असम राइफल्स भारत का सबसे पुराना अर्धसैनिक बल है। अंग्रेजों के दौर में 1835 में कछार लेवी (Cachar Levy) के नाम से इसका गठन हुआ था। आज यही बल 1,643 किलोमीटर लंबी भारत-म्यांमार सीमा की रखवाली करता है और पूरे पूर्वोत्तर में उग्रवाद-रोधी अभियान चलाता है। इसका मुख्यालय शिलांग में है। यह बल इसलिए अहम है क्योंकि पूर्वी सीमा पर भारत की नीति और पूर्वोत्तर के उग्रवाद से निपटने का तरीका, दोनों इसी एक बल से होकर गुजरते हैं।
ज्यादातर पाठकों के मन में इसे लेकर एक उलझन रहती है: असम राइफल्स सेना का हिस्सा है या गृह मंत्रालय का बल? जवाब है, दोनों, लेकिन दो अलग-अलग मायनों में। इसका प्रशासन गृह मंत्रालय (MHA) चलाता है, जबकि इसके अभियान सेना चलाती है और इसके वरिष्ठ अफसर भी सेना ही देती है। 2001 के बाद से इस बँटवारे को खत्म करने की हर कोशिश हुई, और यह हर बार टिका रहा। यह नोट साफ करता है कि किसके हाथ में क्या है, और ऐसा क्यों है।
असम राइफल्स क्या है?
असम राइफल्स संघ का सशस्त्र बल है, जो संसद के अपने अलग अधिनियम से बना है। यह भारत-म्यांमार सीमा की रखवाली करता है और सेना की कमान में पूर्वोत्तर में उग्रवाद से लड़ता है। गृह मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट इसे देश का सबसे पुराना अर्धसैनिक बल कहती है। यही रिपोर्ट इसे केंद्रीय अर्धसैनिक बल के रूप में अलग से गिनाती है, यानी उन पाँच केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) से अलग, जिनके साथ इसे आम तौर पर रखा जाता है।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| स्थापना | 1835 में, लगभग 750 जवानों वाली कछार लेवी के रूप में; 1917 में इसका नाम असम राइफल्स पड़ा |
| मंत्रालय | प्रशासन के लिए गृह मंत्रालय; अभियानों के लिए सेना, जो रक्षा मंत्रालय के तहत आती है |
| कानूनी आधार | असम राइफल्स अधिनियम, 2006 (2006 का अधिनियम संख्या 47), जिसने असम राइफल्स अधिनियम, 1941 को रद्द किया |
| मुख्यालय | महानिदेशालय असम राइफल्स, शिलांग, मेघालय |
| प्रमुख | महानिदेशक, जो सेना के सेवारत लेफ्टिनेंट जनरल होते हैं (मार्च 2026 में लेफ्टिनेंट जनरल विकास लखेड़ा) |
| आदर्श वाक्य | “पूर्वोत्तर के प्रहरी” (“Sentinels of the North East”); इसे “पूर्वोत्तर के लोगों के मित्र” भी कहा जाता है |
| आकार | 1 NDRF बटालियन सहित 47 बटालियनें; स्वीकृत संख्याबल 66,411 (गृह मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2024-25) |
| सीमा | भारत-म्यांमार सीमा, 1,643 किलोमीटर, जो अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम से होकर जाती है |
| आधिकारिक श्रेणी | गृह मंत्रालय के तहत केंद्रीय अर्धसैनिक बल, जिसे पाँच CAPF से अलग सूची में रखा गया है |
केंद्र के बाकी बलों का पूरा परिवार, और उसमें कौन-सा बल कहाँ बैठता है, यह केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल वाले नोट में समझाया गया है।
कछार लेवी असम राइफल्स कैसे बनी?
इस बल की शुरुआत 1835 में कछार लेवी से हुई। यह लगभग 750 जवानों की एक मिलिशिया थी, जिसे ब्रिटिश चाय बागानों और उनकी बस्तियों को कबीलाई हमलों से बचाने के लिए खड़ा किया गया था। पहले विश्व युद्ध में इसकी सेवा के बाद 1917 में इसे आज का नाम मिला। बीच के 82 साल एक छोटी सीमांत पुलिस की कहानी हैं, जिसका काम बढ़ता गया और जिसे बार-बार नए ढाँचे में ढाला गया।
लेवी का काम बढ़ते-बढ़ते असम की सीमाओं के पार दंडात्मक अभियानों तक पहुँच गया। तब इन टुकड़ियों को नए सिरे से संगठित किया गया और इनका नाम फ्रंटियर फोर्स रखा गया। बल का अपना इतिहास बताता है कि इन्हें “नागरिक प्रशासन का दायाँ हाथ और सेना का बायाँ हाथ” कहा जाने लगा। यह वाक्य याद रखने लायक है, क्योंकि आज भी यही इसके काम का सबसे सही बयान है: थोड़ा पुलिस, थोड़ा सैनिक। 1870 में मौजूदा टुकड़ियों को मिलाकर असम मिलिट्री पुलिस की तीन बटालियनें बनाई गईं। फिर पहले विश्व युद्ध से ठीक पहले चौथी बटालियन, यानी दरांग बटालियन, खड़ी की गई।
नाम उसी युद्ध से आया। रिजर्व सैनिकों को कम समय में बुलाया नहीं जा सकता था, और गोरखा सैनिक छुट्टी पर नेपाल गए हुए थे। ऐसे में असम मिलिट्री पुलिस ने यह कमी पूरी की। उसने यूरोप और मध्य-पूर्व के मोर्चों पर 3,000 से ज्यादा जवान भेजे। इसी सेवा के सम्मान में 1917 में इस बल का नाम असम राइफल्स रखा गया।
बाद में लिखे गए कुछ इतिहासों में बीच के पुलिस नामों की एक लंबी कड़ी मिलती है। उनकी तारीखें बल के अपने ब्योरे से मेल नहीं खातीं, जिसमें 1870 के विलय की बात है। लेकिन दो पक्की बातों पर सब सहमत हैं: 1835 की कछार लेवी, और 1917 में मिला असम राइफल्स नाम।
आजादी के बाद यह बल विदेश मंत्रालय के अधीन रहा, जो उस समय पूर्वोत्तर सीमांत एजेंसी (NEFA), यानी आज के अरुणाचल प्रदेश, का प्रशासन देखता था। 1962 के चीन युद्ध में यह एक पारंपरिक बल की तरह लड़ा। उस युद्ध के बाद सेना ने इसका परिचालन नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। 1965 में प्रशासनिक नियंत्रण गृह मंत्रालय के पास चला गया, और वही बँटवारा तय हो गया जो आज इस बल की पहचान है।
बाद की तैनातियों ने तस्वीर को और बड़ा किया। 1987 में यह भारतीय शांति सेना (ऑपरेशन पवन) के साथ श्रीलंका गया। फिर जब पूर्वोत्तर में उग्रवाद फैला, तो इसका मुख्य काम उग्रवाद-रोधी अभियान और कानून-व्यवस्था बन गया। 1960 में 17 बटालियनों से बढ़कर आज इसके पास 46 बटालियनें हैं। इनके अलावा 1 बटालियन NDRF में सेवा दे रही है।
क्या सबसे पुराना अर्धसैनिक बल होने का इसका दावा सही है? यह दावा अटूट निरंतरता पर टिका है: 1835 में खड़ी की गई इकाई का नाम और ढाँचा कई बार बदला, लेकिन उसे कभी भंग करके नए सिरे से खड़ा नहीं किया गया। तुलना करने पर बात और साफ होती है। ITBP और SSB का पूर्ववर्ती संगठन, दोनों 1962-63 के हैं, यानी चीन युद्ध के बाद के। सीमा सुरक्षा बल 1965 का है। इसलिए सीमा की रखवाली करने वाला हर दूसरा बल इससे एक सदी से भी ज्यादा छोटा है।
असम राइफल्स पर किस मंत्रालय का नियंत्रण है?
इसे दो मंत्रालय मिलकर संभालते हैं। गृह मंत्रालय के पास प्रशासनिक नियंत्रण है: वही इस बल को पैसा देता है और इसकी भर्ती चलाता है। रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाली सेना के पास परिचालन नियंत्रण है: वही तय करती है कि बटालियनें कहाँ जाएँगी और वहाँ क्या करेंगी। कमान के पदों पर भी सेना के ही अफसर बैठते हैं।
ये दोनों शब्द आसानी से गड्डमड्ड हो जाते हैं, इसलिए इन्हें पक्का कर लीजिए। प्रशासनिक नियंत्रण (administrative control) इस सवाल का जवाब है कि बल को चालू कौन रखता है। परिचालन नियंत्रण (operational control) इस सवाल का जवाब है कि जमीन पर उसे क्या करना है, यह कौन बताता है। एक जहाज की कल्पना कीजिए। उसका मालिक एक कंपनी है और खर्च भी वही उठाती है, लेकिन उसे चलाने वाले कप्तान और अफसर दूसरी कंपनी से उधार आए हैं। तस्वीर ठीक बैठती है, बस एक पेच है: डेक के नीचे का अमला, यानी राइफलमैन, मालिक कंपनी भर्ती करती है, कप्तान देने वाली कंपनी नहीं।
| मामला | नियंत्रण किसके पास |
|---|---|
| बजट और नई बटालियनें | गृह मंत्रालय; 2022 में उसने पाँच अतिरिक्त बटालियनों की सैद्धांतिक मंजूरी की घोषणा की |
| राइफलमैनों की भर्ती | गृह मंत्रालय, अपनी राइफलमैन (GD) भर्ती योजना के तहत |
| बल का कानून | असम राइफल्स अधिनियम, 2006, जो नियंत्रण केंद्र सरकार को देता है और किसी मंत्रालय का नाम नहीं लेता |
| बटालियनें कहाँ तैनात हों और वहाँ क्या करें | सेना |
| वरिष्ठ कमान | सेना के अफसर: महानिदेशक के रूप में एक लेफ्टिनेंट जनरल, महानिरीक्षक मुख्यालयों पर मेजर जनरल और सेक्टर मुख्यालयों पर ब्रिगेडियर |
| बल में सेवा दे रहे सेना के अफसर | वे सेना अधिनियम, 1950 के तहत ही रहते हैं (असम राइफल्स अधिनियम की धारा 3(3)), लेकिन आदेश बल की अपनी कमान-श्रृंखला से लेते हैं |
नियम-पुस्तिका में इस बँटवारे का कोई प्रावधान नहीं है। इस विवाद पर 2019 की एक रिपोर्ट ने ध्यान दिलाया कि भारत सरकार (कार्य आवंटन) नियम, 1961 में दोहरे नियंत्रण का कोई प्रावधान नहीं है। यह व्यवस्था 1962 के युद्ध और 1965 के हस्तांतरण की बची हुई विरासत है, जिसकी गांठ आज तक कोई नहीं खोल पाया।
इस बँटवारे की कीमत सिर्फ प्रशासनिक नहीं, इंसानी भी है। रिटायर हो चुके जवानों का कहना है कि इसकी वजह से उन्हें वे सुविधाएँ बराबरी से नहीं मिलतीं, जो सैनिकों को मिलती हैं। 2017 में असम राइफल्स एक्स-सर्विसमेन वेलफेयर एसोसिएशन ने दिल्ली हाई कोर्ट से माँग की कि पूरे बल को सेना के अधीन कर दिया जाए।
असम राइफल्स अधिनियम, 2006 क्या कहता है?
असम राइफल्स अधिनियम, 2006 (2006 का अधिनियम संख्या 47) इस बल का बुनियादी कानून है, और इसने असम राइफल्स अधिनियम, 1941 की जगह ली। धारा 4 “असम राइफल्स नाम का संघ का एक सशस्त्र बल” गठित करती है और उसे तीन काम सौंपती है:
- भारत की सीमाओं की सुरक्षा पक्की करना;
- तय किए गए इलाकों में उग्रवाद-रोधी अभियान चलाना;
- कानून-व्यवस्था बनाए रखने में नागरिक प्रशासन की मदद करना।
धारा 5 इस बल का “सामान्य अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण” केंद्र सरकार को देती है, और इसकी कमान एक महानिदेशक को। पूरे अधिनियम में “मंत्रालय” शब्द कहीं नहीं आता। इस चुप्पी की वजह से मंत्रालय चुनने का फैसला कार्यपालिका पर छूट जाता है। इसीलिए यह विवाद कानून से सुलझने के बजाय कैबिनेट नोटों और अदालत की याचिका के बीच घूमता रहा है।
यह अधिनियम पुलिस कानून से ज्यादा सैन्य संहिता जैसा लगता है। इसमें “शत्रु” की परिभाषा में सशस्त्र विद्रोहियों और आतंकवादियों को साफ तौर पर शामिल किया गया है। धारा 86 बल की अपनी असम राइफल्स अदालतें बनाती है, जनरल कोर्ट से लेकर समरी कोर्ट तक, ताकि बल के सदस्यों के अपराधों की सुनवाई हो सके।
बल का अपना भूमिका-विवरण अधिनियम से ज्यादा व्यावहारिक है। उसमें ये काम गिनाए गए हैं:
- पूर्वोत्तर में, और जरूरत पड़ने पर दूसरी जगहों पर भी, सेना के नियंत्रण में उग्रवाद-रोधी अभियान;
- शांति के समय और “छद्म युद्ध” के दौरान भारत-चीन और भारत-म्यांमार सीमाओं की सुरक्षा;
- युद्ध के दौरान पीछे के इलाकों की सुरक्षा;
- आंतरिक सुरक्षा में केंद्र सरकार के “आखिरी से पहले हस्तक्षेप करने वाले बल” (penultimate interventionist force) की भूमिका, यह भी सेना के नियंत्रण में।
यह आखिरी बात खोलकर समझनी होगी। इसका मतलब है आखिरी से पहला सहारा: यानी वह बल जिसे तब भेजा जाता है, जब हालात केंद्रीय पुलिस बलों के बस से बाहर हो जाएँ, लेकिन सेना को सीधे उतारने की नौबत अभी न आई हो। चीन वाला जिक्र भी पाठकों को चौंकाता है, क्योंकि गृह मंत्रालय की सीमा तालिका वह सीमा ITBP को देती है। औपचारिक रूप से असम राइफल्स को म्यांमार सीमा ही सौंपी गई है। 2022 में गृह मंत्रालय ने यह भी बताया कि सीमा पर नशीले पदार्थों के खिलाफ काम के लिए इस बल को NDPS अधिनियम, यानी नशीले पदार्थों वाले कानून, के तहत अधिकार दिए गए हैं।
असम राइफल्स का ढाँचा कैसा है और यह कहाँ तैनात है?
इसका ढाँचा सेना की एक फॉर्मेशन जैसा है, और इसका शीर्ष शिलांग में है। गृह मंत्रालय की 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक इसमें ये इकाइयाँ हैं:
- 1 महानिदेशालय मुख्यालय;
- 3 महानिरीक्षक मुख्यालय;
- 12 सेक्टर मुख्यालय;
- 47 बटालियनें, जिनमें 1 NDRF बटालियन शामिल है;
- एक प्रशिक्षण केंद्र और एक डॉग प्रशिक्षण केंद्र, और यह सब 66,411 के स्वीकृत संख्याबल के भीतर।
महानिदेशक सेना के लेफ्टिनेंट जनरल होते हैं, और उनके नीचे के पद भी सेना की ही सीढ़ी पर चलते हैं। बल की अपनी वेबसाइट एक याद रखने लायक बात जोड़ती है: असम राइफल्स का मुख्यालय शिलांग में इसलिए है क्योंकि इसकी भूमिका क्षेत्रीय है, जबकि बाकी हर केंद्रीय बल का मुख्यालय दिल्ली में है।
इसकी औपचारिक जिम्मेदारी भारत-म्यांमार सीमा है, जो चार राज्यों से होकर 1,643 किलोमीटर तक जाती है:
- अरुणाचल प्रदेश, 520 किलोमीटर;
- नागालैंड, 215 किलोमीटर;
- मणिपुर, 398 किलोमीटर;
- मिजोरम, 510 किलोमीटर।
इस बल ने 2000 के दशक की शुरुआत में यह सीमा BSF से ली। कारगिल संघर्ष के बाद बने मंत्रिसमूह ने “एक सीमा, एक बल” (one border, one force) की सिफारिश की थी। यानी हर सीमा के लिए एक ही जवाबदेह बल, ताकि जिम्मेदारी एक-दूसरे पर टाली न जा सके। ज्यादातर ब्योरे यह हस्तांतरण 2002 का बताते हैं, और सितंबर 2003 की एक रिपोर्ट में BSF की जगह पहले ही बदली हुई बताई गई थी। भारत की बाकी जमीनी सीमाएँ इसी सिद्धांत पर कैसे बाँटी गईं, यह सीमा प्रबंधन वाले नोट में समझाया गया है।
सीमा के साथ-साथ यह बल पूरे पूर्वोत्तर में उग्रवाद-रोधी अभियान चलाता है। इसका 1 सेक्टर मुख्यालय 4 बटालियनों के साथ जम्मू-कश्मीर में भी काम करता है। 1 अप्रैल 2024 से 15 जनवरी 2025 तक का गृह मंत्रालय का सार्वजनिक रिकॉर्ड यह बताता है:
- 4 उग्रवादी मारे गए, 275 पकड़े गए और 98 ने आत्मसमर्पण किया;
- म्यांमार के 550 नागरिक पकड़े गए;
- 1,166 हथियार बरामद हुए;
- करीब ₹1,051 करोड़ का प्रतिबंधित माल जब्त हुआ, जिसमें ज्यादातर नशीले पदार्थ थे।
इस क्षेत्र में उग्रवाद-रोधी अभियान लंबे समय से AFSPA के साथ-साथ चलते आए हैं। यह वह कानून है जो “अशांत” घोषित इलाकों में सशस्त्र बलों को विशेष शक्तियाँ देता है, और इसके तहत इस बल का आचरण भी उसी बड़ी बहस का हिस्सा है। भारत की सुरक्षा एजेंसियों के बीच असम राइफल्स कहाँ बैठता है, यह भारत का आंतरिक सुरक्षा ढाँचा वाले नोट में दिया गया है।
असम राइफल्स का विलय या हस्तांतरण अब तक क्यों नहीं हुआ?
इस बल को एक ही मालिक देने की हर कोशिश अटक गई है। पूरा नियंत्रण लेने या इसे किसी दूसरे बल में मिलाने की गृह मंत्रालय की योजनाएँ सेना की आपत्तियों से टकराती रहीं। उधर पूरे सेना नियंत्रण के लिए पूर्व सैनिकों की लड़ाई अभी अदालत में है। सिलसिलेवार रिकॉर्ड यह है:
- 2001: कारगिल के बाद बने मंत्रिसमूह ने “एक सीमा, एक बल” की सिफारिश की, और यह भी कहा कि इस बल पर पूरा नियंत्रण गृह मंत्रालय का हो; रक्षा मंत्रालय ने दूसरी बात ठुकरा दी।
- जनवरी 2013: गृह मंत्रालय ने सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCS) के लिए एक नोट का मसौदा बनाया। इसमें म्यांमार सीमा पर असम राइफल्स की जगह BSF को लगाने और परिचालन नियंत्रण गृह मंत्रालय को देने की बात थी; योजना अटक गई।
- 2017: पूर्व सैनिकों के एसोसिएशन ने पूरे सेना नियंत्रण के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की।
- 2018: गृह मंत्रालय ने इस बल को ITBP में मिलाने का प्रस्ताव रखा; सेना ने इसका विरोध किया।
- 2019: गृह मंत्रालय ने 20 मार्च को CCS को नया नोट भेजा। फिर 15 अप्रैल को उसने दिल्ली हाई कोर्ट से कहा कि वह समिति का फैसला मानेगा।
- 20 नवंबर 2019: गृह राज्य मंत्री ने राज्यसभा को बताया कि इस बल को ITBP में मिलाने का “कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है”।
- 2025: हाई कोर्ट ने 10 मार्च को मामले की फिर सुनवाई की। अप्रैल में एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को चिट्ठी लिखकर फैसला माँगा।
- अप्रैल 2026: संसद ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 पास किया। यह पाँच बलों पर लागू होता है और असम राइफल्स को अपनी अनुसूची से बाहर रखता है।
2026 का अधिनियम इस फर्क को और तीखा कर देता है। जिन पाँच बलों पर यह लागू होता है, उनमें महानिदेशक का पद IPS अधिकारियों के लिए आरक्षित है। वहीं असम राइफल्स सेना के एक लेफ्टिनेंट जनरल की कमान में ही रहता है।
दोनों पक्षों के पास ठोस तर्क हैं। गृह मंत्रालय का तर्क तालमेल का है: जो मंत्रालय भारत की सीमाओं का प्रबंधन करता है, उसी के पास उस बल की कमान भी होनी चाहिए जो इनमें से एक सीमा की रखवाली करता है, जैसा BSF और ITBP के मामले में पहले से है। सेना का तर्क काम से जुड़ा है: पूर्वोत्तर में उग्रवाद-रोधी अभियान सेना की फॉर्मेशनों के साथ-साथ चलते हैं, और सेना के अफसरों वाली कमान-श्रृंखला ही दोनों को एक सुर में रखती है। प्रेस और नीति पर लिखने वाले एक और, कम बोली जाने वाली वजह की ओर भी इशारा करते हैं: वे वरिष्ठ पद, जो यह बल सेना के अफसरों को देता है।
कोई भी एक छोर साफ-सुथरा हल नहीं है। बल को पूरी तरह गृह मंत्रालय को सौंपने से वह कमान-कड़ी टूट जाएगी, जिस पर इसका उग्रवाद-रोधी काम टिका है। पूरी तरह रक्षा मंत्रालय को सौंपने से एक सीमा-रक्षक बल उस मंत्रालय से बाहर चला जाएगा, जो भारत के बाकी सीमा-रक्षक बल चलाता है। इसलिए समझदारी इसी में है कि दोहरे नियंत्रण को एक व्यावहारिक समझौता माना जाए, जिसे सेवा-शर्तों और कमान पर ज्यादा साफ नियमों की जरूरत है। इसे ऐसी गलती न समझिए, जिसे एक फैसले से पलटा जा सके।
भारत-म्यांमार सीमा पर क्या बदल रहा है?
2024 के बाद सबसे बड़ा बदलाव खुद सीमा पर आया है। बिना वीजा आवाजाही की जगह अब पास व्यवस्था आ गई है और बाड़ लगनी शुरू हो गई है। क्रॉसिंग पॉइंट असम राइफल्स ही चलाता है।
मुक्त आवाजाही व्यवस्था (Free Movement Regime, FMR) सीमा के पास रहने वाले लोगों को बिना वीजा आर-पार जाने देती थी, क्योंकि सीमा के दोनों ओर एक ही समुदाय रहते हैं। यह चलन पुराना है। गृह मंत्रालय की 2005-06 की वार्षिक रिपोर्ट ने प्रस्ताव रखा था कि म्यांमार के साथ समझौता करके परंपरा से चली आ रही 40 किलोमीटर की पट्टी को दोनों ओर 16 किलोमीटर तक घटाया जाए। 2024 के बाद का रिकॉर्ड यह है:
- जनवरी 2024: गृह मंत्रालय ने सीमा प्रबंधन विभाग बनाया।
- 8 फरवरी 2024: गृह मंत्रालय ने FMR खत्म करने का फैसला किया। विदेश मंत्रालय इसे खत्म करने की प्रक्रिया में था, इसलिए गृह मंत्रालय ने इसे तुरंत निलंबित करने की सिफारिश की।
- मार्च 2024: CCS ने म्यांमार सीमा के बाकी हिस्से पर बाड़ लगाने को सैद्धांतिक मंजूरी दी; सितंबर 2024 की प्रेस रिपोर्टों ने इसकी लागत करीब ₹31,000 करोड़ बताई।
- दिसंबर 2024: गृह मंत्रालय के एक पत्र में सीमा पास की व्यवस्था तय हुई। यह 10 किलोमीटर के भीतर रहने वालों के लिए एक बार के प्रवेश वाला पास है, जिस पर सात दिन तक रुका जा सकता है। इसे असम राइफल्स के जवान 43 तय क्रॉसिंग पॉइंटों पर जारी करते हैं। मिजोरम ने इसे 31 दिसंबर से लागू करना शुरू किया।
- 15 मार्च 2025: केंद्रीय गृह मंत्री की मौजूदगी में बल का बटालियन मुख्यालय आइजोल शहर के बीच से हटकर करीब 15 किलोमीटर दूर जोखावसांग ले जाया गया।
- 17 दिसंबर 2025: सरकार ने लोकसभा को बताया कि सीमा के 9.214 किलोमीटर हिस्से पर असल में बाड़ लग चुकी है।
यह 9.214 किलोमीटर, 1,643 किलोमीटर का करीब आधा प्रतिशत है। गृह मंत्रालय की 2024-25 की रिपोर्ट बताती है कि आगे के हिस्से कहाँ से आएँगे:
- करीब 151.61 किलोमीटर बाड़ का काम सौंपा जा चुका है या चल रहा है;
- मणिपुर के चुराचांदपुर में 20.862 किलोमीटर बाड़ और सड़क का काम सीमा सड़क संगठन को दिया गया है;
- हाइब्रिड निगरानी प्रणाली के 1 किलोमीटर लंबे दो पायलट प्रोजेक्ट, एक अरुणाचल प्रदेश में और एक मणिपुर में, जिन्हें असम राइफल्स ने बनाया है।
जमीन पर राजनीति मिली-जुली है। मिजोरम और नागालैंड के कई समूहों ने मुक्त आवाजाही खत्म करने और बाड़ लगाने का खुलकर विरोध किया है, क्योंकि उनके रिश्तेदार सीमा के उस पार रहते हैं। 2024 में मणिपुर सरकार ने म्यांमार से लगे अपने जिलों के लिए असम राइफल्स की जगह एक अलग सीमा बल की माँग की। ये सवाल दोनों देशों के बड़े रिश्ते में कहाँ बैठते हैं, यह भारत-म्यांमार संबंध वाले नोट में है। द्विपक्षीय सुरक्षा बातचीत का ताजा दौर सुरक्षा और खुफिया जानकारी साझा करने पर भारत-म्यांमार सीमा वार्ता में दिया गया है।
इनमें से किसी बदलाव ने यह नहीं बदला कि बल की कमान किसके हाथ में है। इसने 24 मार्च 2026 को शिलांग में लेफ्टिनेंट जनरल विकास लखेड़ा की अगुवाई में अपना 191वाँ स्थापना दिवस मनाया, और आज भी खुद को “पूर्वोत्तर के प्रहरी” ही कहता है।
परीक्षा के लिए असम राइफल्स कैसे पढ़ें
यह विषय GS पेपर III में आता है। वहाँ यह सीमावर्ती इलाकों की सुरक्षा चुनौतियों वाले हिस्से में बैठता है, और उस हिस्से में भी जहाँ अलग-अलग सुरक्षा बलों और उनके जनादेश की बात होती है। भारत-म्यांमार संबंधों के जरिए यह GS पेपर II तक भी पहुँचता है। इसे अकेले एक बल के रूप में कम, और सीमा प्रबंधन के एक जीते-जागते उदाहरण के रूप में ज्यादा पूछा जाता है। मुख्य परीक्षा 2020 के GS पेपर III में पूछा गया था: “म्यांमार, बांग्लादेश और पाकिस्तान की सीमाओं पर, नियंत्रण रेखा (LoC) समेत, आंतरिक सुरक्षा के खतरों और सीमा-पार अपराधों का विश्लेषण कीजिए। इस संबंध में विभिन्न सुरक्षा बलों की भूमिका की भी चर्चा कीजिए।“
ज्यादातर उत्तरों का बोझ ये सात तथ्य उठाते हैं:
- 1835 में कछार लेवी के रूप में गठन हुआ; 1917 में असम राइफल्स नाम मिला।
- प्रशासनिक नियंत्रण 1965 से गृह मंत्रालय के पास है; परिचालन नियंत्रण 1962 के युद्ध से सेना के पास।
- यह असम राइफल्स अधिनियम, 2006 से चलता है, जिसने 1941 का अधिनियम रद्द किया; धारा 4 इसकी तीन भूमिकाएँ तय करती है।
- मुख्यालय शिलांग में है; महानिदेशक सेना के सेवारत लेफ्टिनेंट जनरल होते हैं।
- यह 1,643 किलोमीटर लंबी भारत-म्यांमार सीमा की रखवाली करता है, जो पूर्वोत्तर के चार राज्यों को छूती है और किसी दूसरे राज्य को नहीं।
- 1 NDRF बटालियन सहित 47 बटालियनें हैं; स्वीकृत संख्याबल 66,411 है।
- दिसंबर 2024 से मुक्त आवाजाही की पट्टी 16 किलोमीटर से घटकर 10 किलोमीटर रह गई, और साथ में सात दिन का सीमा पास आया।
चार उलझनें सबसे ज्यादा अंक कटवाती हैं, और हर एक से निकलने का साफ रास्ता है:
- CAPF है या नहीं? इसे आम तौर पर CAPF के साथ रखा जाता है, लेकिन गृह मंत्रालय इसे केंद्रीय अर्धसैनिक बल के रूप में अलग गिनाता है, और 2026 का CAPF अधिनियम इसे बाहर रखता है। “गृह मंत्रालय के तहत केंद्रीय बल” लिखना हमेशा सुरक्षित है।
- सेना है या नहीं? यह सेना का हिस्सा नहीं है। यह अपने अलग अधिनियम से बना संघ का सशस्त्र बल है, जिसकी कमान सेना के अफसरों के हाथ में है।
- 1835 या 1917? 1835 में इसका गठन हुआ; 1917 में इसे नाम मिला।
- 16 किलोमीटर या 10 किलोमीटर? 16 किलोमीटर मुक्त आवाजाही की पुरानी पट्टी थी; 10 किलोमीटर दिसंबर 2024 से लागू सीमा पास की पट्टी है।
इस बल को याद रखने का सबसे तेज तरीका है, इसे बाकी जमीनी सीमाओं पर तैनात इसके भाई-बंधु बलों के सामने रखकर देखना:
| बल | किस सीमा की रखवाली | गठन | अभियान कौन चलाता है | प्रमुख | मुख्यालय |
|---|---|---|---|---|---|
| असम राइफल्स | भारत-म्यांमार | 1835, कछार लेवी के रूप में | सेना | सेना के लेफ्टिनेंट जनरल | शिलांग |
| BSF | भारत-पाकिस्तान और भारत-बांग्लादेश | 1965 | गृह मंत्रालय | IPS अधिकारी | नई दिल्ली |
| ITBP | भारत-चीन | 1962 | गृह मंत्रालय | IPS अधिकारी | दिल्ली |
| SSB | भारत-नेपाल और भारत-भूटान | 1963, स्पेशल सर्विस ब्यूरो के रूप में | गृह मंत्रालय | IPS अधिकारी | दिल्ली |
इस परिवार में NSG सबसे अलग है: यह आतंकवाद-रोधी स्ट्राइक फोर्स है, जिसके पास रखवाली के लिए कोई सीमा नहीं है। इसीलिए सीमा प्रबंधन वाले उत्तर में इसकी जगह शायद ही बनती है।
असम राइफल्स उस विद्यार्थी को सबसे ज्यादा फायदा देता है, जो इसे तथ्यों की फाइल की तरह नहीं, एक केस की तरह पढ़ता है। अगर आप समझा सकें कि इसके दो मालिक क्यों हैं, और यह व्यवस्था इसे बदलने की हर कोशिश के बाद भी क्यों टिकी रही, तो सीमा प्रबंधन के किसी भी उत्तर के लिए आपके पास पूर्वोत्तर का एक ठोस उदाहरण होगा।
सामान्य प्रश्न
असम राइफल्स की स्थापना कब हुई?
असम राइफल्स की स्थापना 1835 में कछार लेवी के रूप में हुई थी। यह लगभग 750 जवानों की मिलिशिया थी, जिसे अंग्रेजों ने असम में चाय बागानों और बस्तियों की सुरक्षा के लिए खड़ा किया था। सीमांत पुलिस बल के रूप में इसके कई नाम बदले, और पहले विश्व युद्ध में इसकी सेवा के सम्मान में 1917 में इसका नाम असम राइफल्स रखा गया। 1835 से चली आ रही इसी अटूट कड़ी की वजह से गृह मंत्रालय इसे भारत का सबसे पुराना अर्धसैनिक बल कहता है।
असम राइफल्स किस मंत्रालय के अधीन है?
असम राइफल्स किस मंत्रालय के अधीन है, इसका जवाब दो हिस्सों में है। गृह मंत्रालय के पास प्रशासनिक नियंत्रण है, जिसमें इसका पैसा और इसकी भर्ती आती है। रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाली सेना के पास परिचालन नियंत्रण है, और वही इसके वरिष्ठ अफसर देती है। यह दोहरा नियंत्रण 1960 के दशक से चला आ रहा है: 1962 के युद्ध के बाद सेना ने परिचालन नियंत्रण लिया, और 1965 में प्रशासन गृह मंत्रालय के पास चला गया।
क्या असम राइफल्स भारतीय सेना का हिस्सा है?
नहीं। यह असम राइफल्स अधिनियम, 2006 से बना संघ का एक अलग सशस्त्र बल है, जिसके अपने राइफलमैन और अपनी अदालतें हैं। उलझन इसकी कमान से पैदा होती है, क्योंकि इसके महानिदेशक सेना के सेवारत लेफ्टिनेंट जनरल होते हैं और ज्यादातर वरिष्ठ पदों पर प्रतिनियुक्ति पर आए सेना के अफसर बैठते हैं।
क्या असम राइफल्स CAPF है?
यह इस पर निर्भर करता है कि आप किसकी सूची देख रहे हैं। इसे आम तौर पर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के साथ रखा जाता है, लेकिन गृह मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट पहले पाँच CAPF गिनाती है और फिर असम राइफल्स को केंद्रीय अर्धसैनिक बल के रूप में अलग से। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 भी सिर्फ उन पाँच पर लागू होता है और असम राइफल्स को बाहर रखता है।
असम राइफल्स किस सीमा की रखवाली करता है?
यह 1,643 किलोमीटर लंबी भारत-म्यांमार सीमा की रखवाली करता है, जो उत्तर में अरुणाचल प्रदेश से दक्षिण में मिजोरम तक पूर्वोत्तर के चार राज्यों से होकर गुजरती है। ‘एक सीमा, एक बल’ के सिद्धांत के तहत इसने 2000 के दशक की शुरुआत में यह सीमा BSF से ली। यह पूर्वोत्तर में उग्रवाद-रोधी अभियान भी चलाता है, और जम्मू-कश्मीर में इसका एक सेक्टर मुख्यालय है।
असम राइफल्स अधिनियम 2006 क्या है?
यह वह कानून है जो इस बल का गठन करता है और इसे चलाता है, और इसने असम राइफल्स अधिनियम, 1941 की जगह ली। धारा 4 असम राइफल्स को सीमा सुरक्षा और उग्रवाद-रोधी काम के लिए संघ का सशस्त्र बल बनाती है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने में यह बल नागरिक प्रशासन की मदद भी कर सकता है। अधिनियम नियंत्रण केंद्र सरकार को देता है, लेकिन किसी मंत्रालय का नाम नहीं लेता, इसलिए दोहरे नियंत्रण का सवाल कार्यपालिका के फैसले पर छूट जाता है।
असम राइफल्स को पूर्वोत्तर के प्रहरी क्यों कहा जाता है?
‘पूर्वोत्तर के प्रहरी’ इस बल का आदर्श वाक्य है, और गृह मंत्रालय भी इसके लिए यही शब्द इस्तेमाल करता है। प्रहरी यानी पहरे पर खड़ा रक्षक, और यह नाम उस बल पर ठीक बैठता है जिसने अपना लगभग पूरा इतिहास पूर्वोत्तर की पहाड़ियों में बिताया है। इसका दूसरा लोकप्रिय नाम, ‘पूर्वोत्तर के लोगों के मित्र’, उस स्थानीय भूमिका को दिखाता है जिसका दावा यह खुद करता है।
भारत-म्यांमार सीमा पर मुक्त आवाजाही व्यवस्था का क्या हुआ?
फरवरी 2024 में गृह मंत्रालय ने मुक्त आवाजाही व्यवस्था खत्म करने का फैसला किया। इस व्यवस्था में सीमा के पास रहने वाले लोग बिना वीजा के 16 किलोमीटर तक आर-पार जा सकते थे। दिसंबर 2024 से इसकी जगह सीमा पास व्यवस्था आ गई, जिसमें 10 किलोमीटर के भीतर रहने वाले लोग तय क्रॉसिंग पॉइंटों से सात दिन तक के लिए सीमा पार कर सकते हैं। इन पॉइंटों पर पास असम राइफल्स के जवान जारी करते हैं।
अभ्यास प्रश्न
प्रीलिम्स MCQ
1. असम राइफल्स के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इसका गठन 1835 में कछार लेवी के रूप में हुआ था। 2. इसका महानिदेशालय नई दिल्ली में स्थित है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1
- (b) केवल 2
- (c) 1 और 2 दोनों
- (d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a) इसका गठन 1835 में कछार लेवी के रूप में हुआ था, और इसका मुख्यालय दिल्ली में नहीं, शिलांग में है।
2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. असम राइफल्स का प्रशासनिक नियंत्रण गृह मंत्रालय के पास है। 2. असम राइफल्स का परिचालन नियंत्रण सेना के पास है। 3. असम राइफल्स उन बलों में से एक है जिन पर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 लागू होता है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 2 और 3
- (c) केवल 1 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a) 2026 का अधिनियम पाँच CAPF पर लागू होता है, और असम राइफल्स उसकी अनुसूची में नहीं है।
3. निम्नलिखित में से राज्यों के किस समूह की जमीनी सीमा म्यांमार से लगती है?
- (a) अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम
- (b) अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर और मिजोरम
- (c) नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा
- (d) अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मेघालय
उत्तर: (a) 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम से होकर गुजरती है।
4. दिसंबर 2024 में भारत-म्यांमार सीमा पर शुरू की गई सीमा पास व्यवस्था के तहत, सीमा से कितनी दूरी के भीतर रहने वाले लोग पास लेकर सीमा पार कर सकते हैं?
- (a) 5 किलोमीटर
- (b) 10 किलोमीटर
- (c) 16 किलोमीटर
- (d) 40 किलोमीटर
उत्तर: (b) पास 10 किलोमीटर के भीतर रहने वालों के लिए है; 16 किलोमीटर मुक्त आवाजाही व्यवस्था की पुरानी पट्टी थी।
5. असम राइफल्स अधिनियम, 2006 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. यह असम राइफल्स को संघ का सशस्त्र बल बताता है। 2. इसने असम राइफल्स अधिनियम, 1941 को रद्द किया। 3. यह बल को सिर्फ सीमा की रखवाली तक सीमित करता है और उग्रवाद-रोधी काम पर रोक लगाता है। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- (a) केवल 1 और 2
- (b) केवल 2 और 3
- (c) केवल 1 और 3
- (d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a) धारा 4 में तय इलाकों में उग्रवाद-रोधी अभियान साफ तौर पर शामिल हैं, इसलिए कथन 3 गलत है।
मुख्य परीक्षा प्रश्न
- उग्रवादियों की सीमा-पार आवाजाही, पूर्वोत्तर भारत में सीमा की पुलिसिंग के सामने खड़ी कई सुरक्षा चुनौतियों में से सिर्फ एक है। भारत-म्यांमार सीमा के पार से इस समय पैदा हो रही विभिन्न चुनौतियों का परीक्षण कीजिए। इन चुनौतियों से निपटने के कदमों की भी चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2019, GS पेपर III।
- गृह मंत्रालय और सेना का असम राइफल्स पर दोहरा नियंत्रण 2001 के बाद से सुधार की हर कोशिश के बावजूद बना हुआ है। इस बल को एक ही मंत्रालय के अधीन रखने के पक्ष का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- ‘एक सीमा, एक बल’ के सिद्धांत को समझाइए और मूल्यांकन कीजिए कि भारत की जमीनी सीमाओं पर यह कहाँ तक हासिल हुआ है। (10 अंक, 150 शब्द)
- भारत-म्यांमार सीमा पर मुक्त आवाजाही व्यवस्था की जगह सीमा पास व्यवस्था लाकर सुरक्षा और सीमावर्ती समुदायों की आपसी रिश्तेदारी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई है। चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
- भारत-म्यांमार सीमा पर बाड़ लगाने का काम शुरू हो गया है, लेकिन यह इसकी लंबाई के एक छोटे से हिस्से को ही ढकता है। इसमें आने वाली भौतिक और सामाजिक बाधाओं का परीक्षण कीजिए और पूरक उपाय सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)