UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

सामाजिक आंदोलन

आंदोलन भारतीय लोकतंत्र का वह हिस्सा हैं जो चुनावों के बीच चलता है। नागरिक स्वतंत्रता, महिला आंदोलन, ग़रीबों का पर्यावरणवाद और आंदोलन से क़ानून बनने के मामले — PSIR पेपर I के लिए।

A crowd seen from behind at dusk with many raised hands holding blank placards above their heads.

आंदोलन भारतीय लोकतंत्र का वह हिस्सा हैं जो चुनावों के बीच काम करता है। इन्हें इससे मत नापिए कि इनकी तात्कालिक माँग पूरी हुई या नहीं। नाप यह है कि इन्होंने राज्य के करने लायक़ कामों की सूची बदली या नहीं — और इस पैमाने पर कई आंदोलनों ने क़ानून तक बनवाए हैं।

यह PSIR Optional Notes का 32वाँ अध्याय है, जो पेपर I के भारतीय शासन और राजनीति वाले हिस्से से आता है। पूरी किताब मुफ़्त डाउनलोड की जा सकती है।

UPSC पाठ्यक्रम

सामाजिक आंदोलन: नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकार आंदोलन; महिला आंदोलन; पर्यावरण आंदोलन।

एक पन्ने में

  • सामाजिक आंदोलन यानी लगातार चलने वाली सामूहिक कार्रवाई, जो संस्थाओं के बँधे-बँधाए रास्तों के बाहर होती है, जिसमें एक साझा पहचान होती है और मौजूदा सत्ता या बँटवारे को चुनौती दी जाती है।
  • पुराने आंदोलन वर्ग पर टिके थे और दोबारा बँटवारा माँगते थे। 1970 के दशक से आए नए सामाजिक आंदोलन पहचान, हक़ और मुद्दे पर टिके हैं, इनका ढाँचा बिखरा हुआ है, और ये अक्सर राज्य वाले विकास मॉडल पर ही शक करते हैं।
  • नागरिक स्वतंत्रता वाले संगठन — PUCL (1976) और PUDR (1977) — आपातकाल से पैदा हुए। इनका रोज़ का काम है हिरासत में मौत, मुठभेड़ में हत्या, एहतियातन गिरफ़्तारी और सुरक्षा क़ानूनों का असल में कैसा इस्तेमाल होता है।
  • महिला आंदोलन की कहानी उन्नीसवीं सदी के समाज सुधार से शुरू होकर राष्ट्रवादी दौर से गुज़रती है और 1970 के दशक के आख़िर में स्वायत्त आंदोलन तक पहुँचती है, जिसकी चिंगारी मथुरा बलात्कार मामले का फ़ैसला था और जिसने आपराधिक क़ानून (संशोधन) अधिनियम 1983 बनवाया।
  • आंध्र प्रदेश के नेल्लोर का अरक-विरोधी आंदोलन (1991–92) वह मानक उदाहरण है जिसमें महिलाओं का आंदोलन साक्षरता कक्षाओं से खड़ा हुआ और राज्य में शराबबंदी तक ले गया।
  • भारत में पर्यावरण आंदोलन असल में रोज़ी-रोटी के आंदोलन हैं। गुहा और मार्टिनेज़-अलिए इसे ग़रीबों का पर्यावरणवाद कहते हैं: यहाँ संसाधन नज़ारा नहीं, गुज़ारा है।
  • चिपको (1973), साइलेंट वैली (1978–83), नर्मदा बचाओ आंदोलन (1985), POSCO-विरोधी संघर्ष और नियमगिरि की लड़ाई मुख्य उदाहरण हैं, और हर एक ने संस्थाओं के स्तर पर बदलाव कराया।
  • सूचना के अधिकार का अभियान इसका सबसे साफ़ नमूना है कि आंदोलन क़ानून कैसे बनवाता है: राजस्थान में MKSS की मज़दूरी के रिकॉर्ड दिखाने की माँग से लेकर RTI अधिनियम 2005 तक।

मैदान को समझिए

पुराने और नए

पुराने आंदोलन वर्ग के इर्द-गिर्द बने थे और राज्य से दोबारा बँटवारे की माँग करते थे — अध्याय 19 वाले किसान और मज़दूर आंदोलन इसी क़िस्म के हैं। नए सामाजिक आंदोलन का सिद्धांत टूरेन, मेलुची और ऑफ़े ने गढ़ा, और भारत पर इसे रजनी कोठारी, डी.एल. शेठ और गेल ऑमवेट ने लागू किया। फ़र्क़ चार जगह है। इनका आधार वर्ग नहीं, पहचान या कोई मुद्दा होता है। इनका ढाँचा बिखरा हुआ होता है और अक्सर ऊपर-नीचे वाली कमान के ख़िलाफ़ होता है। इनकी माँग उत्पादन में बड़े हिस्से की नहीं, स्वायत्तता, इज़्ज़त, पहचान और संसाधनों पर क़ाबू की होती है। और ये अक्सर विकास वाले राज्य पर ही शक करते हैं।

कोठारी की ग़ैर-दलीय राजनीतिक प्रक्रिया इसका मानक भारतीय सूत्र है: 1970 के दशक के आख़िर से पार्टी राजनीति के बाहर के समूहों ने वे मुद्दे उठाए जिन्हें पार्टियाँ छूती नहीं थीं, और इस तरह प्रतिनिधित्व का एक समानांतर रास्ता बन गया। बाद में ख़ुद कोठारी की चिंता यह थी कि यह जगह राजनीति से कटकर प्रोजेक्ट और फंडिंग पर टिके NGO काम में बदल सकती है — यही इस धारा की सबसे टिकाऊ भीतरी आलोचना है।

नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकार

PUCL, जिसे जयप्रकाश नारायण ने 1976 में पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टीज़ एंड डेमोक्रेटिक राइट्स के नाम से बनाया, और PUDR, जो 1977 में उससे अलग हुआ, इस आंदोलन की जान हैं। आपातकाल ही वह अनुभव है जिसने इन्हें गढ़ा: MISA के तहत एहतियातन गिरफ़्तारियाँ, प्रेस पर सेंसरशिप, और ADM जबलपुर (1976) में सुप्रीम कोर्ट का घुटने टेक देना — तीनों ने दिखा दिया कि संविधान की गारंटियाँ ठीक उसी वक़्त नाकाम हो सकती हैं जब उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो।

इस आंदोलन का ख़ास काम क्या है: हिरासत में मौतों और मुठभेड़ में हत्याओं का ब्योरा जुटाना; सांप्रदायिक हिंसा के बाद जाँच दल भेजकर सच पता करना; एहतियातन गिरफ़्तारी पर मुक़दमे लड़ना; TADA, POTA, UAPA और सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम के इस्तेमाल को अदालत में चुनौती देना; और मृत्युदंड के ख़िलाफ़ अभियान चलाना। अदालती नतीजे इसके अच्छे-ख़ासे रहे हैं, और मुक़दमों के नाम याद रखने लायक़ हैं: विचाराधीन क़ैदियों और जल्द सुनवाई पर हुसैनारा ख़ातून (1979), क़ैदियों के अधिकारों पर सुनील बत्रा, गिरफ़्तारी के नियमों पर डी.के. बसु (1997), फ़ोन टैपिंग और निजता पर PUCL (1997), और छत्तीसगढ़ में राज्य के समर्थन वाले निजी दस्तों पर नंदिनी सुंदर (2011)।

इसकी अपनी मुश्किलें भी हैं: अदालतों पर निर्भरता, जिनके आदेश ज़मीन पर कमज़ोर पड़ते हैं; चुन-चुनकर मुद्दे उठाने का इल्ज़ाम, जो इस पर कई तरफ़ से लगता है; FCRA में बदलावों के बाद विदेशी पैसे से चलने वाले संगठनों की सिकुड़ती जगह; और अदालती दिशानिर्देशों में जो लिखा है, पुलिस ज़मीन पर उससे अलग ही चलती है।

महिला आंदोलन

दौर

  • समाज सुधार, उन्नीसवीं सदी। इसकी अगुवाई ज़्यादातर पुरुषों ने की — राममोहन राय, विद्यासागर, फुले — और निशाने पर थे सती, विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह और महिलाओं की शिक्षा। इसकी भाषा समुदाय के सुधार की थी, महिला के हक़ की नहीं।
  • राष्ट्रवादी दौर। महिला संगठन बने — वीमेंस इंडियन एसोसिएशन (1917), नेशनल काउंसिल ऑफ़ वीमेन इन इंडिया (1925) और अखिल भारतीय महिला सम्मेलन (1927) — और सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाएँ बड़ी संख्या में उतरीं। वोट का हक़ आज़ादी के साथ ही लगभग मिल गया, इसलिए आंदोलन को मताधिकार की लड़ाई नहीं लड़नी पड़ी। नतीजा यह हुआ कि ऐसी लड़ाई से जो संगठन खड़ा होता है, वह भी नहीं बना।
  • स्वायत्त आंदोलन, 1970 के दशक के आख़िर से। इसकी चिंगारी तुका राम बनाम महाराष्ट्र राज्य (1979) यानी मथुरा हिरासती बलात्कार मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला था, जिस पर चार क़ानून शिक्षकों ने खुला पत्र लिखा और वही आंदोलन का बुनियादी दस्तावेज़ बन गया। इस अभियान से आपराधिक क़ानून (संशोधन) अधिनियम 1983 आया, जिसने हिरासत में बलात्कार को अलग अपराध बनाया, ऐसे मामलों में सहमति साबित करने का बोझ पलट दिया, और बंद कमरे में सुनवाई का इंतज़ाम किया।
  • 1990 के बाद। आंदोलन कई शाखाओं में बँटा: अध्याय 9 वाली दलित नारीवादी आलोचना; दहेज और घरेलू हिंसा पर अभियान, जिनसे घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 आया; विशाखा दिशानिर्देश (1997) और 2013 का यौन उत्पीड़न क़ानून; और 2012 के बाद की लामबंदी, जिससे जस्टिस वर्मा समिति की सिफ़ारिशों पर आपराधिक क़ानून (संशोधन) अधिनियम 2013 बना।

अरक-विरोधी आंदोलन

2024 के पेपर में अरक-विरोधी आंदोलन में महिलाओं की भूमिका पूछी गई थी, और यह ऐसा ठोस मामला है जिस पर सीधा जवाब बनता है।

यह 1991–92 में आंध्र प्रदेश के नेल्लोर ज़िले के दुबागुंटा गाँव से शुरू हुआ। शुरुआत साक्षरता कार्यक्रम से हुई: प्रौढ़ साक्षरता की किताब में एक पाठ था, जिसमें एक औरत का घर उसके पति की शराब ने उजाड़ दिया था। कक्षा में बैठी महिलाओं ने उसमें अपनी ही कहानी देखी। उन्होंने अरक की बिक्री रोकने के लिए संगठन बनाया, नीलामियों और दुकानों पर धरने दिए, और आंदोलन पूरे ज़िले में और फिर पूरे राज्य में फैल गया।

इसका महत्व चार वजहों से है। इसकी अगुवाई ग़रीब ग्रामीण महिलाओं ने की, शहरी संगठनों ने नहीं, और यह असामान्य बात है। इसने घर की चारदीवारी वाली दिखने वाली शिकायत — घरेलू हिंसा और मज़दूरी का शराब में उड़ जाना — को एक सार्वजनिक और सरकारी ख़ज़ाने के सवाल से जोड़ दिया, क्योंकि राज्य की आबकारी आमदनी अरक की बिक्री पर ही टिकी थी। यह कामयाब भी हुआ: आंध्र प्रदेश ने 1993 में अरक पर रोक लगाई और 1995 में कुछ समय के लिए पूरी शराबबंदी लागू की। और इसने दिखाया कि साक्षरता कार्यक्रमों के राजनीतिक नतीजे क्या होते हैं, इसीलिए यह आंदोलनों के साथ-साथ प्रौढ़ शिक्षा के साहित्य में भी बार-बार आता है। बाद में पैसे की तंगी के दबाव में शराबबंदी वापस ले ली गई, और यह भी सबक़ का ही हिस्सा है।

पर्यावरण आंदोलन

ग़रीबों का पर्यावरणवाद

यह अवधारणा रामचंद्र गुहा और ख़ुआन मार्टिनेज़-अलिए ने विकसित की। यह अमीर समाजों के पर्यावरणवाद को — जो सुख-सुविधा, जंगल बचाने और भौतिक ज़रूरतों से आगे के मूल्यों की बात करता है — ग़रीब समाजों के पर्यावरणवाद से अलग करती है, जहाँ पर्यावरण का झगड़ा असल में रोज़ी-रोटी के आधार पर झगड़ा है। 2023 का सवाल ठीक यही शब्द माँग रहा था।

इसकी पहचान क्या है: लड़ने वाले किसान, जंगल में रहने वाले, मछुआरे और आदिवासी होते हैं, मध्यवर्गीय संरक्षणवादी नहीं; झगड़ा जंगल, पानी, चरागाह और समुद्र तट तक पहुँच और उन पर क़ाबू का होता है; भाषा अक्सर पारंपरिक हक़ की होती है, पारिस्थितिकी की नहीं; और सामने अमूमन राज्य होता है या राज्य के समर्थन वाला कोई प्रोजेक्ट। गुहा और माधव गाडगिल का सर्वभक्षी और पारिस्थितिकी-आश्रित लोग वाला भेद इसके साथ चलने वाला विश्लेषण है: एक तरफ़ वे जो पूरे देश के संसाधन खींचते हैं, दूसरी तरफ़ वे जो अपने आसपास के परिवेश पर ही जीते हैं।

मुख्य उदाहरण

  • चिपको (1973, चमोली का मंडल गाँव)। गाँव वालों ने, जिनमें महिलाएँ सबसे आगे थीं, ठेकेदारों की कटाई रोकने के लिए पेड़ों से चिपककर उन्हें बचाया। चंडी प्रसाद भट्ट और सुंदरलाल बहुगुणा की अगुवाई दो अलग धाराएँ थीं — एक गाँव के उद्योग के लिए स्थानीय जंगल के इस्तेमाल पर ज़ोर देती थी, दूसरी संरक्षण पर। नतीजा: 1980 में उत्तराखंड हिमालय में 1000 मीटर से ऊपर हरे पेड़ों की कटाई पर पंद्रह साल की रोक।
  • साइलेंट वैली (1978–83, केरल)। केरल शास्त्र साहित्य परिषद की अगुवाई में वैज्ञानिकों और लेखकों का अभियान, जो एक अछूते वर्षावन में बन रही पनबिजली परियोजना के ख़िलाफ़ था। नतीजा: परियोजना छोड़ दी गई और 1984 में इलाक़ा राष्ट्रीय उद्यान घोषित हुआ। यही एक बड़ा मामला है जो रोज़ी-रोटी से ज़्यादा शास्त्रीय संरक्षणवाद के क़रीब बैठता है।
  • नर्मदा बचाओ आंदोलन (1985 से, मेधा पाटकर)। सरदार सरोवर और उससे जुड़े बाँधों के ख़िलाफ़, विस्थापन और अधूरे पुनर्वास के मुद्दे पर। नतीजे: विश्व बैंक की पहली स्वतंत्र समीक्षा, यानी मोर्स आयोग (1992), और 1993 में बैंक का हटना; 2000 में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला, जिसने पुनर्वास की शर्तों के साथ निर्माण की इजाज़त दी; और सबसे टिकाऊ नतीजा यह कि पुनर्वास और बसाना नीति का सवाल बन गया, जो आगे चलकर भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 तक पहुँचा।
  • अप्पिको (1983, कर्नाटक), जो चिपको का दक्षिणी रूप है; व्यावसायिक झींगा पालन के ख़िलाफ़ चिल्का के मछुआरों का आंदोलन; ओडिशा में POSCO-विरोधी संघर्ष; और नियमगिरि, जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में तय किया कि बॉक्साइट खनन पर फ़ैसला डोंगरिया कोंध की ग्राम सभाएँ करेंगी, और बारहों ने मना कर दिया। वन अधिकार अधिनियम की सहमति वाली शर्त असल में काम करती है — इसका सबसे मज़बूत सबूत नियमगिरि ही है।

पर्यावरण के शासन-तंत्र पर असर

2024 के सवाल में पूछा गया था कि पर्यावरण आंदोलनों ने शासन-तंत्र को कैसे गढ़ा, और कड़ियाँ बिलकुल ठोस हैं: स्टॉकहोम और भोपाल के बाद जल अधिनियम 1974, वायु अधिनियम 1981 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986; पहले अलग विभाग और फिर पर्यावरण मंत्रालय का बनना; वन संरक्षण अधिनियम 1980, जिसने वन भूमि के दूसरे इस्तेमाल के लिए केंद्र की मंज़ूरी ज़रूरी की; पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, जो 1994 में अधिसूचित हुआ और 2006 में बदला गया, और जिसमें जनसुनवाई की वही शर्तें आईं जो आंदोलन माँग रहे थे; वन अधिकार अधिनियम 2006, जिसने व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकार माने और ज़मीन के दूसरे इस्तेमाल के लिए ग्राम सभा की सहमति ज़रूरी की; राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम 2010, जिसने एक ख़ास अदालत बनाई; और 2013 के भूमि अधिग्रहण क़ानून में सहमति और सामाजिक प्रभाव आकलन की शर्तें।

उलटी धारा भी साफ़ कहनी चाहिए: मंज़ूरी की प्रक्रिया में एक के बाद एक ढील, 2020 का EIA का मसौदा, और वन संरक्षण अधिनियम में 2023 के संशोधन — ये सब उलटी दिशा में गए हैं, और इसीलिए आंदोलन आज भी सक्रिय हैं।

और कौन-से आंदोलन गिनाने लायक़ हैं

सूचना के अधिकार का अभियान आंदोलन-से-क़ानून बनने का सबसे साफ़ मामला है। शुरुआत 1990 के दशक की शुरुआत में राजस्थान में मज़दूर किसान शक्ति संगठन से हुई, जो हाज़िरी रजिस्टर और बिल दिखाने की माँग कर रहा था ताकि जाँचा जा सके कि दर्ज मज़दूरी सचमुच दी भी गई या नहीं। यह माँग सूचना के अधिकार के लिए राष्ट्रीय अभियान तक फैली, राज्यों में क़ानून बने, और आख़िर में सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 आया। भोजन के अधिकार का अभियान 2001 की PUCL याचिका से शुरू हुआ, उससे मध्याह्न भोजन पर सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश निकले और आगे चलकर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 बना। काम के अधिकार के अभियान ने 2005 में MGNREGA बनवाने में योगदान दिया। भारत में आंदोलन क़ानून बनवाते हैं — इस दावे का सबसे मज़बूत सबूत यही तीनों हैं।

जहाँ उत्तर नंबर गँवाते हैं

  • चिपको को संरक्षण आंदोलन बता देना। वह ठेकेदारों के ख़िलाफ़ गाँव वालों के जंगल पर हक़ की लड़ाई थी, इसीलिए वह ग़रीबों के पर्यावरणवाद में आती है।
  • महिला आंदोलन को 1970 के दशक से शुरू हुआ बताना। सुधार और राष्ट्रवादी दौर मायने रखते हैं, और मताधिकार की लड़ाई न होना एक असली संगठनात्मक कमज़ोरी की वजह बताता है।
  • अरक-विरोधी आंदोलन को साक्षरता कार्यक्रम वाली शुरुआत के बिना लिख देना। पूरे मामले की जान वही कड़ी है।
  • आंदोलनों की सूची गिना देना, नतीजे बताए बिना। चिपको की 1980 वाली कटाई रोक, साइलेंट वैली का 1984 का राष्ट्रीय उद्यान, नर्मदा का मोर्स आयोग और 2013 का क़ानून, नियमगिरि की ग्राम सभाओं का फ़ैसला — उत्तर को विश्लेषण यही बनाते हैं।
  • पर्यावरण शासन-तंत्र की उलटी धारा छोड़ देना। मंज़ूरी में ढील और 2023 के वन संशोधन ईमानदार आकलन का हिस्सा हैं।
  • आंदोलन-से-क़ानून वाले मामलों को छोड़ देना। RTI 2005, MGNREGA 2005 और खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 आंदोलनों के असर का सबसे मज़बूत सबूत हैं।

पहले पूछा जा चुका है

  • भारत में पर्यावरण शासन को गढ़ने में पर्यावरण आंदोलनों की भूमिका पर चर्चा कीजिए। (2024, पेपर I, 20 अंक)
  • ग़रीबों का पर्यावरणवाद। (2023, पेपर I, 10 अंक)
  • अरक-विरोधी आंदोलन में महिलाओं की भूमिका। (2024, पेपर I, 10 अंक)

उत्तर का ढाँचा

ग़रीबों का पर्यावरणवाद। (10 अंक, 150 शब्द)

परिभाषा। गुहा और मार्टिनेज़-अलिए का यह शब्द ग़रीब समाजों के पर्यावरण-झगड़ों के लिए है, जहाँ दाँव पर रोज़ी-रोटी का आधार होता है, सुख-सुविधा या जंगल का नज़ारा नहीं। अमीर समाजों के उस पर्यावरणवाद से इसका फ़र्क़ दिखाइए जो भौतिक ज़रूरतें पूरी होने के बाद शुरू होता है।

पहचान। लड़ने वाले किसान, आदिवासी, मछुआरे और जंगल में रहने वाले लोग; झगड़ा जंगल, पानी, चरागाह और तट तक पहुँच और उन पर क़ाबू का; भाषा जितनी पारिस्थितिकी की, उतनी ही पारंपरिक हक़ की; और सामने अमूमन राज्य या राज्य के समर्थन वाला प्रोजेक्ट।

साथ चलने वाला ढाँचा। गाडगिल और गुहा के सर्वभक्षी और पारिस्थितिकी-आश्रित लोग: एक तरफ़ वे जो पूरे देश के संसाधनों पर जीते हैं, दूसरी तरफ़ वे जो अपने आसपास पर, और इस असंतुलन की पैदावार हैं पारिस्थितिकी शरणार्थी

भारतीय उदाहरण। चिपको (1973), ठेकेदारों के ख़िलाफ़ जंगल की उपज पर हक़ की लड़ाई; नर्मदा बचाओ आंदोलन (1985), विस्थापन पर; चिल्का के मछुआरे, व्यावसायिक झींगा पालन के ख़िलाफ़; और नियमगिरि, जहाँ 2013 में डोंगरिया कोंध की बारह ग्राम सभाओं ने खनन ठुकरा दिया।

यह भेद क्यों मायने रखता है। यह उस दावे को ग़लत साबित करता है कि पर्यावरण की चिंता अमीरों का शौक़ है, और नीति का सवाल ही बदल देता है — संरक्षण बनाम विकास की जगह अब सवाल यह है कि किसके संसाधन किसकी तरक़्क़ी में बदले जा रहे हैं।

समापन। संस्थाओं में इसका निशान वन अधिकार अधिनियम 2006 में दिखता है। 2013 के भूमि अधिग्रहण क़ानून की सहमति और सामाजिक प्रभाव आकलन वाली शर्तों में भी।

आख़िरी दौर का रिवीज़न

  • पुराने बनाम नए सामाजिक आंदोलन; कोठारी की ग़ैर-दलीय राजनीतिक प्रक्रिया और NGO बन जाने की उनकी चिंता; ऑमवेट और शेठ।
  • PUCL 1976, PUDR 1977; ADM जबलपुर (1976) वह नाकामी जिसने इन्हें गढ़ा; हुसैनारा ख़ातून (1979), डी.के. बसु (1997), टैपिंग पर PUCL (1997), नंदिनी सुंदर (2011)।
  • महिलाएँ: सुधार का दौर; WIA 1917, NCWI 1925, AIWC 1927; मथुरा फ़ैसला 1979 और खुला पत्र; आपराधिक क़ानून (संशोधन) अधिनियम 1983; विशाखा 1997 और 2013 का क़ानून; घरेलू हिंसा अधिनियम 2005; जस्टिस वर्मा समिति और 2013 का संशोधन।
  • अरक-विरोध: दुबागुंटा, नेल्लोर, 1991–92, साक्षरता की किताब से शुरू; आंध्र प्रदेश में अरक पर रोक 1993, शराबबंदी 1995, बाद में वापस।
  • पर्यावरण: चिपको 1973 और 1980 की कटाई रोक; साइलेंट वैली 1978–83 और 1984 का राष्ट्रीय उद्यान; NBA 1985 से, मोर्स आयोग 1992, विश्व बैंक का हटना 1993, सुप्रीम कोर्ट 2000; अप्पिको 1983; नियमगिरि की ग्राम सभाएँ 2013।
  • शासन-तंत्र: जल अधिनियम 1974, वायु अधिनियम 1981, EPA 1986, वन संरक्षण अधिनियम 1980, EIA 1994 और 2006, वन अधिकार अधिनियम 2006, NGT अधिनियम 2010, भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013; उलटी धारा — 2020 का EIA मसौदा और 2023 के वन संशोधन।
  • आंदोलन से क़ानून: MKSS से RTI 2005; PUCL याचिका 2001 से खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013; काम के अधिकार के अभियान से MGNREGA 2005।

आगे पढ़िए। यह अध्याय पूरी PSIR Optional Notes के 58 अध्यायों में से एक है, जिसमें पेपर I और पेपर II दोनों पूरे कवर हैं — मुफ़्त डाउनलोड।

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

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