स्वदेशी आंदोलन (Swadeshi Movement) भारत के स्वतंत्रता-संग्राम का पहला सच्चे अर्थों में जन-आंदोलन था, जिसका औपचारिक प्रारंभ 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता टाउन हॉल (Calcutta Town Hall) की ऐतिहासिक सभा में हुआ। तत्काल कारण लॉर्ड कर्जन (Lord Curzon) द्वारा घोषित बंगाल विभाजन (Bengal Partition) था — घोषणा 19 जुलाई 1905, और लागू 16 अक्टूबर 1905 — जिसे पूरे बंगाल ने “शोक दिवस” के रूप में मनाया। आंदोलन के दो आधार-स्तंभ थे — बहिष्कार (Boycott) और स्वदेशी (Swadeshi) — अर्थात ब्रिटिश माल का त्याग और भारतीय वस्तुओं तथा संस्थाओं का प्रचार। लाल-बाल-पाल (Lal-Bal-Pal), औरोबिंदो घोष (Aurobindo Ghosh), रवींद्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) और सुरेंद्रनाथ बनर्जी (Surendranath Banerjee) इस आंदोलन के प्रमुख चेहरे थे। यह आंदोलन 1907 के सूरत विभाजन (Surat Split) तक तेज़ रहा और 1911 में बंगाल विभाजन की वापसी के साथ अपने तत्काल लक्ष्य में सफल रहा।
परिचय (Introduction)

स्वदेशी आंदोलन को इतिहासकार बिपिन चंद्र (Bipan Chandra) ने “आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद का प्रथम सामूहिक उद्घोष” कहा है। 1885 की भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress / INC) तक भारतीय राजनीति “नरम-दल (Moderates)” की प्रार्थना-पत्र शैली पर आधारित थी। बंगाल विभाजन ने यह विश्वास तोड़ दिया कि ब्रिटिश सत्ता “न्यायप्रिय” है।
स्वदेशी आंदोलन ने तीन नई चीज़ें भारतीय राजनीति में जोड़ीं — (i) जन-गोलबंदी (mass mobilisation), (ii) आर्थिक राष्ट्रवाद (economic nationalism), और (iii) सांस्कृतिक पुनर्जागरण (cultural revival)।
UPSC में यह विषय GS-I (आधुनिक भारतीय इतिहास) का अनिवार्य अंग है — Prelims में तिथियाँ, नेताओं की पहचान और मुख्य संस्थाओं के तथ्यगत प्रश्न तथा Mains में आंदोलन के कार्यक्रमों, सीमाओं और विरासत पर विश्लेषणात्मक प्रश्न नियमित रूप से पूछे जाते हैं।
मुख्य तथ्य एक नज़र में (Quick Facts at a Glance)
- तत्काल कारण: बंगाल का विभाजन (Lord Curzon की घोषणा 19 जुलाई 1905, लागू 16 अक्टूबर 1905)
- औपचारिक प्रारंभ: 7 अगस्त 1905, कलकत्ता टाउन हॉल सभा
- दो स्तंभ: बहिष्कार (Boycott) + स्वदेशी (Swadeshi)
- प्रमुख नेता: लाल-बाल-पाल — लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल; साथ ही औरोबिंदो घोष, रवींद्रनाथ टैगोर, सुरेंद्रनाथ बनर्जी
- गीत: टैगोर का “आमार सोनार बांग्ला (Amar Sonar Bangla)” — आज बांग्लादेश का राष्ट्रगान
- प्रमुख स्वदेशी उद्यम: Bengal Chemicals (P C Ray, 1893); स्वदेशी स्टीम नेविगेशन (V O Chidambaram Pillai, 1906); Bengal National College (Aurobindo Ghosh, Principal)
- राजनीतिक प्रभाव: सूरत विभाजन 1907 (नरम-गरम विभाजन)
- विदेशी प्रतिक्रिया: Tilak की गिरफ्तारी 1908 (मांडले 6 वर्ष), V O C Pillai की 40 साल कालापानी सज़ा
- तत्काल लक्ष्य की प्राप्ति: 1911 में बंगाल विभाजन की वापसी (Annulment) — दिल्ली दरबार
- शिक्षा: Bengal National College, National Council of Education 1906
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background)
19वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में भारतीय राजनीति में दो धाराएँ बन रही थीं — नरम-दल (Moderates), जो याचिका, सम्मेलन और औपनिवेशिक संवैधानिक मंचों के माध्यम से सुधार चाहते थे; और गरम-दल (Extremists / Radicals) का बीज, जो स्व-राज्य (Swaraj) को साधन-साध्य दोनों मानते थे।
आर्थिक राष्ट्रवाद की भूमि पहले ही तैयार हो चुकी थी। दादाभाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji) का Poverty and Un-British Rule in India (1901), रमेशचंद्र दत्त (R C Dutt) की Economic History of India, और जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे (M G Ranade) की रचनाएँ — सभी ने यह सिद्ध किया कि ब्रिटिश शासन भारत से धन-निकासी (Drain of Wealth) कर रहा है।
लॉर्ड कर्जन (1899-1905, वायसराय / Viceroy) ने प्रशासनिक “दक्षता” के नाम पर 1899 का कलकत्ता निगम क़ानून, 1904 का विश्वविद्यालय अधिनियम (University Act) और 1904 का आधिकारिक रहस्य अधिनियम (Official Secrets Act) पारित किए। इनसे शिक्षित मध्य-वर्ग पहले से ही नाराज़ था। बंगाल विभाजन ने इस आक्रोश को विस्फोटक रूप दे दिया।
बंगाल विभाजन — कारण और घोषणा (Bengal Partition: Causes and Announcement)

ब्रिटिश सरकार का आधिकारिक कारण “प्रशासनिक सुविधा” था — बंगाल प्रांत (province) उस समय वर्तमान बिहार-झारखंड-ओडिशा-बंगाल-असम-त्रिपुरा क्षेत्र को मिलाकर अत्यधिक विशाल था। परंतु वास्तविक उद्देश्य था — (i) शिक्षित बंगाली मध्यवर्ग की राजनीतिक एकता तोड़ना, और (ii) “हिंदू-मुस्लिम विभाजन (divide and rule)” का प्रशासनिक संस्थागतीकरण।
विभाजन-योजना — पश्चिम बंगाल (हिंदू-बहुल, बंगाली) और पूर्वी बंगाल और असम (मुस्लिम-बहुल) — 19 जुलाई 1905 को घोषित हुई और 16 अक्टूबर 1905 को लागू।
लॉर्ड कर्जन के शासन-सचिव हर्बर्ट रिज़ले (Herbert Risley) के विचार-पत्र (1904) में स्पष्ट लिखा था: “एकजुट बंगाल एक शक्ति है; विभाजित बंगाल अनेक तरीकों से नीचे खींच लिया जाएगा।”
आंदोलन का प्रारंभ — 7 अगस्त 1905 (Launch of the Movement)
7 अगस्त 1905 को कलकत्ता टाउन हॉल में आयोजित विशाल सभा ने औपचारिक रूप से बहिष्कार प्रस्ताव (Boycott Resolution) पारित किया। इसी दिन को बाद में “राष्ट्रीय शोक दिवस” और बाद में “राष्ट्रीय हस्तकला दिवस” के रूप में मनाया गया (वर्तमान भारत सरकार 7 अगस्त को National Handloom Day के रूप में मनाती है — 2015 से)।
16 अक्टूबर 1905 — विभाजन-दिवस — रवींद्रनाथ टैगोर के नेतृत्व में बंगाली लोगों ने एक-दूसरे को राखी बाँधी ताकि “बँधे बंगाल” का संदेश पूरे भारत में जाए। टैगोर ने इसी अवसर पर “आमार सोनार बांग्ला (Amar Sonar Bangla)” गीत की रचना की — जो आज बांग्लादेश का राष्ट्रगान है।
आंदोलन के कार्यक्रम (Programmes of the Movement)
स्वदेशी आंदोलन एक बहु-आयामी कार्यक्रम था —
1. बहिष्कार (Boycott)
ब्रिटिश माल — विशेषकर मानचेस्टर का सूती कपड़ा (Manchester textiles), लिवरपूल का नमक, ब्रिटिश-निर्मित चीनी — का त्याग। सार्वजनिक स्थानों पर विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। दुकानदारों और ख़रीदारों दोनों पर सामाजिक दबाव डाला गया।
2. स्वदेशी उत्पादन (Swadeshi Industries)
- Bengal Chemicals and Pharmaceutical Works (1893): प्रफुल्ल चंद्र राय (P C Ray) द्वारा स्थापित — भारतीय रसायन-उद्योग का अग्रदूत।
- Swadeshi Steam Navigation Company (1906): तमिलनाडु के तूतीकोरिन से V O चिदंबरम पिल्लई (V O Chidambaram Pillai) ने स्थापित की — ब्रिटिश इंडिया स्टीम नेविगेशन कंपनी का सीधा प्रतिस्पर्धी। पिल्लई को बाद में 40 वर्ष कालापानी की सज़ा दी गई।
- साबुन, कपड़ा, चमड़ा, माचिस, चीनी — सैकड़ों छोटे उद्यम बंगाल, बंबई और मद्रास में खुले।
3. राष्ट्रीय शिक्षा (National Education)
- Bengal National College (1906): औरोबिंदो घोष इसके पहले प्राचार्य (Principal) बने।
- National Council of Education (1906): स्वतंत्र शिक्षा-व्यवस्था का केंद्रीय संगठन।
- मातृभाषा-माध्यम, भारतीय इतिहास और तकनीकी शिक्षा पर ज़ोर दिया गया।
4. सांस्कृतिक पुनर्जागरण (Cultural Revival)
- “बंदे मातरम् (Vande Mataram)” आंदोलन का गीत बना — बंकिमचंद्र चटर्जी (Bankim Chandra Chatterjee) द्वारा 1882 में Anandamath में रचित।
- गणेशोत्सव और शिवाजी जयंती (तिलक द्वारा 1893 से) सार्वजनिक मंच बने।
- स्वदेशी मेले, सांस्कृतिक संगीत-सभाएँ और साहित्यिक रचनाएँ — सभी एकीकृत आंदोलन का हिस्सा बने।
5. समितियाँ और श्रमिक हड़तालें
अनुशीलन समिति (Anushilan Samiti) बंगाल में और युगांतर (Jugantar) की क्रांतिकारी पत्रिका — सशस्त्र राष्ट्रवाद के बीज बोई। श्रमिक हड़तालें — रेलवे, जूट मिलें, टकसाल — स्वदेशी आंदोलन के अंग बनीं।
आंदोलन के प्रमुख नेता (Key Leaders of the Movement)
| नेता | भूमिका | विशेष योगदान |
|---|---|---|
| लाला लाजपत राय (Lala Lajpat Rai) | “पंजाब केसरी” | पंजाब में आंदोलन का प्रसार; बाद में 1907 में बर्मा निर्वासन |
| बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak) | “लोकमान्य” | “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” का उद्घोष |
| बिपिन चंद्र पाल (Bipin Chandra Pal) | विचारक-वक्ता | “स्वराज” के दार्शनिक आधार के निर्माता |
| औरोबिंदो घोष (Aurobindo Ghosh) | प्राचार्य Bengal National College | New Lamps for Old; “निष्क्रिय प्रतिरोध” का सिद्धांत |
| रवींद्रनाथ टैगोर | सांस्कृतिक प्रतीक | राखी आंदोलन; आमार सोनार बांग्ला |
| सुरेंद्रनाथ बनर्जी (Surendranath Banerjee) | नरम-दल नेता | प्रारंभिक चरण में बहिष्कार-समर्थक |
| अश्विनी कुमार दत्त (Ashwini Kumar Dutt) | बारीसाल केंद्र | ग्रामीण-स्तर पर संगठन |
| V O चिदंबरम पिल्लई | तमिलनाडु केंद्र | स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी |
| लालमोहन घोष (Lalmohan Ghosh) | प्रवक्ता | राष्ट्रीय शिक्षा का प्रचार |
स्वदेशी आंदोलन और कांग्रेस — सूरत विभाजन 1907 (Surat Split)
स्वदेशी आंदोलन ने INC के अंदर लंबे समय से चली आ रही नरम-गरम तनाव को विस्फोटक मोड़ पर पहुँचा दिया।
- नरम-दल (Moderates) — गोपाल कृष्ण गोखले, फेरोज़शाह मेहता, सुरेंद्रनाथ बनर्जी — मानते थे कि बहिष्कार केवल बंगाल तक सीमित रहे और संवैधानिक मार्ग पर बातचीत जारी रहे।
- गरम-दल (Extremists) — तिलक, बिपिन चंद्र पाल, लाजपत राय — चाहते थे कि बहिष्कार-स्वदेशी पूरे भारत में फैले और स्वराज को कांग्रेस का घोषित लक्ष्य बनाया जाए।
दिसंबर 1907 में सूरत अधिवेशन (Surat Session) में कांग्रेस के अध्यक्ष-पद को लेकर विवाद ने भौतिक झड़प का रूप ले लिया। नरम-दल ने रास बिहारी घोष (Rashbehari Ghosh) को अध्यक्ष बनाने का प्रयास किया, जिसका गरम-दल ने विरोध किया। परिणामस्वरूप कांग्रेस का विभाजन हो गया — गरम-दल को संगठन से बाहर कर दिया गया। 1916 के लखनऊ अधिवेशन (Lucknow Session) तक यह विभाजन चलता रहा।
आंदोलन का पतन और कारण (Decline and Reasons)
स्वदेशी आंदोलन 1908 के बाद धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ा। प्रमुख कारण —
- तीव्र दमन: लॉर्ड मिंटो (Lord Minto, 1905-10) के प्रशासन ने प्रेस अधिनियम 1908, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम 1908 और राजद्रोह सम्मेलन अधिनियम 1907 लागू किए।
- तिलक की गिरफ्तारी 1908: 6 वर्ष का मांडले (बर्मा) निर्वासन।
- औरोबिंदो की राजनीतिक संन्यास: अलिपोर बम केस (1908) के बाद वे आध्यात्मिक जीवन की ओर मुड़ गए।
- सूरत विभाजन 1907: कांग्रेस-संगठन का विघटन।
- साम्प्रदायिक राजनीति का उदय: मुस्लिम लीग (Muslim League / ML) की स्थापना 30 दिसंबर 1906 (ढाका); 1909 का मॉर्ले-मिंटो सुधार (Morley-Minto Reforms) — पृथक निर्वाचक मंडल (separate electorate)।
- नेताओं के बीच रणनीतिक मतभेद: बहिष्कार-गाँधी से पहले की रणनीति केवल आर्थिक रही, जन-गोलबंदी का विशेषकर ग्रामीण विस्तार सीमित।
आंदोलन का अंतिम लक्ष्य — 1911 में विभाजन-वापसी (Annulment of Partition)
आंदोलन का तत्काल राजनीतिक लक्ष्य 1911 में पूरा हुआ — दिल्ली दरबार (Delhi Durbar) 12 दिसंबर 1911 में किंग जॉर्ज V (King George V) ने तीन घोषणाएँ कीं —
- बंगाल विभाजन की वापसी (Annulment),
- राजधानी का कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरण,
- भाषाई आधार पर बिहार-उड़ीसा को बंगाल से अलग किया गया।
ब्रिटिश सरकार ने इसे “उदारता” बताया, परंतु वस्तुतः यह स्वदेशी आंदोलन की पहली बड़ी जीत थी।
स्वदेशी आंदोलन का दीर्घकालिक महत्व (Long-term Significance)
- राष्ट्रीयता का जन-स्वरूप: आंदोलन ने पहली बार राजनीति को बैठक-कक्ष से सड़क पर ला दिया।
- आर्थिक राष्ट्रवाद की संस्थागत जड़: बाद में 1929 की कांग्रेस का “पूर्ण स्वराज” प्रस्ताव और 1931 की कराची प्रस्तावना के मौलिक अधिकार-घोषणा-पत्र की आधारभूमि।
- गाँधीवादी रणनीति का पूर्व-प्रशिक्षण: बहिष्कार, असहयोग, सत्याग्रह — इन सभी का बीज स्वदेशी में था। 1920 के असहयोग आंदोलन और 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन ने इन्हीं विधियों को विकसित किया।
- सांस्कृतिक पुनर्जागरण: “वंदे मातरम्”, “आमार सोनार बांग्ला”, राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (National Council of Education) — आज भी इन सबकी जीवंत विरासत मौजूद है।
- क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का जन्म: अनुशीलन समिति, युगांतर — और बाद में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) तक की रेखा यहीं से शुरू हुई।
संबंधित नोट्स के लिए देखें — जवाहरलाल नेहरू: लोकतांत्रिक समाजवाद और स्वतंत्रता, भारतीय संविधान की उद्देशिका तथा संसद का इतिहास और बदलती गतिशीलता — जिनकी जड़ें इसी राष्ट्रीयता-धारा में हैं।
आलोचना (Criticism)
- सीमित सामाजिक आधार: आंदोलन मुख्यतः शहरी, मध्यवर्गीय, हिंदू-बंगाली रहा। मुसलमान भागीदारी कम रही — आंशिकत: इसलिए क्योंकि पूर्वी बंगाल को विभाजन से प्रशासनिक लाभ मिलता दिख रहा था।
- जातिगत सीमाएँ: दलित और आदिवासी समुदायों की संगठित भागीदारी सीमित रही।
- रणनीतिक एकता का अभाव: नरम-गरम तनाव ने 1907 में कांग्रेस को तोड़ दिया।
- आर्थिक प्रभाव सीमित: स्वदेशी उद्यमों के पास पूँजी, तकनीक और बाज़ार-पहुँच सीमित रही, जिससे ब्रिटिश आयात पर प्रभाव अल्पकालिक रहा।
UPSC के लिए प्रासंगिकता (UPSC Relevance)
- Prelims: बंगाल विभाजन की तिथियाँ; प्रमुख नेता और उनके स्थान; प्रमुख स्वदेशी उद्यम; सूरत विभाजन; मॉर्ले-मिंटो सुधार 1909; मुस्लिम लीग की स्थापना 1906।
- Mains GS-I: “स्वदेशी आंदोलन भारतीय राष्ट्रवाद का पहला सच्चा जन-आंदोलन था” — चर्चा कीजिए। आंदोलन के कार्यक्रमों, सीमाओं और गाँधीवादी रणनीति पर इसके प्रभाव पर समीक्षा।
- Essay: “आर्थिक राष्ट्रवाद से राजनीतिक स्वतंत्रता तक — स्वदेशी की विरासत” — एक सशक्त निबंध-विषय।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न (Mains Practice Questions)
- “स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को ‘प्रार्थना’ से ‘प्रतिरोध’ की ओर बढ़ाया।” इस कथन का परीक्षण कीजिए। (150 शब्द, 10 अंक)
- स्वदेशी आंदोलन के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आयामों का परीक्षण कीजिए और 1920 के असहयोग आंदोलन से इसकी तुलना कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)
- बंगाल विभाजन 1905 के पीछे ब्रिटिश सरकार के घोषित और वास्तविक उद्देश्य क्या थे? आंदोलन ने 1911 में इन उद्देश्यों को कैसे विफल किया? (250 शब्द, 15 अंक)
निष्कर्ष (Conclusion)
स्वदेशी आंदोलन 1905 भारत के स्वतंत्रता-संग्राम का वह “गुणात्मक मोड़” था जहाँ राजनीति पहली बार जनता के घर तक पहुँची। बंगाल विभाजन के विरोध में जो शुरू हुआ, वह आर्थिक राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पुनर्जागरण, राष्ट्रीय शिक्षा और सशस्त्र क्रांति — चारों दिशाओं में फैल गया। यद्यपि आंदोलन का तत्काल पतन 1908 के बाद हुआ, परंतु इसने जो विचार-धारा छोड़ी — स्वराज, स्वदेशी, बहिष्कार और आत्म-निर्भरता — वही आगे चलकर 1920, 1930 और 1942 के सभी बड़े आंदोलनों का आधार बनी।
UPSC अभ्यर्थी के लिए स्वदेशी केवल एक “अध्याय” नहीं — यह भारतीय राष्ट्रवाद का प्रथम सामूहिक हस्ताक्षर है, जिसके बिना गाँधीयुग की पूरी कथा अधूरी रहती है। आज भी जब “आत्मनिर्भर भारत” या “वोकल फॉर लोकल” जैसी अवधारणाएँ चर्चा में आती हैं, तो उनकी ऐतिहासिक वैधता स्वदेशी आंदोलन से ही प्राप्त होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
स्वदेशी आंदोलन कब हुआ था?
स्वदेशी आंदोलन का औपचारिक प्रारंभ 7 अगस्त 1905 को कलकत्ता टाउन हॉल की सभा में हुआ। इसका तत्काल कारण लॉर्ड कर्जन द्वारा 19 जुलाई 1905 को घोषित और 16 अक्टूबर 1905 को लागू किया गया बंगाल विभाजन था। आंदोलन 1908 तक अपनी चरम तीव्रता पर रहा।
स्वदेशी आंदोलन के मुख्य नेता कौन थे?
प्रमुख नेता थे — लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल), औरोबिंदो घोष, रवींद्रनाथ टैगोर, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, अश्विनी कुमार दत्त और V O चिदंबरम पिल्लई।
बहिष्कार और स्वदेशी में क्या अंतर है?
बहिष्कार (Boycott) का अर्थ ब्रिटिश माल, संस्थाओं और शिक्षा का त्याग करना — एक “नकारात्मक” कार्यक्रम। स्वदेशी (Swadeshi) का अर्थ भारतीय वस्तुओं, उद्यमों और राष्ट्रीय शिक्षा-संस्थाओं का प्रचार करना — एक “सकारात्मक” कार्यक्रम। दोनों एक ही आंदोलन के दो पहलू थे।
बंगाल विभाजन क्यों हुआ था?
ब्रिटिश सरकार का घोषित कारण “प्रशासनिक सुविधा” था, परंतु वास्तविक उद्देश्य था (i) शिक्षित बंगाली मध्यवर्ग की राजनीतिक एकता तोड़ना, और (ii) हिंदू-मुस्लिम आधार पर “बाँटो और राज करो (divide and rule)” की नीति का संस्थागतीकरण।
“आमार सोनार बांग्ला” गीत किसने लिखा?
रवींद्रनाथ टैगोर ने 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में यह गीत रचा। यह गीत आज बांग्लादेश का राष्ट्रगान है। उसी समय “वंदे मातरम्” (बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा 1882 में Anandamath में रचित) आंदोलन का प्रमुख नारा बना।
सूरत विभाजन (Surat Split) क्या है?
दिसंबर 1907 में सूरत अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दो भागों में विभाजित हो गई — नरम-दल (Moderates) और गरम-दल (Extremists)। तिलक के नेतृत्व वाले गरम-दल को संगठन से बाहर कर दिया गया। यह विभाजन 1916 के लखनऊ अधिवेशन तक चला।
स्वदेशी आंदोलन में कौन-कौन से उद्यम स्थापित हुए?
प्रमुख स्वदेशी उद्यम थे — Bengal Chemicals (1893, P C Ray), Swadeshi Steam Navigation Company (1906, V O Chidambaram Pillai), Bengal National College (1906, Aurobindo Ghosh प्राचार्य) और National Council of Education (1906)। साथ ही साबुन, कपड़ा, चीनी, माचिस के सैकड़ों छोटे उद्यम भी खुले।
स्वदेशी आंदोलन का परिणाम क्या रहा?
तत्काल राजनीतिक लक्ष्य 1911 में पूरा हुआ — दिल्ली दरबार 12 दिसंबर 1911 में बंगाल विभाजन वापस हुआ। दीर्घकालिक दृष्टि से इसने भारतीय राष्ट्रवाद को जन-आधार दिया और गाँधीवादी असहयोग-सत्याग्रह की रणनीति का पूर्व-प्रशिक्षण बना। राष्ट्रीय शिक्षा, आर्थिक राष्ट्रवाद और क्रांतिकारी आंदोलन — तीनों की संस्थागत नींव यहीं पड़ी।
स्वदेशी आंदोलन कब और क्यों कमज़ोर पड़ा?
आंदोलन 1908 के बाद कमज़ोर पड़ा। मुख्य कारण थे — तिलक की गिरफ्तारी (1908, मांडले निर्वासन), औरोबिंदो का राजनीतिक संन्यास, सूरत विभाजन से कांग्रेस का विघटन, मुस्लिम लीग का गठन (1906) और मॉर्ले-मिंटो सुधार 1909 से पृथक निर्वाचक-मंडल लागू होना।