमाही | समीक्षित शोध |
| Protected Area Update | हर दो महीने | संरक्षित क्षेत्रों के शासन की ख़बरें |
ढाँचा और मैदानी नेटवर्क
WII के देहरादून परिसर में शोध प्रयोगशालाएँ, एक GIS सेल, रेडियो-टेलीमेट्री प्रयोगशाला, वन्यजीव स्वास्थ्य केंद्र, एक संग्रहालय और दक्षिण एशिया के सबसे बड़े वन्यजीव पुस्तकालयों में से एक है। संस्थान अहम पारिस्थितिक तंत्रों में मैदानी केंद्र भी चलाता है:
- वाल्मीकि टाइगर रिज़र्व (बिहार)
- काज़ीरंगा–कार्बी आंगलोंग (असम)
- गिर भू-दृश्य (गुजरात)
- सुंदरबन (पश्चिम बंगाल)
- ट्रांस-हिमालय मैदानी केंद्र (लद्दाख/हिमाचल)
साझेदारियाँ
WII बहुत से संगठनों के साथ काम करता है:
- अंतरराष्ट्रीय: IUCN, WWF, स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन, USFWS, CITES सचिवालय
- राष्ट्रीय: NTCA, CZA, ZSI, BSI, ICFRE, राज्यों के वन विभाग
- शैक्षिक: IIT, IISc, वाइल्डलाइफ़ कंज़र्वेशन सोसाइटी-इंडिया, नेचर कंज़र्वेशन फ़ाउंडेशन
वनस्पतियों को छोड़कर बाक़ी प्रजातियों के मामले में भारत का CITES वैज्ञानिक प्राधिकरण यही है — यानी WII का आकलन ही तय करता है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार संधि में भारत किसी प्रजाति का दर्जा बढ़ाने या घटाने की सिफ़ारिश करेगा या नहीं।
आलोचनाएँ और मुश्किलें
इतने क़द के बावजूद WII पर कुछ सवाल बार-बार उठते हैं।
- MoEFCC से नज़दीकी की धारणा सरकारी बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं की मंज़ूरी पर खुलकर आलोचना करना मुश्किल कर देती है
- संरक्षित इलाक़ों की परियोजनाओं के लिए WII के किए कुछ EIA आकलनों पर नागरिक समाज के वैज्ञानिकों ने सवाल उठाए हैं
- काम का दायरा बढ़ता गया है, पर पैसे की तंगी ने विस्तार धीमा कर रखा है
- शोधकर्ता और नियामकीय सलाहकार, इस दोहरी भूमिका से कभी-कभी हितों का टकराव पैदा होता है
ये बहसें ख़ुद UPSC के लिए अच्छी केस सामग्री हैं — स्वायत्तता, वैज्ञानिक शासन और पर्यावरण के फ़ैसलों की राजनीति पर।
UPSC में कहाँ काम आता है
WII पर्यावरण का बार-बार पूछा जाने वाला विषय है।
- प्रीलिम्स: स्थापना का साल (1982), मूल मंत्रालय (MoEFCC), जगह (देहरादून), स्वायत्त हैसियत, बड़े सर्वेक्षण (अखिल भारतीय बाघ आकलन, M-STrIPES)
- मुख्य परीक्षा GS पेपर III: जैव विविधता संरक्षण में भूमिका, चीता वापसी का वैज्ञानिक आधार, बाघ गिनने के तरीक़े का विकास, इंसान और वन्यजीव के टकराव पर शोध
- करेंट अफ़ेयर्स से जोड़: प्रोजेक्ट चीता (कुनो राष्ट्रीय उद्यान), 2022 की बाघ गणना के नतीजे, गोडावण का प्रजनन कार्यक्रम, गंगा डॉल्फ़िन और प्रोजेक्ट डॉल्फ़िन
- संस्थाओं का नक़्शा: NTCA (वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत वैधानिक संस्था), CZA, NBWL, ZSI, BSI से रिश्ता
- संरक्षण संधियाँ: CITES वैज्ञानिक प्राधिकरण के तौर पर WII की भूमिका, IUCN रेड लिस्ट में इनपुट
उम्मीदवारों को WII (शोध और प्रशिक्षण), NTCA (बाघों के लिए वैधानिक नियामक), MoEFCC (मंत्रालय) और राज्यों के वन विभाग (ज़मीन पर अमल) का फ़र्क़ साफ़ पता होना चाहिए — प्रीलिम्स में यहीं सबसे ज़्यादा गड़बड़ होती है।