चुनाव उतना ही ईमानदार माना जाता है जितना लोगों को उस पर भरोसा होता है। यह भरोसा एक सीधी बात पर टिका है: मुकाबला कराने वाली संस्था किसी एक पक्ष के साथ खड़ी न हो। इसलिए “हमारे चुनाव कराने वालों को कौन चुनता है?” केवल प्रक्रिया का सवाल नहीं है। यह पूछता है कि कहीं निर्णायक किसी टीम का ऋणी तो नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने 22 मार्च 2024 को कानून पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया था, पर चुनौती समाप्त नहीं की। 11 दिसंबर 2025 की आधिकारिक वाद सूची में रिट याचिका (सिविल) 14/2024 अब भी दर्ज थी; इससे बाद का कोई अंतिम फैसला नहीं मिला। इसलिए नवीनतम आधिकारिक स्थिति में चुनौती लंबित थी, न कि निपट चुकी।
संविधान ने जान-बूझकर एक रास्ता खुला छोड़ा। अनुच्छेद 324 ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संसद द्वारा बनाए गए कानून के अधीन होगी, लेकिन संसद ने 73 वर्षों तक ऐसा कानून नहीं बनाया। 2023 में बने कानून ने चयन समिति की तीन सीटों में से दो सरकार से जुड़े सदस्यों को दीं। इससे निर्णायक निष्पक्ष रहता है या मैदान एक ओर झुकता है, यही वह प्रश्न है जिसे भावी प्रशासक को दोनों पक्षों से समझना चाहिए।
मुद्दा क्या है
पहले शब्द साफ कर लें, क्योंकि इस विषय की बहुत-सी उलझन भारी शब्दों के ढीले इस्तेमाल से पैदा होती है।
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव कराता है। इसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त, यानी CEC, और दो चुनाव आयुक्त, यानी ECs, होते हैं। थोड़े समय की एक-सदस्यीय व्यवस्था के बाद 1 अक्टूबर 1993 से तीन-सदस्यीय ढाँचा स्थायी हुआ।
अनुच्छेद 324 इसका संवैधानिक आधार है। पहला खंड चुनावों की “अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण” की शक्ति आयोग को देता है, यानी चुनाव प्रक्रिया की पूरी संचालन जिम्मेदारी। दूसरा खंड इस विवाद के केंद्र में है: राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करेंगे, लेकिन यह संसद के कानून के अधीन होगी। संविधान-निर्माताओं ने नियुक्ति की पूरी विधि संविधान में नहीं लिखी; उसे भविष्य के कानून पर छोड़ा। वह कानून 2023 में आया।
दो और शब्द ठीक से समझें। पद की सुरक्षा (security of tenure) बताती है कि नियुक्त व्यक्ति को हटाना कितना कठिन है। अनुच्छेद 324(5) में जान-बूझकर अंतर है। मुख्य चुनाव आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी संसदीय महाभियोग प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है, वह भी सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता पर। लेकिन दो चुनाव आयुक्त के पास वही सुरक्षा नहीं है; उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर हटाया जा सकता है। इसलिए संरचना में बाकी दो आयुक्त मुख्य आयुक्त से कम सुरक्षित हैं।
स्वतंत्रता (independence) का अर्थ किसी व्यक्ति की निजी ईमानदारी भर नहीं है। ईमानदार व्यक्ति भी कमजोर कुर्सी पर बैठ सकता है। असली कसौटी यह है कि नियुक्ति, वेतन और पद-सुरक्षा में संस्था उस सरकार से कितनी दूर है जिसके आचरण पर उसे फैसला देना है।
विवाद यह नहीं कि ECI जरूरी है। विवाद यह है कि मौजूदा चयन-विधि उसके सदस्यों को सरकार के विरुद्ध भी निष्पक्ष फैसला देने की वास्तविक और दिखने वाली आजादी देती है या नहीं।
तथ्य क्या बताते हैं
बदलाव समझने का सबसे साफ तरीका दोनों नियुक्ति समितियों को साथ रखकर देखना है। कागज पर सदस्य सिर्फ एक बदला, लेकिन असर बहुत बड़ा हुआ।
2 मार्च 2023 के अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ फैसले में न्यायमूर्ति के.एम. जोसेफ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीश संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से कहा कि केवल कार्यपालिका की सलाह पर मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति आयोग की स्वतंत्रता छीनती है और असंवैधानिक है। अनुच्छेद 324(2) का कानून 73 वर्षों से नहीं बना था। इस खाली जगह को “संसद के कानून बनाने तक” भरने के लिए न्यायालय ने प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली अस्थायी समिति बनाई। इसमें एक सरकारी, एक विपक्षी और एक तटस्थ न्यायिक सदस्य था; किसी एक पक्ष का तय बहुमत नहीं था।
इसके बाद संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 बनाया। इसे 28 दिसंबर 2023 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और 2 जनवरी 2024 से लागू हुआ। समिति में प्रधानमंत्री अध्यक्ष, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता हैं। मुख्य न्यायाधीश हटा दिए गए। अब गणित दो सरकारी आवाजों के मुकाबले एक विपक्षी आवाज का है, इसलिए कार्यपालिका 2-1 से अपनी पसंद पारित करा सकती है।
दूसरा बदलाव वेतन का है। 1991 के पुराने कानून में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त का वेतन व सेवा-शर्तें सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर थीं, जिनका वेतन संसद के कानून से तय होता है। 2023 के कानून ने इन्हें कैबिनेट सचिव के बराबर कर दिया, जिसका वेतन वेतन आयोग की सलाह पर सरकार तय करती है। यह केवल दर्जे का बदलाव नहीं; संस्था अपने वेतन के मामले में कार्यपालिका के एक कदम और पास आ जाती है।
एक और संरचनात्मक तथ्य देखें। ECI का बजट संसद में मतदान से मंजूर (voted) होता है; वह भारत की संचित निधि पर भारित (charged) नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और CAG का वेतन भारित खर्च है, जिस पर सालाना मतदान नहीं होता। आयोग के संचालन खर्च को हर साल सरकार की अनुदान-माँग से गुजरना पड़ता है।
इस कानून का पहला व्यावहारिक परीक्षण हो चुका है। ज्ञानेश कुमार 2023 के कानून के तहत नियुक्त पहले मुख्य चुनाव आयुक्त बने। कानून मंत्रालय की अधिसूचना 17 फरवरी 2025 की थी और नियुक्ति 19 फरवरी से प्रभावी हुई। प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और विपक्ष के नेता वाली समिति ने नाम मंजूर किया; विपक्ष के नेता ने लिखित असहमति दी कि समिति की वैधता पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई से 48 घंटे से भी कम पहले नियुक्ति नहीं होनी चाहिए। यानी कानून अब सैद्धांतिक नहीं रहा; इससे देश का मुख्य चुनाव निर्णायक चुना जा चुका है।


कानून के पक्ष में तर्क
2023 के कानून का बचाव आलोचक जितना सरल बताते हैं, उससे मजबूत है। अच्छे उत्तर में उसकी आलोचना से पहले उसका सबसे अच्छा रूप ईमानदारी से रखना चाहिए।
पहला तर्क संविधान के शब्दों से आता है। अनुच्छेद 324(2) नियुक्ति को केवल संसदीय कानून की अनुमति नहीं देता, बल्कि उसे ऐसे कानून के अधीन रखता है। इस पढ़त में नियम बनाने वाली निर्वाचित संसद है, न्यायालय नहीं। अनूप बरनवाल ने भी अपनी समिति को “संसद के कानून बनाने तक” की व्यवस्था कहा था। समर्थकों का कहना है कि संसद ने अब वही काम किया है जिसे संविधान ने उसे सौंपा था; न्यायालय की अस्थायी समिति विधिवत बने कानून से ऊपर नहीं हो सकती।
शक्तियों के पृथक्करण का तर्क उलटी दिशा में भी जाता है। मुख्य न्यायाधीश को कार्यपालिका की नियुक्ति समिति में रखने से न्यायपालिका एक प्रशासनिक, गैर-न्यायिक काम में आती है। बाद में उसी न्यायाधीश को अपने चुने अधिकारी से जुड़े विवाद सुनने पड़ सकते हैं। न्यायाधीश को समिति से बाहर रखने पर वह चुनावी विवादों का स्वतंत्र निर्णय कर सकता है। यहां आयोग की स्वतंत्रता के साथ न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी मूल्य है।
लोकतांत्रिक जवाबदेही भी एक तर्क है। प्रधानमंत्री और कैबिनेट मंत्री संसद तथा अंततः मतदाताओं को जवाब देते हैं; निर्वाचित न हुआ न्यायाधीश वैसी राजनीतिक जवाबदेही नहीं रखता। इस नजरिये से निर्वाचित पदाधिकारियों को अधिक वजन देने वाली समिति अधिक लोकतांत्रिक वैधता रखती है।
ईमानदार तुलना केवल अनूप बरनवाल समिति से नहीं, 2023 से पहले की व्यवस्था से भी होनी चाहिए। तब राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर नियुक्ति करते थे; न कोई वैधानिक चयन समिति, न खोज प्रक्रिया और न लिखित पात्रता मानदंड था। 2023 के कानून ने पहली बार वैधानिक चयन समिति, कैबिनेट सचिव के अधीन पांच नाम चुनने वाली खोज समिति और पात्रता नियम बनाए। पुरानी वास्तविक स्थिति के मुकाबले इसमें प्रक्रिया और विपक्ष की औपचारिक सीट जुड़ी। सुनवाई में पीठ ने यह भी पूछा कि क्या न्यायालय संसद को किसी खास तरह का कानून बनाने का निर्देश दे सकता है; यही न्यायिक कानून-निर्माण की सीमा का प्रश्न है।
कानून के विरुद्ध तर्क
इस बचाव की सीमा भी है। कोई समिति वैधानिक, लिखित और खुली दिखते हुए भी अपने अंकगणित में असंतुलित हो सकती है। डॉ. जया ठाकुर और लोकतांत्रिक सुधार संघ (Association for Democratic Reforms) सहित याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 2023 का कानून रूप में स्वतंत्रता, पर व्यवहार में कार्यपालिका का नियंत्रण देता है।
मुख्य आपत्ति 2-1 के गणित पर है। प्रधानमंत्री और उन्हीं के नामित मंत्री के कारण कार्यपालिका के पास तीन में दो मत हैं; विपक्ष का नेता अकेला और हमेशा पीछे रहने वाला सदस्य है। जिस समिति में एक पक्ष हार ही नहीं सकता, वह प्रभावी रोक नहीं, केवल समिति जैसी दिखने वाली औपचारिकता है।
याचिकाकर्ताओं का दूसरा तर्क अनूप बरनवाल के उद्देश्य से जुड़ा है। न्यायालय ने कार्यपालिका के एकाधिकार को तोड़ने के लिए मुख्य न्यायाधीश जोड़ा था। तटस्थ सदस्य की जगह कैबिनेट मंत्री रखना उसी असंतुलन की ओर वापसी माना जा सकता है जिसे संविधान पीठ ने गलत कहा था। दूसरी ओर इसे संसद का संवैधानिक अधिकार भी पढ़ा जा सकता है। यही चुनौती जीवित है: 22 मार्च 2024 को अंतरिम रोक नहीं मिली, पर मुकदमा खत्म नहीं हुआ; 11 दिसंबर 2025 की आधिकारिक सूची में वह लंबित था।
इसके नीचे हितों के टकराव का प्रश्न है। ECI आदर्श आचार संहिता, चुनाव तिथियों और मंत्रियों की शिकायतों पर सरकार के विरुद्ध भी निर्णय देता है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार उसी सरकार को निर्णायक चुनने की प्रभावी शक्ति देना ऐसा है जैसे एक टीम अपने मैच का निर्णायक चुने। चयन प्रक्रिया सरकार-नियंत्रित दिखे तो व्यक्तिगत रूप से ईमानदार आयुक्त पर भी विश्वसनीयता का बोझ आता है।
दो बारीक बातें यह तर्क पूरा करती हैं। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश से कैबिनेट सचिव के बराबर वेतन करने पर संरचनात्मक दूरी घटती है। और कानून की “रिक्ति के बावजूद वैध” धारा विपक्ष के नेता की अनुपस्थिति या असहमति में भी नियुक्ति चलने देती है, जिससे विपक्ष की अकेली रोक कमजोर होती है। फरवरी 2025 की नियुक्ति पर इसी कारण न्यायिक समीक्षा से पहले कदम उठाने की आलोचना हुई।

गहरी संरचनात्मक तस्वीर
तुरंत चल रही बहस से थोड़ा पीछे हटें तो लंबा ढाँचा दिखता है। यही दृष्टि मुख्य परीक्षा के उत्तर में विषय को नई दिशा देती है।
यह अचानक पैदा हुई 2023 की समस्या नहीं है। 1990 की दिनेश गोस्वामी समिति ने राष्ट्रपति को मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता से सलाह लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त चुनने की सिफारिश की। 2002 में संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग (NCRWC) ने कॉलेजियम जैसी नियुक्ति का समर्थन किया। 2007 के द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने कानून मंत्री और राज्यसभा के उपसभापति को भी जोड़ने वाला व्यापक कॉलेजियम सुझाया। 2015 की विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट ने प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश का कॉलेजियम तथा तीनों आयुक्तों को समान हटाने की सुरक्षा सुझाई। चार विशेषज्ञ संस्थाएं, तीन दशक और एक दिशा: कार्यपालिका के एकाधिकार से दूर। 2023 का कानून इस क्रम में समिति को चौड़ा करने के बजाय संकरा करता है।
2023 का कानून पद-सुरक्षा का अंतर भी नहीं मिटाता। मुख्य चुनाव आयुक्त को न्यायाधीश जैसी सुरक्षा है, पर चुनाव आयुक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर हटाया जा सकता है। अनूप बरनवाल में न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी ने सहमति मत में कहा था कि अनुच्छेद 324(5) की महाभियोग जैसी सुरक्षा सभी चुनाव आयुक्त को मिले। जिसे मुख्य आयुक्त से आसानी से हटाया जा सके, वह दबाव के प्रति अधिक खुला रहता है। केवल शीर्ष पद की स्वतंत्रता पूरी संस्था की स्वतंत्रता नहीं बनती।
इस पद पर इतनी बहस की एक वजह टी.एन. शेषन की विरासत है। 1990 से 1996 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए उन्होंने सुस्त मानी जाने वाली संस्था को दृढ़ बनाया, आदर्श आचार संहिता सख्ती से लागू की, मतदाता पहचान पत्र आगे बढ़ाए और बूथ कब्जे पर कार्रवाई की। इससे दिखा कि संस्था की ताकत कुर्सी पर बैठे व्यक्ति से भी आती है। 1993 में आयोग को तीन-सदस्यीय बनाने का उन्होंने विरोध किया, पर टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ में न्यायालय ने बहुमत से निर्णय लेने वाले बहु-सदस्यीय ढाँचे को सही माना। तीन-सदस्यीय व्यवस्था भी कार्यपालिका और मुखर मुख्य चुनाव आयुक्त के टकराव की पृष्ठभूमि में बनी थी।
संरचनात्मक निष्कर्ष यह है: स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के मूल ढाँचे का हिस्सा हैं, जैसा इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण से माना गया। जो निर्णायक अपनी नियुक्ति, वेतन और सालाना बजट के लिए एक टीम पर निर्भर हो, उसकी संरचना पर सवाल उठना स्वाभाविक है। विवाद यह तय करेगा कि स्वतंत्रता तटस्थ सदस्य जैसी प्रक्रिया मांगने वाली संवैधानिक गारंटी है या संसद के किसी भी वैध कानून से पूरी हो जाती है। नवीनतम आधिकारिक सूची में चुनौती लंबित थी, इसलिए निष्कर्ष का अनुमान नहीं लगाना चाहिए। इसका असर ECI से आगे अन्य संवैधानिक नियुक्तियों पर भी पड़ेगा।
क्या सुधार होने चाहिए
निर्णायक को सचमुच सुरक्षित रखने वाली नियुक्ति व्यवस्था कैसी होगी? केवल “और स्वतंत्रता” कहने के बजाय ऐसे ठोस बदलाव बताने चाहिए जिन्हें लागू किया जा सके और जिनके पीछे विशेषज्ञ समर्थन हो।
- समिति में वास्तविक तटस्थ सदस्य लौटे। मुख्य न्यायाधीश, उनके नामित न्यायाधीश या विपक्ष के नेता को वास्तविक वजन मिले, ताकि कार्यपालिका हर चयन 2-1 से न जीत सके। गोस्वामी समिति, NCRWC, द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग और 255वीं विधि आयोग रिपोर्ट का साझा संकेत यही है।
- तीनों आयुक्तों को समान पद-सुरक्षा मिले। अनुच्छेद 324(5) की न्यायाधीश जैसी महाभियोग-आधारित सुरक्षा चुनाव आयुक्त तक बढ़े। जिसे आसानी से हटाया जा सके, उस पर दबाव डालना भी आसान होता है।
- ECI का बजट भारत की संचित निधि पर भारित हो। न्यायपालिका और CAG की तरह खर्च मतदान के बजाय स्वतः देय हो, ताकि निर्णायक को हर साल उसी सरकार से बजट न माँगना पड़े जिसकी निगरानी वह करता है।
- चयन का रिकॉर्ड सार्वजनिक हो। खोज समिति की संक्षिप्त सूची, कसौटियां, अंतिम चुनाव के कारण और बैठक का विवरण प्रकाशित किया जाए। खुली प्रक्रिया आधी रात की नियुक्ति जैसे आरोपों का सबसे मजबूत उत्तर है।
- स्वतंत्र स्थायी सचिवालय बने। ECI का अपना अधिकारी-वर्ग हो, ताकि सरकार की निगरानी करने वाली संस्था रोजमर्रा में पूरी तरह सरकारी अधिकारियों पर निर्भर न रहे।
- पद छोड़ने के बाद विराम-नियम हो। सेवानिवृत्ति के बाद कार्यपालिका के पद स्वीकारने पर कुछ समय की रोक यह धारणा घटाएगी कि आयुक्त भविष्य के लाभ के लिए झुक सकता है।
इनमें से कोई सुधार आयोग को कमजोर नहीं करता। ये उस एक चीज को मजबूत करते हैं जो निर्णायक की सीटी को मान्यता देती है: हारने वाले पक्ष का यह विश्वास कि प्रक्रिया निष्पक्ष थी।
मुख्य परीक्षा के उत्तर के लिए
यह GS2 का महत्त्वपूर्ण विषय है। इसमें संवैधानिक निकाय, शक्तियों का पृथक्करण, न्यायिक समीक्षा और मूल ढाँचा सिद्धांत एक साथ आते हैं, और जीवित मुकदमा इसे समसामयिक आधार देता है।
GS पत्र से संबंध: GS2 में संविधान; वैधानिक, नियामक और संवैधानिक निकाय; अंगों के बीच शक्तियों का पृथक्करण; संवैधानिक पदों पर नियुक्ति; कार्यपालिका और न्यायपालिका का कामकाज।
राजनीति विज्ञान और अंतर्राष्ट्रीय संबंध (PSIR) वैकल्पिक से संबंध: पत्र 1 में भारतीय शासन और राजनीति के अंतर्गत चुनाव तंत्र, संवैधानिक निकाय और संस्थाओं की स्वायत्तता; राजनीतिक सिद्धांत में लोकतंत्र और वैधता की शर्त के रूप में स्वतंत्र चुनाव; विधायी खाली जगह भरने वाला न्यायिक कानून-निर्माण; और इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण में स्वतंत्र चुनाव का मूल ढाँचा। ठोस आधार हो तो अन्य लोकतंत्रों की स्वतंत्र और कार्यपालिका-नियुक्त चुनाव संस्थाओं से तुलना जोड़ सकते हैं।
संभावित प्रश्न:
- निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता इस बात पर उतनी ही निर्भर करती है कि उसके सदस्य कैसे चुने जाते हैं, जितनी इस पर कि वे कौन हैं। अनूप बरनवाल और 2023 के नियुक्ति अधिनियम के संदर्भ में आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
- अनुच्छेद 324 चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संसद के कानून पर छोड़ता है। इस क्षेत्र में संसदीय अधिकार और स्वतंत्र चुनाव निर्णायक की संवैधानिक जरूरत के बीच तनाव समझाइए।
- जिस चयन समिति में कार्यपालिका का पहले से तय बहुमत हो, वह तटस्थ निर्वाचन आयोग की गारंटी नहीं दे सकती। मूल्यांकन कीजिए।
उद्धृत करने योग्य तथ्य और मामले:
- अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ, 2 मार्च 2023: पांच-न्यायाधीश पीठ ने केवल कार्यपालिका की सलाह वाली नियुक्ति असंवैधानिक मानी; संसद के कानून तक प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की अस्थायी समिति बनाई।
- 2023 के कानून को 28 दिसंबर 2023 को स्वीकृति मिली और 2 जनवरी 2024 से लागू हुआ; समिति में प्रधानमंत्री, केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता हैं, इसलिए कार्यपालिका के पास तीन में दो सीटें हैं।
- वेतन-दर्जा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश से बदलकर कैबिनेट सचिव के बराबर हुआ।
- ECI का बजट भारत की संचित निधि पर भारित नहीं, संसद में मतदान से मंजूर होता है।
- ज्ञानेश कुमार कानून के तहत पहले मुख्य चुनाव आयुक्त बने; 17 फरवरी 2025 को अधिसूचना, 19 फरवरी से प्रभाव, और विपक्ष के नेता की लिखित असहमति।
- गोस्वामी समिति 1990, NCRWC 2002, द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग 2007 और 255वीं विधि आयोग रिपोर्ट 2015 ने व्यापक कॉलेजियम का समर्थन किया।
मुख्य शब्द: अनुच्छेद 324, अनुच्छेद 324(2), अनुच्छेद 324(5), अधीक्षण-निर्देशन-नियंत्रण, चयन समिति, पद की सुरक्षा, शक्तियों का पृथक्करण, मूल ढाँचा, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, संस्था की स्वतंत्रता।
पाठ्यक्रम संबंध: संविधान की प्रमुख विशेषताएं, संवैधानिक और वैधानिक निकाय, शक्तियों का पृथक्करण, न्यायिक समीक्षा, संवैधानिक पदों पर नियुक्ति, शासन और पारदर्शिता।
संतुलित निष्कर्ष: संविधान ने नियुक्ति-विधि संसद पर छोड़ी, लेकिन वही संविधान स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को मूल ढाँचे का हिस्सा मानता है। 2023 के कानून की असली कसौटी यह नहीं कि संसद कानून बना सकती थी या नहीं, बल्कि यह है कि उससे चुना निर्णायक उसे चुनने वाली सरकार के विरुद्ध भी गलती की सीटी बजा सकता है या नहीं।
उत्तर कैसे बनाएं
परिभाषा से नहीं, टकराव से शुरुआत करें। संसद के पास नियुक्ति पर कानून बनाने का स्पष्ट अधिकार है, लेकिन संविधान ऐसा निर्णायक भी मांगता है जिस पर हारने वाला पक्ष भरोसा कर सके। पहली दो पंक्तियों में दोनों बातें रखने से परीक्षक को पता चलता है कि आपने असली द्वंद्व पकड़ा है। अनुच्छेद 324 की परिभाषा दूसरी या तीसरी पंक्ति में दें।
संस्थागत इतिहास जल्दी लाएं। अधिकतर उत्तर केवल 2023 और हाल की सुनवाई लिखेंगे। गोस्वामी समिति, NCRWC, द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग और 255वीं रिपोर्ट का एक ही दिशा में जाना दिखाकर आप कानून को 30 वर्ष की सुधार सहमति से अलग रख सकते हैं। यह एक कदम साधारण उत्तर को विश्लेषणात्मक बनाता है।
मुख्य भाग में दोनों पक्षों का सबसे मजबूत रूप दें। सरकार के पाठ-आधारित और शक्तियों के पृथक्करण वाले तर्क को पूरा वजन दें, फिर उसे 2-1 के गणित और हितों के टकराव की कसौटी पर परखें। केवल अभियोजन या केवल बचाव करने वाला उत्तर विश्लेषण के बजाय राय लगता है।
आगे का रास्ता समूहों में रखें: तटस्थ सदस्य, सभी चुनाव आयुक्त को समान पद-सुरक्षा, भारित वित्त, खुला चयन, स्वतंत्र सचिवालय और पदोत्तर विराम। पद की सुरक्षा, मूल ढाँचा और शक्तियों का पृथक्करण जैसे विषय के अपने शब्द इस्तेमाल करें।
अंत नारे पर नहीं, कसौटी पर करें। नवीनतम आधिकारिक सूची में चुनौती लंबित थी और कोई बाद का अंतिम फैसला नहीं मिला; इसलिए परिणाम की भविष्यवाणी न करें। यह सिद्धांत रखें कि न्यायालय को प्रक्रिया से सुरक्षित स्वतंत्रता और संसद के वैध कानून के बीच सीमा तय करनी है।
आम गलतियां
- दल के पक्ष में न लिखें। पक्ष और विपक्ष के हर बिंदु को संबंधित पक्ष का तर्क बताएं; मुकदमे को तथ्य की तरह रखें, अपना फैसला न सुनाएं।
- यह न कहें कि अंतिम फैसला आ गया। 22 मार्च 2024 को अंतरिम रोक नहीं मिली थी, पर चुनौती जीवित रही; 11 दिसंबर 2025 की आधिकारिक सूची में मामला लंबित था।
- दोनों समितियां न मिलाएं। अनूप बरनवाल में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश थे; 2023 के कानून में प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता हैं।
- स्वतंत्रता को निजी ईमानदारी तक न घटाएं। सवाल नियुक्ति, वेतन, पदावधि और हटाने की संरचनात्मक सुरक्षा का है।
- वित्त का पहलू न भूलें। मतदान से मंजूर और संचित निधि पर भारित खर्च का अंतर उत्तर को गहराई देता है।
उत्तर की छोटी रीढ़
- भूमिका: नियुक्ति और स्वतंत्रता का टकराव खोलें; अगली पंक्ति में अनुच्छेद 324 और ECI बताएं।
- बदलाव: अनूप बरनवाल की तटस्थ समिति से 2023 की कार्यपालिका-बहुमत समिति तक जाएं; वेतन और वित्त को सहायक तथ्य बनाएं।
- तर्क: संसदीय अधिकार और न्यायपालिका की स्वतंत्रता वाला पक्ष, फिर कार्यपालिका प्रभुत्व और हितों के टकराव वाला पक्ष।
- संरचनात्मक पहचान: तीन दशक की सुधार सहमति, पद-सुरक्षा का अंतर और मूल ढाँचे में स्वतंत्र चुनाव।
- आगे का रास्ता: संसद, न्यायालय और ECI के लिए स्पष्ट सुरक्षा उपायों के समूह दें।
- निष्कर्ष: संतुलित निष्कर्ष को प्रश्न के ठीक शब्दों के अनुसार ढालें।
आरेख या प्रवाह-चित्र का विचार
15 अंकों के प्रश्न में दो-स्तंभी तुलना सबसे उपयोगी है: “अनूप बरनवाल समिति: प्रधानमंत्री + विपक्ष के नेता + मुख्य न्यायाधीश, कार्यपालिका की 1 सीट” बनाम “2023 कानून: प्रधानमंत्री + कैबिनेट मंत्री + विपक्ष के नेता, कार्यपालिका की 2 सीटें”। परीक्षक तीन सेकंड में झुकाव पढ़ लेगा।
10 अंकों के प्रश्न में छोटी कारण-श्रृंखला बनाएं: कार्यपालिका-बहुमत समिति निर्णायक चुनती है → सरकार-तय वेतन और मतदान वाला बजट → स्वतंत्रता में कमी की धारणा → तटस्थ सदस्य, भारित वित्त और समान पद-सुरक्षा जैसे सुधार। एक साफ तर्क सजावटी जाल से बेहतर है।
नीतिशास्त्र और शासन का पहलू
GS2 के उत्तर में भी शासन-नीति की एक पंक्ति जोड़ें। यहां सबसे गहरी बात सार्वजनिक मूल्य के रूप में धारणा है। शक्तिशाली लोगों के विरुद्ध फैसला देने वाली संस्था केवल निष्पक्ष हो ही नहीं, निष्पक्ष दिखे भी, क्योंकि उसका अधिकार बल नहीं, सहमति पर टिका है। यही “न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए” का सिद्धांत चुनाव निर्णायक पर लागू होता है।
इस मूल्य को संस्थागत रचना में बदलें। केवल “ECI स्वतंत्र होना चाहिए” न कहें; बताएं कैसे: तटस्थ चयनकर्ता, भारित वित्त, समान पद-सुरक्षा और चयन के कारण सार्वजनिक करना। मूल्य को लागू करने योग्य प्रशासनिक व्यवस्था में बदलना ही परिपक्व उत्तर है।
एक उपयोगी वाक्य है: “उद्देश्य वैध है, लेकिन उसकी वैधता ऐसी प्रक्रिया पर निर्भर है जिसे हारने वाला पक्ष भी स्वीकार कर सके।” यह संसद के अधिकार को मानता है, पर उसे असीम छूट नहीं देता। संवेदनशील राजनीतिक प्रश्न में यही संतुलन चाहिए।
आंकड़े यांत्रिक लगे बिना कैसे लिखें
जितने आंकड़े जानते हैं, उससे कम इस्तेमाल करें। तीन आधार पर्याप्त हैं: समिति का गणित, यानी कार्यपालिका की 1 सीट बनाम 3 में 2; वेतन-दर्जा, यानी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश से कैबिनेट सचिव; और चार विशेषज्ञ निकायों की साझा दिशा। पहले गणित, फिर दर्जा और अंत में सुधार सहमति रखें।
तथ्य अकेला न छोड़ें। “कार्यपालिका के पास तीन में दो सीटें हैं” के बाद अर्थ लिखें: सरकार की पसंद समिति में हार नहीं सकती। संख्या आधार है; उसका मतलब अंक दिलाता है। मुख्य परीक्षा में तथ्य कच्चा माल है और निर्णय तैयार उत्तर।
अंत में एक कसौटी लगाएं: क्या थका हुआ परीक्षक इसे एक बार में समझ सकता है? छोटी भूमिका, समिति का बदलाव जल्दी, दोनों पक्ष साफ, आगे का रास्ता समूह में और विवेक दिखाता निष्कर्ष। UPSC में स्पष्टता ही गहराई को दिखाई देती है।
सामान्य प्रश्न
अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ, 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा?
2 मार्च 2023 को पांच-न्यायाधीश संविधान पीठ ने केवल कार्यपालिका की सलाह पर मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति असंवैधानिक मानी, क्योंकि उससे आयोग की स्वतंत्रता खत्म होती थी। “संसद के कानून बनाने तक” पीठ ने प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की अस्थायी चयन समिति बनाई।
2023 के नियुक्ति अधिनियम ने समिति कैसे बदली?
28 दिसंबर 2023 को राष्ट्रपति की स्वीकृति और 2 जनवरी 2024 से लागू कानून ने तीन-सदस्यीय समिति रखी, पर मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री कर दिया। अब प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता हैं, इसलिए कार्यपालिका की तीन में दो सीटें हैं। आयुक्तों का वेतन-दर्जा भी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के बजाय कैबिनेट सचिव के बराबर हुआ।
निर्वाचन आयोग की नियुक्ति-विधि क्यों महत्त्वपूर्ण है?
आयोग आदर्श आचार संहिता, चुनाव तिथियों और मंत्रियों के विरुद्ध शिकायतों पर सरकार के खिलाफ भी निर्णय देता है। इसलिए उसकी विश्वसनीयता किसी एक राजनीतिक पक्ष से संरचनात्मक दूरी पर निर्भर करती है। सवाल व्यक्ति की ईमानदारी नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया का है जिससे संस्था चुनी जाती है।
क्या सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 के कानून की चुनौती का अंतिम फैसला कर दिया है?
मिला हुआ नवीनतम आधिकारिक रिकॉर्ड ऐसा नहीं कहता। 22 मार्च 2024 को सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरिम रोक से इनकार किया, लेकिन चुनौती जीवित रखी। 11 दिसंबर 2025 की आधिकारिक वाद सूची में रिट याचिका (सिविल) 14/2024 अब भी दर्ज थी। इसके बाद का कोई अंतिम निर्णय नहीं मिला, इसलिए सुरक्षित और सही कथन यही है कि नवीनतम आधिकारिक सूची में चुनौती लंबित थी।