Opens in a new tab
Join Anantam IAS Channel on Telegram

क्रिप्स मिशन — पृष्ठभूमि, प्रस्ताव और असफलता के कारण

क्रिप्स मिशन मार्च-अप्रैल 1942: स्टैफर्ड क्रिप्स, युद्धोपरांत अधिराज्य का दर्जा, INC और ML की अस्वीकृति, गांधी का 'post-dated cheque' कथन और भारत छोड़ो आंदोलन — संपूर्ण UPSC नोट्स।

क्रिप्स मिशन — पृष्ठभूमि, प्रस्ताव और असफलता के कारण — UPSC Hindi notes

क्रिप्स मिशन (Cripps Mission) द्वितीय विश्वयुद्ध के संकट-काल में ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत भेजा गया वह संवैधानिक प्रस्ताव-दल था जिसका नेतृत्व सर स्टैफर्ड क्रिप्स (Sir Stafford Cripps) ने किया। मिशन 22 मार्च 1942 को नई दिल्ली पहुँचा और 9 अप्रैल 1942 तक भारतीय राजनीतिक दलों से वार्ता करता रहा। PM विंस्टन चर्चिल (Winston Churchill) की अनिच्छा के बावजूद यह मिशन इसलिए भेजा गया क्योंकि जापान ने सिंगापुर (15 फरवरी 1942) और बर्मा (मार्च 1942) पर क़ब्ज़ा कर लिया था और US राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट (Franklin Roosevelt) तथा चीन के चियांग काई-शेक (Chiang Kai-shek) ने ब्रिटेन पर भारतीय सहयोग प्राप्त करने का दबाव डाला था। प्रस्ताव में युद्धोपरांत अधिराज्य का दर्जा (Dominion Status), संविधान सभा (Constituent Assembly) और प्रांतों को अलग होने का अधिकार शामिल था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress / INC), मुस्लिम लीग (Muslim League / ML) और लगभग सभी राजनीतिक धाराओं ने प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। महात्मा गांधी ने इसे “a post-dated cheque on a crashing bank” (डूबते बैंक का बासी चेक) कहा। मिशन की असफलता ने सीधे 8 अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) का मार्ग प्रशस्त किया।

परिचय (Introduction)

क्रिप्स मिशन — पृष्ठभूमि, प्रस्ताव और असफलता के कारण — चित्र 1

क्रिप्स मिशन भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के उस संधि-बिंदु पर खड़ा है जहाँ ब्रिटिश सरकार ने पहली बार स्पष्ट शब्दों में “भारत के लिए भारतीयों द्वारा रचित संविधान (an Indian-made Constitution)” की संभावना स्वीकार की। परंतु यह स्वीकार्यता इतनी देर से, इतनी शर्तों के साथ और इतने अव्यावहारिक स्वरूप में आई कि कोई भी पक्ष इसे स्वीकार करने योग्य नहीं मान सका।

UPSC के लिए यह विषय GS-I (आधुनिक भारतीय इतिहास) का अनिवार्य अंग है — यह भारत छोड़ो आंदोलन, कैबिनेट मिशन 1946 और अंततः 15 अगस्त 1947 की स्वतंत्रता तक की पूरी कथा का एक अनिवार्य कड़ी है।

मुख्य तथ्य एक नज़र में (Quick Facts at a Glance)

  • मिशन-प्रमुख: सर स्टैफर्ड क्रिप्स (Sir Stafford Cripps) — Lord Privy Seal, Leader of House of Commons, Labour Party
  • भारत आगमन: 22 मार्च 1942 (नई दिल्ली)
  • वार्ता-अंत: 9 अप्रैल 1942 (वार्ता विफल)
  • प्रेषक: ब्रिटिश युद्ध मंत्रिमंडल (War Cabinet), PM विंस्टन चर्चिल
  • भारतीय वायसराय (Viceroy): लॉर्ड लिनलिथगो (Lord Linlithgow, 1936-1943)
  • मुख्य प्रस्ताव: युद्धोपरांत अधिराज्य का दर्जा (Dominion Status); संविधान सभा (Constituent Assembly); प्रांतों को अलग होने का अधिकार
  • रक्षा (Defence): युद्ध-काल में ब्रिटिश हाथ में रहेगी
  • INC अध्यक्ष: मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (Maulana Abul Kalam Azad) — मुख्य वार्ताकार पंडित जवाहरलाल नेहरू
  • ML अध्यक्ष: मोहम्मद अली जिन्ना (Muhammad Ali Jinnah)
  • गांधी का कथन: “a post-dated cheque on a crashing bank”
  • परिणाम: सर्वसम्मत अस्वीकार → भारत छोड़ो आंदोलन (8 अगस्त 1942)

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background)

द्वितीय विश्वयुद्ध और भारत

1 सितंबर 1939 को जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण किया और 3 सितंबर को ब्रिटेन ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की। उसी दिन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने भारतीय निर्वाचित प्रतिनिधियों से परामर्श किए बिना भारत को युद्ध में सम्मिलित होने की घोषणा कर दी। यह घोषणा कांग्रेस के लिए असहनीय थी।

INC के 8 प्रांतीय मंत्रिमंडलों ने नवंबर 1939 में सामूहिक त्यागपत्र दे दिए। 1940 का अगस्त प्रस्ताव (August Offer) आया जिसने सीमित संवैधानिक रियायतें दीं, परंतु INC ने अस्वीकार किया।

जापान का प्रशांत-प्रवेश और ब्रिटेन पर दबाव

7 दिसंबर 1941 को जापान ने पर्ल हार्बर (Pearl Harbor) पर हमला किया और US युद्ध में आ गया। फिर तेज़ी से जापानी विजय-यात्रा —

  • 25 दिसंबर 1941: हाँगकाँग
  • 15 फरवरी 1942: सिंगापुर का पतन (ब्रिटिश साम्राज्य की सबसे बड़ी सैन्य हार)
  • 8 मार्च 1942: रंगून पर क़ब्ज़ा
  • मार्च 1942: पूरे बर्मा पर जापानी क़ब्ज़ा

जापानी सेना अब भारत की पूर्वी सीमा पर थी। इस संकट में ब्रिटेन को भारत का सहयोग चाहिए था। US राष्ट्रपति रूज़वेल्ट और चीन के चियांग काई-शेक ने (फ़रवरी 1942 की दिल्ली यात्रा में) चर्चिल पर सीधा दबाव डाला कि भारत को ठोस राजनीतिक रियायत दी जाए।

चर्चिल की अनिच्छा

PM विंस्टन चर्चिल भारत को स्वतंत्रता देने के घोर विरोधी थे — वे स्वयं को “Empire के अंतिम विक्टोरियन” कहते थे। 1942 में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था: “I have not become the King’s First Minister in order to preside over the liquidation of the British Empire।” परंतु US-चीन के दबाव में उन्हें कोई पहल करनी थी — और इसके लिए उन्होंने अपनी ही Labour Party सहयोगी और भारत-समर्थक माने जाने वाले स्टैफर्ड क्रिप्स को चुना।

स्टैफर्ड क्रिप्स कौन थे? (Who Was Stafford Cripps?)

क्रिप्स मिशन — पृष्ठभूमि, प्रस्ताव और असफलता के कारण — चित्र 2

सर रिचर्ड स्टैफर्ड क्रिप्स (Sir Richard Stafford Cripps, 1889-1952) ब्रिटिश Labour Party के वरिष्ठ नेता, बैरिस्टर और 1930 के दशक में सोवियत संघ में ब्रिटिश राजदूत रह चुके थे। 1942 में वे Lord Privy Seal और House of Commons के Leader थे — युद्ध-मंत्रिमंडल के सदस्य।

क्रिप्स की भारतीय नेताओं — विशेषकर नेहरू — से व्यक्तिगत मित्रता थी। 1939 में वे भारत यात्रा पर भी आए थे और कांग्रेस-नेताओं से मिले थे। यही व्यक्तिगत-समीकरण उन्हें मिशन के लिए उपयुक्त बनाता था — और साथ ही चर्चिल को निशाने पर रखने का राजनीतिक माध्यम भी।

क्रिप्स मिशन के मुख्य प्रस्ताव (Main Proposals of the Mission)

मिशन की तथाकथित घोषणा (Draft Declaration) में निम्नलिखित प्रमुख बिंदु थे —

1. अधिराज्य का दर्जा (Dominion Status)

युद्ध-समाप्ति के तुरंत बाद भारत को अधिराज्य का दर्जा (Dominion Status) दिया जाएगा — अर्थात कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड के समान आंतरिक स्वायत्तता और राष्ट्रकुल (Commonwealth) में स्थान।

2. संविधान सभा (Constituent Assembly)

भारत का संविधान भारतीयों द्वारा बनाई गई एक संविधान-निर्मात्री सभा (Constitution-making body) लिखेगी। इस सभा का गठन इस प्रकार होगा —

  • प्रांतों के निम्न सदनों (provincial legislative assemblies) के निर्वाचित सदस्य ही उच्च सदनों के सदस्यों का चयन कर सभा-सदस्य चुनेंगे (अप्रत्यक्ष चुनाव)।
  • देशी रियासतों (Princely States) को सदस्य “नामित (nominate)” करने का अधिकार — निर्वाचन नहीं।

3. प्रांतों को अलग होने का अधिकार (Right to Secede)

यदि कोई प्रांत संविधान सभा में सम्मिलित नहीं होना चाहे, तो उसे अलग संविधान बनाने और अलग रहने (separate union or remain outside) का अधिकार होगा। यही प्रावधान वस्तुतः पाकिस्तान-निर्माण की अप्रत्यक्ष स्वीकृति था — मुस्लिम लीग को रिझाने के लिए।

4. युद्ध-काल में रक्षा (Defence During War)

युद्ध-काल में रक्षा-विभाग (Defence) पूर्णतः ब्रिटिश हाथों में रहेगी। संविधान-निर्माण भी युद्ध-समाप्ति के बाद ही प्रारंभ होगा।

5. संक्रमण-काल (Transition)

संक्रमण-काल में मौजूदा वायसराय की कार्यकारी परिषद (Executive Council) में अधिक भारतीयों को शामिल किया जा सकता है — परंतु वायसराय की संवैधानिक स्थिति में बदलाव नहीं।

INC की प्रतिक्रिया (Congress Response)

INC के लिए मुख्य वार्ताकार पंडित जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (Maulana Abul Kalam Azad) (तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष) थे। महात्मा गांधी सेवाग्राम से आए और चर्चा में शामिल हुए।

INC की मुख्य आपत्तियाँ —

  1. तत्काल हस्तांतरण नहीं: अधिराज्य का दर्जा “युद्ध के बाद” — कोई निश्चित समय-सीमा नहीं।
  2. रक्षा का प्रश्न: युद्ध-काल में रक्षा-विभाग पर भारतीयों का कोई नियंत्रण नहीं — परंतु युद्ध स्वयं भारत की पूर्वी सीमा पर लड़ा जा रहा था।
  3. रियासतों का अनिर्वाचित प्रतिनिधित्व: लगभग 565 देशी रियासतों के राजाओं द्वारा “नामित” सदस्य — लोकतांत्रिक नहीं।
  4. विभाजन का बीज: “प्रांतों को अलग रहने का अधिकार” वस्तुतः पाकिस्तान-स्वीकृति का अप्रत्यक्ष रास्ता।
  5. वायसराय की सर्वोच्चता: वायसराय वही — संक्रमण-काल में भी।

गांधी का कथन सबसे प्रसिद्ध रहा — उन्होंने प्रस्ताव को “a post-dated cheque on a crashing bank” (डूबते बैंक का बासी चेक) कहा। बाद में उन्होंने जोड़ा “post-dated on a failing bank” — अर्थात वह चेक जिसकी तिथि भविष्य की है, और जो बैंक उस चेक का भुगतान करेगा वह स्वयं डूब रहा है।

ML की प्रतिक्रिया (Muslim League Response)

ML अध्यक्ष मोहम्मद अली जिन्ना के लिए मिशन में सबसे आकर्षक तत्त्व था — “प्रांतों को अलग होने का अधिकार”। यह वस्तुतः 1940 के लाहौर प्रस्ताव (Pakistan Resolution) का अप्रत्यक्ष स्वीकार था।

परंतु ML ने भी प्रस्ताव अस्वीकार किया, क्योंकि —

  • “पाकिस्तान” शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं था।
  • संविधान सभा का गठन-तंत्र मुस्लिम-बहुल प्रांतों को अल्पसंख्यक स्थिति में डाल रहा था।
  • रियासतों के “नामित” सदस्य कुल का लगभग 1/3 होंगे — जो मुस्लिम हितों के लिए असुरक्षित।

अन्य पक्षों की प्रतिक्रिया (Other Parties’ Response)

दल / समुदायप्रतिक्रियामुख्य कारण
हिंदू महासभा (Hindu Mahasabha) — सावरकरअस्वीकार“अलग होने का अधिकार” विभाजन का द्वार खोलता है
सिख दल (Akali Dal)अस्वीकारपंजाब के विभाजन की आशंका; सिख-हितों की कोई गारंटी नहीं
दलित वर्ग (Depressed Classes) — डॉ. भीमराव अंबेडकरअस्वीकारअनुसूचित जातियों के लिए कोई अलग प्रावधान नहीं
लिबरल फेडरेशन (Liberal Federation) — तेज बहादुर सप्रूआंशिक स्वीकारपरंतु संशोधन-सुझाव के साथ
कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)समर्थनफासीवाद-विरोधी युद्ध-प्रयास के कारण

इस प्रकार लगभग सर्वसम्मत अस्वीकार ने मिशन को निरस्त कर दिया।

मिशन की असफलता के कारण (Reasons for Failure)

  1. ब्रिटिश पक्ष की अनिच्छा: चर्चिल और वायसराय लिनलिथगो स्वयं प्रस्ताव में पूरे मन से नहीं थे। क्रिप्स को लंदन से दिए गए “वार्ता-दायरे” बहुत संकीर्ण थे।
  2. समय-सीमा का अभाव: “युद्ध के बाद” का अर्थ अनिश्चित था।
  3. रक्षा-विवाद: युद्ध-काल में रक्षा-विभाग पर भारतीय नियंत्रण न मिलना — यह सबसे बड़ा गतिरोध बना।
  4. रियासतों की अनिर्वाचित स्थिति: लगभग 1/3 सदस्य रियासतों से नामित होंगे — INC के लिए असहनीय।
  5. विभाजन का अप्रत्यक्ष द्वार: “अलग होने का अधिकार” से INC, हिंदू महासभा, सिख दल — सभी असहमत।
  6. वायसराय की सर्वोच्चता: संक्रमण-काल में भी वायसराय की वस्तुतः कोई जवाबदेही नहीं।
  7. राजनीतिक अविश्वास: 1939 का एकपक्षीय युद्ध-घोषणा, 1940 का अगस्त प्रस्ताव — INC का ब्रिटिश सरकार पर भरोसा पहले ही टूट चुका था।

लुई फिशर (Louis Fischer) ने लिखा है — “क्रिप्स ब्रिटिश सरकार से सच्ची शक्ति लेकर नहीं आए थे; वे केवल एक संदेशवाहक थे।”

क्रिप्स मिशन और भारत छोड़ो आंदोलन (Cripps Mission and Quit India Movement)

मिशन की 9 अप्रैल 1942 को विफलता ने राजनीतिक स्थिति को विस्फोटक बना दिया। गांधी ने अब तक जिस “रचनात्मक प्रतीक्षा” की नीति अपनाई थी, उसे त्याग दिया।

  • जुलाई 1942: कांग्रेस कार्य समिति (Congress Working Committee) की वर्धा बैठक में “अंग्रेज़ों भारत छोड़ो (Quit India)” प्रस्ताव का मसौदा।
  • 8 अगस्त 1942: AICC (Bombay) ने “Quit India Resolution” स्वीकार किया।
  • 9 अगस्त 1942: सभी प्रमुख कांग्रेस नेता गिरफ्तार — गांधी, नेहरू, पटेल, आज़ाद। भूमिगत आंदोलन प्रारंभ — जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, अरुणा आसफ़ अली, उषा मेहता।

इस प्रकार क्रिप्स मिशन की विफलता और 8 अगस्त के बीच सीधा कारण-प्रभाव संबंध है।

क्रिप्स मिशन का दीर्घकालिक महत्व (Long-term Significance)

आयाममहत्व
संवैधानिक स्वीकार्यतापहली बार ब्रिटिश सरकार ने “भारतीयों द्वारा रचित संविधान” का सिद्धांत स्वीकार किया
विभाजन का द्वार“अलग होने का अधिकार” — भारत के विभाजन (1947) की संवैधानिक नींव
राजनीतिक ध्रुवीकरणINC + ML का स्थायी विभाजन इसी से तेज़ हुआ
जन-आंदोलनभारत छोड़ो आंदोलन का तत्काल कारण
आगामी मिशनों की नींव1945 का वेवेल योजना (Wavell Plan), 1946 का कैबिनेट मिशन (Cabinet Mission) — सभी क्रिप्स से सीख लेकर तैयार किए गए

संबंधित Hindi नोट्स के लिए देखें — भारतीय संविधान की उद्देशिका, संविधान सभा की प्रतिनिधित्वशीलता और वैधता तथा जवाहरलाल नेहरू: लोकतांत्रिक समाजवाद और स्वतंत्रता — ये तीनों मिलकर 1942 से 1950 तक की संपूर्ण संवैधानिक यात्रा को स्पष्ट करते हैं।

आलोचना (Criticism)

  • “बहुत कम, बहुत देर से (Too Little, Too Late)”: यह मिशन का सबसे प्रसिद्ध आलोचनात्मक मूल्यांकन है। 1939 या 1940 में यदि यही प्रस्ताव आता तो शायद स्वीकार होता; 1942 तक भारतीय राजनीति बहुत आगे जा चुकी थी।
  • विभाजन-स्वीकृति: “अलग होने का अधिकार” ने मुस्लिम लीग के पाकिस्तान-दावे को अप्रत्यक्ष ब्रिटिश समर्थन दिया।
  • रियासतों का प्रावधान: लोकतांत्रिक संविधान-निर्माण में अनिर्वाचित नामित सदस्य — मूल सिद्धांत-विरोधी।
  • युद्ध-समर्थन की आशा: ब्रिटेन की मुख्य अपेक्षा थी कि INC तत्काल युद्ध-प्रयास का समर्थन कर दे — परंतु प्रस्ताव में तत्काल लाभ कुछ नहीं था।

UPSC के लिए प्रासंगिकता (UPSC Relevance)

  • Prelims: क्रिप्स मिशन की तिथियाँ (22 मार्च – 9 अप्रैल 1942); क्रिप्स की भूमिका; तत्कालीन वायसराय; तत्कालीन INC अध्यक्ष; गांधी का प्रसिद्ध कथन; “अलग होने का अधिकार” प्रावधान; भारत छोड़ो प्रस्ताव की तिथि (8 अगस्त 1942)।
  • Mains GS-I: “क्रिप्स मिशन की असफलता ने भारत छोड़ो आंदोलन का मार्ग प्रशस्त किया” — विश्लेषण; प्रस्ताव की मुख्य कमज़ोरियाँ; 1942 से 1947 तक के क्रमिक संवैधानिक प्रस्तावों की तुलना।
  • Essay: “बहुत कम, बहुत देर से — औपनिवेशिक संक्रमण के सबक” — एक सशक्त निबंध-विषय।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Mains Practice Questions)

  1. “क्रिप्स मिशन की असफलता अनिवार्य थी, क्योंकि इसमें न तो तत्काल राहत थी, न दीर्घकालिक विश्वास।” इस कथन का परीक्षण कीजिए। (150 शब्द, 10 अंक)
  2. “क्रिप्स प्रस्ताव में निहित ‘अलग होने का अधिकार’ भारत के विभाजन की संवैधानिक भूमिका बना।” चर्चा कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)
  3. क्रिप्स मिशन (1942), कैबिनेट मिशन (1946) और माउंटबेटन योजना (1947) — इन तीनों के तुलनात्मक संदर्भ में संवैधानिक संक्रमण की प्रक्रिया का विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)

निष्कर्ष (Conclusion)

क्रिप्स मिशन 1942 भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम के उन क्षणों में से एक है जब इतिहास ने एक “अधूरा अवसर” गँवाया। ब्रिटिश सरकार ने पहली बार स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि भारत का संविधान भारतीयों द्वारा रचित होगा — परंतु यह स्वीकार्यता शर्तों, अनिश्चितताओं और अप्रत्यक्ष विभाजन-स्वीकृति से इस क़दर ढकी हुई थी कि कोई भी भारतीय राजनीतिक धारा इसे स्वीकार नहीं कर सकी।

मिशन की असफलता ने 8 अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का तत्काल कारण बना। और साथ ही, “अलग होने के अधिकार” वाला प्रावधान आगे चलकर 3 जून 1947 की माउंटबेटन योजना और 15 अगस्त 1947 के विभाजन-स्वतंत्रता तक की रेखा का प्रथम बिंदु बना।

UPSC अभ्यर्थी के लिए क्रिप्स मिशन केवल “एक मिशन” नहीं — यह औपनिवेशिक सत्ता के अंतिम चरण की तीव्र राजनीतिक गणित है, जिसमें युद्ध-संकट, अमेरिकी-चीनी दबाव, ब्रिटिश आंतरिक राजनीति और भारतीय जन-आकांक्षा — चारों एक साथ टकराईं। इसी टकराव के सबक से 1946 का कैबिनेट मिशन और अंततः स्वतंत्र भारत का संविधान आगे चला।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

क्रिप्स मिशन भारत कब आया था?

क्रिप्स मिशन 22 मार्च 1942 को नई दिल्ली पहुँचा। मिशन का नेतृत्व सर स्टैफर्ड क्रिप्स (Sir Stafford Cripps) ने किया, जो ब्रिटिश युद्ध-मंत्रिमंडल के सदस्य थे। वार्ता 9 अप्रैल 1942 को विफल होकर समाप्त हुई।

क्रिप्स मिशन क्यों भेजा गया था?

मुख्य कारण द्वितीय विश्वयुद्ध का संकट था। जापान ने सिंगापुर (15 फरवरी 1942) और बर्मा (मार्च 1942) पर क़ब्ज़ा कर लिया था और भारत की पूर्वी सीमा खतरे में थी। US राष्ट्रपति रूज़वेल्ट और चीन के चियांग काई-शेक के दबाव में PM विंस्टन चर्चिल ने भारतीय सहयोग प्राप्त करने के लिए मिशन भेजा।

क्रिप्स मिशन के मुख्य प्रस्ताव क्या थे?

मुख्य प्रस्ताव थे — (i) युद्धोपरांत भारत को अधिराज्य का दर्जा (Dominion Status), (ii) भारतीयों द्वारा संविधान सभा (Constituent Assembly) का गठन, (iii) किसी भी प्रांत को अलग होने का अधिकार, (iv) देशी रियासतों को सदस्य “नामित” करने का अधिकार, और (v) युद्ध-काल में रक्षा ब्रिटिश हाथ में।

महात्मा गांधी ने क्रिप्स प्रस्ताव को क्या कहा?

गांधी ने प्रस्ताव को “a post-dated cheque on a crashing bank” (डूबते बैंक का बासी चेक) कहा। उनका तात्पर्य था कि चेक की तिथि भविष्य की है (युद्ध के बाद), और जो बैंक भुगतान करेगा (ब्रिटिश साम्राज्य) वह स्वयं डूब रहा है।

क्रिप्स मिशन को INC ने क्यों अस्वीकार किया?

मुख्य कारण थे — (i) तत्काल अधिकार-हस्तांतरण नहीं, (ii) युद्ध-काल में रक्षा पर भारतीय नियंत्रण नहीं, (iii) रियासतों के अनिर्वाचित सदस्य, (iv) “अलग होने का अधिकार” वस्तुतः विभाजन का बीज, और (v) वायसराय की संवैधानिक सर्वोच्चता बरकरार।

क्रिप्स मिशन को मुस्लिम लीग ने क्यों अस्वीकार किया?

ML अध्यक्ष जिन्ना के लिए “अलग होने का अधिकार” आकर्षक था, परंतु प्रस्ताव में “पाकिस्तान” शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। संविधान सभा का गठन-तंत्र मुस्लिम-बहुल प्रांतों को अल्पसंख्यक स्थिति में डालता था, इसलिए ML ने भी प्रस्ताव अस्वीकार किया।

स्टैफर्ड क्रिप्स कौन थे?

सर स्टैफर्ड क्रिप्स (1889-1952) ब्रिटिश Labour Party के वरिष्ठ नेता और बैरिस्टर थे। 1942 में वे Lord Privy Seal और House of Commons के Leader थे। उनकी नेहरू से व्यक्तिगत मित्रता थी और उन्हें भारत-समर्थक माना जाता था। बाद में 1946 में वे कैबिनेट मिशन के भी सदस्य रहे।

क्रिप्स मिशन के बाद क्या हुआ?

मिशन की 9 अप्रैल 1942 को विफलता के बाद कांग्रेस ने 8 अगस्त 1942 को मुंबई के AICC अधिवेशन में “अंग्रेज़ों भारत छोड़ो (Quit India)” प्रस्ताव स्वीकार किया। 9 अगस्त को सभी प्रमुख कांग्रेस-नेता गिरफ्तार किए गए और भूमिगत आंदोलन प्रारंभ हुआ।

क्रिप्स मिशन का दीर्घकालिक महत्व क्या है?

पहली बार ब्रिटिश सरकार ने “भारतीयों द्वारा रचित संविधान” का सिद्धांत स्वीकार किया। परंतु “अलग होने के अधिकार” से विभाजन (1947) की संवैधानिक नींव भी पड़ी। आगे के मिशन — 1945 का वेवेल योजना और 1946 का कैबिनेट मिशन — सभी क्रिप्स से सीख लेकर तैयार किए गए।

क्रिप्स मिशन और कैबिनेट मिशन में क्या अंतर है?

क्रिप्स मिशन (मार्च-अप्रैल 1942): एकल-सदस्य मिशन (केवल क्रिप्स), युद्ध-काल का संकट-प्रस्ताव, युद्धोपरांत Dominion Status। कैबिनेट मिशन (मार्च-जून 1946): त्रि-सदस्य मिशन (क्रिप्स, पेथिक-लॉरेंस, A V Alexander), युद्धोपरांत स्थिति में अधिक ठोस अंतरिम सरकार और सीधे संविधान-निर्माण की रूपरेखा।

Share this

PDF

Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

Recognized as one of India’s best content marketers, Gaurav Tiwari is an SEO strategist, WordPress developer, and founder of Gatilab. He builds websites that load in under a second, creates content that ranks on Google’s first page, and develops WordPress plugins and tools used on thousands of live sites.

Specialises in · Writing, web development, design — UPSC prep tooling Experience · 16+ years Visit website ↗

UPSC की तैयारी हिंदी माध्यम में — एक निशुल्क डेमो क्लास

न कोई सेल्स कॉल, न कोई ब्रोशर। सोमवार सुबह की असली GS क्लास देखिए — हमारे अनुभवी शिक्षकों के साथ।