UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

विनियमन में ढील और आर्थिक स्वतंत्रता: भारत का अगला बड़ा सुधार राज्यों के जिम्मे क्यों है

विनियमन में ढील का मतलब, इसके छह मुख्य क्षेत्र, जोखिम-आधारित विनियमन, अब तक हुए बदलाव, पर्यावरण और क्रॉस-सब्सिडी की ईमानदार सीमाएँ, और यह सुधार अब राज्यों और नगर निकायों का विषय क्यों बन चुका है।

Bundled files stacked in a government records office

भारत की विकास रणनीति चुपचाप बदल चुकी है। दुनिया भू-आर्थिक बिखराव के दौर में है, इसलिए अब निर्यात के भरोसे विकास नहीं टिकाया जा सकता और बोझ घरेलू इंजनों पर आ गया है। इन इंजनों में सबसे अहम है विनियमन में ढील (deregulation) और आर्थिक स्वतंत्रता। यह क्यों मायने रखता है, इसका जवाब सीधा हिसाब है — जायज़ कारोबार करने की लागत घटाइए, तो बिना नई पूँजी लगाए उत्पादन बढ़ जाता है।

विनियमन में ढील का मतलब है — सरकार के गैर-ज़रूरी नियंत्रण, मंज़ूरियाँ, लाइसेंस और नियम-पालन की शर्तें घटाना, ताकि जायज़ आर्थिक गतिविधि कम लागत, कम देरी और ज़्यादा निश्चितता के साथ हो सके। यह सुरक्षा-उपाय हटाने वाली ढील नहीं है। यह उन शर्तों को हटाना है जो अब किसी जीवित सार्वजनिक मक़सद को पूरा नहीं करतीं।

मुख्य क्षेत्र कौन-से हैं

कारोबारी क़ानूनों का सरलीकरण। दोहराव वाला नियम-पालन का बोझ घटाने और मंज़ूरियों को डिजिटल करने से कारोबार का समय और ख़र्च दोनों घटते हैं। ठोस औज़ार तीन हैं — छोटे अपराधों का अपराधमुक्तीकरण, कर प्रक्रियाओं का सरलीकरण, और सिंगल-विंडो क्लियरेंस व्यवस्था।

श्रम विनियमन का तर्कसंगत होना। भारत के श्रम ढाँचे में कई पंजीकरण, निरीक्षण और रिटर्न लगे हुए हैं। तर्कसंगत बनाने का मक़सद यह बोझ घटाना है, लेकिन मज़दूरों की ज़रूरी सुरक्षा बनाए रखते हुए। इसका वाहन श्रम संहिताएँ हैं।

पर्यावरण से जुड़े नियमों का पालन आसान बनाना। पारदर्शी और जोखिम-आधारित मंज़ूरियाँ पारिस्थितिक हितों की रक्षा भी कर सकती हैं और निवेश को ज़्यादा भरोसेमंद भी बना सकती हैं। यही वह क्षेत्र है जहाँ ढील का असली ख़तरा सबसे ज़्यादा है, और इसीलिए यहाँ सबसे ज़्यादा सावधानी चाहिए।

भूमि और भवन विनियमन में सुधार। भू-उपयोग परिवर्तन आसान करना, भवन उपनियमों में सुधार, और सेटबैक व पार्किंग मानदंडों को तर्कसंगत बनाना — ये सीधे तय करते हैं कि कोई बुनियादी ढाँचा या औद्योगिक परियोजना व्यवहार में बन भी पाएगी या नहीं।

उपयोगिता शुल्कों का तर्कसंगत होना। औद्योगिक बिजली दरों में अक्सर बड़ी क्रॉस-सब्सिडी छिपी होती है। इन्हें तर्कसंगत करने से प्रतिस्पर्धा-क्षमता सुधरती है, पर इससे वितरण का एक सवाल भी खड़ा होता है जिसे टालने के बजाय जवाब देना पड़ता है।

जोखिम-आधारित विनियमन (risk-based regulation)। यानी नियमों की सख़्ती हर कंपनी पर एक जैसी नहीं, बल्कि असली जोखिम के अनुपात में।

  • कम और मध्यम जोखिम वाले प्रतिष्ठानों के लिए अग्नि अनापत्ति प्रमाणपत्र की वैधता लंबी
  • उद्योग की जोखिम प्रोफ़ाइल के हिसाब से निरीक्षण की अलग-अलग बारंबारता
  • कम जोखिम वाले MSME के लिए पालन की आसान शर्तें

यह अब राज्यों का विषय क्यों है

इस विषय पर यही सबसे अहम ढाँचागत बात है, और अक्सर यही छूट जाती है।

कारोबार को असल में जो नियम बाँधते हैं, उनमें से ज़्यादातर भूमि, भवन, स्थानीय व्यापार, उपयोगिता सेवाओं और नगरीय शासन से जुड़े होते हैं। ये विषय संघ के नहीं, राज्य सरकारों और शहरी स्थानीय निकायों के विधायी या प्रशासनिक दायरे में आते हैं।

केंद्र अपने हिस्से में बहुत कुछ पहले ही सुधार चुका है — FDI नियम, कर प्रक्रिया, दिवाला क़ानून, कंपनी क़ानून का पालन। जो बचा है, अड़चन अब वहीं बैठी है। कोई कारख़ाना केंद्र की मंज़ूरी न मिलने से नहीं रुकता; वह भवन नक़्शे की स्वीकृति, अग्नि मंज़ूरी, भू-उपयोग परिवर्तन या बिजली कनेक्शन पर अटकता है।

नतीजा यह है कि ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस सुधार की अगली पीढ़ी राज्यों को आगे रहकर चलानी होगी, और उसकी नाप राष्ट्रीय स्तर पर नहीं, ज़िले और नगरपालिका के स्तर पर होनी चाहिए।

अब तक क्या बदल चुका है

  • सेवाओं में FDI उदारीकरण: बीमा, दूरसंचार, नागरिक उड्डयन और सिंगल-ब्रांड खुदरा में क्रमिक छूट, जिससे पूँजी आई, तकनीक आई और प्रतिस्पर्धा बढ़ी
  • उच्च शिक्षा: UGC विनियम 2023, जो प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर खोलने की अनुमति देते हैं
  • अपराधमुक्तीकरण: छोटे प्रक्रियागत कारोबारी अपराधों को आपराधिक से नागरिक दायित्व में बदलना
  • सिंगल-विंडो व्यवस्था और डिजिटल मंज़ूरियाँ — केंद्र और राज्य, दोनों स्तरों पर

ईमानदार सीमाएँ

इस विषय की किसी भी गंभीर चर्चा में तीन चेतावनियाँ शामिल होनी चाहिए।

पहली, पर्यावरण के मामले में ढील मुफ़्त नहीं पड़ती। तेज़ मंज़ूरी और कमज़ोर मंज़ूरी एक चीज़ नहीं हैं, और यह फ़र्क़ तभी टिकता है जब उसके पीछे की जोखिम श्रेणीबद्धता तकनीकी रूप से ठोस हो और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो।

दूसरी, बिजली में क्रॉस-सब्सिडी को तर्कसंगत करने का मतलब है लागत को उद्योग से हटाकर घरेलू और कृषि उपभोक्ताओं पर डाल देना — जब तक उसके साथ प्रत्यक्ष लाभ अंतरण न जोड़ा जाए। इसे सिर्फ़ प्रतिस्पर्धा-क्षमता का उपाय बताकर पेश करना यह छिपा देता है कि क़ीमत कौन चुका रहा है।

तीसरी, नियम-पालन का बोझ सब पर बराबर नहीं पड़ता। बड़ी कंपनी के पास इसे देखने वाला पूरा विभाग होता है; छोटी कंपनी के पास सिर्फ़ मालिक होता है। इसीलिए एक जैसी ढील का सबसे बड़ा आनुपातिक फ़ायदा MSME को मिलता है, और यही तर्क है कि सुधार की शुरुआत वहीं से होनी चाहिए।

आगे का रास्ता

  • राज्य स्तर पर विनियामक लागत सूचकांक प्रकाशित हों, ताकि सुधार नापा जा सके और राज्यों की आपस में तुलना हो सके।
  • जोखिम श्रेणीबद्धता को औपचारिक रूप से अपनाया जाए, प्रकाशित मानदंडों के साथ, ताकि पालन का हल्का बोझ किसी की मर्ज़ी से दी गई रियायत न लगे बल्कि बचाव-योग्य नीति बने।
  • अपराधमुक्तीकरण को राज्य क़ानूनों तक बढ़ाया जाए, क्योंकि तकनीकी उल्लंघनों के लिए बचे हुए ज़्यादातर आपराधिक प्रावधान वहीं बैठे हैं।
  • केंद्र की प्रोत्साहन राशि को नगरपालिका सुधार से जोड़ा जाए, क्योंकि सबसे ज़्यादा देरी शहर स्तर की मंज़ूरियों में होती है।
  • पर्यावरणीय मंज़ूरी में गति और मानक को अलग रखा जाए — समय-सीमा छोटी कीजिए, सीमा-मानक वैसे ही रखिए।

यहाँ आर्थिक स्वतंत्रता कोई वैचारिक पसंद नहीं है। जो अर्थव्यवस्था इस भरोसे पर नहीं चल सकती कि दुनिया उसका बनाया सामान और ज़्यादा ख़रीदेगी, उसके लिए यह विकास का सबसे सस्ता उपलब्ध स्रोत है।

सामान्य प्रश्न

विनियमन में ढील (deregulation) क्या है?

विनियमन में ढील का मतलब है सरकार के गैर-ज़रूरी नियंत्रण, मंज़ूरियाँ, लाइसेंस और नियम-पालन की शर्तें घटाना, ताकि लोग और कारोबार जायज़ आर्थिक गतिविधि कम लागत, कम देरी और ज़्यादा निश्चितता के साथ कर सकें। यह विनियमन का न होना नहीं है, बल्कि उस विनियमन को हटाना है जो अब किसी जीवित सार्वजनिक मक़सद को पूरा नहीं करता।

अभी विनियमन में ढील ही प्राथमिक सुधार क्यों है?

क्योंकि भू-आर्थिक बिखराव के कारण भारत विकास के लिए निर्यात पर उतना भरोसा नहीं कर सकता। जब बाहरी माँग पर भरोसा न हो, तो घरेलू विकास इंजनों को मज़बूत करना पड़ता है, और घरेलू उत्पादन बढ़ाने का सबसे सस्ता तरीक़ा यही है कि जायज़ कारोबार करने की लागत घटा दी जाए।

ढील के मुख्य क्षेत्र कौन-से हैं?

कारोबारी क़ानूनों का सरलीकरण, श्रम विनियमन को तर्कसंगत बनाना, पारिस्थितिक सुरक्षा कमज़ोर किए बिना पर्यावरण के नियमों का पालन आसान करना, भूमि और भवन विनियमन में सुधार, उपयोगिता शुल्कों और क्रॉस-सब्सिडी को तर्कसंगत करना, और जोखिम-आधारित विनियमन की ओर बढ़ना।

जोखिम-आधारित विनियमन क्या है?

हर कारोबार पर एक जैसी शर्तें थोपने के बजाय नियमों की सख़्ती को असली जोखिम के अनुपात में रखा जाता है। ज़्यादा जोखिम वाले उद्योगों पर कड़ी निगरानी रहती है, कम जोखिम वाले कारोबारों पर पालन का बोझ हल्का। उदाहरण — कम और मध्यम जोखिम वाले प्रतिष्ठानों के लिए अग्नि अनापत्ति प्रमाणपत्र की लंबी वैधता, जोखिम प्रोफ़ाइल के हिसाब से निरीक्षण की अलग-अलग बारंबारता, और कम जोखिम वाले MSME के लिए पालन की आसान शर्तें।

छोटे अपराधों का अपराधमुक्तीकरण क्या होता है?

यह छोटे प्रक्रियागत और तकनीकी कारोबारी उल्लंघनों को आपराधिक अपराध से हटाकर नागरिक जुर्माने में बदल देना है। किसी फ़ाइलिंग की चूक पर आपराधिक दायित्व असंगत है, और उसका मुख्य असर यही होता है कि उद्यमियों के लिए जोखिम की धारणा बढ़ जाती है और निरीक्षक के स्तर पर विवेकाधिकार पैदा हो जाता है।

सुधार की अगली पीढ़ी की अगुवाई राज्यों को क्यों करनी होगी?

क्योंकि भूमि, भवन, स्थानीय व्यापार, उपयोगिता सेवाओं और नगरीय शासन से जुड़े ज़्यादातर कारोबारी विनियम राज्यों और शहरी स्थानीय निकायों के विधायी या प्रशासनिक दायरे में आते हैं। केंद्र अपने हिस्से में बहुत कुछ सुधार चुका है, इसलिए आगे का फ़ायदा अब राज्य और नगरपालिका स्तर की कार्रवाई पर टिका है।

सेवाओं में FDI उदारीकरण का क्या योगदान रहा है?

बीमा, दूरसंचार, नागरिक उड्डयन और सिंगल-ब्रांड खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नियमों में क्रमिक छूट से उन क्षेत्रों में पूँजी आई, तकनीक हस्तांतरण हुआ और प्रतिस्पर्धा बढ़ी, जो पहले प्रतिबंधित थे।

UGC विनियम 2023 ने क्या बदला?

ये विनियम प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर स्थापित करने की अनुमति देते हैं। मंशा यह है कि प्रतिस्पर्धा बढ़े, गुणवत्ता सुधरे और भारत वैश्विक शिक्षा गंतव्य के रूप में मज़बूत हो। यह विनिर्माण नहीं, बल्कि एक सेवा क्षेत्र पर लागू की गई ढील का उदाहरण है।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

  1. विनियमन में ढील की सबसे सही परिभाषा क्या है?
    (a) आर्थिक गतिविधि से राज्य का पूरी तरह हट जाना
    (b) गैर-ज़रूरी नियंत्रण, मंज़ूरियाँ और नियम-पालन की शर्तें घटाना
    (c) सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजीकरण
    (d) सभी पर्यावरणीय सुरक्षा-उपाय हटा देना
    उत्तर: (b) ढील का निशाना गैर-ज़रूरी नियंत्रण और नियम-पालन की लागत है, विनियमन का अस्तित्व नहीं।
  2. जोखिम-आधारित विनियमन का अर्थ है कि
    (a) हर कारोबार पर एक जैसी नियम-पालन शर्तें लगती हैं
    (b) नियमों की सख़्ती असली जोखिम के अनुपात में होती है
    (c) सिर्फ़ बड़ी कंपनियों का निरीक्षण होता है
    (d) MSME के लिए नियम मानना मर्ज़ी की बात है
    उत्तर: (b) ज़्यादा जोखिम वाले उद्योगों पर कड़ी निगरानी रहती है, जबकि कम जोखिम वाले कारोबारों पर पालन का बोझ हल्का होता है।
  3. UGC विनियम, 2023 किससे जुड़े हैं?
    (a) केवल ऑनलाइन डिग्री कार्यक्रमों से
    (b) विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में परिसर खोलने से
    (c) निजी विश्वविद्यालयों में आरक्षण से
    (d) सभी विश्वविद्यालयों के लिए एक साझा प्रवेश परीक्षा से
    उत्तर: (b) ये विनियम प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर स्थापित करने की अनुमति देते हैं।
  4. भूमि, भवन, स्थानीय व्यापार और उपयोगिता सेवाओं से जुड़े ज़्यादातर विनियम किसके दायरे में आते हैं?
    (a) केवल संघ सरकार के
    (b) राज्य सरकारों और शहरी स्थानीय निकायों के
    (c) न्यायपालिका के
    (d) SEBI जैसे वैधानिक नियामकों के
    उत्तर: (b) ये विषय बड़े पैमाने पर राज्य और नगरपालिका के हैं, इसीलिए ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस में आगे का फ़ायदा राज्यों की अगुवाई से ही आएगा।
  5. कारोबारी क़ानूनों में छोटे अपराधों के अपराधमुक्तीकरण का मुख्य मक़सद क्या है?
    (a) जुर्माने की राशि बढ़ाना
    (b) तकनीकी उल्लंघनों पर आपराधिक दायित्व की जगह नागरिक जुर्माना लाना
    (c) सभी दंड हटा देना
    (d) क़ानून लागू कराने का काम पुलिस को सौंप देना
    उत्तर: (b) प्रक्रियागत उल्लंघनों को नागरिक जुर्माने में बदलने से असंगत आपराधिक जोखिम हटता है और मर्ज़ी से क़ानून लागू करने की गुंजाइश घटती है।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. निर्यात-आधारित विकास की सीमाएँ देखते हुए, विनियमन में ढील भारत का सबसे अहम घरेलू सुधार है। समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)
  2. जोखिम-आधारित विनियमन नियमों के पालन और सुरक्षा, दोनों के नतीजे सुधारता है। भारतीय विनियामक व्यवहार के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
  3. ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस सुधार की अगली पीढ़ी की अगुवाई राज्य सरकारों को करनी होगी। इसके संवैधानिक और प्रशासनिक कारणों का परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)
  4. भारतीय कारोबारी क़ानून में छोटे प्रक्रियागत अपराधों को अपराधमुक्त करने के पक्ष में तर्क पर चर्चा कीजिए। (150 शब्द)
  5. पर्यावरणीय क्षेत्र में ढील का ख़तरा यह है कि विकास के बदले पारिस्थितिक सुरक्षा-उपाय सौदे में चले जाएँ। इस तनाव को कैसे संभाला जाना चाहिए? (150 शब्द)

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

UPSC Content Team Head · Web Developer & Designer · AnantamIAS

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