भारत में केंद्र सरकार की नौकरियों और शिक्षण-संस्थानों में OBC (Other Backward Classes) आरक्षण 27% है। यह आरक्षण 1980 की मंडल आयोग रिपोर्ट की सिफ़ारिश पर आधारित है और अगस्त 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री V. P. सिंह की सरकार ने इसे केंद्रीय सेवाओं में लागू किया। 1992 के इंदिरा साहनी (Indra Sawhney) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे संवैधानिक रूप से वैध ठहराया, साथ ही कुल आरक्षण की 50% की अधिकतम सीमा तय की और “क्रीमी लेयर” (creamy layer) — संपन्न तबकों — को इसके दायरे से बाहर रखा। वर्तमान (2026) में क्रीमी लेयर की वार्षिक आय-सीमा ₹8 लाख है। संवैधानिक आधार अनुच्छेद 15(4), 15(5), 16(4) और 340 हैं, और निगरानी NCBC (National Commission for Backward Classes) करता है, जिसे 102वें संशोधन (2018) से संवैधानिक दर्जा प्राप्त है।
परिचय

भारतीय संविधान का प्रारंभ “सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय” के संकल्प से होता है। संविधान-निर्माताओं ने यह स्वीकार किया कि सदियों के सामाजिक भेदभाव के कारण कुछ वर्ग शिक्षा, सरकारी सेवा और आर्थिक अवसरों में पिछड़ गए हैं। इसी कारण अनुच्छेद 15 और 16 — जो “समानता” का अधिकार देते हैं — में “विशेष प्रावधानों” (special provisions) की गुंजाइश रखी गई।
SC (अनुसूचित जाति) और ST (अनुसूचित जनजाति) के लिए आरक्षण संविधान लागू होते ही 1950 से शुरू हो गया था, लेकिन OBC के लिए आरक्षण 40 वर्षों की लंबी राजनीतिक यात्रा के बाद 1990 में लागू हो सका। यही यात्रा और इसके संवैधानिक-न्यायिक आयाम UPSC के सामाजिक न्याय (GS-II) के लिए केंद्रीय हैं।
मुख्य तथ्य एक नज़र में
- केंद्रीय OBC आरक्षण: 27% (नौकरी + शिक्षा)
- कुल आरक्षण की अधिकतम सीमा: 50% (इंदिरा साहनी 1992) — हालांकि 103वें संशोधन (EWS 10%) ने इसे प्रभावी रूप से 60% तक पहुँचाया
- क्रीमी लेयर वार्षिक आय-सीमा: ₹8 लाख (2017 से प्रभावी)
- मंडल आयोग का गठन: 1979 (मोरारजी देसाई सरकार); रिपोर्ट 1980
- मंडल आयोग की सिफ़ारिश लागू: 13 अगस्त 1990, V. P. सिंह सरकार
- इंदिरा साहनी निर्णय: 16 नवंबर 1992 (9 न्यायाधीशों की पीठ)
- OBC पहचान करने वाला आयोग: NCBC (National Commission for Backward Classes)
- NCBC का गठन: 1993 (अधिनियम के तहत); संवैधानिक दर्जा 2018 (102वाँ संशोधन)
- संबंधित अनुच्छेद: 15(4), 15(5), 16(4), 16(4-A), 16(4-B), 338-B, 340
- केंद्रीय OBC सूची में जातियाँ: लगभग 2,650 (राज्य-वार भिन्न)
- रोहिणी आयोग: OBC के उप-वर्गीकरण (sub-categorisation) के लिए 2017 में गठित
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
स्वतंत्रता-पूर्व काल में 1882 में हंटर शिक्षा आयोग और 1918 में मैसूर के मिलर आयोग ने पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान की वकालत की। 1921 में मद्रास प्रेसीडेंसी और बाद में मैसूर रियासत ने जातिगत आरक्षण लागू किया।
संविधान सभा में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अनुच्छेद 16(4) के अंतर्गत यह प्रावधान रखा कि राज्य “किसी पिछड़े वर्ग” के लिए नियुक्तियों में आरक्षण कर सकता है। यहीं से “पिछड़ा वर्ग कौन है?” — यह प्रश्न उठा।
काका कालेलकर आयोग (1953–55): स्वतंत्र भारत का प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग। इसने 2,399 जातियों को OBC के रूप में चिह्नित किया, लेकिन रिपोर्ट का क्रियान्वयन नहीं हुआ क्योंकि नेहरू सरकार जाति-आधारित मानदंडों को लेकर असहज थी। संविधान के अनुच्छेद 340 का यह प्रथम औपचारिक प्रयोग था।
मंडल आयोग — 1979 का गठन और 1980 की रिपोर्ट

जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार ने 1 जनवरी 1979 को B. P. मंडल की अध्यक्षता में दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया। आयोग ने 31 दिसंबर 1980 को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
मंडल आयोग के मुख्य निष्कर्ष:
- भारत की जनसंख्या में OBC लगभग 52% हैं।
- आयोग ने पिछड़ेपन की पहचान के लिए 11 सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक संकेतक तय किए।
- 3,743 जातियों को “अन्य पिछड़ा वर्ग” के रूप में चिह्नित किया।
मुख्य सिफ़ारिशें:
- केंद्रीय सरकारी नौकरियों और सार्वजनिक उपक्रमों में OBC के लिए 27% आरक्षण।
- केंद्रीय शिक्षण-संस्थानों में भी 27% आरक्षण।
- भूमि सुधार और शिक्षा-विस्तार जैसे संरचनात्मक उपाय।
रिपोर्ट 1980 से 1990 तक “ठंडे बस्ते” में पड़ी रही — कांग्रेस सरकारों (इंदिरा गांधी, राजीव गांधी) ने इसे लागू नहीं किया।
V. P. सिंह की 1990 की घोषणा
7 अगस्त 1990 को प्रधानमंत्री V. P. सिंह ने संसद में मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू करने की घोषणा की। 13 अगस्त 1990 को कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum, OM) जारी किया गया जिसने केंद्रीय सेवाओं में 27% OBC आरक्षण की व्यवस्था की।
इसके विरुद्ध देश भर में हिंसक आंदोलन भड़के — विशेष रूप से उत्तर भारत में, जहाँ कई छात्रों ने आत्म-दाह किया। राजीव गोस्वामी का दिल्ली में आत्म-दाह इस आंदोलन का प्रतीक बना।
इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) — मंडल केस
मंडल OM को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। 16 नवंबर 1992 को 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 6:3 के बहुमत से ऐतिहासिक निर्णय दिया।
निर्णय के मुख्य बिंदु:
- 27% OBC आरक्षण संवैधानिक रूप से वैध है — अनुच्छेद 16(4) के तहत।
- कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं हो सकता — असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर।
- “क्रीमी लेयर” को आरक्षण से बाहर रखना अनिवार्य है — सामाजिक रूप से उन्नत व्यक्ति OBC लाभ का दावा नहीं कर सकता।
- पदोन्नति में आरक्षण OBC के लिए नहीं — केवल प्रवेश-स्तर पर।
- जाति “पिछड़ा वर्ग” की पहचान का वैध आधार है — लेकिन अकेला नहीं।
- एक स्थायी आयोग बनाया जाए जो “पिछड़ा वर्ग” की सूची का परीक्षण करे — यही NCBC (1993) का जन्म-आधार बना।
न्यायाधीश रत्नावेल पांडियन के मुख्य शब्द: “आरक्षण आपवादिक प्रावधान है, सामान्य नियम नहीं।”
क्रीमी लेयर — अवधारणा और सीमा
क्रीमी लेयर (creamy layer) का अर्थ है — OBC जातियों के भीतर वह संपन्न तबका जो सामाजिक-शैक्षणिक रूप से अन्य OBC व्यक्तियों के बराबर पिछड़ा नहीं है, और इसलिए उसे आरक्षण-लाभ नहीं मिलना चाहिए।
आय-सीमा का इतिहास:
| वर्ष | वार्षिक आय-सीमा |
|---|---|
| 1993 | ₹1 लाख |
| 2004 | ₹2.5 लाख |
| 2008 | ₹4.5 लाख |
| 2013 | ₹6 लाख |
| 2017 | ₹8 लाख (वर्तमान) |
केंद्र सरकार के विभिन्न प्रस्तावों के बावजूद, 2017 के बाद इस सीमा को संशोधित नहीं किया गया है (जुलाई 2024 की संसदीय जानकारी के अनुसार)। 2026 में भी ₹8 लाख ही प्रभावी सीमा है।
क्रीमी लेयर का निर्धारण कैसे होता है:
- संवैधानिक पद: राष्ट्रपति, न्यायाधीश, संवैधानिक आयोगों के अध्यक्ष — स्वचालित क्रीमी लेयर।
- उच्च सरकारी पद: Group A अधिकारी (माता-पिता दोनों या एक भी), Group B अधिकारी (दोनों माता-पिता) — क्रीमी लेयर।
- सेना अधिकारी: कर्नल और उससे ऊपर — क्रीमी लेयर।
- आय-आधार: शैक्षणिक/नौकरी-व्यवसाय/कृषि-वेतन के अतिरिक्त ₹8 लाख वार्षिक।
- कृषि-आय और वेतन को आय-गणना से बाहर रखा गया है।
संवैधानिक प्रावधान — विस्तार से
अनुच्छेद 15(4): राज्य को “सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों” के लिए विशेष प्रावधान बनाने की शक्ति। (1951 का प्रथम संशोधन)
अनुच्छेद 15(5): राज्य को निजी अनैड़ शैक्षणिक संस्थानों में भी आरक्षण की शक्ति। (93वाँ संशोधन, 2005; अशोक कुमार ठाकुर 2008 में वैध)
अनुच्छेद 15(6): EWS के लिए 10% आरक्षण। (103वाँ संशोधन, 2019; जनहित अभियान 2022 में वैध)
अनुच्छेद 16(4): “किसी पिछड़े वर्ग” की नियुक्तियों में आरक्षण।
अनुच्छेद 16(4-A): SC/ST के लिए पदोन्नति में आरक्षण (77वाँ संशोधन, 1995)। OBC पर लागू नहीं।
अनुच्छेद 16(4-B): 50% सीमा से ऊपर “बैकलॉग” रिक्तियों को आगे ले जाने की अनुमति (81वाँ संशोधन, 2000)।
अनुच्छेद 338-B: NCBC को संवैधानिक दर्जा (102वाँ संशोधन, 2018)।
अनुच्छेद 340: राष्ट्रपति की शक्ति कि वे “सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों” की दशा की जाँच के लिए आयोग गठित कर सकते हैं — काका कालेलकर और मंडल आयोग इसी अनुच्छेद के तहत बने थे।
संविधान के मूल अधिकारों और निदेशक तत्त्वों के संतुलन को समझने के लिए भारतीय समाज की विशेषताएँ और विविधता उपयोगी है।
NCBC — राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग
गठन की कथा:
- 1993: इंदिरा साहनी निर्णय के बाद NCBC अधिनियम 1993 के तहत वैधानिक निकाय (statutory body) के रूप में गठित।
- 2018: 102वें संविधान संशोधन के तहत संवैधानिक दर्जा (constitutional status) — अनुच्छेद 338-B।
संरचना: अध्यक्ष + उपाध्यक्ष + 3 अन्य सदस्य; राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त; कार्यकाल 3 वर्ष।
मुख्य कार्य:
- OBC सूची में जातियों के समावेश/बहिष्करण की सिफ़ारिशें केंद्र सरकार को।
- OBC के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की रक्षा की निगरानी।
- शिकायतों की जाँच और स्व-संज्ञान कार्रवाई।
- वार्षिक रिपोर्ट राष्ट्रपति को।
102वें संशोधन की सीमा (विवाद): मई 2021 के मराठा आरक्षण मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 3:2 के बहुमत से कहा कि 102वें संशोधन के बाद राज्य अपनी OBC सूची नहीं बना सकते — यह केवल राष्ट्रपति की शक्ति है। इस संकट को हल करने के लिए 2021 का 105वाँ संशोधन आया।
102वाँ और 105वाँ संशोधन — एक तुलनात्मक दृष्टि
| आधार | 102वाँ संशोधन (2018) | 105वाँ संशोधन (2021) |
|---|---|---|
| उद्देश्य | NCBC को संवैधानिक दर्जा | राज्यों की OBC सूची-निर्माण शक्ति की पुनर्बहाली |
| जोड़े गए अनुच्छेद | 338-B, 342-A | 342-A में स्पष्टीकरण |
| संदर्भ | इंदिरा साहनी 1992 के 25 वर्ष बाद | मराठा आरक्षण निर्णय 5 मई 2021 |
| प्रभाव | केंद्रीय OBC सूची केंद्र के पास | राज्य अपनी OBC सूची तैयार कर सकते हैं |
संवैधानिक संशोधनों की प्रक्रिया और 102वें से 105वें तक की यात्रा के संदर्भ में भारत के संविधान का 105वाँ संशोधन विस्तार से पढ़ा जा सकता है।
केंद्रीय OBC सूची बनाम राज्य OBC सूची
| आधार | केंद्रीय सूची | राज्य सूची |
|---|---|---|
| शक्ति | राष्ट्रपति (अनुच्छेद 342-A) | राज्य सरकार |
| उपयोग | केंद्रीय नौकरियाँ, IIT/IIM/AIIMS, केंद्रीय विश्वविद्यालय | राज्य सेवाएँ, राज्य विश्वविद्यालय |
| सिफ़ारिश | NCBC | राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग |
| संख्या (लगभग) | 2,650 जातियाँ | राज्य-वार भिन्न |
एक जाति केंद्रीय सूची में हो लेकिन राज्य सूची में न हो — यह संभव है। उदाहरण: कुछ राज्यों में जाटों को केंद्रीय सूची से 2015 में हटाया गया लेकिन कुछ राज्यों की सूची में बने रहे।
रोहिणी आयोग और OBC उप-वर्गीकरण
केंद्रीय OBC सूची की 2,650 जातियों में लाभ का वितरण असमान पाया गया। कुछ “उन्नत OBC” (जैसे यादव, कुर्मी, गुज्जर) ने अधिकांश लाभ ले लिया, जबकि “अति-पिछड़ी” जातियों को बहुत कम मिला।
रोहिणी आयोग (Rohini Commission):
- गठन: अक्टूबर 2017, न्यायमूर्ति G. रोहिणी की अध्यक्षता में।
- उद्देश्य: OBC जातियों का उप-वर्गीकरण (sub-categorisation) — A, B, C, D चार श्रेणियाँ।
- रिपोर्ट: 31 जुलाई 2023 को राष्ट्रपति को सौंपी; अभी तक सार्वजनिक नहीं।
- तर्क: आरक्षण-लाभ को छोटी और सर्वाधिक पिछड़ी जातियों तक पहुँचाना।
- विवाद: उप-वर्गीकरण से OBC एकता टूटने की राजनीतिक चिंता।
कमज़ोर वर्गों के लिए कल्याण और OBC
OBC आरक्षण केवल नौकरी-शिक्षा तक सीमित नहीं है। केंद्र सरकार की कई योजनाएँ OBC, SC, ST, EWS के लिए विशेष प्रावधान करती हैं — विस्तार के लिए कमज़ोर वर्गों के लिए कल्याण योजनाएँ और अन्य पिछड़ा वर्ग OBCs का उप-वर्गीकरण पढ़ें। प्रमुख छात्रवृत्तियाँ — पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप, राष्ट्रीय फेलोशिप, NBCFDC के ऋण।
तुलनात्मक विश्लेषण — SC/ST/OBC/EWS आरक्षण
| आधार | SC | ST | OBC | EWS |
|---|---|---|---|---|
| केंद्रीय आरक्षण | 15% | 7.5% | 27% | 10% |
| संवैधानिक आधार | 341, 16(4-A), 15(4) | 342, 16(4-A), 15(4) | 16(4), 15(4), 15(5), 340 | 15(6), 16(6) |
| क्रीमी लेयर | लागू नहीं | लागू नहीं | लागू (₹8 लाख) | आय-शर्त ₹8 लाख |
| पदोन्नति में आरक्षण | हाँ | हाँ | नहीं | नहीं |
| संशोधन | प्रारंभिक 1950 | प्रारंभिक 1950 | मंडल 1990 | 103वाँ, 2019 |
चुनौतियाँ और आलोचना
1. क्रीमी लेयर की सीमा का स्थिर रहना: ₹8 लाख की सीमा 2017 से नहीं बदली। मुद्रास्फीति को देखते हुए यह वास्तविक मूल्य में घट गई है।
2. 50% की सीमा का उल्लंघन: EWS 10% जोड़ने से कुल आरक्षण 60% तक पहुँचा। तमिलनाडु में राज्य कानून से कुल 69% आरक्षण है (9वीं अनुसूची में)।
3. उप-वर्गीकरण की अनुपस्थिति: रोहिणी रिपोर्ट 2023 में सौंपी जाने के बावजूद लागू नहीं — “क्रीमी” OBC जातियों को अधिक लाभ।
4. जाति-गणना का अभाव: 1931 के बाद कोई समग्र जाति-गणना नहीं — 2026 में जाति-जनगणना (caste census) की माँग प्रबल। बिहार ने 2023 में अपनी राज्य-स्तरीय जाति-गणना कराई।
5. निजी क्षेत्र में आरक्षण की अनुपस्थिति: OBC आरक्षण केवल सरकारी और सहायता-प्राप्त क्षेत्रों तक — निजी रोज़गार में नहीं।
6. NEET और चिकित्सा-सीटों में सेंट्रल पूल पर लंबा विवाद: 2021 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद ही OBC को अखिल भारतीय कोटा में 27% आरक्षण मिला।
UPSC के लिए प्रासंगिकता
- Prelims: मंडल आयोग 1980, इंदिरा साहनी 1992, NCBC, क्रीमी लेयर ₹8 लाख, अनुच्छेद 15(4)/15(5)/16(4)/338-B/340, 102वाँ-105वाँ संशोधन — सभी प्रत्यक्ष तथ्य।
- Mains GS-I (समाज): भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था, सामाजिक न्याय की अवधारणा।
- Mains GS-II (राजव्यवस्था + सामाजिक न्याय): आरक्षण-नीति का संवैधानिक ढाँचा; 50% की सीमा का तर्क; क्रीमी लेयर का सामाजिक औचित्य; 105वें संशोधन की पृष्ठभूमि।
- Essay: “आरक्षण की आज की आवश्यकता” / “क्या जाति-जनगणना अनिवार्य है?”
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
- “क्रीमी लेयर का सिद्धांत आरक्षण की लोकतांत्रिक आत्मा है।” — चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
- इंदिरा साहनी (1992) निर्णय के संदर्भ में आरक्षण की 50% की सीमा का परीक्षण कीजिए। क्या EWS आरक्षण ने इस सिद्धांत को कमज़ोर किया है? (250 शब्द)
निष्कर्ष
OBC आरक्षण भारतीय सामाजिक न्याय की 75 वर्षीय यात्रा का सबसे जटिल और सबसे विवादित अध्याय है। मंडल आयोग की 1980 की रिपोर्ट से लेकर 2021 के 105वें संशोधन तक — यह यात्रा संवैधानिक आदर्शों, न्यायिक संयम और लोकतांत्रिक राजनीति के बीच निरंतर संवाद रही है। 27% का आँकड़ा केवल एक प्रतिशत नहीं, एक सामाजिक अनुबंध है जो भारत की 52% पिछड़ी आबादी को अवसर की समानता का वादा करता है। क्रीमी लेयर का सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि लाभ वास्तविक ज़रूरतमंद तक पहुँचे। आगे की चुनौतियाँ — रोहिणी आयोग की सिफ़ारिशों का क्रियान्वयन, क्रीमी लेयर की सीमा का पुनरीक्षण, जाति-जनगणना और निजी क्षेत्र में आरक्षण — 2026 के बाद की भारतीय राजनीति का केंद्रीय एजेंडा हैं। UPSC अभ्यर्थी के लिए यह विषय तथ्य + संविधान + न्यायिक निर्णय + समकालीन बहस का चार-स्तरीय संगम है — और इसी कारण इसका पूरा महारथ Mains के निबंध और GS-II दोनों में निर्णायक अंक दिलाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
भारत में OBC आरक्षण कितना है?
केंद्र सरकार की नौकरियों और शिक्षण-संस्थानों में OBC आरक्षण 27% है। यह 1990 में मंडल आयोग की सिफ़ारिश के आधार पर लागू हुआ और 1992 के इंदिरा साहनी निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संवैधानिक रूप से वैध ठहराया गया।
क्रीमी लेयर क्या है और इसकी आय-सीमा कितनी है?
क्रीमी लेयर का अर्थ है — OBC जातियों के भीतर वह संपन्न तबका जो आरक्षण-लाभ का पात्र नहीं है। 2026 में इसकी वार्षिक आय-सीमा ₹8 लाख है (कृषि-आय और वेतन को इस गणना से बाहर रखा गया है)। यह सीमा 2017 से अपरिवर्तित है।
मंडल आयोग कब और किसके द्वारा गठित किया गया?
मंडल आयोग 1 जनवरी 1979 को मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार ने गठित किया। B. P. मंडल आयोग के अध्यक्ष थे। आयोग ने 31 दिसंबर 1980 को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसे 13 अगस्त 1990 को V. P. सिंह सरकार ने लागू किया।
इंदिरा साहनी मामला क्या है?
इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (16 नवंबर 1992) सर्वोच्च न्यायालय की 9 न्यायाधीशों की पीठ का निर्णय है। इसने 27% OBC आरक्षण को वैध ठहराया, क्रीमी लेयर बहिष्करण को अनिवार्य किया, कुल आरक्षण की 50% सीमा तय की और एक स्थायी पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) की सिफ़ारिश दी।
NCBC क्या है और इसका संवैधानिक दर्जा कब मिला?
NCBC (National Commission for Backward Classes) पिछड़े वर्गों के लिए केंद्रीय आयोग है। यह 1993 में अधिनियम के तहत वैधानिक निकाय बना और 2018 के 102वें संविधान संशोधन से इसे संवैधानिक दर्जा (अनुच्छेद 338-B) मिला।
102वाँ और 105वाँ संशोधन क्यों ज़रूरी थे?
102वाँ संशोधन (2018) ने NCBC को संवैधानिक दर्जा दिया। मई 2021 के मराठा आरक्षण निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अब केवल राष्ट्रपति OBC सूची तय कर सकते हैं — राज्य नहीं। इस संकट को हल करने के लिए 105वाँ संशोधन (2021) आया जिसने राज्यों की OBC सूची-निर्माण शक्ति बहाल की।
क्या OBC को पदोन्नति में आरक्षण मिलता है?
नहीं। इंदिरा साहनी निर्णय के अनुसार OBC के लिए केवल प्रवेश-स्तर पर आरक्षण है, पदोन्नति में नहीं। पदोन्नति में आरक्षण केवल SC/ST के लिए है (अनुच्छेद 16(4-A), 77वाँ संशोधन 1995)।
केंद्रीय OBC सूची और राज्य OBC सूची में क्या अंतर है?
केंद्रीय सूची राष्ट्रपति द्वारा (अनुच्छेद 342-A के तहत NCBC की सिफ़ारिश पर) तय होती है और केंद्रीय नौकरियों/संस्थानों में लागू होती है। राज्य सूची राज्य सरकार तय करती है और राज्य सेवाओं/विश्वविद्यालयों में लागू होती है। एक जाति केवल एक सूची में हो सकती है, या दोनों में।
रोहिणी आयोग का उद्देश्य क्या था?
रोहिणी आयोग (अक्टूबर 2017, न्यायमूर्ति G. रोहिणी की अध्यक्षता) केंद्रीय OBC सूची की 2,650 जातियों के उप-वर्गीकरण (sub-categorisation) के लिए गठित हुआ। इसका उद्देश्य आरक्षण-लाभ को छोटी और सर्वाधिक पिछड़ी OBC जातियों तक पहुँचाना है। रिपोर्ट 31 जुलाई 2023 को सौंपी गई लेकिन अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई।
क्या 50% आरक्षण की सीमा का उल्लंघन हो सकता है?
इंदिरा साहनी ने 50% सीमा को सामान्य नियम बताया, लेकिन “असाधारण और अति-विशेष परिस्थितियों” में अपवाद की अनुमति दी। 103वें संशोधन से EWS के 10% जुड़ने पर कुल केंद्रीय आरक्षण 60% तक पहुँचा। तमिलनाडु में राज्य-कानून के तहत कुल आरक्षण 69% है, जो 9वीं अनुसूची में डाला गया है।