UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

NCSC और NCST: अनुच्छेद 338 और 338A, ताक़त, हद और सुधार

अनुच्छेद 338 और 338A के तहत बने ये संवैधानिक आयोग जाँच में सिविल कोर्ट जितने ताक़तवर हैं, पर इनकी सिफ़ारिश मानने को कोई बाध्य नहीं। रुतबे और अमल का पूरा फ़ासला।

Four live routes carrying evidence into a commission, and a single dashed outbound route that stops short of a row of unconnected authorities

NCSC और NCST — राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग — अनुच्छेद 338 और 338A के तहत बने संवैधानिक निकाय हैं, और इनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है कि इनकी बात मानने को कोई बाध्य नहीं है। जाँच करते वक़्त इनके पास सिविल कोर्ट जितनी ताक़त होती है और हैसियत एक संवैधानिक संस्था की, लेकिन किसी से अपनी बात मनवाने का अधिकार नहीं। रुतबे और अमल के बीच का यही फ़ासला परीक्षा का जाना-पहचाना सवाल है।

संवैधानिक सफ़र

पड़ावक्या हुआ
1950अनुच्छेद 338 ने SC और ST के लिए एक विशेष अधिकारी का इंतज़ाम किया, जिन्हें बाद में आयुक्त कहा गया
1978प्रस्ताव के ज़रिए कई सदस्यों वाला आयोग बना, जिसे कोई कानूनी दर्जा नहीं था
65वाँ संशोधन, 1990विशेष अधिकारी की जगह SC और ST के लिए कई सदस्यों वाला राष्ट्रीय आयोग आया
89वाँ संशोधन, 2003आयोग दो हिस्सों में बँटा — NCSC (अनुच्छेद 338) और NCST (अनुच्छेद 338A), 2004 से लागू
102वाँ संशोधन, 2018इसी ढाँचे पर राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को अनुच्छेद 338B के तहत संवैधानिक दर्जा मिला

कौन-कौन होता है

  • NCSC में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और तीन और सदस्य होते हैं, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुहर वाले अधिपत्र से करते हैं।
  • NCST में भी एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और तीन और सदस्य होते हैं, और इनमें कम से कम एक महिला होनी ज़रूरी है।
  • सेवा शर्तें और कार्यकाल राष्ट्रपति के बनाए नियमों से तय होते हैं।

काम और ताक़त

  • जाँच और निगरानी — संविधान या किसी कानून के तहत SC या ST को मिली सुरक्षा से जुड़े हर मामले को देखना और यह परखना कि वे ज़मीन पर कैसे चल रहे हैं।
  • शिकायतों की सुनवाई — अधिकार और सुरक्षा छिनने की ख़ास शिकायतों पर जाँच करना।
  • योजना पर सलाह — सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना पर राय देना, और देखना कि केंद्र और राज्यों में कितनी प्रगति हुई।
  • सालाना रिपोर्ट — राष्ट्रपति को हर साल, और जब आयोग ठीक समझे तब भी, रिपोर्ट देना। ये रिपोर्टें संसद के सामने रखी जाती हैं, साथ में एक ज्ञापन भी जो बताता है कि कोई सिफ़ारिश क्यों नहीं मानी गई।
  • सिविल कोर्ट की ताक़त — जाँच के दौरान: किसी को बुलाना और हाज़िर कराना, दस्तावेज़ माँगना, हलफ़नामे पर सबूत लेना, सरकारी रिकॉर्ड मँगाना और कमीशन जारी करना।
  • सलाह लेना ज़रूरी: SC या ST से जुड़ी हर बड़ी नीति पर केंद्र और हर राज्य सरकार को आयोग से सलाह लेनी ही पड़ती है।
  • NCST के पास अनुसूचित क्षेत्रों में खनिज और वन अधिकारों से जुड़े मामले भी हैं, और NCSC का दायरा एंग्लो-इंडियन तक जाता है — अनुच्छेद 338B आने से पहले OBC भी इसी के पास थे।

ताक़त कहाँ जाकर रुक जाती है

  • सिफ़ारिशें मानना ज़रूरी नहीं। कोई प्रावधान किसी अफ़सर को आयोग की बात मानने पर बाध्य नहीं करता।
  • सज़ा देने का हक़ नहीं। आयोग न बात न मानने पर सज़ा दे सकता है, न हक़ के तौर पर मुआवज़ा दिला सकता है, न मुक़दमा चला सकता है।
  • रिपोर्ट में देरी। सालाना रिपोर्टें सालों देर से सदन में रखी जाती रही हैं, और की-गई-कार्रवाई ज्ञापन उससे भी देर से। इससे जवाबदेही का वह चक्र टूट जाता है जो संविधान ने बनाया था।
  • खाली पद और स्टाफ़। अध्यक्ष और सदस्यों के पद लंबे-लंबे समय तक खाली पड़े रहे हैं, और जाँच करने वाला स्टाफ़ ज़्यादातर उन्हीं विभागों से प्रतिनियुक्ति पर आता है जिनकी जाँच होनी है।
  • तालमेल के बिना ओवरलैप — SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तंत्र, NHRC और राज्य आयोगों के साथ काम बँटा हुआ नहीं है।
NCSC और NCST जाँच करते वक़्त किससे जवाब माँग सकते हैं और क्या लागू नहीं करा सकते, साथ में 1950 से 2018 तक इन आयोगों का संवैधानिक सफ़र
अंदर जाती है सिविल कोर्ट की ताक़त, बाहर आती है सिर्फ़ सलाह। यही फ़र्क़ बताता है कि संवैधानिक दर्जे से पालन क्यों नहीं आया।

इन्हें मज़बूत कैसे किया जाए

  • हर अफ़सर पर कानूनी ज़िम्मेदारी हो कि तय समय में या तो सिफ़ारिश पर अमल करे या वजह बताकर मना करे, और चूक की जानकारी संसद तक पहुँचे।
  • सालाना रिपोर्ट और की-गई-कार्रवाई ज्ञापन सदन में रखने की एक आख़िरी तारीख़ तय हो।
  • जाँच के लिए अपना अलग कैडर हो, न कि उन्हीं विभागों से प्रतिनियुक्ति पर आए लोग।
  • नियुक्तियाँ साफ़-सुथरी और कोलेजियम जैसी हों, कार्यकाल तय हो और योग्यता पहले से लिखी हो।
  • अत्याचार निवारण अधिनियम के विशेष न्यायालयों और विशेष लोक अभियोजकों से जोड़कर आयोग को खुद संज्ञान लेने का अधिकार मिले।
  • राज्य और विभाग के हिसाब से एक पालन-सूचकांक छपे, ताकि बात न मानने की साख पर क़ीमत चुकानी पड़े।

यह डिज़ाइन की गड़बड़ी अकेले इन्हीं आयोगों की नहीं है। भारत की निगरानी करने वाली ज़्यादातर संस्थाओं का यही हाल है — संवैधानिक रुतबा, और हाथ में सिर्फ़ सलाह देने की ताक़त। इस पर हमारा नोट नियामक और अर्ध-न्यायिक निकाय देखें। इससे जुड़ा और पढ़ें: NCBC और कमज़ोर वर्गों के लिए कल्याण योजनाएँ

सामान्य प्रश्न

NCSC और NCST किन अनुच्छेदों के तहत बने हैं?

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग अनुच्छेद 338 के तहत बना है और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग अनुच्छेद 338A के तहत। इन्हें 89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 ने अलग किया, जो 2004 से लागू हुआ।

क्या NCSC और NCST की सिफ़ारिशें मानना ज़रूरी है?

नहीं। इनकी जाँच और सिफ़ारिशें सिर्फ़ सलाह होती हैं। किसी अफ़सर पर कानूनी बाध्यता नहीं है कि वह उन पर अमल करे, और आयोग न बात न मानने पर सज़ा दे सकते हैं, न हक़ के तौर पर मुआवज़ा दिला सकते हैं, न मुक़दमा चला सकते हैं। इनके असर की सबसे बड़ी हद यही है।

जाँच करते वक़्त NCSC और NCST के पास कौन-सी ताक़त होती है?

किसी शिकायत की जाँच या पड़ताल करते वक़्त इनके पास मुक़दमा सुन रही सिविल कोर्ट जितनी ताक़त होती है: किसी को बुलाना और हाज़िर कराना, दस्तावेज़ माँगना और पेश कराना, हलफ़नामे पर सबूत लेना, सरकारी रिकॉर्ड मँगाना, और गवाहों और दस्तावेज़ों की जाँच के लिए कमीशन जारी करना।

क्या सरकारों को NCSC और NCST से सलाह लेनी ही पड़ती है?

हाँ। अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों से जुड़ी हर बड़ी नीति पर केंद्र और हर राज्य सरकार को संबंधित आयोग से सलाह लेनी ही पड़ती है। यह संवैधानिक ज़िम्मेदारी है, हालाँकि सलाह की गुणवत्ता हर जगह एक जैसी नहीं रहती।

SC और ST आयोगों को किस संशोधन ने अलग किया?

89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 ने। इसने SC और ST के पुराने साझा राष्ट्रीय आयोग को दो अलग निकायों में बाँट दिया, जो 2004 से प्रभावी हुआ। वह साझा आयोग खुद 65वें संशोधन से 1990 में बना था।

NCSC और NCST को ज़्यादा असरदार कैसे बनाया जा सकता है?

अफ़सरों पर समय-सीमा के भीतर सिफ़ारिश मानने या वजह बताकर मना करने की ज़िम्मेदारी डालकर, सालाना और की-गई-कार्रवाई रिपोर्टें सदन में रखने की कानूनी तारीख़ तय करके, जाँच के लिए अलग स्वतंत्र कैडर बनाकर, नियुक्तियाँ और कार्यकाल साफ़-सुथरे तरीक़े से तय करके, और राज्यवार पालन-सूचकांक छापकर।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

1. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग किस अनुच्छेद के तहत बना है:

  • (a) अनुच्छेद 338
  • (b) अनुच्छेद 338A
  • (c) अनुच्छेद 338B
  • (d) अनुच्छेद 339

उत्तर: (b) अनुच्छेद 338A

2. NCSC और NCST को अलग-अलग किस संशोधन ने किया?

  • (a) 65वाँ संशोधन, 1990
  • (b) 73वाँ संशोधन, 1992
  • (c) 89वाँ संशोधन, 2003
  • (d) 102वाँ संशोधन, 2018

उत्तर: (c) 89वाँ संशोधन, 2003

3. राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा किस अनुच्छेद से मिला:

  • (a) अनुच्छेद 338
  • (b) अनुच्छेद 338A
  • (c) अनुच्छेद 338B
  • (d) अनुच्छेद 340

उत्तर: (c) अनुच्छेद 338B

4. शिकायतों की जाँच करते वक़्त NCSC के पास होती है:

  • (a) आपराधिक अदालत की ताक़त
  • (b) मुक़दमा सुन रही सिविल कोर्ट की ताक़त
  • (c) जाँच की कोई ताक़त नहीं
  • (d) गिरफ़्तार करने की ताक़त

उत्तर: (b) मुक़दमा सुन रही सिविल कोर्ट की ताक़त

5. NCSC की रिपोर्ट किसे सौंपी जाती है:

  • (a) प्रधानमंत्री को
  • (b) लोकसभा अध्यक्ष को
  • (c) राष्ट्रपति को
  • (d) सामाजिक न्याय मंत्रालय को

उत्तर: (c) राष्ट्रपति को

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. क्या NCSC और NCST जैसे संवैधानिक निकायों के पास सामाजिक समानता को ज़मीन पर उतारने लायक़ पर्याप्त ताक़त है? इन्हें संस्था के स्तर पर असरदार बनाने के उपाय सुझाइए।
  2. “संवैधानिक रुतबा तो हो पर बात मनवाने की ताक़त न हो — भारत की निगरानी संस्थाओं की यही बार-बार दोहराई जाने वाली डिज़ाइन की चूक है।” NCSC और NCST के संदर्भ में चर्चा कीजिए।
  3. अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा के तंत्र का 1950 से आज तक का संवैधानिक सफ़र बताइए।
  4. NCSC/NCST और SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तंत्र के बीच के रिश्ते का परीक्षण कीजिए।
  5. SC और ST से जुड़ी बड़ी नीतियों पर सलाह लेना ज़रूरी होने का क्या महत्व है? आकलन कीजिए।

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

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