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खाद्य संरक्षण की तकनीकें: सुखाना, डिब्बाबंदी और निर्वात पैकिंग कैसे काम करती हैं (UPSC विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)

भोजन क्यों खराब होता है और सुखाने, नमक, ठंड, डिब्बाबंदी, निर्वात पैकिंग, विकिरण और शीत शृंखला से उसे कैसे बचाया जाता है, आसान हिंदी में समझिए।

खाद्य संरक्षण में पानी, तापमान, ऑक्सीजन और पीएच बदलने वाले उपाय

किसी भी रसोई को ध्यान से देखिए। वह खाद्य विज्ञान का छोटा-सा संग्रहालय है। अचार के मर्तबान में नमक, मुरब्बे में चीनी, फ्रिज की ठंडी हवा, हवा निकालकर बंद किया गया पनीर और कई सप्ताह तक बिना खोले रखा जा सकने वाला दूध का डिब्बा, ये सभी एक पुरानी समस्या के अलग-अलग समाधान हैं। भोजन खराब होता है और मनुष्य हजारों वर्षों से इस प्रक्रिया को धीमा करना सीखता आया है। ऊपर से ये उपाय अलग दिखते हैं, पर इनके पीछे मूल विचार एक ही है।

यह बात केवल रसोई तक सीमित नहीं है। भारत में उगाई गई उपज का बड़ा हिस्सा थाली तक पहुँचने से पहले ही नष्ट हो जाता है। सरकारी अनुमानों के अनुसार फल और सब्जियों की कटाई-पश्चात हानि लगभग एक-चौथाई से एक-तिहाई तक हो सकती है। यानी जिस भोजन को उगाने, सींचने और काटने में संसाधन लगे, वह परिवहन या भंडारण के दौरान खराब हो जाता है। इसलिए खाद्य संरक्षण का संबंध खाद्य सुरक्षा, पोषण, किसान की आय और जनस्वास्थ्य से है। सरकार का शीत शृंखला (cold chain) और खाद्य विकिरण (food irradiation) पर जोर इसे फिर चर्चा में लाया है। परीक्षा में केवल तकनीकों के नाम गिनाने से बेहतर है यह समझाना कि वे कैसे काम करती हैं और उनकी सीमा क्या है।

दो दुश्मन: भोजन आखिर खराब क्यों होता है?

किसी तकनीक को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि हमें रोकना किसे है। भोजन मुख्यतः दो कारणों से खराब होता है। पहला कारण सूक्ष्मजीवी वृद्धि है। जीवाणु, खमीर और फफूँद भोजन पर पहुँचकर उसमें मौजूद शर्करा, प्रोटीन और वसा को तोड़ते हैं तथा अपनी संख्या बढ़ाते हैं। इसी से खट्टी गंध, चिपचिपापन, रंग बदलना और कभी-कभी खतरनाक विष बनते हैं। दूसरा कारण एंजाइम क्रिया है, जो भोजन के भीतर से आती है। फल, सब्जी और मांस जीवित कोशिकाओं से बने हैं। उनमें जैविक उत्प्रेरक यानी एंजाइम होते हैं। कटाई या वध के बाद भी ये एंजाइम काम करते रहते हैं। इसी कारण कटा सेब भूरा पड़ता है, पका केला नरम होता जाता है और ताजी सब्जियाँ मुरझाने लगती हैं। साथ में ऑक्सीकरण भी चलता है। हवा की ऑक्सीजन वसा को बासी और रंगद्रव्यों को फीका कर देती है।

इसलिए भोजन खराब होना एक दौड़ जैसा है। एक ओर सूक्ष्मजीव भोजन खा रहे हैं और दूसरी ओर भोजन की अपनी रासायनिक क्रियाएँ उसे बदल रही हैं। संरक्षण की हर तकनीक उन परिस्थितियों को बदलती है जिनकी सूक्ष्मजीवों और एंजाइमों को जरूरत होती है। यह सूची छोटी है: पोषक तत्त्वों को घोलने और पहुँचाने के लिए पानी, अनुकूल तापमान, कई जीवों के लिए ऑक्सीजन और बहुत अधिक अम्लीय न होने वाला पीएच (pH)। इनमें से एक सुविधा भी हटा दी जाए तो जीवन की गति घटती है। कई सुविधाएँ एक साथ हटा दें तो यह लगभग रुक जाती है। यही पूरे विषय की कुंजी है: भोजन को सूक्ष्मजीवों के रहने लायक न रहने देना।

इस तर्क से सारी तकनीकें साफ समूहों में बँट जाती हैं। कुछ पानी को निशाना बनाती हैं, कुछ तापमान को, कुछ ऑक्सीजन को और कुछ पीएच को। कुछ तकनीकें गर्मी या विकिरण से सूक्ष्मजीवों को सीधे नष्ट करती हैं। सुखाना और नमक लगाना पानी हटाते या बाँधते हैं। प्रशीतन और जमाना तापमान घटाकर सभी जैविक क्रियाएँ धीमी करते हैं। अचार बनाना और किण्वन पीएच घटाते हैं। निर्वात पैकिंग और परिवर्तित-वायुमंडलीय पैकिंग भोजन के आसपास की गैसें बदलते हैं। डिब्बाबंदी, पाश्चुरीकरण और विकिरण सूक्ष्मजीवों को सीधे मारते या बहुत कम करते हैं। हर विधि किस सुविधा को हटाती है, यह समझ लिया तो सूची रटने की जरूरत नहीं रहती।

पुराने और भरोसेमंद उपाय: नमक और धूप से निष्कीटित डिब्बे तक

सबसे पुराने उपाय पानी को निशाना बनाते हैं, क्योंकि हर सूक्ष्मजीव को पानी चाहिए। वैज्ञानिक इसे जल सक्रियता (water activity) से मापते हैं, जिसे aw लिखा जाता है। यह बताती है कि भोजन का कितना पानी सचमुच मुक्त है और जीवों के उपयोग के लिए उपलब्ध है, न कि नमक, चीनी या ठोस पदार्थों में बँधा हुआ। जल सक्रियता काफी घट जाए तो सूक्ष्मजीव बढ़ नहीं पाते। सुखाना और निर्जलीकरण पानी को सीधे हटा देते हैं। धूप में सुखाया आम, सूखे प्याज के टुकड़े, दूध पाउडर और सूखी मछली महीनों टिकते हैं, क्योंकि उनमें सूक्ष्मजीवों के लिए बहुत कम मुक्त पानी बचता है। नमक या चीनी लगाने से परासरण होता है। अधिक सांद्रता की ओर पानी खिंचने के कारण भोजन और सूक्ष्मजीवी कोशिकाओं से पानी बाहर आता है। भोजन भीतर से सूखता है और सूक्ष्मजीव निर्जलित हो जाते हैं। नमकीन मछली, मुरब्बा और मीठे छिलकों के पीछे जहर नहीं, पानी की कमी का विज्ञान है।

दूसरा समूह पीएच घटाता है। अचार में सिरका या किण्वन से बना दुग्धाम्ल भोजन को इतना अम्लीय कर देता है कि अधिकतर खराब करने वाले जीवाणु वहाँ नहीं बढ़ पाते। भारतीय आम और नींबू के अचार में तीसरी सुरक्षा भी होती है। ऊपर तेल की परत हवा रोकती है और नमक परासरण से पानी खींचता है। यानी एक ही मर्तबान में अम्ल, नमक और ऑक्सीजन की रुकावट मिलती है। किण्वन इस कहानी को उलट देता है। इसमें सभी सूक्ष्मजीवों को रोकने के बजाय इडली-दोसा के घोल, दही और किमची में उपयोगी दुग्धाम्ल जीवाणुओं को बढ़ने दिया जाता है। वे भोजन को अम्लीय बनाते हैं, हानिकारक जीवों के लिए जगह कम करते हैं और साथ में स्वाद व पोषण भी बढ़ाते हैं।

फिर गर्मी आती है, जो पर्याप्त मात्रा में सूक्ष्मजीवों को केवल धीमा नहीं करती बल्कि मार देती है। फ्रांसीसी मिठाईकार निकोलस एपर्ट (Nicolas Appert) ने लगभग 1809 में डिब्बाबंदी को लोकप्रिय बनाया। भोजन को वायुरुद्ध पात्र में बंद करके इतनी गर्मी दी जाती है कि भीतर के सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाएँ। बंद डिब्बा बाद में हवा और नए जीवों को अंदर नहीं आने देता, इसलिए बिना खुला डिब्बाबंद भोजन वर्षों टिक सकता है। लुई पाश्चर (Louis Pasteur) के नाम पर रखा गया पाश्चुरीकरण इसका हल्का रूप है। भोजन को पकाए बिना रोगकारी और खराब करने वाले जीवों को मारने जितनी गर्मी दी जाती है, फिर जल्दी ठंडा किया जाता है। लगभग 72°C पर कुछ सेकंड गरम किया दूध ठंडा रखने पर कई दिन सुरक्षित रहता है। तापमान को लगभग 135-140°C तक दो से पाँच सेकंड के लिए ले जाएँ तो अति-उच्च तापमान (Ultra-High Temperature या UHT) प्रसंस्करण से व्यावसायिक निर्जीवता मिलती है। इसीलिए बंद डिब्बे वाला ऐसा दूध बिना फ्रिज कई सप्ताह टिक सकता है।

भोजन खराब करने वाले सूक्ष्मजीवों और एंजाइमों से पानी, तापमान, ऑक्सीजन, पीएच तथा प्रत्यक्ष विनाश के उपायों का संबंध दिखाता हिंदी चित्र
एक विचार, कई उपाय: हर तकनीक सूक्ष्मजीवों को जरूरी सुविधा से वंचित करती है, एंजाइम रोकती है या जीवों को सीधे नष्ट करती है।
निर्वात पैकिंग से ऑक्सीकरण और वायवीय जीव घटने पर भी अवायवीय जीवों के कारण ठंड जरूरी होने का हिंदी चित्र
निर्वात पैकिंग केवल पैक करने का तरीका है, जीवों को मारने का चरण नहीं। यह ऑक्सीजन हटाती है, पर अवायवीय जीवों को नहीं रोकती, इसलिए ठंड जरूरी है।

ठंड, निर्वात और बदला वायुमंडल: जीवन को मारे बिना धीमा करना

आधुनिक रसोई में एक अलग रणनीति खूब काम आती है: सूक्ष्मजीवों को मारने के बजाय निष्क्रिय-सा कर देना। प्रशीतन और जमाना तापमान को निशाना बनाते हैं। लगभग 0-5°C पर सूक्ष्मजीवी वृद्धि और एंजाइम क्रियाएँ बहुत धीमी हो जाती हैं, इसलिए भोजन कुछ दिन अधिक टिकता है। 0°C से नीचे मुक्त पानी बर्फ बन जाता है और सूक्ष्मजीव उसे उपयोग नहीं कर पाते। अत्यधिक ठंड एंजाइम क्रिया भी लगभग रोक देती है, इसलिए भोजन महीनों टिक सकता है। पर यह विराम है, विनाश नहीं। भोजन पिघलने पर वही सूक्ष्मजीव फिर सक्रिय हो जाते हैं। इसीलिए पिघले भोजन को दोबारा जमाने पर वह जल्दी खराब हो सकता है। ठंड खराब होने की प्रक्रिया रोककर रखती है, उसे समाप्त नहीं करती।

निर्वात पैकिंग को सबसे अधिक गलत समझा जाता है। थैली से हवा खींचकर निकालने पर ऑक्सीजन घटती है। इससे दो लाभ होते हैं। ऑक्सीकरण धीमा होता है, इसलिए वसा देर से बासी होती है और मांस का रंग अधिक समय रहता है। साथ ही ऑक्सीजन चाहने वाले वायवीय सूक्ष्मजीवों (aerobic) की वृद्धि घटती है। इसलिए निर्वात में बंद पनीर, चीज या मांस अधिक समय टिक सकता है। लेकिन ऑक्सीजन हटाना जीवों को मारने का चरण नहीं है। इससे केवल पैकिंग बदलती है, भोजन अपने-आप सुरक्षित नहीं हो जाता। पैकेट के भीतर नमी अब भी बनावट और सूक्ष्मजीवी गतिविधि को प्रभावित करती है। इससे भी बड़ी बात यह है कि बिना ऑक्सीजन बढ़ने वाले अवायवीय सूक्ष्मजीवों (anaerobic) को ऐसी दशा अनुकूल लग सकती है। इनमें क्लॉस्ट्रिडियम बोटुलिनम (Clostridium botulinum) सबसे खतरनाक है, जिसका विष बोटुलिज्म रोग पैदा करता है। इसकी कुछ किस्में फ्रिज के तापमान पर भी धीरे-धीरे बढ़ सकती हैं। इसीलिए निर्वात में बंद जल्दी खराब होने वाले भोजन को प्रशीतित या जमा हुआ रखना जरूरी है। निर्वात वायवीय जीवों को रोकता है, पर अवायवीय जीवों को ठंड ही काबू में रखती है।

इससे मिलती-जुलती तकनीक परिवर्तित-वायुमंडलीय पैकिंग (Modified Atmosphere Packaging या MAP) है। इसमें हवा केवल निकाली नहीं जाती, बल्कि उसकी जगह तय अनुपात वाली गैसें भरी जाती हैं। आम तौर पर कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन अधिक तथा ऑक्सीजन कम रखी जाती है। कार्बन डाइऑक्साइड जीवाणुओं और फफूँद को दबाती है, जबकि कम ऑक्सीजन ऑक्सीकरण धीमा करती है। इसी कारण सलाद की पत्तियाँ, मांस या बेकरी उत्पाद सामान्य हवा की तुलना में कई दिन अधिक अच्छे रह सकते हैं। निर्वात पैकिंग केवल ऑक्सीजन हटाती है, जबकि यह तकनीक भोजन के आसपास पूरा वायुमंडल नियंत्रित करती है।

उन्नत तकनीक और भारत की शीत शृंखला

आधुनिक संरक्षण गर्मी और ठंड से आगे विकिरण तथा रसायन तक जाता है। खाद्य विकिरण में भोजन को आयनीकारी विकिरण (ionising radiation) की नियंत्रित मात्रा दी जाती है। आम तौर पर कोबाल्ट-60 स्रोत की गामा किरणें उपयोग होती हैं। ये भोजन को बहुत गरम किए बिना सूक्ष्मजीवों, कीटों और अंकुर बनाने वाली कोशिकाओं के डीएनए (DNA) को नुकसान पहुँचाती हैं। इससे दूषक नष्ट या निष्क्रिय होते हैं, जबकि भोजन कच्चा रहता है और स्वाद में बहुत कम बदलाव आता है। इसे एक तरह का शीत पाश्चुरीकरण कहा जा सकता है। भारत में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (Bhabha Atomic Research Centre या BARC) और परमाणु ऊर्जा विभाग इस तकनीक का उपयोग आलू-प्याज का अंकुरण रोकने, मसालों व दालों से कीट हटाने और निर्यात के लिए आम की भंडारण अवधि बढ़ाने में करते हैं। दिसंबर 2025 में पत्र सूचना कार्यालय (Press Information Bureau या PIB) ने बताया कि विकिरण और प्याज-विशेष शीत भंडारण को मिलाकर रबी प्याज को साढ़े सात महीने तक ताजा रखा जा सकता है। विकिरण एवं समस्थानिक प्रौद्योगिकी बोर्ड (Board of Radiation and Isotope Technology) कोबाल्ट-60 देता है और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (Food Safety and Standards Authority of India या FSSAI) इस उपयोग को नियंत्रित करता है।

रासायनिक परिरक्षक सूक्ष्मजीवों को रोकते या ऑक्सीकरण धीमा करते हैं। हर आम परिरक्षक का अलग काम है। सोडियम बेंजोएट और बेंजोइक अम्ल 4.5 से कम पीएच वाले शीतल पेय, मुरब्बे और अचार में फफूँद व खमीर को दबाते हैं। सोर्बिक अम्ल और सोर्बेट चीज तथा पके खाद्य पदार्थों को फफूँद से बचाते हैं। सोडियम नाइट्राइट प्रसंस्कृत मांस को सुरक्षित रखने और रंग बनाए रखने के साथ क्लॉस्ट्रिडियम बोटुलिनम को रोकता है। बीएचए (BHA) और एस्कॉर्बिक अम्ल यानी विटामिन सी जैसे प्रतिऑक्सीकारक वसा को बासी बनाने वाला ऑक्सीकरण धीमा करते हैं। भारत में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण अनुमत पदार्थ और उनकी अधिकतम मात्रा तय करता है। सुरक्षित मात्रा में वैध परिरक्षक और मिलावट के बीच यही सीमा है। यहाँ संरक्षण केवल रसायन का नहीं, खाद्य सुरक्षा और शासन का प्रश्न भी बन जाता है।

इन सबको जोड़ने पर शीत शृंखला सामने आती है। यह खेत से थाली तक प्रशीतित भंडारण और परिवहन की ऐसी लगातार व्यवस्था है जिसमें जल्दी खराब होने वाले भोजन का तापमान बढ़ने नहीं दिया जाता। यह किसी एक तकनीक से अधिक बुनियादी ढाँचे का प्रश्न है और भारत के लिए बड़े लाभ यहीं छिपे हैं। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की एकीकृत शीत शृंखला योजना (Integrated Cold Chain Scheme) और संबंधित अभियानों के अंतर्गत प्रशीतित ट्रक, पैक-हाउस, पकाने वाले कक्ष और शीत भंडार बनाए जा रहे हैं। इनसे कटाई-पश्चात हानि घट सकती है, किसान की आय बढ़ सकती है और फल, सब्जी, दूध व मांस की आपूर्ति स्थिर रह सकती है। अच्छी सुविधा में विकिरित आम भी बिना ठंड वाले ट्रक में दो दिन पड़ा रहे तो सड़ जाएगा। इसलिए पूरी शृंखला को ठंडा और अखंड रखना सबसे जरूरी है।

मुख्य परीक्षा के उत्तर में कैसे लिखें?

यह विषय सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, स्वदेशीकरण, तकनीक के अनुप्रयोग, खाद्य प्रसंस्करण, खाद्य सुरक्षा और किसान आय वाले हिस्सों से जुड़ता है। खाद्य विकिरण भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम और भाभा केंद्र से, शीत शृंखला कटाई-पश्चात हानि व खाद्य प्रसंस्करण से और खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण वाला पक्ष नियमन से जुड़ता है। प्रारंभिक परीक्षा में सुखाने, पाश्चुरीकरण या निर्वात पैकिंग का सिद्धांत सीधे पूछा जा सकता है। यही सामग्री खाद्य सुरक्षा या उपयुक्त प्रौद्योगिकी पर निबंध को भी मजबूत करती है। अंक पाने का तरीका साफ है: पहले क्रियाविधि समझाइए, फिर उसका भारतीय उपयोग जोड़िए।

उत्तर की रचना

सूची से नहीं, मूल सिद्धांत से शुरू करें। लिखें कि खाद्य संरक्षण सूक्ष्मजीवी वृद्धि और एंजाइम क्रिया को धीमा या बंद करता है। फिर तकनीकों को उनके निशाने के अनुसार बाँटें: पानी के लिए सुखाना और नमक; तापमान के लिए प्रशीतन और जमाना; पीएच के लिए अचार और किण्वन; ऑक्सीजन के लिए निर्वात व परिवर्तित वायुमंडल; तथा प्रत्यक्ष विनाश के लिए डिब्बाबंदी, पाश्चुरीकरण और विकिरण। अंत में भारत की कटाई-पश्चात हानि, शीत शृंखला, भाभा केंद्र और खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण जोड़ें। सिद्धांत, क्रियाविधि के आधार पर वर्गीकरण और भारतीय उपयोग का यह क्रम उत्तर को सुव्यवस्थित बनाता है।

आम गलतियाँ

निर्वात पैकिंग को सूक्ष्मजीव मारने की तकनीक न लिखें। यह ऑक्सीजन हटाकर वायवीय जीव और ऑक्सीकरण धीमे करती है, लेकिन क्लॉस्ट्रिडियम जैसे अवायवीय जीवों को बढ़ावा दे सकती है। इसलिए ठंड जरूरी है। पाश्चुरीकरण को पूर्ण निर्जीवीकरण न मानें। पाश्चुरीकरण रोगकारी और खराब करने वाले जीवों को मारता है, जबकि डिब्बाबंदी और अति-उच्च तापमान प्रसंस्करण का लक्ष्य व्यावसायिक निर्जीवता है। यह भी न लिखें कि जमाने से सूक्ष्मजीव मर जाते हैं; वे केवल निष्क्रिय होते हैं। और एंजाइमों को न भूलें। भोजन केवल सूक्ष्मजीवों से खराब नहीं होता। इसी कारण हल्का उबालना (blanching) जैसी विधियाँ भोजन के अपने एंजाइम निष्क्रिय करती हैं।

संक्षिप्त उत्तर-ढाँचा

खराब होना = सूक्ष्मजीवी वृद्धि + एंजाइम क्रिया + ऑक्सीकरण → पानी हटाएँ: सुखाना, नमक और परासरण से कम जल सक्रियता → तापमान घटाएँ: प्रशीतन धीमा करता है, जमाने से पानी बर्फ बनता है, पर जीव मरते नहीं → पीएच घटाएँ: अचार और किण्वन → गैस हटाएँ या बदलें: निर्वात वायवीय जीव घटाता है पर अवायवीय जीवों को बढ़ा सकता है, इसलिए ठंड जरूरी; परिवर्तित वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड जोड़ी जाती है → जीव नष्ट करें: एपर्ट की डिब्बाबंदी, पाश्चर का पाश्चुरीकरण, अति-उच्च तापमान और डीएनए को नुकसान पहुँचाने वाली गामा किरणें → खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण की सीमा में सोडियम बेंजोएट, नाइट्राइट और प्रतिऑक्सीकारक → भारत में प्याज, आलू, मसाले व आम के लिए भाभा केंद्र का विकिरण और कटाई-पश्चात हानि घटाने वाली शीत शृंखला।

आरेख कैसे बनाएँ?

दो शाखाओं वाला सरल पेड़ बनाएँ। ऊपर लिखें “भोजन क्यों खराब होता है?” और नीचे दो शाखाएँ रखें: सूक्ष्मजीवी वृद्धि तथा एंजाइम क्रिया। फिर पानी, तापमान, ऑक्सीजन, पीएच और प्रत्यक्ष विनाश के नीचे संबंधित तकनीकें जोड़ें। ऐसा वर्गीकरण दिखाता है कि आपको केवल शब्द नहीं, उनके पीछे का तर्क समझ में आता है। यही आरेख पुनरावृत्ति मानचित्र भी बन सकता है।

संतुलित निष्कर्ष

आप लिख सकते हैं: “खाद्य संरक्षण का मूल विचार भोजन को सूक्ष्मजीवों के लिए अनुपयुक्त और उसके अपने एंजाइमों के लिए शांत स्थान बनाना है। भारत के लिए असली चुनौती किसी एक तकनीक से अधिक मजबूत शीत शृंखला और स्वदेशी विकिरण क्षमता बनाना है, ताकि उपज का लगभग एक-चौथाई हिस्सा खाने से पहले खराब न हो।”

आँकड़ों का सही उपयोग

बहुत सारे आँकड़े भरने की जरूरत नहीं है। कुछ मजबूत आधार पर्याप्त हैं: फल-सब्जियों की कटाई-पश्चात हानि लगभग एक-चौथाई से एक-तिहाई; पाश्चुरीकरण करीब 72°C पर कुछ सेकंड और अति-उच्च तापमान प्रसंस्करण करीब 135°C पर कुछ सेकंड; विकिरण और शीत भंडारण से रबी प्याज साढ़े सात महीने तक ताजा; तथा गामा किरणों का स्रोत कोबाल्ट-60। दिसंबर 2025 के पत्र सूचना कार्यालय के उल्लेख की तरह स्रोत साफ लिखें और उत्तर का भार आँकड़ों के बजाय क्रियाविधि पर रखें।

सामान्य प्रश्न

सभी खाद्य संरक्षण विधियों का मूल सिद्धांत क्या है? हर विधि भोजन खराब करने वाली दो प्रक्रियाओं को धीमा या बंद करती है: सूक्ष्मजीवों की वृद्धि और भोजन के अपने एंजाइमों की क्रिया, जिनके साथ ऑक्सीकरण भी चलता है। इसके लिए पानी हटाया जाता है, तापमान या पीएच घटाया जाता है, ऑक्सीजन हटाई या बदली जाती है अथवा सूक्ष्मजीव सीधे नष्ट किए जाते हैं। भोजन को सूक्ष्मजीवों के रहने लायक न छोड़ें, तो वह अधिक समय टिकता है।

क्या निर्वात पैकिंग जीवाणुओं को मारती है या भोजन को अपने-आप सुरक्षित बनाती है? नहीं। यह केवल ऑक्सीजन हटाती है। इससे ऑक्सीकरण और वायवीय सूक्ष्मजीव धीमे होते हैं, लेकिन जीव मरते नहीं। ऑक्सीजन हटने पर क्लॉस्ट्रिडियम बोटुलिनम जैसे अवायवीय जीवों को लाभ मिल सकता है। इसलिए जल्दी खराब होने वाले निर्वात-पैक भोजन को प्रशीतित या जमा हुआ रखना जरूरी है।

पाश्चुरीकरण, अति-उच्च तापमान प्रसंस्करण और निर्जीवीकरण में क्या अंतर है? पाश्चुरीकरण दूध को लगभग 72°C पर कुछ सेकंड गरम करके रोगकारी व खराब करने वाले जीवों को मारता है। ऐसा भोजन फिर भी ठंडा रखना पड़ता है और कुछ दिन टिकता है। अति-उच्च तापमान प्रसंस्करण में लगभग 135°C पर कुछ सेकंड गर्मी दी जाती है। इसका और पूर्ण निर्जीवीकरण का लक्ष्य व्यावसायिक निर्जीवता है, इसलिए बंद दूध या डिब्बाबंद भोजन कमरे के तापमान पर सप्ताहों या वर्षों तक टिक सकता है।

भारत में खाद्य विकिरण का उपयोग कैसे होता है और क्या यह सुरक्षित है? नियंत्रित गामा किरणें सूक्ष्मजीवों, कीटों और अंकुर बनाने वाली कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुँचाती हैं, पर भोजन को बहुत गरम नहीं करतीं। भारत में भाभा केंद्र और परमाणु ऊर्जा विभाग इसका उपयोग आलू-प्याज का अंकुरण रोकने, मसाले-दाल से कीट हटाने और निर्यात के लिए आम की भंडारण अवधि बढ़ाने में करते हैं। खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण अनुमत मात्रा नियंत्रित करता है और इस प्रक्रिया से भोजन रेडियोधर्मी नहीं बनता।

अभ्यास प्रश्न

प्रारंभिक परीक्षा बहुविकल्पीय प्रश्न

  1. अधिकतर खाद्य संरक्षण विधियों का साझा मूल सिद्धांत क्या है?
    (a) भोजन की कोशिकाओं को मजबूत करने वाले पोषक तत्त्व जोड़ना
    (b) सूक्ष्मजीवी वृद्धि और एंजाइम क्रिया को धीमा या बंद करना
    (c) भोजन के आसपास ऑक्सीजन बढ़ाना
    (d) भोजन की जल सक्रियता बढ़ाना
    उत्तर: (b) संरक्षण भोजन को खराब करने वाले सूक्ष्मजीवों के लिए अनुपयुक्त बनाता है और उसके अपने एंजाइम निष्क्रिय करता है। कई विधियाँ ऑक्सीकरण भी धीमा करती हैं।
  2. नमक और चीनी मुख्यतः किस प्रक्रिया से भोजन बचाते हैं?
    (a) गर्मी से सूक्ष्मजीव मारकर
    (b) पीएच को 4.5 से कम करके
    (c) परासरण से भोजन और सूक्ष्मजीवी कोशिकाओं का पानी बाहर खींचकर
    (d) ऑक्सीजन की जगह कार्बन डाइऑक्साइड भरकर
    उत्तर: (c) अधिक नमक या चीनी परासरण से पानी बाहर खींचते हैं। इससे भोजन और सूक्ष्मजीव निर्जलित होते हैं तथा जल सक्रियता घटती है।
  3. निर्वात पैकिंग के संदर्भ में इन कथनों पर विचार करें:
    1. नमी का निर्वात में बंद भोजन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
    2. कम ऑक्सीजन खराब होने और वसा के बासी पड़ने वाली ऑक्सीकरण क्रियाएँ धीमी करती है।
    3. कुछ अवायवीय सूक्ष्मजीव निर्वात में भी बढ़ सकते हैं। कौन-से कथन सही हैं?
    (a) केवल 1 और 2
    (b) केवल 2 और 3
    (c) केवल 1 और 3
    (d) 1, 2 और 3
    उत्तर: (b) नमी का प्रभाव पड़ता है, ऑक्सीजन हटने से ऑक्सीकरण घटता है और क्लॉस्ट्रिडियम जैसे अवायवीय जीव फिर भी बढ़ सकते हैं। इसलिए प्रशीतन जरूरी है।
  4. पाश्चुरीकरण के बारे में कौन-सा कथन सही है?
    (a) यह भोजन को पूरी तरह निर्जीव कर देता है, इसलिए ठंड की जरूरत नहीं रहती
    (b) यह भोजन को पकाए बिना रोगकारी और खराब करने वाले जीवों को मारने के लिए हल्की गर्मी देता है
    (c) यह भोजन का सारा पानी निकाल देता है
    (d) यह सूक्ष्मजीव मारने के लिए गामा विकिरण उपयोग करता है
    उत्तर: (b) दूध को लगभग 72°C पर कुछ सेकंड गरम करने जैसी प्रक्रिया हानिकारक जीव मारती है। फिर भोजन ठंडा करके आम तौर पर प्रशीतित रखा जाता है।
  5. भारत में प्याज-आलू का अंकुरण रोकने और मसालों से कीट हटाने वाला खाद्य विकिरण मुख्यतः किस स्रोत व क्रियाविधि पर आधारित है?
    (a) भोजन गरम करने वाली पराबैंगनी किरणें
    (b) पानी उबालने वाली सूक्ष्मतरंगें
    (c) सूक्ष्मजीवों और अंकुर कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुँचाने वाली कोबाल्ट-60 की गामा किरणें
    (d) भोजन में परिरक्षक जोड़ने वाली एक्स किरणें
    उत्तर: (c) कोबाल्ट-60 की गामा किरणें भोजन को बहुत गरम किए बिना कोशिकीय डीएनए को नुकसान पहुँचाती हैं। भारत में भाभा केंद्र इसका नेतृत्व करता है और खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण इसे नियंत्रित करता है।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न

  1. “सभी खाद्य संरक्षण विधियाँ एक ही मूल सिद्धांत पर टिकी हैं।” इस कथन को समझाइए और प्रमुख तकनीकों को उस कारक के आधार पर वर्गीकृत कीजिए जिसे वे निशाना बनाती हैं। (15 अंक, 250 शब्द)
  2. आम धारणा है कि निर्वात पैकिंग अपने-आप भोजन को सुरक्षित बना देती है। अवायवीय सूक्ष्मजीवों और प्रशीतन की जरूरत के संदर्भ में इसके विज्ञान, लाभ और सीमाओं की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
  3. भारत की खाद्य सुरक्षा मजबूत करने में खाद्य विकिरण की भूमिका पर चर्चा कीजिए। भाभा केंद्र और खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण इसके सुरक्षित व प्रभावी उपयोग में कैसे योगदान देते हैं? (15 अंक, 250 शब्द)
  4. पाश्चुरीकरण, अति-उच्च तापमान प्रसंस्करण और निर्जीवीकरण में अंतर बताइए तथा समझाइए कि हर विधि भोजन की भंडारण अवधि और भंडारण जरूरत कैसे तय करती है। (10 अंक, 150 शब्द)
  5. भारत अपनी उपज का बड़ा हिस्सा कटाई-पश्चात खराब होने से खो देता है। मूल्यांकन कीजिए कि उपयुक्त संरक्षण तकनीकों के साथ एकीकृत शीत शृंखला इस चुनौती को कैसे कम कर सकती है। (15 अंक, 250 शब्द)

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

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