UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

संविधान सभा की प्रतिनिधित्वशीलता और वैधता — यूपीएससी राजव्यवस्था

यूपीएससी गाइड: संविधान सभा की वैधता और प्रतिनिधित्वशीलता पर बहस — कैबिनेट मिशन, अप्रत्यक्ष निर्वाचन, ग्रेनविल ऑस्टिन और केसवानंद भारती मामला।

Representativeness and Legitimacy of the Constituent Assembly — UPSC Polity — UPSC featured image

भारत की संविधान सभा — जो 9 दिसंबर 1946 से 24 जनवरी 1950 तक बैठी — ने एक ऐसा दस्तावेज़ तैयार किया जो आज विश्व के सर्वाधिक दीर्घजीवी लोकतांत्रिक संविधानों में से एक है। फिर भी सभा की अपनी प्रतिनिधित्वशीलता और वैधता 1946 से ही विवादित रही है।

संविधान सभा का गठन

संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना, 1946 के अनुसार हुआ। इसमें 389 सदस्य थे — 296 ब्रिटिश भारत के प्रांतों से और 93 देशी रियासतों से। प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन के माध्यम से इनका चुनाव हुआ।

प्रतिनिधित्व की सीमाएँ

1. सार्वभौमिक मताधिकार का अभाव

1946 में केवल 14% भारतीयों को मतदान का अधिकार था। संविधान सभा प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा चुनी गई जो स्वयं संकुचित मताधिकार पर आधारित थीं। अतः यह संपूर्ण जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करती थी।

2. मुस्लिम लीग का बहिष्कार

मुस्लिम लीग ने सभा का बहिष्कार किया। पाकिस्तान बनने के बाद संख्या और कम हो गई, जिससे आलोचकों ने कहा कि यह पूरे उपमहाद्वीप का प्रतिनिधित्व नहीं करती।

3. रियासतों के मनोनीत प्रतिनिधि

देशी रियासतों के प्रतिनिधि मनोनीत थे, निर्वाचित नहीं — जो प्रजातांत्रिक सिद्धांत के विपरीत था।

ग्रेनविल ऑस्टिन का दृष्टिकोण

प्रसिद्ध विद्वान ग्रेनविल ऑस्टिन ने माना कि सभा में उच्च-शिक्षित, उच्च-जाति के पुरुषों का वर्चस्व था। फिर भी उनका तर्क था कि सभा ने लोकतंत्र, मौलिक अधिकार और सामाजिक न्याय के प्रति वास्तविक प्रतिबद्धता दिखाई।

वैधता के पक्ष में तर्क

  • सभा में डॉ. अंबेडकर, नेहरू, पटेल, मौलाना आज़ाद जैसे जन-आंदोलन से उभरे नेता थे।
  • 2 वर्ष 11 माह 18 दिन की गहन बहस-प्रक्रिया।
  • संविधान द्वारा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise) प्रदान किया — सभा की सीमाओं को एक प्रकार से पार किया।
  • केसवानंद भारती मामले में न्यायमूर्ति खन्ना का कथन: संविधान की वैधता उन लोगों की स्वीकृति से है जो इसके तहत जीते हैं।

केसवानंद भारती मामला (1973) और मूल संरचना सिद्धांत

सर्वोच्च न्यायालय ने ‘मूल संरचना सिद्धांत’ (Basic Structure Doctrine) प्रतिपादित किया — संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, परंतु उसकी मूल संरचना नहीं बदल सकती। यह संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान को स्थायी प्रामाणिकता देता है।

यूपीएससी परीक्षा की दृष्टि से

यह विषय GS-II (राजव्यवस्था) के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसमें सभा की रचना, कार्यविधि, आलोचनाएँ और वैधता — सभी पर प्रश्न आते हैं। मुख्य परीक्षा में इस पर 10-15 अंक के प्रश्न प्रायः पूछे जाते हैं।

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

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