खुले समुद्र के ऊपर किसी विमान का इंजन बंद हो जाए या तूफान में जहाज के भीतर पानी भरने लगे, तो चालक दल सबसे पहले जीवनरक्षक नौका या अग्निशामक नहीं उठाता। वह एक शब्द बोलता है। यह शब्द तीन बार दोहराया जाता है और दुनिया के हर पायलट, नाविक, तटरक्षक तथा वायु यातायात नियंत्रक को इसे सुनते ही बाकी काम रोकने का प्रशिक्षण मिला होता है: “मे-डे, मे-डे, मे-डे (Mayday)।” यह उन गिने-चुने शब्दों में है जिनका अर्थ हर देश, हर रेडियो आवृत्ति, हर विमान कक्ष और हर जहाज के नियंत्रण कक्ष में एक ही है। इसके पीछे आवाज, रेडियो आवृत्तियों, उपग्रहों और संकेतकों की पूरी व्यवस्था है, जिसे एक शताब्दी से अधिक समय में इसलिए बनाया गया कि सहायता की पुकार भाषा या दूरी में खो न जाए।
गंभीर समुद्री या विमान दुर्घटना होते ही ये संकट तंत्र समाचारों में आते हैं। यह विषय रेडियो संचार, उपग्रह संजाल और सुरक्षा अभियांत्रिकी के कारण विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से जुड़ता है। इसका संबंध आंतरिक सुरक्षा और आपदा प्रबंधन से भी है। पूरी व्यवस्था को स्तरों में देखें तो यह आसान लगती है: मनुष्य के लिए बोले जाने वाले संकेत, मशीनों के लिए कूटबद्ध संदेश और संदेश पहुँचाने वाले उपग्रह। आगे फ्रांसीसी शब्द से बने मे-डे से लेकर अंतरिक्ष यान से बात करने वाले 406 मेगाहर्ट्ज संकेतक तक हर स्तर को समझते हैं।
तीन बोले जाने वाले संकेत: मे-डे, पैन-पैन और सेक्युरिते
आवाज वाले संकेत इस व्यवस्था का सबसे पुराना और मानवीय स्तर हैं। वे गंभीरता की तीन सीढ़ियाँ बनाते हैं। सबसे ऊपर मे-डे है, जो अंतरराष्ट्रीय रेडियो-दूरभाष संकट पुकार है। इसका उपयोग तभी होता है जब जहाज या विमान में जीवन को गंभीर और तुरंत खतरा हो तथा तत्काल सहायता चाहिए, जैसे आग, जहाज डूबना, समुद्र के ऊपर इंजन बंद होना या जानलेवा चिकित्सा संकट। यह फ्रांसीसी वाक्य “मे डे (m’aider)” से निकला है, जो “वेने मे डे (venez m’aider)” यानी “मेरी मदद के लिए आइए” का छोटा रूप है। लंदन हवाई अड्डे के रेडियो अधिकारी फ्रेडरिक स्टैनली मॉकफोर्ड (Frederick Stanley Mockford) ने 1923 में इसे सुझाया था। उन्हें ऐसा शब्द चाहिए था जो खराब रेडियो आवाज में भी साफ सुनाई दे और क्रॉयडन-पेरिस मार्ग के अंग्रेजी व फ्रांसीसी दल समझ सकें। इसे हमेशा तीन बार बोला जाता है, ताकि सामान्य बातचीत का हिस्सा न समझा जाए और शोर में न खोए। मे-डे पुकार को कानूनी रूप से अन्य सभी रेडियो यातायात पर प्राथमिकता मिलती है।
एक सीढ़ी नीचे पैन-पैन (PAN-PAN) है। यह तात्कालिकता का संकेत है। इसका अर्थ है कि समस्या गंभीर है, लेकिन जीवन को अभी तुरंत खतरा नहीं है। उदाहरण के लिए नियंत्रण में मौजूद यांत्रिक खराबी, ऐसा घायल व्यक्ति जिसकी जान खतरे में नहीं है या दिशा-ज्ञान खोना जो अभी दुर्घटना की स्थिति तक नहीं पहुँचा। यह फ्रांसीसी शब्द “पान (panne)” से आया है, जिसका अर्थ खराबी है। इसे भी “पैन-पैन” तीन बार बोला जाता है। अंतर कामकाज में बहुत महत्वपूर्ण है। मे-डे से पूर्ण खोज और बचाव प्रतिक्रिया शुरू होती है तथा रेडियो मार्ग खाली कराया जाता है। पैन-पैन अधिकारियों को सतर्क करके मदद या प्राथमिकता माँगता है, लेकिन हर उपलब्ध बचाव संसाधन तुरंत नहीं भेजा जाता। गलत संकेत से संसाधन व्यर्थ हो सकते हैं और उलटी गलती से जान जा सकती है।
तीसरा संकेत सेक्युरिते (Securité) है, जिसका उच्चारण लगभग “से-क्यू-री-ते” होता है और फ्रांसीसी में इसका अर्थ सुरक्षा है। इसे तीन बार बोलकर सुरक्षा संदेश शुरू किया जाता है, जैसे नौवहन चेतावनी, मौसम सूचना या संकरी जलधारा में बड़े जहाज के मुड़ने की सूचना। इसमें कोई आपात स्थिति नहीं होती, पर सुरक्षा से जुड़ी बात पर ध्यान दिलाया जाता है। रेडियो पर प्राथमिकता का क्रम है: सुरक्षा के लिए सेक्युरिते, तात्कालिकता के लिए पैन-पैन और गंभीर संकट के लिए मे-डे। पहले किसी खास चिकित्सा अधिकारी से संपर्क के लिए “पैन-पैन मेडिको (PAN-PAN MEDICO)” भी बोला जाता था, लेकिन परीक्षा की दृष्टि से मुख्य तीन संकेत यही हैं।
एसओएस और मोर्स का दौर: संकट संकेत की शुरुआत
रेडियो पर आवाज आने से पहले मोर्स कूट (Morse code) था। यहीं सबसे प्रसिद्ध संकट संकेत एसओएस (SOS) पैदा हुआ। आम धारणा के विपरीत इसका अर्थ “हमारी आत्माएँ बचाओ (Save Our Souls)” या “हमारा जहाज बचाओ (Save Our Ship)” नहीं है। ये अर्थ बाद में लोकप्रिय हुए। इसे 1906 में चुना गया और 1908 में अंतरराष्ट्रीय रूप से अपनाया गया, क्योंकि इसका मोर्स क्रम बहुत साफ और भेजने में आसान है: तीन बिंदु, तीन लंबी रेखाएँ, फिर तीन बिंदु, बिना अंतर के लगातार, यानी …—…। घबराया व्यक्ति भी यह सरल लय भेज सकता है और इसे किसी दूसरे संदेश से मिलाना कठिन है। एस-ओ-एस अक्षर केवल उस लय का सुविधाजनक नाम हैं; असली संकेत अक्षर नहीं, लय है। आवाज वाले रेडियो ने इसके सिद्धांत को समाप्त नहीं किया। पहले यही विचार बोले जाने वाले मे-डे में और फिर स्वचालित उपग्रह तंत्र में बदल गया।


सहायता पुकारने की आपात रेडियो आवृत्तियाँ
संकेत उतना ही उपयोगी है जितना वह माध्यम जिस पर भेजा जाए। इसलिए दुनिया ने कुछ रेडियो आवृत्तियाँ आपात संदेशों के लिए सुरक्षित रखी हैं और उन पर लगातार निगरानी होती है। नागरिक विमानन की अंतरराष्ट्रीय संकट आवृत्ति 121.5 मेगाहर्ट्ज है, जिसे कभी-कभी “गार्ड” कहा जाता है। नागरिक विमान और वायु यातायात केंद्र इस अति-उच्च आवृत्ति चैनल पर नजर रखते हैं। सेना के लिए समान आवृत्ति 243.0 मेगाहर्ट्ज है। संकट में पायलट किसी स्टेशन तक पहुँच सके तो 121.5 मेगाहर्ट्ज पर जाकर आवाज में पुकार करता है।
समुद्र में पानी और पृथ्वी की वक्रता तय करते हैं कि संकेत कितनी दूर जाएगा, इसलिए व्यवस्था थोड़ी विस्तृत है। कम दूरी की आवाज के लिए अंतरराष्ट्रीय समुद्री संकट, पुकार और सुरक्षा चैनल अति-उच्च आवृत्ति चैनल 16 है, जिसकी आवृत्ति 156.8 मेगाहर्ट्ज है। हर जहाज और तटीय केंद्र इस पर मे-डे सुनता है। सीधी दृष्टि की सीमा के कारण इसकी पहुँच आम तौर पर कुछ दर्जन समुद्री मील होती है। क्षितिज से आगे मध्यम और उच्च आवृत्ति काम आती है। 2182 किलोहर्ट्ज मध्यम तरंग की पुरानी अंतरराष्ट्रीय संकट आवृत्ति है, जो रात में समुद्र पर बहुत दूर तक पहुँच सकती है। इसके साथ चैनल 70, यानी 156.525 मेगाहर्ट्ज, केवल अंकीय चयनात्मक पुकार (Digital Selective Calling या DSC) के लिए आरक्षित है। इसमें बटन दबाकर कूटबद्ध संकट संदेश भेजा जाता है, इसलिए किसी व्यक्ति के आवाज सुनने पर निर्भरता घटती है। याद रखें: विमानन के लिए 121.5 मेगाहर्ट्ज, समुद्री आवाज के लिए चैनल 16, लंबी दूरी के लिए 2182 किलोहर्ट्ज और अंकीय संदेश के लिए चैनल 70।
वैश्विक समुद्री संकट और सुरक्षा तंत्र: समुद्र में एसओएस को स्वचालित करना
बोले गए मे-डे की कमजोरी साफ है: उसे भेजते समय कोई व्यक्ति सीमा के भीतर सुन भी रहा हो। आधी रात बीच समुद्र में अकेला जहाज डूब रहा हो तो यह भरोसा कमजोर पड़ जाता है। इतिहास में कई संदेश इसलिए नहीं सुने गए। इसका अंतरराष्ट्रीय समाधान वैश्विक समुद्री संकट और सुरक्षा तंत्र (Global Maritime Distress and Safety System या GMDSS) है। अधिकांश बड़े वाणिज्यिक जहाजों के लिए इसे अनिवार्य किया गया और अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (International Maritime Organization या IMO) के समुद्र में जीवन की सुरक्षा अभिसमय (Safety of Life at Sea या SOLAS) के अंतर्गत यह 1999 में पूरी तरह लागू हुआ।
इस तंत्र का मूल विचार चेतावनी देने का भार मनुष्य के कान से हटाकर स्वचालित उपकरण और उपग्रह पर डालना है। पास के जहाज द्वारा आवाज सुने जाने की उम्मीद करने के बजाय जहाज अंकीय चयनात्मक पुकार, उपग्रह या स्वचालित संकेतक से संकट संदेश भेज सकता है। संदेश तट पर मौजूद बचाव समन्वय केंद्र तक पहुँचता है, चाहे कोई जहाज पास न हो। दुनिया के समुद्र चार क्षेत्रों में बाँटे गए हैं: तट के पास अति-उच्च आवृत्ति वाला ए1, उससे आगे मध्यम आवृत्ति वाला ए2, उपग्रह से आच्छादित विशाल मध्य-अक्षांश ए3 और ध्रुवीय ए4। जहाज को अपने मार्ग के क्षेत्र के अनुसार उपकरण रखने होते हैं। यह तंत्र मौसम और नौवहन चेतावनियों जैसी समुद्री सुरक्षा जानकारी भी प्रसारित करता है। इस प्रकार यह संकट और सुरक्षा सूचना दोनों की व्यवस्था है। पूरे महासागर के लिए यह वही काम करता है जो स्थानीय बंदरगाह में चैनल 16 करता है: पुकार बाहर जाए और उसका उत्तर मिले।
संकेतक और उपग्रह: ईपीआईआरबी, ईएलटी और कोस्पास-सारसैट
सबसे शक्तिशाली स्तर में मनुष्य की जरूरत भी नहीं रहती। आपात संकेतक सीधे उपग्रह से बात करता है। समुद्र में यह आपात स्थिति-सूचक रेडियो संकेतक (Emergency Position-Indicating Radio Beacon या EPIRB), विमान में आपात स्थान संकेतक (Emergency Locator Transmitter या ELT) और किसी व्यक्ति के पास निजी स्थान संकेतक (Personal Locator Beacon या PLB) होता है। तीनों का काम एक है। जहाज डूबने, विमान गिरने या व्यक्ति के जानलेवा संकट में संकेतक सक्रिय होकर उपग्रहों द्वारा सुनी जा रही आवृत्ति पर संदेश भेजता है। यह पानी में डूबने या भारी टक्कर पर अपने-आप और स्विच से हाथ द्वारा सक्रिय हो सकता है।
यह आवृत्ति 406 मेगाहर्ट्ज है और इसके पीछे कोस्पास-सारसैट (Cospas-Sarsat) नाम का अंतरराष्ट्रीय उपग्रह-आधारित खोज और बचाव तंत्र है। कनाडा, फ्रांस, संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ ने इसे 1979 में शुरू किया था। 406 मेगाहर्ट्ज संकेतक लगभग हर 50 सेकंड में छोटा अंकीय संदेश भेजता है। उसमें किसी जहाज, विमान या व्यक्ति के नाम पंजीकृत विशिष्ट षोडशाधारी पहचान (HEX ID) होती है। इसलिए बचाव दल जानता है कि संकट में कौन है, कौन-सा वाहन है और किससे संपर्क करना है। कई संकेतकों में वैश्विक स्थान-निर्धारण तंत्र (Global Positioning System या GPS) ग्रहणकर्ता भी होता है, जिससे सटीक निर्देशांक संदेश में जुड़ जाते हैं। उपग्रह संदेश को स्थानीय उपयोगकर्ता केंद्र (Local User Terminal या LUT) नाम के भू-केंद्र तक पहुँचाता है। वहाँ से यह अभियान नियंत्रण केंद्र और फिर सहायता भेजने वाले बचाव समन्वय केंद्र तक जाता है। यही संकेतक कम शक्ति वाला 121.5 मेगाहर्ट्ज दिशा-पता संकेत भी भेजते हैं, जिससे अंतिम चरण में विमान या जहाज व्यक्ति की सटीक जगह खोजते हैं।
कोस्पास-सारसैट ने उपग्रहों की तीन पीढ़ियाँ देखी हैं। कम पृथ्वी कक्षा खोज और बचाव तंत्र (LEOSAR) डॉप्लर परिवर्तन से स्थान निकालता था, लेकिन उपग्रह के ऊपर से गुजरने में एक घंटा या अधिक लग सकता था। भूस्थिर कक्षा खोज और बचाव तंत्र (GEOSAR) ने संदेश तुरंत पकड़ना संभव किया, पर अकेले स्थान तय नहीं कर सकता था। नवीन मध्यम पृथ्वी कक्षा खोज और बचाव तंत्र (MEOSAR) ने मध्यम कक्षा वाले नौवहन उपग्रह समूहों पर बचाव ग्रहणकर्ता लगाए हैं। इनमें वैश्विक स्थान-निर्धारण तंत्र, गैलीलियो और ग्लोनास जैसे समूह शामिल हैं। यह 406 मेगाहर्ट्ज संदेश को लगभग वास्तविक समय में पकड़कर सामान्यतः पाँच मिनट के भीतर सटीक स्थान दे सकता है, भले संकेतक में अपना स्थान-निर्धारण ग्रहणकर्ता न हो। इससे लगभग तत्काल, वैश्विक और एक से अधिक मार्गों वाला आच्छादन मिलता है। भारत इस तंत्र में भाग लेता है और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन तथा भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण देश के भू-केंद्र ढाँचे से जुड़े हैं।
मौन चेतावनी: विमान के ट्रांसपोंडर कोड
विमानन में एक संकट माध्यम ऐसा है जिसमें कोई शब्द नहीं बोला जाता। हर विमान का ट्रांसपोंडर वायु यातायात नियंत्रण रडार को चार अंकों का संकेत भेजता है, जिसे स्क्वॉक कोड (squawk code) कहा जाता है। तीन कोड दुनिया भर में आपात स्थिति के लिए सुरक्षित हैं। अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (International Civil Aviation Organization या ICAO) के अनुबंध 10 में ये निर्धारित हैं और 1960 के दशक से नहीं बदले। 7700 सामान्य आपात स्थिति बताता है, जैसे इंजन बंद होना, आग या चिकित्सा संकट, और नियंत्रक की स्क्रीन पर विमान तुरंत अलग दिखता है। 7600 रेडियो संचार विफलता बताता है। नियंत्रक समझते हैं कि दल बोल नहीं सकता, लेकिन विमान उड़ रहा है, इसलिए रास्ता खाली करते हैं। 7500 अवैध हस्तक्षेप या अपहरण का कोड है। इससे दल विमान कक्ष में हमलावर को बताए बिना जमीन पर मौन चेतावनी भेज सकता है।
यहाँ सटीक भेद जरूरी है। ट्रांसपोंडर कोड मे-डे पुकार नहीं है। इनमें से कोई स्वचालित इंजन चेतावनी या केवल तटरक्षक के मौसम की तय आवृत्ति भी नहीं है। ट्रांसपोंडर रडार के लिए मौन कूटबद्ध संकेत है, मे-डे आवाज में बोली गई पुकार है और संकेतक स्वचालित उपग्रह संदेश है। हर साधन अलग स्थिति के लिए है और प्रशिक्षित दल जरूरत पड़ने पर तीनों एक साथ उपयोग कर सकता है। ये पर्याय नहीं, एक-दूसरे को पूरा करने वाले स्तर हैं। यही इस पूरे विषय की सबसे उपयोगी समझ है।
मुख्य परीक्षा के उत्तर में कैसे लिखें?
यह विषय सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (GS पेपर 3) के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, आपदा प्रबंधन और आंतरिक सुरक्षा से जुड़ता है। आपात संचार तकनीक, उपग्रह सेवाएँ, नागरिक विमानन व नौवहन की सुरक्षा व्यवस्था या आपदा प्रतिक्रिया में कोस्पास-सारसैट की भूमिका पर प्रश्न में इसका उपयोग किया जा सकता है। उत्तर में केवल एक परिभाषा न लिखें। आवाज संकेत, रेडियो आवृत्ति, स्वचालित चेतावनी और उपग्रह का स्तरबद्ध तर्क दिखाइए।
उत्तर की रचना
मानवीय स्तर से बाहर की ओर बढ़ें। पहले बोले जाने वाले संकेतों का क्रम बताइए: सेक्युरिते, पैन-पैन और मे-डे। उनका अर्थ और मे-डे की सर्वोच्च प्राथमिकता समझाइए। फिर उन्हें ले जाने वाली आवृत्तियाँ लिखें: विमानन में 121.5 मेगाहर्ट्ज और समुद्र में चैनल 16। इसके बाद बताइए कि केवल आवाज कमजोर क्यों है और वैश्विक समुद्री संकट तंत्र तथा 406 मेगाहर्ट्ज संकेतक कोस्पास-सारसैट उपग्रहों से चेतावनी कैसे स्वचालित करते हैं। अंत में ट्रांसपोंडर कोड को विमानन का मौन स्तर बताइए। आवाज, आवृत्ति, स्वचालन, उपग्रह और ट्रांसपोंडर का यह क्रम वास्तविक व्यवस्था जैसा सुव्यवस्थित उत्तर देता है।
आम गलतियाँ
यह न लिखें कि एसओएस का अर्थ “हमारी आत्माएँ बचाओ” है। यह स्पष्टता के लिए चुना गया मोर्स क्रम …—… है, संक्षिप्त नाम नहीं। मे-डे को आवृत्ति या ट्रांसपोंडर कोड न कहें; यह बोला जाने वाला संकेत है। तीन कोड न मिलाएँ: 7700 आपात स्थिति, 7600 रेडियो विफलता और 7500 अपहरण। पैन-पैन और मे-डे को एक न मानें। तात्कालिकता और तुरंत जानलेवा संकट का अंतर ही इनका उद्देश्य है।
संक्षिप्त उत्तर-ढाँचा
बोले जाने वाले संकेत: सुरक्षा के लिए सेक्युरिते → फ्रांसीसी “पान” से तात्कालिकता वाला पैन-पैन → फ्रांसीसी “मे डे” से गंभीर और तुरंत खतरे वाला मे-डे, हर एक तीन बार → एसओएस मोर्स क्रम …—… है, संक्षिप्त नाम नहीं → आवृत्तियाँ: विमानन 121.5 मेगाहर्ट्ज, समुद्री आवाज चैनल 16 यानी 156.8 मेगाहर्ट्ज, लंबी दूरी 2182 किलोहर्ट्ज, अंकीय संदेश चैनल 70 → अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन के अभिसमय के अंतर्गत वैश्विक समुद्री संकट तंत्र → 406 मेगाहर्ट्ज ईपीआईआरबी, ईएलटी और पीएलबी संकेतक + कोस्पास-सारसैट की तीन उपग्रह पीढ़ियाँ, लगभग वास्तविक समय में स्थान और विशिष्ट पहचान → 7700, 7600 और 7500 विमानन के मौन आपात कोड।
आरेख कैसे बनाएँ?
सरल प्रवाह बनाएँ: ईपीआईआरबी या ईएलटी संकेतक → 406 मेगाहर्ट्ज संदेश → कोस्पास-सारसैट उपग्रह → स्थानीय भू-केंद्र → अभियान नियंत्रण केंद्र → बचाव समन्वय केंद्र → सहायता रवाना। साथ में प्राथमिकता की तीन सीढ़ियाँ बनाएँ: सेक्युरिते, पैन-पैन और मे-डे। दोनों चित्र मिलकर व्यवस्था का स्वचालित और मानवीय पक्ष दिखाते हैं।
संतुलित निष्कर्ष
आप लिख सकते हैं: “एक फ्रांसीसी वाक्य से उपग्रह समूह तक दुनिया की संकट-संचार व्यवस्था एक सिद्धांत पर बनी है: सहायता की पुकार बचावकर्मी तक तब भी पहुँचे जब कोई सुन न रहा हो, संदेश साफ न हो या बोलने के लिए कोई बचा ही न हो।”
आँकड़ों का सही उपयोग
कुछ आधार पर्याप्त हैं: तीन आवाज संकेत और उनके अर्थ, एसओएस क्रम …—…, मुख्य आवृत्तियाँ 121.5 मेगाहर्ट्ज, चैनल 16 और 406 मेगाहर्ट्ज तथा तीन ट्रांसपोंडर कोड 7700, 7600 और 7500। संख्याएँ अकेली न लिखें। इन्हें “अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन के वैश्विक तंत्र के अंतर्गत” या “अंतरराष्ट्रीय कोस्पास-सारसैट कार्यक्रम के माध्यम से” जैसे ढाँचे में रखें।
सामान्य प्रश्न
मे-डे और पैन-पैन में क्या अंतर है? मे-डे गंभीर और तुरंत जानलेवा संकट में तत्काल सहायता माँगने वाला संकेत है, जैसे आग, जहाज डूबना या समुद्र के ऊपर इंजन बंद होना। पैन-पैन गंभीर लेकिन अभी जानलेवा न बनी स्थिति के लिए है, जैसे नियंत्रण में मौजूद यांत्रिक खराबी या ऐसा घायल व्यक्ति जिसकी जान को खतरा नहीं है। दोनों तीन बार बोले जाते हैं। मे-डे से पूर्ण खोज और बचाव शुरू होता है तथा उसे सभी रेडियो यातायात पर प्राथमिकता मिलती है। पैन-पैन मदद या प्राथमिकता माँगता है, लेकिन हर बचाव संसाधन तुरंत नहीं भेजा जाता।
क्या एसओएस का अर्थ “हमारी आत्माएँ बचाओ” है? नहीं। एसओएस को 1908 में इसलिए अपनाया गया कि तीन बिंदु, तीन लंबी रेखाएँ और तीन बिंदु वाला लगातार मोर्स क्रम …—… साफ और भेजने में आसान है। अक्षर उस लय का सुविधाजनक नाम हैं। “हमारी आत्माएँ बचाओ” और “हमारा जहाज बचाओ” बाद की लोकप्रिय धारणाएँ हैं।
मुख्य आपात रेडियो आवृत्तियाँ कौन-सी हैं? नागरिक विमानन में 121.5 मेगाहर्ट्ज और सेना में 243.0 मेगाहर्ट्ज है। समुद्र में कम दूरी की आवाज के लिए चैनल 16 यानी 156.8 मेगाहर्ट्ज, लंबी दूरी के लिए 2182 किलोहर्ट्ज और स्वचालित अंकीय संदेश के लिए चैनल 70 है। आधुनिक संकेतक 406 मेगाहर्ट्ज पर उपग्रह को संदेश और अंतिम खोज के लिए 121.5 मेगाहर्ट्ज दिशा-पता संकेत भेजते हैं।
ट्रांसपोंडर कोड 7700, 7600 और 7500 का अर्थ क्या है? ये दुनिया भर के तीन विमानन आपात कोड हैं। 7700 किसी भी सामान्य आपात स्थिति, 7600 रेडियो संचार विफलता और 7500 अवैध हस्तक्षेप या अपहरण बताता है। ये अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन के अनुबंध 10 में निर्धारित हैं और 1960 के दशक से मानक हैं।
अभ्यास प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा बहुविकल्पीय प्रश्न
- समुद्री और विमानन संचार में “मे-डे” किसे कहते हैं?
(a) इंजन खराब होने पर आसपास के वाहनों को अपने-आप चेतावनी देने वाला तंत्र
(b) जीवन को गंभीर और तुरंत खतरा बताने वाला अंतरराष्ट्रीय आवाज संकट संकेत
(c) केवल तटरक्षक द्वारा मौसम चेतावनी के लिए उपयोग की जाने वाली तय आवृत्ति
(d) अपहरण बताने वाला कूटबद्ध ट्रांसपोंडर कोड
उत्तर: (b) मे-डे फ्रांसीसी “मे डे” से आया अंतरराष्ट्रीय आवाज संकट संकेत है। इसे तीन बार तब बोला जाता है जब जीवन गंभीर और तुरंत खतरे में हो। - संकट और तात्कालिकता संकेतों में कौन-सा युग्म सही है?
(a) पैन-पैन: जीवन को गंभीर और तुरंत खतरा
(b) सेक्युरिते: अपहरण जारी
(c) पैन-पैन: ऐसी गंभीर समस्या जिसमें जीवन को अभी तुरंत खतरा नहीं है
(d) मे-डे: नियमित सुरक्षा संदेश
उत्तर: (c) पैन-पैन गंभीर लेकिन अभी जानलेवा न बनी स्थिति का तात्कालिकता संकेत है। मे-डे गंभीर संकट और सेक्युरिते सुरक्षा संदेश के लिए है। - एसओएस को अंतरराष्ट्रीय संकट संकेत मुख्यतः क्यों चुना गया?
(a) इसका अर्थ “हमारी आत्माएँ बचाओ” है
(b) इसका मोर्स क्रम …—… साफ और भेजने में आसान है
(c) इसे केवल प्रशिक्षित नौसेना अधिकारी भेज सकते थे
(d) यह रेडियो पर बोला गया पहला शब्द था
उत्तर: (b) तीन बिंदु, तीन लंबी रेखाएँ और तीन बिंदु वाला लगातार मोर्स क्रम अपनी स्पष्टता के कारण चुना गया। लोकप्रिय वाक्य बाद में जोड़े गए। - खोज और बचाव से जुड़ा कोस्पास-सारसैट तंत्र मुख्यतः कैसे काम करता है?
(a) तटीय केंद्रों से चैनल 16 की निगरानी करके
(b) उपग्रहों से 406 मेगाहर्ट्ज संकेतक पकड़कर बचाव केंद्र तक संदेश पहुँचाकर
(c) सभी जहाजों को मौसम चेतावनी प्रसारित करके
(d) जमीन से विमान के ट्रांसपोंडर कोड देखकर
उत्तर: (b) यह उपग्रह-आधारित तंत्र ईपीआईआरबी, ईएलटी और पीएलबी के 406 मेगाहर्ट्ज संदेश पकड़कर पहचान व स्थान सहित बचाव समन्वय केंद्र तक पहुँचाता है। - विमानन में ट्रांसपोंडर कोड 7700, 7600 और 7500 क्रमशः क्या बताते हैं?
(a) सामान्य आपात स्थिति, रेडियो विफलता और अवैध हस्तक्षेप या अपहरण
(b) अपहरण, आग और चिकित्सा संकट
(c) रेडियो विफलता, सामान्य आपात स्थिति और मौसम खतरा
(d) कम ईंधन, इंजन विफलता और दिशा-ज्ञान खोना
उत्तर: (a) अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन के अनुबंध 10 के अनुसार 7700 सामान्य आपात स्थिति, 7600 संचार विफलता और 7500 अपहरण बताता है।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
- आवाज में बोले जाने वाले संकेतों से उपग्रह-आधारित संकेतकों तक विमानन और समुद्री संकट संचार की स्तरबद्ध व्यवस्था समझाइए। ये स्तर सहायता की पुकार को अधिक विश्वसनीय कैसे बनाते हैं? (15 अंक, 250 शब्द)
- वैश्विक समुद्री संकट और सुरक्षा तंत्र को “चेतावनी मनुष्य के कान पर निर्भर न रखने” के लिए बनाया गया था। समुद्र में जीवन सुरक्षा के लिए इसके उद्देश्य, घटक और महत्त्व पर चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
- कोस्पास-सारसैट उपग्रह तंत्र आपात संकेतक को कैसे पहचानता और उसका स्थान तय करता है? विशेष रूप से मध्यम कक्षा वाली नवीन पीढ़ी ने खोज और बचाव की गति व सटीकता कैसे बढ़ाई है? (15 अंक, 250 शब्द)
- आपात स्थिति घोषित करने के साधनों के रूप में आवाज संकट पुकार, अंकीय चयनात्मक पुकार और ट्रांसपोंडर कोड में अंतर बताइए। आधुनिक व्यवस्था किसी एक के बजाय तीनों पर निर्भर क्यों है? (10 अंक, 150 शब्द)
- आपात संचार तकनीक विज्ञान, आपदा प्रबंधन और आंतरिक सुरक्षा के संगम पर है। संकट संकेतों, स्थान संकेतकों और अपहरण चेतावनी कोड के संदर्भ में इस कथन की समीक्षा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)