स्वराज पार्टी, जिसे कांग्रेस–खिलाफ़त स्वराज्य पार्टी भी कहा जाता है, की स्थापना 1 जनवरी 1923 को इलाहाबाद में चित्तरंजन दास (CR Das) और मोतीलाल नेहरू (Motilal Nehru) ने की। इसका जन्म भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर एक तीव्र आंतरिक बहस से हुआ — क्या भारत सरकार अधिनियम 1919 के तहत बनी विधान-परिषदों का बहिष्कार जारी रखा जाए या उनमें प्रवेश कर भीतर से ही औपनिवेशिक प्रशासन को बाधित किया जाए? स्वराजवादी, जैसा वे जाने गए, ने संवैधानिक अवरोध (constitutional obstruction) की एक नई रणनीति विकसित की, जिसने 1920 के दशक के मध्य की राष्ट्रवादी राजनीति को नया आकार दिया। UPSC अभ्यर्थियों के लिए यह विषय प्रारंभिक परीक्षा के तथ्यात्मक प्रश्नों और मुख्य परीक्षा में असहयोग एवं सविनय अवज्ञा के बीच के संक्रमण-काल पर चर्चा हेतु अनिवार्य है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

5 फ़रवरी 1922 की चौरी-चौरा घटना के बाद जब गांधीजी ने असहयोग आंदोलन स्थगित किया, तो कांग्रेस के सामने एक रणनीतिक रिक्तता उत्पन्न हो गई। अनेक नेताओं को लगा कि अचानक की गई वापसी ने कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ा, संगठनात्मक शक्ति का अपव्यय किया, और औपनिवेशिक तंत्र को बिना चुनौती के संचालित होने दिया। साथ ही, 1919 के मॉन्टेग्यू–चेम्सफ़र्ड सुधारों ने द्वैध शासन (dyarchy) के अंतर्गत बड़े प्रांतीय परिषदें गठित की थीं, और चुनाव होने वाले थे। प्रश्न यह था — क्या इन निकायों का बहिष्कार जारी रखा जाए, या उन्हें राष्ट्रवादी संघर्ष का मंच बनाया जाए?
इसने कांग्रेस के भीतर दो गुट उत्पन्न कर दिए।
| गुट | स्थिति |
|---|---|
| परिवर्तन-विरोधी (No-changers) | गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम के प्रति निष्ठावान; परिषद-प्रवेश के विरुद्ध; खादी, मद्यपान-निषेध, हिंदू–मुस्लिम एकता और अस्पृश्यता-निवारण पर केंद्रित। नेता: वल्लभभाई पटेल, सी. राजगोपालाचारी, राजेन्द्र प्रसाद, एम. ए. अंसारी। |
| परिवर्तन-समर्थक (Pro-changers) | परिषदों में प्रवेश कर सरकार को भीतर से बाधित करना चाहते थे। नेता: चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू, विट्ठलभाई पटेल, एन. सी. केलकर, मदन मोहन मालवीय (सहानुभूति)। |
कांग्रेस के गया अधिवेशन (दिसंबर 1922) में, जिसकी अध्यक्षता चित्तरंजन दास ने की, परिवर्तन-समर्थकों का परिषद-प्रवेश का प्रस्ताव पराजित हुआ। दास और मोतीलाल नेहरू ने अपने कांग्रेस-पदों से त्यागपत्र दे दिया और 1 जनवरी 1923 को कांग्रेस के भीतर रहते हुए ही स्वराज पार्टी का गठन किया।
स्वराज पार्टी का गठन
- तिथि: 1 जनवरी 1923
- स्थान: इलाहाबाद
- अध्यक्ष: चित्तरंजन दास
- सचिव: मोतीलाल नेहरू
- मूल संगठन: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (स्वराजवादियों ने कांग्रेस सदस्यता बनाए रखी)
- औपचारिक नाम: कांग्रेस–खिलाफ़त स्वराज्य पार्टी
उद्देश्य और कार्यक्रम

स्वराज पार्टी का घोषणा-पत्र और चुनावी कार्यक्रम एक विशिष्ट रणनीति प्रस्तुत करता है।
| उद्देश्य | विधि |
|---|---|
| स्वराज (स्व-शासन) की प्राप्ति | परिषद-प्रवेश और संसदीय दबाव के माध्यम से। |
| औपनिवेशिक सरकार को भीतर से बाधित करना | स्थगन प्रस्ताव लाना, बजट अस्वीकार करना, सरकारी विधेयकों को रोकना। |
| द्वैध शासन की पोल खोलना | परिषद-वाद-विवादों के माध्यम से दर्शाना कि वास्तविक सत्ता अब भी ब्रिटिश के पास है। |
| संवैधानिक सुधार की माँग | डोमिनियन स्थिति, पूर्ण उत्तरदायी सरकार, भारत सरकार अधिनियम 1919 का सुधार। |
| गांधीजी का रचनात्मक कार्यक्रम जारी रखना | खादी, राष्ट्रीय शिक्षा, हिंदू–मुस्लिम एकता, अस्पृश्यता-निवारण — परिषदों के बाहर। |
| चुनाव लड़ना | केंद्रीय एवं प्रांतीय विधानमंडलों में प्रत्याशी खड़े करना। |
1923 के परिषद चुनाव: प्रवेश और सफलता
स्वराज पार्टी ने नवंबर 1923 के चुनावों में भारत सरकार अधिनियम 1919 के तहत भाग लिया और प्रभावशाली प्रदर्शन किया।
- केंद्रीय विधान सभा: स्वराजवादियों ने 101 निर्वाचित सीटों में से 42 सीटें जीतीं। उदारवादियों और निर्दलीयों के सहयोग से वे प्रायः सरकारी प्रस्तावों को पराजित कर सकते थे।
- प्रांतीय प्रदर्शन: उन्होंने मध्य प्रांत और बंगाल में बहुमत या निकट-बहुमत प्राप्त किया, और बंबई एवं संयुक्त प्रांत में सशक्त प्रतिनिधित्व।
- केंद्रीय नेतृत्व: मोतीलाल नेहरू ने केंद्रीय विधान सभा में पार्टी का नेतृत्व किया। विट्ठलभाई पटेल 1925 में केंद्रीय विधान सभा के अध्यक्ष (Speaker) चुने गए — यह पद सँभालने वाले पहले भारतीय।
योगदान और उपलब्धियाँ
प्रभाव की संक्षिप्त खिड़की के बावजूद, स्वराज पार्टी ने स्पष्ट और स्थायी अभिलेख छोड़ा।
- 1924–25 के बजट और वित्त विधेयक की पराजय — यह दर्शाते हुए कि एक संगठित विपक्ष सरकार को असहज कर सकता है।
- लोक सुरक्षा विधेयक (1928) की अस्वीकृति — कम्युनिस्ट आंदोलनकारियों को निर्वासित करने का प्रयास।
- द्वैध शासन की पोल खोलना — बंगाल और मध्य प्रांत की परिषदों ने मंत्रियों के वेतन रोककर इन प्रांतों में द्वैध शासन को अव्यावहारिक बना दिया।
- मुद्दीमन समिति (1924) की माँग — 1919 के सुधारों की कार्यप्रणाली की समीक्षा हेतु; स्वराजवादियों ने एक सशक्त अल्पमत रिपोर्ट प्रस्तुत की।
- नेहरू रिपोर्ट (1928) — मोतीलाल नेहरू ने उस समिति की अध्यक्षता की जिसने साइमन कमीशन के विरोध में भारत द्वारा रचित प्रथम संविधान-प्रारूप तैयार किया।
- संसदीय प्रशिक्षण — कांग्रेस नेताओं की एक पूरी पीढ़ी ने विधायी तकनीक सीखी, जो आगे चलकर संविधान सभा को आकार देने में सहायक हुई।
- संवैधानिक एवं असंवैधानिक विधियों का एकीकरण — स्वराज पार्टी ने उस चरण में कांग्रेस को राजनीतिक रूप से जीवित रखा जब जन-आंदोलन व्यवहार्य नहीं था।
स्वराज पार्टी का पतन
पार्टी का पतन 1925–26 तक प्रारंभ हो गया, अनेक कारणों से।
| कारण | विवरण |
|---|---|
| चित्तरंजन दास का निधन (16 जून 1925) | पार्टी ने अपना सबसे प्रेरक एवं एकीकृत नेता खोया। |
| आंतरिक विभाजन | सांप्रदायिक तनाव बढ़ा; मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय, और एन. सी. केलकर के नेतृत्व में उत्तरदायी (Responsivist) गुट ने कुछ मुद्दों पर सरकार से सहयोग का समर्थन किया और पद स्वीकार किए। मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में अनुत्तरदायी (Non-Responsivist) गुट ने इसका विरोध किया। |
| सांप्रदायिक राजनीति का पुनरुत्थान | 1920 के दशक के मध्य के हिंदू–मुस्लिम दंगों ने पार्टी की हिंदू–मुस्लिम एकता को कमज़ोर किया। |
| 1926 के चुनावों में सीटों की हानि | मद्रास और मध्य प्रांत को छोड़कर प्रदर्शन कमज़ोर रहा। |
| जन-राजनीति की वापसी | साइमन कमीशन (1927), लाहौर कांग्रेस का पूर्ण स्वराज प्रस्ताव (1929), और सविनय अवज्ञा (1930) के आरंभ ने ऊर्जा को पुनः सड़क-स्तर के आंदोलन की ओर खींचा। |
1930 के बाद स्वराज पार्टी प्रभावी रूप से मुख्यधारा कांग्रेस में विलीन हो गई।
स्वराजवादी बनाम परिवर्तन-विरोधी: एक तुलना
| पहलू | स्वराजवादी (परिवर्तन-समर्थक) | परिवर्तन-विरोधी |
|---|---|---|
| नेता | चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू | पटेल, राजगोपालाचारी, राजेन्द्र प्रसाद |
| रणनीति | परिषद-प्रवेश, अवरोध | रचनात्मक ग्राम कार्यक्रम |
| मूल विधि | विधायी अवरोध | खादी, शिक्षा, एकता |
| गांधीजी पर दृष्टिकोण | श्रद्धा, परंतु रणनीतिक रूप से स्वतंत्र | गांधीवादी रेखा के प्रति निष्ठा |
| बहिष्कार पर रवैया | आंशिक — बाहर बहिष्कार, भीतर अवरोध | परिषदों का पूर्ण बहिष्कार |
राष्ट्रीय आंदोलन में महत्व
स्वराज पार्टी तीन स्थायी कारणों से महत्वपूर्ण है।
पहला, इसने यह प्रदर्शित किया कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन जन-आंदोलन और संवैधानिक संघर्ष को संयोजित करने में पर्याप्त लचीला था — एक दोहरी-पथ रणनीति, जिसने आगे चलकर भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत और 1937 की मंत्रिमंडलों में कांग्रेस की रणनीति को सूचित किया।
दूसरा, इसने 1928 की नेहरू रिपोर्ट उत्पन्न की — यह भारत के पहले व्यापक संविधान-प्रारूप का प्रयास था — और इसने नेताओं को विधायी कौशल में प्रशिक्षित किया, जो 1946–50 की संविधान सभा में अपरिहार्य सिद्ध हुआ।
तीसरा, इसने असहयोग आंदोलन (1920–22) और सविनय अवज्ञा (1930–34) के बीच जन-राजनीति के मंदी के काल में कांग्रेस को संगठनात्मक रूप से जीवित रखा, जिससे औपनिवेशिक सरकार यह दावा नहीं कर सकी कि राष्ट्रवादी भावना समाप्त हो चुकी है।
द्रुत पुनरावलोकन तालिका
| बिंदु | तथ्य |
|---|---|
| स्थापना | 1 जनवरी 1923, इलाहाबाद |
| संस्थापक | चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू |
| कारण | चौरी-चौरा (1922) के बाद असहयोग आंदोलन की वापसी |
| परिषद-प्रवेश को अस्वीकार करने वाला कांग्रेस अधिवेशन | गया, दिसंबर 1922 |
| रणनीति | परिषद-प्रवेश और अवरोध |
| प्रथम बड़ा चुनाव | 1923 (केंद्रीय विधान सभा) |
| प्रमुख मील का पत्थर | 1924–25 के बजट की पराजय |
| केंद्रीय विधान सभा के प्रथम भारतीय अध्यक्ष | विट्ठलभाई पटेल, 1925 |
| पार्टी को आघात | चित्तरंजन दास का निधन, 1925 |
| उल्लेखनीय रिपोर्ट | नेहरू रिपोर्ट, 1928 (मोतीलाल नेहरू द्वारा) |
UPSC प्रासंगिकता
स्वराज पार्टी एक आधार-स्तंभ प्रारंभिक विषय है — विशेषकर कथन-आधारित और मिलान-प्रकार के प्रश्नों में, जिनमें चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू, विट्ठलभाई पटेल, नेहरू रिपोर्ट, और 1923 के चुनाव सम्मिलित होते हैं। अभ्यर्थियों को 1922 का गया अधिवेशन, परिवर्तन-समर्थक बनाम परिवर्तन-विरोधी विभाजन, और यह तथ्य कि स्वराज पार्टी ने कांग्रेस कभी नहीं छोड़ी — स्मरण रखना चाहिए। मुख्य परीक्षा GS पेपर I में यह 1922 से 1930 के बीच भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की रणनीतियों, संवैधानिक राजनीति के विकास, और असहयोग एवं सविनय अवज्ञा के बीच सेतु के प्रश्नों में आता है। इसे भारत सरकार अधिनियम 1919, मॉन्टेग्यू–चेम्सफ़र्ड सुधार, साइमन कमीशन, और नेहरू रिपोर्ट से जोड़ें। निबंध लेखन में स्वराज पार्टी इस बात का सशक्त उदाहरण है कि एक जन-आंदोलन के भीतर रणनीतिक लचीलापन और सिद्धांत-निष्ठ असहमति सह-अस्तित्व रख सकते हैं — यह विषय आधुनिक भारत में नेतृत्व, बहुलवाद और लोकतांत्रिक राजनीति पर प्रश्नों से अनुनादित है।
प्रारंभिक परीक्षा बिंदु
- स्वराज पार्टी की स्थापना — 1 जनवरी 1923, इलाहाबाद; अध्यक्ष — चित्तरंजन दास; सचिव — मोतीलाल नेहरू।
- गया अधिवेशन (दिसंबर 1922) — परिषद-प्रवेश का प्रस्ताव अस्वीकृत; इसी के कारण स्वराज पार्टी का गठन।
- विट्ठलभाई पटेल — केंद्रीय विधान सभा के प्रथम भारतीय अध्यक्ष (1925)।
- नेहरू रिपोर्ट 1928 — साइमन कमीशन के विरोध में मोतीलाल नेहरू द्वारा अध्यक्षता।
- चित्तरंजन दास का निधन — 16 जून 1925; उपनाम — “देशबंधु”।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
- “स्वराज पार्टी ने असहयोग और सविनय अवज्ञा के बीच के काल में राष्ट्रीय आंदोलन को राजनीतिक रूप से जीवित रखा।” समीक्षा कीजिए। (250 शब्द)
- परिवर्तन-समर्थक एवं परिवर्तन-विरोधियों के बीच की बहस की चर्चा कीजिए। यह विभाजन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की रणनीतिक परिपक्वता का सूचक कैसे था? (250 शब्द)
- नेहरू रिपोर्ट 1928 के संवैधानिक एवं राजनीतिक महत्व का मूल्यांकन कीजिए। (150 शब्द)
सामान्य प्रश्न
स्वराज पार्टी की स्थापना कब और किसने की?
स्वराज पार्टी की स्थापना 1 जनवरी 1923 को इलाहाबाद में चित्तरंजन दास (अध्यक्ष) और मोतीलाल नेहरू (सचिव) ने की। औपचारिक नाम — कांग्रेस–खिलाफ़त स्वराज्य पार्टी।
स्वराज पार्टी क्यों बनी?
चौरी-चौरा (फ़रवरी 1922) के बाद गांधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन की वापसी ने कांग्रेस में रणनीतिक रिक्तता पैदा की। 1919 के सुधारों के तहत बनी विधान-परिषदों में प्रवेश कर सरकार को भीतर से बाधित करने की रणनीति पर गया अधिवेशन (1922) में मतभेद हुआ — परिवर्तन-समर्थकों ने स्वराज पार्टी का गठन किया।
परिवर्तन-समर्थक और परिवर्तन-विरोधी कौन थे?
परिवर्तन-समर्थक (Pro-changers) — चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू — परिषद-प्रवेश और भीतरी अवरोध के पक्षधर थे। परिवर्तन-विरोधी (No-changers) — पटेल, राजगोपालाचारी, राजेन्द्र प्रसाद — गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम (खादी, शिक्षा, एकता) के पक्षधर थे।
स्वराज पार्टी की प्रमुख उपलब्धियाँ क्या थीं?
1924–25 बजट और वित्त विधेयक की पराजय; 1928 के लोक सुरक्षा विधेयक की अस्वीकृति; मुद्दीमन समिति की माँग; नेहरू रिपोर्ट 1928 का निर्माण; और कांग्रेस को संक्रमण-काल में राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बनाए रखना।
स्वराज पार्टी का पतन क्यों हुआ?
चित्तरंजन दास का निधन (1925), उत्तरदायी–अनुत्तरदायी विभाजन, सांप्रदायिक तनाव का पुनरुत्थान, 1926 के चुनावों में कमज़ोर प्रदर्शन, और साइमन कमीशन (1927) तथा सविनय अवज्ञा (1930) के साथ जन-राजनीति की वापसी — सभी कारणों से।
नेहरू रिपोर्ट 1928 क्या थी?
नेहरू रिपोर्ट साइमन कमीशन (जिसमें कोई भारतीय सदस्य नहीं था) के विरोध में सर्वदलीय सम्मेलन द्वारा गठित समिति की रिपोर्ट थी। मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में यह भारत द्वारा रचित प्रथम संविधान-प्रारूप था — डोमिनियन स्थिति, मौलिक अधिकार, और संघीय ढाँचा प्रस्तावित।
विट्ठलभाई पटेल कौन थे और उनका योगदान क्या था?
विट्ठलभाई पटेल — सरदार पटेल के बड़े भाई — स्वराज पार्टी के प्रमुख नेता थे। 1925 में वे केंद्रीय विधान सभा के अध्यक्ष (Speaker) चुने गए — यह पद ग्रहण करने वाले प्रथम भारतीय।
स्वराज पार्टी और कांग्रेस का क्या संबंध था?
स्वराज पार्टी कभी कांग्रेस से बाहर नहीं गई। यह कांग्रेस के भीतर एक “दल के भीतर दल” के रूप में कार्यरत रही। चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने अपने कांग्रेस-पदों से ही त्यागपत्र दिया, सदस्यता बनाए रखी।
स्वराज पार्टी ने द्वैध शासन की पोल कैसे खोली?
बंगाल और मध्य प्रांत की परिषदों में स्वराजवादियों ने मंत्रियों के वेतन रोक दिए, जिससे इन प्रांतों में द्वैध शासन अव्यावहारिक हो गया। यह सिद्ध किया कि वास्तविक सत्ता अब भी ब्रिटिश गवर्नर के पास थी, “ज़िम्मेदार सरकार” मात्र दिखावा थी।
स्वराज पार्टी का दीर्घकालिक महत्व क्या है?
तीन कारणों से — (1) जन-आंदोलन और संवैधानिक संघर्ष की दोहरी-पथ रणनीति का प्रयोग, जो आगे 1937 की कांग्रेस सरकारों तक चली; (2) नेहरू रिपोर्ट जैसे संविधान-निर्माण कार्य; (3) कांग्रेस नेताओं का विधायी प्रशिक्षण, जो संविधान सभा में काम आया।