सहयोग पोर्टल गृह मंत्रालय (MHA) का ऑनलाइन सिस्टम है। इसके जरिए अधिकृत सरकारी एजेंसियाँ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को उस कंटेंट को हटाने के नोटिस भेजती हैं, जिसे वे गैरकानूनी मानती हैं। इसे भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) चलाता है और यह अक्टूबर 2024 से काम कर रहा है। इसका कानूनी आधार सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) की धारा 79(3)(b) है। सहयोग का मतलब ही है साथ मिलकर काम करना। यानी एक ऐसी खिड़की, जिसके एक तरफ पुलिस और मंत्रालय हैं, दूसरी तरफ प्लेटफॉर्म, और दोनों ईमेल की जगह यहीं नोटिस का लेन-देन करते हैं।
ज्यादातर लोग सहयोग पोर्टल का नाम पहली बार तब सुनते हैं, जब X Corp ने इसे सेंसरशिप का औजार कहा। फिर वे मान लेते हैं कि यह ब्लॉक करने की कोई नई ताकत है। ऐसा नहीं है। पोर्टल अपनी कोई ताकत पैदा नहीं करता। यह बस एक पाइप है। असली झगड़ा इस पर है कि इस पाइप से बहता क्या है। सवाल यह है कि क्या धारा 79(3)(b), जो सिर्फ इतना बताती है कि किसी प्लेटफॉर्म का कानूनी कवच कब हटता है, कंटेंट हटवाने का ऐसा रास्ता बन सकती है जो धारा 69A के बराबर-बराबर चले। धारा 69A वह ब्लॉकिंग शक्ति है, जिसके साथ सुनवाई और समीक्षा जुड़ी है। पाइप और ताकत को अलग-अलग रखिए, तो अदालत की पूरी लड़ाई साफ समझ आने लगती है।
सहयोग पोर्टल क्या है?
सहयोग गृह मंत्रालय का नोटिस पहुँचाने वाला सिस्टम है। यह न कोई नियामक संस्था है, न कोई अदालत। यह सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत काम करता है और दो तरह के उपयोगकर्ताओं को जोड़ता है। एक तरफ वे अधिकारी हैं जिन्हें नोटिस भेजने का अधिकार मिला है। दूसरी तरफ वे मध्यस्थ (intermediary) हैं, जिन्हें ये नोटिस मिलते हैं।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| कौन चलाता है | भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C), जो गृह मंत्रालय का संबद्ध कार्यालय है |
| कब से चालू | अक्टूबर 2024 से, जैसा केंद्र ने कर्नाटक हाई कोर्ट को बताया |
| कानूनी आधार | IT Act, 2000 की धारा 79(3)(b), जिसे IT नियम, 2021 के नियम 3(1)(d) के साथ पढ़ा जाता है |
| I4C का अधिकार | गृह मंत्रालय की 13 मार्च 2024 की अधिसूचना, जिसने I4C को धारा 79(3)(b) के तहत अपनी एजेंसी नामित किया |
| नोटिस कौन भेज सकता है | केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की अधिकृत एजेंसियाँ; 15 नवंबर 2025 से सिर्फ संयुक्त सचिव रैंक के अधिकारी (जहाँ यह पद न हो, वहाँ निदेशक) या पुलिस में DIG और उससे ऊपर के अधिकारी |
| नोटिस किसे मिलते हैं | मध्यस्थ: मार्च 2025 तक 38 जुड़ चुके थे, और केंद्र की 2026 की गिनती में 524 |
| कार्रवाई का समय | 2021 के नियमों में 36 घंटे; 20 फरवरी 2026 से तीन घंटे |
| पैमाना | 31 मार्च 2025 तक धारा 79(3)(b) के तहत 1,11,185 से ज्यादा आइटम ब्लॉक, सहयोग के जरिए भेजे गए नोटिस भी शामिल |
| कानूनी स्थिति | 24 सितंबर 2025 को कर्नाटक हाई कोर्ट ने सही ठहराया; 22 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की चुनौतियों पर रोक लगाई |
सहयोग का नोटिस कैसे काम करता है
एक अधिकृत अधिकारी पोर्टल पर कारण सहित नोटिस डालता है, जिसमें किसी खास वेब पते का जिक्र होता है। प्लेटफॉर्म को वह कंटेंट तीन घंटे के भीतर हटाना होता है, वरना उस कंटेंट के लिए उसकी कानूनी छूट खत्म हो जाती है। यही दूसरा हिस्सा है जो ज्यादातर लोगों की नजर से छूट जाता है।
शुरुआत कवच से कीजिए। धारा 79 मध्यस्थों को, यानी उन सेवाओं को जो दूसरों का कंटेंट आगे ले जाती हैं, सेफ हार्बर यानी कानूनी कवच देती है। मतलब उपयोगकर्ता जो पोस्ट करते हैं, उसके लिए प्लेटफॉर्म जिम्मेदार नहीं होता। ठीक वैसे ही, जैसे कूरियर वाला पार्सल के अंदर बंद सामान के लिए जवाबदेह नहीं होता। धारा 79(3)(b) इसी का अपवाद है। मान लीजिए किसी प्लेटफॉर्म को अदालत के आदेश या सरकारी नोटिस से पता चलता है कि कोई कंटेंट गैरकानूनी काम के लिए इस्तेमाल हो रहा है। अगर फिर भी वह उसे जल्दी नहीं हटाता, तो उस कंटेंट के लिए उसका कवच हट जाता है।
कूरियर वाली मिसाल एक हद तक ही चलती है। कूरियर पार्सल कभी नहीं खोलता, जबकि प्लेटफॉर्म जो कुछ ले जाता है, उसकी रैंकिंग और मॉडरेशन भी करता है। इसीलिए कानून उससे उम्मीद करता है कि बताए जाने के बाद वह कार्रवाई करे।
अब एक नोटिस को शुरू से आखिर तक देखिए। मान लीजिए किसी राज्य पुलिस के साइबर सेल को शेयर टिप्स का एक फर्जी पेज मिलता है, जो लोगों को ठगी के जाल में फँसा रहा है:
- कम से कम DIG रैंक का अधिकारी, जिसे राज्य सरकार ने खास तौर पर अधिकृत किया हो, सहयोग पर कारण सहित सूचना जारी करता है।
- इस सूचना में लगाया गया कानूनी प्रावधान और गैरकानूनी काम की प्रकृति लिखी होती है। साथ में सटीक URL भी दिया जाता है।
- प्लेटफॉर्म को यह सूचना पोर्टल पर मिलती है, किसी ऐसे ईमेल पते पर नहीं जहाँ से शायद जवाब ही न आए।
- प्लेटफॉर्म के पास पेज हटाने या उस तक पहुँच बंद करने के लिए तीन घंटे होते हैं।
- अगर वह मना कर दे, तो मना करना अपने आप में अपराध नहीं है। प्लेटफॉर्म उस पेज के लिए धारा 79 की छूट खो देता है। फिर वह पेज जिस भी कानून को तोड़ता है, उसके तहत प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई हो सकती है।
यही आखिरी कदम पूरे ढाँचे की जान है। सहयोग का नोटिस नतीजों वाली चेतावनी है, कोई ऐसा आदेश नहीं जिसके पीछे उसका अपना कोई दंड खड़ा हो।
तो पोर्टल की जरूरत ही क्यों पड़ी? केंद्र ने कर्नाटक हाई कोर्ट को बताया कि प्लेटफॉर्म तक पहुँचने में पुलिस को ये दिक्कतें आती थीं:
- नोडल संपर्क की जानकारी पुरानी होती थी, या उस पर कोई जवाब ही नहीं देता था;
- औपचारिक अनुरोध के बाद भी कंटेंट धीरे-धीरे हटता था, और बिना सहमति के साझा की गई निजी तस्वीरों के मामले में यह देरी सबसे ज्यादा चोट करती है;
- कई विदेशी प्लेटफॉर्म का भारत में न कोई दफ्तर था, न कोई प्रतिनिधि;
- हर कंपनी ने कानून लागू करने वाली एजेंसियों के अनुरोधों के लिए अपना अलग पोर्टल बना रखा था;
- कोई साझा रिकॉर्ड नहीं था कि कौन-से नोटिस लंबित हैं और किन्हें अनदेखा किया गया।
सहयोग इन दिक्कतों का जवाब यूँ देता है कि हर अधिकृत एजेंसी और हर जुड़े हुए मध्यस्थ को एक साझा रिकॉर्ड वाले एक ही प्लेटफॉर्म पर ले आता है। यह I4C के इर्द-गिर्द बने साइबर अपराध से निपटने के बड़े तंत्र का एक हिस्सा है। I4C का उद्घाटन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 10 जनवरी 2020 को किया था।
धारा 79(3)(b) का इस्तेमाल भी सहयोग से शुरू नहीं हुआ। गृह मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट में दर्ज है कि अगस्त 2018 में NCRB को अधिसूचित किया गया था, ताकि वह बाल यौन शोषण सामग्री और बलात्कार से जुड़े कंटेंट के लिए ऐसे नोटिस भेज सके। 2024 में जो बदला, वह पैमाना था: एक साझा पोर्टल, जिससे मार्च 2025 तक 28 राज्य और 5 केंद्र शासित प्रदेश जुड़ चुके थे।
धारा 69A और धारा 79(3)(b): कंटेंट हटाने के दो रास्ते
धारा 69A ब्लॉक करने की शक्ति है, जबकि धारा 79(3)(b) कानूनी छूट के साथ जुड़ी एक शर्त है। दोनों का नतीजा एक ही होता है: कंटेंट गायब हो जाता है। इसीलिए दोनों को अक्सर एक ही चीज समझ लिया जाता है।
धारा 69A के तहत केंद्र सरकार, या उसका खास तौर पर अधिकृत अधिकारी, किसी प्लेटफॉर्म को कंटेंट ब्लॉक करने का निर्देश दे सकता है। इसके लिए कारण लिखित में दर्ज करने होते हैं। और ऐसा तभी हो सकता है, जब यह इनमें से किसी के हित में जरूरी हो:
- भारत की संप्रभुता और अखंडता;
- भारत की रक्षा;
- राज्य की सुरक्षा;
- विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध;
- सार्वजनिक व्यवस्था;
- इनमें से किसी से जुड़े संज्ञेय अपराध के लिए उकसावे को रोकना।
आदेश न मानना मध्यस्थ के लिए अपराध है, जिसकी सजा सात साल तक की जेल और जुर्माना है।
2009 के ब्लॉकिंग नियमों के तहत प्रक्रिया
सूचना प्रौद्योगिकी (जनता द्वारा सूचना तक पहुँच को ब्लॉक करने की प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय) नियम, 2009 इस शक्ति को जाँच के कई पड़ावों में बाँट देते हैं:
- अनुरोध करने वाला मंत्रालय या राज्य अपने नोडल अधिकारी के जरिए अनुरोध नामित अधिकारी (Designated Officer) को भेजता है। यह केंद्र सरकार का कम से कम संयुक्त सचिव रैंक का अधिकारी होता है।
- नामित अधिकारी की अध्यक्षता वाली एक समिति अनुरोध की जाँच करती है। इसमें CERT-In समेत चार दूसरी संस्थाओं के संयुक्त सचिव स्तर के सदस्य होते हैं।
- जिस व्यक्ति या प्लेटफॉर्म पर कंटेंट है, उसे नोटिस मिलता है। उस समिति के सामने जवाब देने के लिए उसे कम से कम 48 घंटे मिलते हैं।
- IT विभाग के सचिव समिति की सिफारिश को मंजूर या नामंजूर करते हैं। किसी भी अनुरोध पर सात कार्य-दिवसों के भीतर फैसला होना जरूरी है।
- आपात स्थिति में सचिव बिना सुनवाई के अंतरिम ब्लॉकिंग का आदेश दे सकते हैं। फिर मामला 48 घंटे के भीतर समिति के सामने आना चाहिए। अगर वहाँ मंजूरी न मिले, तो ब्लॉक हटा लिया जाता है।
- एक समीक्षा समिति (Review Committee) हर दो महीने में कम से कम एक बार बैठती है। धारा 69A के दायरे से बाहर जाने वाले किसी भी निर्देश को यह रद्द कर सकती है।
नियम 16 अनुरोधों और कार्रवाई के बारे में सख्त गोपनीयता की शर्त जोड़ता है। यह रास्ता ठंडा नहीं पड़ा है, जैसा टेलीग्राम के मामले में केंद्र की 2026 की दलीलें दिखाती हैं।
दोनों रास्ते आमने-सामने
दोनों रास्तों को साथ रखकर देखिए, तो लगभग हर कदम पर फर्क दिखता है।
| पहलू | धारा 69A के तहत ब्लॉकिंग | सहयोग के जरिए धारा 79(3)(b) का नोटिस |
|---|---|---|
| प्रकृति | ब्लॉक करने का आदेश देने की शक्ति | सेफ हार्बर बनाए रखने की शर्त |
| फैसला कौन करता है | समिति के बाद नामित अधिकारी; सचिव मंजूरी देते हैं | केंद्र, किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश का अधिकृत अधिकारी; 15 नवंबर 2025 से संयुक्त सचिव रैंक, या पुलिस में DIG |
| आधार | संप्रभुता से लेकर उकसावे तक छह आधार | अनुच्छेद 19(2) जैसे आधार, जिनमें शालीनता, मानहानि और अदालत की अवमानना भी हैं; ऊपर से किसी भी कानून में प्रतिबंधित सूचना |
| सुनवाई | नोटिस और जवाब के लिए कम से कम 48 घंटे, आपात स्थिति को छोड़कर | नोटिस से पहले कोई सुनवाई नहीं |
| कारण | लिखित में दर्ज | 15 नवंबर 2025 से कानूनी आधार और URL के साथ कारण सहित सूचना |
| समीक्षा | हर दो महीने में कम से कम एक बार समीक्षा समिति | नोटिस भेजने वाली सरकार के सचिव रैंक के अधिकारी द्वारा हर महीने समीक्षा |
| समय-सीमा | जैसी निर्देश में तय हो | 2021 से 36 घंटे; 20 फरवरी 2026 से तीन घंटे |
| न मानने पर | अपराध: सात साल तक की जेल और जुर्माना | उस कंटेंट के लिए छूट खत्म |
| अदालत में स्थिति | श्रेया सिंघल (2015) में सही ठहराई गई | कर्नाटक हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश ने सही ठहराया (2025); अब मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने |
पूरा झगड़ा एक सवाल में समा जाता है। क्या सरकार बाएँ कॉलम वाला नतीजा दाएँ कॉलम के रास्ते से हासिल कर सकती है, वह भी बाएँ कॉलम की जाँचों के बिना? सरकार का जवाब है कि दोनों कॉलम अलग-अलग जमीन सँभालते हैं, क्योंकि धारा 69A के छह आधार किसी ठगी वाले पेज या मानहानि वाली पोस्ट तक पहुँचते ही नहीं। आलोचकों का जवाब है कि बिना सुनवाई वाला हटाने का नोटिस, नाम को छोड़कर, हर तरह से ब्लॉकिंग आदेश ही है।
श्रेया सिंघल फैसले ने धारा 79 के बारे में क्या कहा
श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ मामले का फैसला 24 मार्च 2015 को जस्टिस जे. चेलमेश्वर और जस्टिस आर.एफ. नरीमन ने सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने धारा 69A को सही ठहराया, लेकिन धारा 79(3)(b) को तभी बचाया जब उसे सीमित अर्थ में पढ़ा (read down)। सहयोग की मुकदमेबाजी में दोनों पक्ष इसी फैसले का हवाला देते हैं। अनुच्छेद 19 के तहत ऑनलाइन अभिव्यक्ति पर इसके तीन निष्कर्ष ये हैं:
- धारा 66A, जो बेहद आपत्तिजनक या धमकी भरे ऑनलाइन संदेशों पर सजा देती थी, रद्द कर दी गई। कोर्ट ने माना कि यह अनुच्छेद 19(1)(a) का उल्लंघन करती है, और अनुच्छेद 19(2) इसे नहीं बचाता।
- धारा 69A और 2009 के ब्लॉकिंग नियम सही ठहराए गए, क्योंकि ब्लॉकिंग अनुच्छेद 19(2) के आधारों तक सीमित है और इसके लिए लिखित कारण चाहिए। साथ ही इसमें मध्यस्थ को सुनवाई का मौका मिलता है, और जहाँ कंटेंट के मूल लेखक की पहचान हो सके, वहाँ उसे भी।
- धारा 79(3)(b) को सीमित अर्थ में पढ़ा गया। प्लेटफॉर्म को तभी कार्रवाई करनी है जब उसे अदालत के आदेश से, या उपयुक्त सरकार या उसकी एजेंसी की अधिसूचना से असल जानकारी मिले। वह भी सिर्फ उन गैरकानूनी कामों के लिए, जो अनुच्छेद 19(2) से जुड़े हों।
अब इस तीसरे निष्कर्ष को उसी तरह पढ़िए, जैसे दोनों पक्ष पढ़ते हैं। X Corp कहता है कि इससे पक्का होता है कि कंटेंट हटवाने की शक्ति धारा 69A में है, और धारा 79(3)(b) सिर्फ यह तय करती है कि प्लेटफॉर्म की छूट कब खत्म होती है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने इसे उल्टा पढ़ा। उसके मुताबिक 2015 की बेंच ने धारा 79(3)(b) के तहत सरकारी अधिसूचनाओं की बात साफ-साफ सोची थी। और वह बेंच 2011 के मध्यस्थ नियमों पर फैसला दे रही थी, जिनकी जगह अब 2021 के नियम आ चुके हैं।
एक ही पैराग्राफ, दो मतलब। ठीक यही सवाल अब सुप्रीम कोर्ट को सुलझाना है।
कर्नाटक हाई कोर्ट में X Corp का मुकदमा
24 सितंबर 2025 को कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने X Corp की याचिका खारिज कर दी। साथ ही उन्होंने सहयोग पोर्टल और नियम 3(1)(d), दोनों को सही ठहराया। फैसला 351 पन्नों का है, लेकिन उसने जो तय किया, वह छोटा-सा है।
X Corp वह अमेरिकी कंपनी है, जो पहले ट्विटर कहलाने वाला प्लेटफॉर्म चलाती है। उसने मार्च 2025 में रिट याचिका संख्या 7405 (2025) दायर की थी। उसने तीन घोषणाएँ माँगी थीं:
- कि धारा 79(3)(b) ब्लॉकिंग आदेश जारी करने की कोई शक्ति नहीं देती, और ऐसे आदेश सिर्फ धारा 69A के तहत आ सकते हैं;
- कि नियम 3(1)(d) अधिकार-क्षेत्र से बाहर (ultra vires) है, या फिर उसे सीमित अर्थ में पढ़ा जाए;
- कि सहयोग पोर्टल, जिसे याचिका ने सेंसरशिप पोर्टल कहा, अधिकार-क्षेत्र से बाहर है।
उसने MeitY (इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय) के 31 अक्टूबर 2023 के एक कार्यालय ज्ञापन को भी रद्द करने की माँग की थी, और चार मंत्रालयों की अधिसूचनाओं को भी। इनमें गृह मंत्रालय का वह आदेश भी था, जिसने I4C को नामित किया था। अदालत ने हर माँग ठुकरा दी। उसके निष्कर्ष इन बातों पर आकर टिकते हैं:
- अनुच्छेद 19 के अधिकार सिर्फ नागरिकों के हैं, इसलिए कोई विदेशी कंपनी उनका सहारा नहीं ले सकती।
- धारा 79(3)(b) और नियम 3(1)(d) के तहत बना सहयोग, साइबर अपराध के खिलाफ आपसी सहयोग का एक वैध तंत्र है, सेंसरशिप का औजार नहीं।
- श्रेया सिंघल फैसला 2011 के नियमों के बारे में था, इसलिए उसे सीधे 2021 के नियमों पर लागू नहीं किया जा सकता।
- सोशल मीडिया को “अराजक आजादी की हालत में नहीं छोड़ा जा सकता”, और महिलाओं के खिलाफ अपराधों में नियमन सबसे ज्यादा मायने रखता है।
- X अपने देश में अमेरिका के टेक इट डाउन एक्ट, 2025 का पालन करता है, और अदालत को कोई वजह नहीं दिखी कि वह भारत में ऐसे ही नोटिसों का विरोध करे।
X ने नवंबर 2025 में रिट अपील दायर की। 10 मार्च 2026 को मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और जस्टिस सी.एम. पूनाचा की खंडपीठ ने केंद्र को नोटिस जारी किया। अपील में X की दलील है कि धारा 79 कंटेंट हटवाने की शक्ति का स्रोत नहीं हो सकती। उसके मुताबिक धारा 69A को धारा 79 के साथ मिलाकर पढ़ना होगा।
इस मामले को उसी अदालत में X की पिछली हार से अलग रखिए। 30 जून 2023 को जस्टिस कृष्णा एस. दीक्षित ने धारा 69A के ब्लॉकिंग आदेशों के खिलाफ उसकी चुनौती खारिज कर दी थी, और उस पर 50 लाख रुपये का हर्जाना लगाया था। वह मामला दूसरे रास्ते के बारे में था।
रफ्तार के पक्ष में दलील और सुरक्षा उपायों के पक्ष में दलील
सरकार की दलील पैमाने और रफ्तार पर टिकी है, जबकि आलोचकों की दलील प्रक्रिया पर। दोनों किसी असली चीज की बात कर रहे हैं।
सरकार का पक्ष
- संख्या। गृह मंत्रालय की 2024-25 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक 31 मार्च 2025 तक धारा 79(3)(b) के तहत 1,11,185 से ज्यादा आइटम ब्लॉक किए गए, सहयोग के जरिए भेजे गए नोटिस भी मिलाकर। मार्च 2024 में I4C के नामित होने से गिनें, तो यह रोज करीब 290 आइटम बैठता है।
- बढ़त। सरकार ने अगस्त 2026 में बताया कि मार्च से जुलाई 2026 के बीच करीब 2.98 लाख URL हटाने के लिए भेजे गए। इनमें से करीब 82 प्रतिशत राज्यों ने भेजे थे।
- पहुँच। पुलिस रोज जिन मामलों से जूझती है, उनमें से बहुत कुछ धारा 69A के छह आधारों की पकड़ से बाहर रह जाता है। सरकार का कहना है कि I4C के ज्यादातर नोटिस वित्तीय धोखाधड़ी और महिलाओं व बच्चों के खिलाफ अपराधों से जुड़े होते हैं।
- जवाब। केंद्र के मुताबिक प्लेटफॉर्म, जिनमें से कई विदेश में बैठे हैं, पुलिस के नोटिसों का अक्सर देर से जवाब देते थे, या देते ही नहीं थे।
- विकल्प। नोटिस कंटेंट हटाने को मजबूर नहीं करता। जिस प्लेटफॉर्म को नोटिस गलत लगे, वह मना कर सकता है और अदालत में अपना बचाव कर सकता है। कीमत बस इतनी है कि उस आइटम के लिए उसकी छूट चली जाती है।
- जोड़े गए सुरक्षा उपाय। 15 नवंबर 2025 से नोटिस सिर्फ वरिष्ठ अधिकारियों से आ सकते हैं, और उनके साथ कारण लिखे होने चाहिए। सचिव रैंक का एक अधिकारी हर महीने इनकी समीक्षा करता है।
आलोचकों का पक्ष
- शक्ति का गलत स्रोत। धारा 79 छूट देने वाला प्रावधान है। ब्लॉक करने की शक्ति धारा 69A में है, और उसके सुरक्षा उपाय भी उसी के साथ चलते हैं।
- सुनवाई नहीं। याचिकाकर्ताओं की दलील है कि कंटेंट डालने वाले उपयोगकर्ता को पहले से बताए बिना कंटेंट हटाया जा सकता है। आलोचक इसे उस सुनवाई से इनकार मानते हैं, जिसकी माँग उचित प्रक्रिया (due process) करती है।
- कई हाथ। हर राज्य और कई मंत्रालयों के अधिकारी नोटिस भेज सकते हैं, जबकि धारा 69A में एक नामित अधिकारी और एक समिति होती है।
- ज्यादा चौड़े आधार। नियम 3(1)(d) किसी भी कानून में प्रतिबंधित सूचना तक पहुँचता है। आलोचकों का कहना है कि यह अनुच्छेद 19(2) की उस सीमा से आगे निकल जाता है, जो श्रेया सिंघल ने तय की थी।
- जरूरत से ज्यादा हटाना। जब कंटेंट रखने पर छूट खतरे में हो और घड़ी सिर्फ तीन घंटे की चल रही हो, तो प्लेटफॉर्म के लिए सबसे सुरक्षित रास्ता है पहले हटा देना। अदालतें इसी को डराने वाला असर (chilling effect) कहकर आगाह करती हैं।
- घर के अंदर की समीक्षा। हर महीने होने वाली समीक्षा उसी सरकार के भीतर होती है, जो नोटिस भेजती है।
किसी भी तरफ पूरी तरह अड़ जाना अच्छा विचार बिल्कुल नहीं है। आज किसी की जमा-पूँजी खाली कर रहा फर्जी निवेश पेज दिल्ली में किसी समिति का इंतजार नहीं कर सकता। दूसरी तरफ, व्यंग्य वाली कोई पोस्ट तीन घंटे में गायब नहीं होनी चाहिए, वह भी बिना किसी को वजह बताए। बीच का रास्ता यह होगा कि तेज लेन बनी रहे, और हटाने के बाद की जाँचें जोड़ी जाएँ, जैसे:
- कंटेंट हटने के बाद उपयोगकर्ता को सूचना, और उसे चुनौती देने का रास्ता;
- एजेंसी और आधार के हिसाब से नोटिसों के प्रकाशित आँकड़े;
- नोटिस भेजने वाले दफ्तर से बाहर की किसी संस्था द्वारा समीक्षा।
समझदारी इसी में है कि इस बहस के दोनों हिस्सों को साथ पकड़कर रखें, क्योंकि अदालतों को भी यही करना होगा।
सहयोग पोर्टल आज कहाँ खड़ा है
पोर्टल लगातार बढ़ रहा है, जबकि उसकी वैधता सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रही है। 22 जुलाई 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने केंद्र की ट्रांसफर याचिकाओं पर नोटिस जारी किया। साथ ही पोर्टल से जुड़े हाई कोर्ट के हर मामले पर रोक लगा दी।
| तारीख | घटनाक्रम |
|---|---|
| 13 मार्च 2024 | गृह मंत्रालय ने I4C को धारा 79(3)(b) के तहत अपनी एजेंसी नामित किया |
| अक्टूबर 2024 | सहयोग चालू हुआ |
| मार्च 2025 | X Corp ने कर्नाटक हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की |
| 24 सितंबर 2025 | जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने याचिका खारिज की और सहयोग को सही ठहराया |
| 22 अक्टूबर 2025 | MeitY ने वरिष्ठ अधिकारियों, कारणों और मासिक समीक्षा के लिए नियम 3(1)(d) में संशोधन किया, जो 15 नवंबर 2025 से लागू हुआ |
| नवंबर 2025 | X Corp ने रिट अपील दायर की |
| 10 फरवरी 2026 | MeitY ने नियम 3(1)(d) की समय-सीमा 36 घंटे से घटाकर तीन घंटे की, जो 20 फरवरी 2026 से लागू हुई |
| फरवरी 2026 | कुणाल कामरा और हरीश जगतियानी ने बॉम्बे हाई कोर्ट में सहयोग को चुनौती दी |
| 10 मार्च 2026 | कर्नाटक हाई कोर्ट की खंडपीठ ने X की अपील पर नोटिस जारी किया |
| 22 जुलाई 2026 | सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के चारों मामलों पर रोक लगाई |
जिन मामलों पर रोक लगी है, उनमें कर्नाटक हाई कोर्ट में X की अपील है, और वहीं डिजीपब न्यूज इंडिया फाउंडेशन की याचिका, जो डिजिटल समाचार प्रकाशकों की एक संस्था है। बाकी दो बॉम्बे हाई कोर्ट में हैं: कॉमेडियन कुणाल कामरा की याचिका, और वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश जगतियानी की याचिका।
बॉम्बे की याचिकाएँ नियम 3(1)(d) में हुए 2025 के संशोधन को भी चुनौती देती हैं। कामरा और जगतियानी भारतीय नागरिक हैं, इसलिए अनुच्छेद 19 का जो दरवाजा कर्नाटक की अदालत ने X के लिए बंद कर दिया था, वह इनके लिए खुला रहता है। केंद्र चाहता है कि चारों मामले एक साथ सुने जाएँ। फिलहाल ये मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।
नियम भी साथ-साथ बदलते रहे हैं। MeitY की अक्टूबर 2025 की अधिसूचना ने नोटिस भेजने वालों का दायरा छोटा कर दिया, और फरवरी 2026 के संशोधन ने कार्रवाई का समय घटा दिया। IT नियमों में 2025 और 2026 के संशोधनों पर अलग नोट है। जून 2026 में नीति आयोग ने प्लेटफॉर्म और उद्योग संगठनों से पूछा कि क्या कंटेंट हटाने की मौजूदा समय-सीमाएँ व्यावहारिक हैं। उस परामर्श से कोई कानून नहीं बदलता।
डीपफेक पर गुजरात हाई कोर्ट में चल रही एक जनहित याचिका में केंद्र ने 2026 में बताया कि 524 मध्यस्थ सहयोग से जुड़ चुके हैं, जिनमें मेटा और गूगल भी हैं। लेकिन X पूरी तरह नहीं जुड़ा था। केंद्र की ट्रांसफर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले पर भी रोक लगा दी, जैसा 12 सितंबर 2026 को खबर आई।
परीक्षा के लिए सहयोग पोर्टल कैसे पढ़ें
सहयोग सिलेबस के उस मोड़ पर बैठता है, जहाँ तीन हिस्से आकर मिलते हैं:
- GS पेपर II: मौलिक अधिकार, खासकर अनुच्छेद 19, साथ में सरकारी नीतियाँ और उनकी समीक्षा में न्यायपालिका की भूमिका।
- GS पेपर III: आंतरिक सुरक्षा और साइबर सुरक्षा, जहाँ सिलेबस मीडिया और सोशल नेटवर्किंग साइटों की भूमिका का नाम लेकर जिक्र करता है।
- निबंध और GS पेपर IV: आजादी बनाम व्यवस्था, और अपने विवेक से फैसले लेने वाले अधिकारियों की जवाबदेही।
यह विषय पोर्टल के नाम से कम, और उसके पीछे के कानून से ज्यादा पूछा जाता है। मुख्य परीक्षा 2013 के GS पेपर II में पूछा गया था, “संविधान के अनुच्छेद 19 के कथित उल्लंघन के संदर्भ में IT Act की धारा 66A पर चर्चा कीजिए।” यह वही जमीन है जिस पर श्रेया सिंघल फैसला खड़ा है, और आज सहयोग की बहस भी उसी फैसले पर टिकी है। मुख्य परीक्षा 2024 के GS पेपर III में पूछा गया था, “सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग सेवाएँ सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती पैदा करती हैं। सोशल मीडिया के सुरक्षा पर पड़ने वाले असर से निपटने के लिए अलग-अलग स्तरों पर क्या उपाय अपनाए गए हैं? समस्या से निपटने के लिए कोई और उपाय भी सुझाइए।” सहयोग अब उन्हीं उपायों में से एक है।
प्रीलिम्स की तरफ देखें, तो Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक में 2013 से 2026 तक के 1,403 प्रश्नों में से 240 पर भारतीय राजव्यवस्था का टैग है। इसलिए नीचे दिए आँकड़े एकदम सटीक दोहराइए:
- I4C: गृह मंत्रालय का संबद्ध कार्यालय; 10 जनवरी 2020 को उद्घाटन हुआ, और 13 मार्च 2024 को धारा 79(3)(b) के तहत नामित हुआ।
- सहयोग: अक्टूबर 2024 से चालू; धारा 79(3)(b) को नियम 3(1)(d) के साथ पढ़कर उसके तहत नोटिस पहुँचाता है।
- धारा 69A: छह आधार, लिखित कारण, 2009 के नियमों के तहत कम से कम 48 घंटे के नोटिस वाली समिति, हर दो महीने में समीक्षा, और आदेश न मानने पर सात साल तक की सजा।
- श्रेया सिंघल (24 मार्च 2015): धारा 66A रद्द, धारा 69A बरकरार, धारा 79(3)(b) सीमित अर्थ में पढ़ी गई।
- नियम 3(1)(d): 2021 में 36 घंटे, 20 फरवरी 2026 से तीन घंटे; 15 नवंबर 2025 से संयुक्त सचिव या DIG रैंक, और सचिव द्वारा मासिक समीक्षा।
- X Corp बनाम भारत संघ: जस्टिस एम. नागप्रसन्ना, 24 सितंबर 2025, याचिका खारिज; 10 मार्च 2026 को अपील पर नोटिस; 22 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की रोक।
चार तरह की उलझनें आम हैं:
- सहयोग और धारा 69A। सहयोग धारा 79(3)(b) के नोटिस ले जाता है, जबकि धारा 69A के आदेश नामित अधिकारी और समिति से होकर जाते हैं।
- सहयोग और संचार साथी। संचार साथी दूरसंचार विभाग का नागरिकों के लिए बना पोर्टल है, जो खोए फोन और SIM की जाँच के काम आता है। नागरिक सहयोग का इस्तेमाल करते ही नहीं।
- X Corp के दो मामले। 2023 में जस्टिस कृष्णा एस. दीक्षित का फैसला धारा 69A के ब्लॉकिंग आदेशों पर था, जबकि 2025 में जस्टिस एम. नागप्रसन्ना का फैसला सहयोग और धारा 79(3)(b) पर था।
- MHA और MeitY। MHA, यानी गृह मंत्रालय, I4C के जरिए सहयोग चलाता है। MeitY IT नियम लिखता है और धारा 69A की प्रक्रिया चलाता है।
सहयोग को उसके पड़ोसियों के बगल में रखकर समझना आसान है:
| तंत्र | कौन चलाता है | कौन इस्तेमाल करता है | क्या करता है |
|---|---|---|---|
| सहयोग पोर्टल | गृह मंत्रालय, I4C के जरिए | अधिकृत एजेंसियाँ और मध्यस्थ | धारा 79(3)(b) के तहत कंटेंट हटाने के नोटिस पहुँचाता है |
| धारा 69A के तहत ब्लॉकिंग | 2009 के नियमों के तहत नामित अधिकारी और समिति | नोडल अधिकारियों के जरिए मंत्रालय और राज्य | समिति की समीक्षा के बाद छह आधारों पर कंटेंट ब्लॉक करता है |
| राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल | गृह मंत्रालय, I4C के जरिए | नागरिक | साइबर अपराध की शिकायतें लेता है; हेल्पलाइन 1930 |
| संचार साथी | दूरसंचार विभाग | नागरिक | खोए फोन ब्लॉक करता है और आपके नाम पर चल रहे कनेक्शन दिखाता है |
सहयोग एक छोटा पोर्टल है, जिस पर एक बड़ा संवैधानिक सवाल टिका है। जो अभ्यर्थी एक पंक्ति में बता सके कि धारा 69A शक्ति है, जबकि धारा 79(3)(b) एक शर्त, उसने पहला काम कर लिया। फिर अगर वह ठगी वाले पेज और व्यंग्य वाली पोस्ट, दोनों मामलों में निष्पक्ष दलील रख सके, तो वह सुप्रीम कोर्ट के किसी भी फैसले के लिए तैयार है।
सामान्य प्रश्न
सहयोग पोर्टल क्या है?
सहयोग पोर्टल गृह मंत्रालय का ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है, जिसके जरिए अधिकृत सरकारी एजेंसियाँ IT Act, 2000 की धारा 79(3)(b) के तहत मध्यस्थों को कंटेंट हटाने के नोटिस भेजती हैं। इसे भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र चलाता है, और यह अक्टूबर 2024 से काम कर रहा है। यह नोटिस भेजने वाली एजेंसियों और नोटिस पाने वाले प्लेटफॉर्म को एक साझा रिकॉर्ड वाले एक ही सिस्टम पर ले आता है।
सहयोग पोर्टल कौन चलाता है?
यह पोर्टल भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र चलाता है, जो गृह मंत्रालय का संबद्ध कार्यालय है। गृह मंत्रालय ने 13 मार्च 2024 को I4C को धारा 79(3)(b) के तहत अपनी एजेंसी नामित किया। खुद I4C का उद्घाटन 10 जनवरी 2020 को हुआ था, ताकि साइबर अपराध से निपटने में तालमेल बैठाया जा सके।
क्या सहयोग पोर्टल कानूनी है?
कर्नाटक हाई कोर्ट ने 24 सितंबर 2025 को X Corp बनाम भारत संघ मामले में इसे सही ठहराया था। इस फैसले के खिलाफ अपील चल रही है। 22 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने पोर्टल से जुड़े हाई कोर्ट के सभी मामलों पर रोक लगा दी, और अब वह केंद्र की ट्रांसफर याचिकाओं पर विचार कर रहा है। जब तक सुप्रीम कोर्ट फैसला नहीं करता, पोर्टल काम करता रहता है।
IT Act की धारा 69A और धारा 79(3)(b) में क्या फर्क है?
धारा 69A कंटेंट ब्लॉक करने की सीधी शक्ति है, जो संप्रभुता और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे छह आधारों पर इस्तेमाल होती है। इसके पीछे समिति की प्रक्रिया और समय-समय पर होने वाली समीक्षा खड़ी है। धारा 79(3)(b) सिर्फ यह बताती है कि प्लेटफॉर्म का सेफ हार्बर कब खत्म होता है। ऐसा तब होता है, जब अदालत के आदेश या सरकारी नोटिस के बाद भी वह गैरकानूनी कंटेंट नहीं हटाता। सहयोग दूसरी तरह के नोटिस ले जाता है।
X Corp मामले में कर्नाटक हाई कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने 24 सितंबर 2025 को X Corp की याचिका खारिज कर दी। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 19 के अधिकार सिर्फ नागरिकों को मिलते हैं, इसलिए कोई विदेशी कंपनी उन पर दावा नहीं कर सकती। उन्होंने सहयोग और नियम 3(1)(d) को धारा 79(3)(b) के तहत वैध माना। श्रेया सिंघल को उन्होंने पुराने 2011 के नियमों पर दिया गया फैसला माना।
अगर कोई प्लेटफॉर्म सहयोग के नोटिस को अनदेखा करे, तो क्या होता है?
नोटिस को अनदेखा करना अपने आप में अपराध नहीं है। धारा 69A के ब्लॉकिंग आदेश को न मानने की बात अलग है, जिसमें सात साल तक की जेल हो सकती है। इसकी जगह प्लेटफॉर्म उस कंटेंट के लिए धारा 79 की छूट खो देता है, और कंटेंट जिस भी कानून को तोड़ता है, उसके तहत उस पर कार्रवाई हो सकती है। इसी खतरे की वजह से आलोचक कहते हैं कि असल में ये नोटिस आदेश की तरह ही काम करते हैं।
सहयोग के नोटिस पर प्लेटफॉर्म को कितनी जल्दी कार्रवाई करनी होती है?
20 फरवरी 2026 से किसी मध्यस्थ को अदालत का आदेश या कारण सहित सूचना मिलने के तीन घंटे के भीतर चिह्नित कंटेंट हटाना होता है, या उस तक पहुँच बंद करनी होती है। IT नियम, 2021 के नियम 3(1)(d) में पहले यह सीमा 36 घंटे थी। यह बदलाव 10 फरवरी 2026 को अधिसूचित संशोधन से आया।
क्या सहयोग पोर्टल और संचार साथी एक ही हैं?
नहीं। संचार साथी दूरसंचार विभाग का पोर्टल है, जहाँ नागरिक खोए फोन ब्लॉक कर सकते हैं और अपने नाम पर चल रहे मोबाइल कनेक्शन देख सकते हैं। सहयोग गृह मंत्रालय का चैनल है, जो अधिकृत एजेंसियों और प्लेटफॉर्म के बीच चलता है। आम नागरिक इसका इस्तेमाल नहीं करते।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
1. सहयोग पोर्टल के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसे गृह मंत्रालय के तहत भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र चलाता है।
2. इसके जरिए भेजे गए नोटिस IT Act, 2000 की धारा 69A के तहत जारी ब्लॉकिंग आदेश होते हैं।
3. यह IT Act, 2000 की धारा 79(3)(b) के तहत मध्यस्थों तक नोटिस पहुँचाता है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 1 और 3
- (c) केवल 2 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b) सहयोग धारा 79(3)(b) के नोटिस पहुँचाता है, जबकि धारा 69A के आदेश 2009 के ब्लॉकिंग नियमों के तहत नामित अधिकारी की ओर से आते हैं।
2. IT Act, 2000 की धारा 69A के तहत ब्लॉकिंग के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ब्लॉकिंग निर्देश के कारण लिखित में दर्ज करना जरूरी है।
2. ब्लॉकिंग निर्देशों की जाँच के लिए एक समीक्षा समिति को हर दो महीने में कम से कम एक बार बैठक करनी होती है।
3. आदेश का पालन न करने वाले मध्यस्थ को सात साल तक की कैद की सजा हो सकती है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 2 और 3
- (c) केवल 1 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d) कथन 1 और 3 खुद धारा 69A से आते हैं, जबकि कथन 2 का आधार 2009 के ब्लॉकिंग नियमों का नियम 14 है।
3. श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने:
- (a) IT Act की धारा 69A रद्द कर दी
- (b) IT Act की धारा 79 को पूरी तरह रद्द कर दिया
- (c) धारा 79(3)(b) को सीमित अर्थ में पढ़ा, ताकि इसके लिए अदालत का आदेश या अनुच्छेद 19(2) से जुड़ी सरकारी अधिसूचना जरूरी हो
- (d) IT Act की धारा 66A को अतिरिक्त सुरक्षा उपायों के साथ बरकरार रखा
उत्तर: (c) कोर्ट ने धारा 66A रद्द की, धारा 69A बरकरार रखी और धारा 79(3)(b) को सीमित अर्थ में पढ़ा।
4. 15 नवंबर 2025 से लागू संशोधन के बाद IT नियम, 2021 के नियम 3(1)(d) के तहत पुलिस की ओर से कंटेंट हटाने की सूचना कम से कम किस रैंक का अधिकारी जारी कर सकता है?
- (a) पुलिस अधीक्षक
- (b) पुलिस उप महानिरीक्षक
- (c) पुलिस महानिरीक्षक
- (d) पुलिस महानिदेशक
उत्तर: (b) संशोधित नियम के मुताबिक पुलिस की सूचना के लिए खास तौर पर अधिकृत ऐसा अधिकारी चाहिए, जो DIG रैंक से नीचे का न हो।
5. X Corp बनाम भारत संघ मामले में कर्नाटक हाई कोर्ट के 24 सितंबर 2025 के फैसले के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अदालत ने कहा कि जो कंपनी भारतीय नागरिक नहीं है, वह अनुच्छेद 19 के अधिकारों का सहारा नहीं ले सकती।
2. अदालत ने IT नियम, 2021 का नियम 3(1)(d) रद्द कर दिया।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a) अदालत ने नियम 3(1)(d) और सहयोग पोर्टल को सही ठहराया, और X Corp की याचिका खारिज कर दी।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- समझाइए कि भारतीय संदर्भ में फेक न्यूज और दुष्प्रचार आंतरिक सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए कैसे खतरा पैदा करते हैं? इस संदर्भ में सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 में हुए संशोधनों की मुख्य विशेषताओं पर चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2026, GS पेपर III।
- सरकार के लिए सहयोग पोर्टल सुविधा देने वाला तंत्र है, जबकि उसके आलोचकों के लिए यह ब्लॉकिंग की समानांतर व्यवस्था है। IT Act, 2000 की धारा 69A और 79(3)(b) के आलोक में दोनों पक्षों का परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) ने भारत में मध्यस्थों की जिम्मेदारी से जुड़े कानून को कैसे आकार दिया, और सहयोग की मुकदमेबाजी में दोनों पक्ष उस पर क्यों भरोसा करते हैं? (15 अंक, 250 शब्द)
- गैरकानूनी ऑनलाइन कंटेंट के नियमन में रफ्तार और उचित प्रक्रिया, दोनों जायज लक्ष्य हैं। ऐसे सुरक्षा उपाय सुझाइए, जिनसे कंटेंट हटाने की व्यवस्था दोनों को हासिल कर सके। (10 अंक, 150 शब्द)
- नोटिस भेजने में राज्य पुलिस बलों की भूमिका के संदर्भ में, भारत में ऑनलाइन कंटेंट हटाने के संघीय पहलू पर चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)