UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

जनहित याचिका (PIL) भारत में: विकास, दायरा और सुधार (यूपीएससी राजव्यवस्था)

भारत में PIL का परिचय, इसकी उत्पत्ति, लोकस स्टेंडी में छूट, ऐतिहासिक मामले, न्यायिक सक्रियता की आलोचना और सर्वोच्च न्यायालय के नए दिशा-निर्देशों का यूपीएससी के लिए विस्तृत विश्लेषण।

Public Interest Litigation (PIL) in India: Evolution, Scope & Reforms (UPSC Polity) — UPSC featured image

जनहित याचिका (Public Interest Litigation) भारतीय सर्वोच्च न्यायालय की सबसे प्रसिद्ध न्यायिक खोज है। यह संविधान में लिखित नहीं थी। इसे 1970 और 1980 के दशक में न्यायाधीशों ने मामला दर मामला तैयार किया, जिन्होंने तय किया कि न्यायालय के दरवाज़े शास्त्रीय स्टैंडिंग नियमों से अधिक चौड़े खुलने चाहिए। आज, कोई भी नागरिक — यहाँ तक कि किसी कैदी का पत्र — संवैधानिक तंत्र को गतिमान कर सकता है ताकि उन लोगों के अधिकारों की रक्षा हो सके जो स्वयं न्यायालय नहीं जा सकते। PIL ने पर्यावरण कानून, श्रम कानून, महिला अधिकार, जेल सुधार, यौन उत्पीड़न कानून, भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और अनेक क्षेत्रों को नया रूप दिया है। इसकी आलोचना भी हुई है — कभी-कभी स्वयं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा — अदालतों को भीड़भाड़ से भरना, शक्तियों के पृथक्करण को धुंधला करना और सार्वजनिक हित की आड़ में निजी या प्रचार हितों की सेवा करने के कारण।

यूपीएससी के लिए, PIL न्यायपालिका और शासन के अंतर्गत GS Paper II का एक मूल विषय है। यह निबंध और नीतिशास्त्र में भी आता है क्योंकि यह न्याय तक पहुँच, न्यायिक सक्रियता और विधि के शासन के चौराहे पर स्थित है।

PIL की अवधारणा

PIL अपने किसी अलग क़ानून वाला मुकदमे का कोई अलग प्रकार नहीं है। यह दो नियमों की प्रक्रियागत छूट है:

  • लोकस स्टेंडी (Locus standi): सामान्यतः केवल वही व्यक्ति मुकदमा कर सकता है जिसका कानूनी अधिकार उल्लंघित हुआ हो। PIL में, कोई भी जन-हितैषी व्यक्ति उन लोगों की ओर से न्यायालय जा सकता है जो स्वयं नहीं जा सकते।
  • रूप: किसी वकील द्वारा तैयार की गई औपचारिक याचिका आदर्श है लेकिन अनिवार्य नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने पोस्टकार्ड, पत्र और अखबारी रिपोर्टों को रिट याचिका के रूप में माना है। इसे एपिस्टोलरी क्षेत्राधिकार (epistolary jurisdiction) कहते हैं।

इसका लक्ष्य गरीबों, अनपढ़ों, विकलांगों, बंधुआ मजदूरों, कैदियों, विचाराधीन बंदियों, झुग्गी निवासियों और भावी पीढ़ियों के लिए — हर उस व्यक्ति के लिए न्याय तक पहुँच सुनिश्चित करना है जिसकी आवाज़ न्यायालय तक मुश्किल से पहुँचती है।

PIL का उद्भव

इसकी पृष्ठभूमि 1970 का दशक था। आपातकाल की ज़्यादतियाँ, व्यापक गरीबी, जाम से भरा दीवानी न्याय तंत्र और कार्यकर्ता वकीलों की नई पीढ़ी ने मिलकर सुधार की माँग उठाई। दो न्यायाधीशों — न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर — ने पीठ से इस बदलाव का नेतृत्व किया।

एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (1981), जिसे प्रथम न्यायाधीश मामले के नाम से भी जाना जाता है, एक मौलिक PIL मामला है। न्यायमूर्ति भगवती ने लिखा कि “पर्याप्त हित रखने वाला कोई भी सार्वजनिक सदस्य” उन लोगों की ओर से न्यायिक उपचार के लिए अदालत जा सकता है जो स्वयं नहीं जा सकते। उस वाक्य ने स्टैंडिंग पर लगे शास्त्रीय ताले को तोड़ दिया।

इससे पहले, मुंबई कामगार सभा बनाम अब्दुलभाई (1976) और हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य (1979) — विचाराधीन कैदियों का मामला — पहले ही रास्ता दिखा चुके थे। हुसैनारा खातून मामले में हजारों विचाराधीन बंदियों को रिहा करवाया गया जो अपने कथित अपराध की अधिकतम सज़ा से भी अधिक समय जेल में बिता चुके थे।

PIL कौन दायर कर सकता है और कहाँ

PIL निम्नलिखित के तहत दायर की जा सकती है:

  • अनुच्छेद 32 — सीधे सर्वोच्च न्यायालय में, मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट के रूप में। यह स्वयं एक मौलिक अधिकार है, जिसे अंबेडकर ने संविधान का “हृदय और आत्मा” कहा था।
  • अनुच्छेद 226 — किसी भी उच्च न्यायालय में, व्यापक आधार पर (मौलिक अधिकार और अन्य कानूनी अधिकार दोनों पर)।
  • धारा 133, CrPC — सार्वजनिक उपद्रव के मामलों में मजिस्ट्रेट के समक्ष।

PIL केवल अनुच्छेद 12 के व्यापक अर्थ में राज्य के विरुद्ध दायर की जा सकती है — केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, स्थानीय प्राधिकरण और सरकारी नियंत्रण में अन्य प्राधिकरण। यह किसी निजी व्यक्ति के विरुद्ध दायर नहीं की जा सकती, यद्यपि निजी पक्षों को प्रतिवादी के रूप में जोड़ा जा सकता है यदि वे राज्य कार्रवाई से जुड़े हों।

ऐतिहासिक PIL मामले

मामलावर्षयोगदान
हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य1979शीघ्र सुनवाई का अधिकार; विचाराधीन बंदियों की रिहाई
एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ1981लोकस स्टेंडी पर मौलिक PIL निर्णय
बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ1984बंधुआ मजदूरी उन्मूलन
ओल्गा टेलिस बनाम बम्बई नगर निगम1985अनुच्छेद 21 के तहत जीविका का अधिकार
एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ1986 सेगंगा प्रदूषण, वाहन उत्सर्जन, ताज ट्रेपीज़ियम
विशाखा बनाम राजस्थान राज्य1997कार्यस्थल यौन उत्पीड़न पर दिशा-निर्देश
PUCL बनाम भारत संघ2001भोजन का अधिकार; मध्याह्न भोजन
कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ2018निष्क्रिय इच्छामृत्यु और लिविंग विल
नवतेज सिंह जोहर बनाम भारत संघ2018धारा 377 का अपराधीकरण समाप्त
अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ2020इंटरनेट पहुँच मौलिक अधिकार

PIL का महत्व

  • सस्ती पहुँच: न्यूनतम न्यायालय शुल्क और सरल प्रक्रिया से आम नागरिक संवैधानिक प्रश्न उठा सकते हैं।
  • शिथिल लोकस स्टेंडी: पीड़ित के अतिरिक्त कोई तीसरा पक्ष भी मामला दायर कर सकता है।
  • सामाजिक परिवर्तन का साधन: विशाखा से लेकर मध्याह्न भोजन तक, PIL ने ऐसे दिशा-निर्देश दिए हैं जो कानून की तरह काम करते हैं जब तक संसद उन पर कदम नहीं उठाती।
  • राज्य संस्थाओं की निगरानी: न्यायालयों ने जेलों, मानसिक आश्रयों, बाल गृहों और महिला संरक्षण गृहों का निरंतर परमादेश (continuing mandamus) के माध्यम से पर्यवेक्षण किया।
  • नियंत्रण और संतुलन: PIL ने कार्यपालिका की निष्क्रियता पर सार्वजनिक नियंत्रण का काम किया है।
  • नवाचारी राहतें: अंतरिम मुआवजा, न्यायालय-निगरानी जाँच, सामाजिक-कानूनी आयोग, मित्र न्यायालय (amicus curiae) ब्रीफ, NHRC संदर्भ।

आलोचनाएं और चुनौतियाँ

शक्ति संतुलन में व्यवधान

PIL ने कभी-कभी न्यायालय को विधायिका और कार्यपालिका की भूमिका में धकेल दिया है। न्यायालयों ने प्रदूषण नियंत्रण योजनाएं, मध्याह्न भोजन मेनू, शराब नीतियाँ, यातायात नियम और खेल शासन ढाँचे तक लिख दिए हैं। आलोचक — जिनमें न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और हाल ही में न्यायमूर्ति अभय ओका शामिल हैं — चेतावनी देते हैं कि यह न्यायिक अतिक्रमण (judicial overreach) है और चुने हुए अंगों को उनका काम करने से हतोत्साहित करता है।

निरर्थक और प्रचार PIL

सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं “प्रचार हित याचिका” और “निजी हित याचिका” जैसे शब्द गढ़े हैं — उन याचिकाओं के लिए जो बाधा डालने वाले, नाराज प्रतिद्वंद्वियों या सुर्खियाँ बटोरने वाले कार्यकर्ताओं द्वारा दायर की जाती हैं। CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ और उनसे पहले के CJI ने बार-बार चेतावनी दी है कि PIL उत्पीड़न का हथियार बनने का खतरा है।

लंबित मामलों पर प्राथमिकता

PIL मामले अक्सर कतार में आगे निकल जाते हैं। ऐसी व्यवस्था में जहाँ 5 करोड़ से अधिक लंबित मामले हों (2025 तक), यह उन सामान्य वादियों के साथ अन्याय है जिनकी अपीलें दशकों से प्रतीक्षारत हैं।

अत्यधिक उपयोग और कमज़ोरी

जब हर शिकायत — सड़क के गड्ढे से लेकर राजनीतिक नारों तक — PIL के रूप में दायर होने लगती है, तो उपाय का नैतिक महत्व कम हो जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के उत्तरांचल राज्य बनाम बलवंत सिंह चौफाल (2010) में PIL को प्रवेश स्तर पर छानने और निरर्थक याचिकाकर्ताओं पर जुर्माना लगाने के लिए न्यायालयों को विस्तृत दिशा-निर्देश दिए गए।

लंबितता

PIL स्वयं जमा होने लगे हैं। निरंतर परमादेश — जहाँ न्यायालय अनुपालन की निगरानी के लिए वर्षों तक मामला खुला रखता है — पीठों को एकल विवादों से स्थायी रूप से बाँध देता है।

PIL के लिए सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश

उत्तरांचल राज्य बनाम बलवंत सिंह चौफाल (2010) में सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों को निर्देश दिया:

  • वास्तविक और सद्भावनापूर्ण PIL को प्रोत्साहित करने तथा निरर्थक PIL को हतोत्साहित करने के लिए नियम बनाएं।
  • PIL स्वीकार करने से पहले याचिकाकर्ता की विश्वसनीयता सत्यापित करें।
  • नोटिस जारी करने से पहले तथ्यों की शुद्धता जाँचें।
  • सुनिश्चित करें कि PIL पर्याप्त सार्वजनिक हित की सेवा करे।
  • प्रक्रिया के दुरुपयोग पर दृष्टांत लागत (exemplary costs) लगाएं।

नवीनतम घटनाक्रम (2024–26)

अद्यतन संदर्भ: सर्वोच्च न्यायालय ने PIL फ़िल्टर को कड़ा किया है जबकि कुल मामलों का बोझ बढ़ा है।

  • CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ का कार्यकाल (2022–24) में राजनीतिक रूप से प्रेरित PIL की जाँच और संवैधानिक पीठों के त्वरित निपटारे पर जोर दिया गया।
  • न्यायमूर्ति संजीव खन्ना नवंबर 2024 में CJI बने, उसके बाद न्यायमूर्ति बी.आर. गवई मई 2025 में। दोनों ने सच्चे वंचित याचिकाकर्ताओं पर केंद्रित अनुशासित PIL क्षेत्राधिकार के पक्ष में बात की है।
  • निरर्थक PIL पर दृष्टांत लागत लगाना बढ़ा है: सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 में कई राजनीतिक रंग वाली PIL को ₹25,000 से ₹5 लाख तक की लागत सहित खारिज किया।
  • चुनावी बॉन्ड पर PIL (2024) ने ऐतिहासिक एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स फैसला दिया जिसने उस योजना को असंवैधानिक करार दिया — यह याद दिलाता है कि PIL अभी भी सबसे बड़े संवैधानिक क्षणों को आकार देती है।
  • 2025 सर्वोच्च न्यायालय ई-फाइलिंग नियमों ने PIL ऑनलाइन दायर करना आसान किया है लेकिन अज्ञात दुरुपयोग को कम करने के लिए पहचान सत्यापन के चरण भी जोड़े हैं।

निष्कर्ष

PIL भारत का सबसे प्रशंसित और सबसे विवादित न्यायिक नवाचार दोनों है। इसने अदालतों के दरवाज़े उन लोगों के लिए खोले जिन्हें वहाँ पहुँचने की कोई उम्मीद नहीं थी। इसने कानून बनाए — यौन उत्पीड़न, बंधुआ मजदूरी, खाद्य सुरक्षा पर — जिन्हें लिखने में संसद धीमी थी। इसने शक्ति पृथक्करण को भी मोड़ा है और कभी-कभी शासन में भटक गई है। आगे की चुनौती इसे वापस लेने की नहीं बल्कि इसे अनुशासित करने की है — प्रवेश पर कड़ी जाँच, दुरुपयोग पर लागत, अनुपालन की समय-सीमा और कार्यपालिका की सक्रियता ताकि न्यायालय को नीति नहीं लिखनी पड़े। जब तीनों अंग अपना-अपना काम करें, तो PIL अपने मूल उद्देश्य पर लौट आती है: उन लोगों के लिए न्याय की सीढ़ी जो नियमित सीढ़ियाँ नहीं चढ़ सकते।

यूपीएससी प्रासंगिकता

पेपर मैपिंग: GS Paper II — न्यायपालिका, शक्तियों का पृथक्करण, नागरिक चार्टर, जवाबदेही। निबंध और GS IV (संस्थागत सत्यनिष्ठा) के लिए भी प्रासंगिक।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए मुख्य बिंदु:

  • PIL क्षेत्राधिकार अनुच्छेद 32 (सर्वोच्च न्यायालय) और अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय) से उद्भूत है।
  • मौलिक PIL मामला एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (1981) है।
  • न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर को PIL को आकार देने का श्रेय जाता है।
  • विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) ने कार्यस्थल यौन उत्पीड़न दिशा-निर्देश दिए जिन्हें बाद में POSH अधिनियम 2013 में संहिताबद्ध किया गया।
  • एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ ने ओलियम गैस रिसाव मामले में निरपेक्ष दायित्व (absolute liability) सिद्धांत दिया।
  • उत्तरांचल राज्य बनाम बलवंत सिंह चौफाल (2010) ने PIL स्क्रीनिंग दिशा-निर्देश दिए।
  • 2024 चुनावी बॉन्ड फैसला PIL के एक समूह में दिया गया।
  • PIL केवल अनुच्छेद 12 के “राज्य” के विरुद्ध दायर की जा सकती है।

मुख्य परीक्षा के दृष्टिकोण:

  • “PIL ने न्याय तक पहुँच को लोकतांत्रिक बनाया है लेकिन न्यायिक अतिक्रमण को भी बढ़ावा दिया है। समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।”
  • “ऐतिहासिक मामलों के संदर्भ में भारत में पर्यावरण न्यायशास्त्र में PIL की भूमिका की चर्चा कीजिए।”

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

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