राष्ट्रीय न्यायिक अवसंरचना निगम (National Judicial Infrastructure Corporation — NJIC) भारत की न्यायपालिका की भौतिक और तकनीकी अवसंरचना को सुदृढ़ करने के लिए प्रस्तावित एक स्वायत्त निकाय है। यह सुप्रीम कोर्ट की पहल है और यूपीएससी GS-II के लिए महत्वपूर्ण विषय है।
NJIC की आवश्यकता क्यों?
न्यायिक लंबितता का संकट
- सभी स्तरों पर 5 करोड़+ मुकदमे लंबित (2024)।
- जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में ~4.4 करोड़।
- न्यायाधीश रिक्तियाँ: उच्च न्यायालयों में ~30%।
अवसंरचना की कमी
- अनेक जिला न्यायालयों में जीर्ण-शीर्ण इमारतें।
- पर्याप्त अदालत कक्षों का अभाव।
- डिजिटलीकरण असमान।
NJIC का प्रस्ताव
सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन CJI एन.वी. रमण ने 2021 में NJIC का प्रस्ताव रखा। उद्देश्य:
- न्यायिक अवसंरचना के लिए केंद्रीकृत वित्तपोषण और योजना।
- राज्य सरकारों पर निर्भरता कम करना।
- अदालत कक्ष, आवास, IT अवसंरचना का मानकीकृत निर्माण।
- सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों और केंद्र सरकार की भागीदारी।
मौजूदा प्रयास
- Centrally Sponsored Scheme for Development of Judiciary — अदालत भवनों के लिए।
- eCourts Mission Mode Project — डिजिटलीकरण।
- Fast Track Courts — POCSO और बलात्कार मामले।
NJIC की संरचना (प्रस्ताव)
- सुप्रीम कोर्ट के CJI की अध्यक्षता।
- केंद्र और राज्य सरकारों की भागीदारी।
- स्वायत्त निगम के रूप में — राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त।
नवीनतम घटनाक्रम (2024-26)
- NJIC अभी भी प्रस्ताव चरण में।
- बजट 2024-25: न्यायिक अवसंरचना के लिए ₹1,000 करोड़।
- Phase III eCourts — ₹7,210 करोड़; 2023-2027।
- लंबित मामलों में कमी के लिए Mediation Act 2023।
यूपीएससी प्रासंगिकता
- GS-II: न्यायपालिका, शासन, नागरिक चार्टर।
- प्रारंभिक: 5 करोड़+ लंबित मुकदमे; eCourts Phase III।
- मुख्य: “NJIC के माध्यम से न्यायिक सुधारों पर चर्चा करें।”
NJIC न केवल भौतिक अवसंरचना का प्रश्न है, बल्कि न्याय तक पहुँच और न्यायिक स्वतंत्रता का भी। इसे जल्द से जल्द स्थापित करना भारतीय न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है।