UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

हिंदी संधि: स्वर, व्यंजन और विसर्ग संधि के नियम

संधि के तीनों प्रकार — स्वर, व्यंजन और विसर्ग — के नियम, सूत्र, अपवाद, उदाहरण और संधि-विच्छेद अभ्यास, परीक्षा-दृष्टि से।

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संधि का अर्थ है ‘मेल’। जब बोलते या लिखते समय दो वर्ण इतने निकट आ जाते हैं कि उनके परस्पर प्रभाव से ध्वनि में परिवर्तन (विकार) हो जाता है, तो इस मेल को संधि कहते हैं — जैसे विद्या + आलय = विद्यालय। इसके विपरीत किसी संधि-शब्द को तोड़कर उसके मूल खंडों में पृथक् करना संधि-विच्छेद कहलाता है — विद्यालय = विद्या + आलय। संधि मुख्यतः तत्सम (संस्कृतमूलक) शब्दों में मिलती है।

अनिवार्य हिंदी में संधि एक ऐसा विषय है जहाँ नियम निश्चित हैं और उत्तर भी एक ही होता है, इसलिए ठीक अभ्यास से इसमें पूरे अंक मिल सकते हैं। प्रश्न प्रायः दो रूपों में आते हैं — “संधि कीजिए” और “संधि-विच्छेद कीजिए” — तथा कभी-कभी “संधि का नाम बताइए”। नीचे तीनों प्रकार की संधि — स्वर, व्यंजन और विसर्ग — को सूत्र, अपवाद और भरपूर उदाहरणों के साथ समझाया गया है।

संधि के प्रकार: एक दृष्टि में

जिस वर्ण के मेल से विकार होता है, उसी के अनुसार संधि का प्रकार तय होता है। मेल करने वाले पहले शब्द के अंतिम वर्ण और दूसरे शब्द के पहले वर्ण को देखकर प्रकार पहचानें।

प्रकारकिसका मेलसंक्षिप्त उदाहरण
स्वर संधिस्वर + स्वरविद्या + आलय = विद्यालय
व्यंजन संधिव्यंजन + व्यंजन या व्यंजन + स्वरसत् + जन = सज्जन
विसर्ग संधिविसर्ग (ः) + स्वर/व्यंजनमनः + रथ = मनोरथ

इनमें स्वर संधि सबसे विस्तृत है और इसी से सर्वाधिक प्रश्न बनते हैं; इसे आगे पाँच भेदों में बाँटा गया है।

स्वर संधि और उसके पाँच भेद

जब दो स्वरों के परस्पर मेल से विकार उत्पन्न होता है, तो उसे स्वर संधि कहते हैं। इसके पाँच भेद हैं — दीर्घ, गुण, वृद्धि, यण् और अयादि। नीचे प्रत्येक का सूत्र अलग शीर्षक में, उदाहरण-सहित दिया गया है।

भेदसूत्र (संक्षेप)
दीर्घ संधिसवर्ण (समान) स्वर मिलकर अपना दीर्घ बनाते हैं
गुण संधिअ/आ + इ/ई/उ/ऊ/ऋ → ए/ओ/अर्
वृद्धि संधिअ/आ + ए/ऐ/ओ/औ → ऐ/औ
यण् संधिइ/ई, उ/ऊ, ऋ के बाद भिन्न स्वर → य्/व्/र्
अयादि संधिए/ऐ/ओ/औ के बाद कोई स्वर → अय्/आय्/अव्/आव्

1. दीर्घ संधि

नियम — दो सवर्ण (समान) स्वर — चाहे ह्रस्व हों या दीर्घ — पास आएँ तो दोनों मिलकर उसी का दीर्घ रूप बना देते हैं (अ/आ + अ/आ = आ; इ/ई + इ/ई = ई; उ/ऊ + उ/ऊ = ऊ)।

संधिविच्छेद
विद्या + आलय = विद्यालयअ-वर्ग का दीर्घ आ
देव + आलय = देवालयअ + आ = आ
मुनि + इंद्र = मुनींद्रइ + इ = ई
गिरि + ईश = गिरीशइ + ई = ई
भानु + उदय = भानूदयउ + उ = ऊ
सु + उक्ति = सूक्तिउ + उ = ऊ

2. गुण संधि

नियम — अ/आ के बाद इ/ई आए तो , उ/ऊ आए तो , और आए तो अर् हो जाता है।

संधिविच्छेद
नर + इंद्र = नरेंद्रअ + इ = ए
महा + ईश = महेशआ + ई = ए
सूर्य + उदय = सूर्योदयअ + उ = ओ
महा + उत्सव = महोत्सवआ + उ = ओ
देव + ऋषि = देवर्षिअ + ऋ = अर्
महा + ऋषि = महर्षिआ + ऋ = अर्

3. वृद्धि संधि

नियम — अ/आ के बाद ए/ऐ आए तो , और ओ/औ आए तो हो जाता है।

संधिविच्छेद
एक + एक = एकैकअ + ए = ऐ
मत + ऐक्य = मतैक्यअ + ऐ = ऐ
सदा + एव = सदैवआ + ए = ऐ
महा + औषध = महौषधआ + औ = औ
परम + औषध = परमौषधअ + औ = औ
जल + ओघ = जलौघअ + ओ = औ

4. यण् संधि

नियम — इ/ई, उ/ऊ, ऋ के बाद कोई भिन्न (असवर्ण) स्वर आए तो इ/ई → य्, उ/ऊ → व्, और ऋ → र् में बदल जाता है।

संधिविच्छेद
यदि + अपि = यद्यपिइ + अ → य्
अति + आचार = अत्याचारइ + आ → य्
इति + आदि = इत्यादिइ + आ → य्
सु + आगत = स्वागतउ + आ → व्
अनु + अय = अन्वयउ + अ → व्
पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञाऋ + आ → र्

5. अयादि संधि

नियम — ए, ऐ, ओ, औ के बाद कोई भिन्न स्वर आए तो ए → अय्, ऐ → आय्, ओ → अव्, और औ → आव् हो जाता है।

संधिविच्छेद
ने + अन = नयनए + अ → अय्
शे + अन = शयनए + अ → अय्
गै + अक = गायकऐ + अ → आय्
नै + अक = नायकऐ + अ → आय्
पो + अन = पवनओ + अ → अव्
पौ + अक = पावकऔ + अ → आव्

व्यंजन संधि

जब किसी व्यंजन का मेल किसी दूसरे व्यंजन या स्वर से होने पर विकार उत्पन्न होता है, तो उसे व्यंजन संधि कहते हैं। इसके मुख्य नियम नीचे उदाहरणों सहित दिए गए हैं।

  • वर्ग के पहले वर्ण का तीसरे में परिवर्तन — क्, च्, ट्, त्, प् के आगे किसी वर्ग का तीसरा/चौथा वर्ण अथवा य, र, ल, व, ह आए तो वे क्रमशः ग्, ज्, ड्, द्, ब् हो जाते हैं।
  • दिक् + गज = दिग्गज; वाक् + ईश = वागीश; अच् + अंत = अजंत; सत् + आनंद = सदानंद; अप् + ज = अब्ज।
  • त् का च् में परिवर्तन — त् के आगे च/छ आए तो त् → च्।
  • उत् + चारण = उच्चारण; सत् + चित = सच्चित; शरत् + चंद्र = शरच्चंद्र।
  • त् का ज् में परिवर्तन — त् के आगे ज/झ आए तो त् → ज्।
  • सत् + जन = सज्जन; उत् + ज्वल = उज्ज्वल; जगत् + जननी = जगज्जननी।
  • त् का ल् में परिवर्तन — त् के आगे ल आए तो त् → ल्।
  • उत् + लास = उल्लास; तत् + लीन = तल्लीन; विद्युत् + लता = विद्युल्लता।
  • त् का पंचमाक्षर में परिवर्तन — त् के आगे न/म आए तो त् → न्।
  • उत् + नति = उन्नति; जगत् + नाथ = जगन्नाथ; तत् + मय = तन्मय।
  • म् का पंचमाक्षर/अनुस्वार में परिवर्तन — म् के आगे किसी वर्ग का व्यंजन आए तो म् उसी वर्ग के पंचमाक्षर (अनुस्वार) में बदल जाता है।
  • सम् + तोष = संतोष; सम् + गम = संगम; सम् + कल्प = संकल्प; सम् + पूर्ण = संपूर्ण।
  • स का ष में परिवर्तन (षत्व विधान) — अ/आ से भिन्न स्वर अथवा क्, र के बाद आने वाला स प्रायः ष हो जाता है।
  • अभि + सेक = अभिषेक; नि + सिद्ध = निषिद्ध; वि + सम = विषम।

विसर्ग संधि

विसर्ग (ः) के बाद कोई स्वर या व्यंजन आने पर जो विकार होता है, उसे विसर्ग संधि कहते हैं। नियम विसर्ग के पहले के स्वर तथा बाद के वर्ण — दोनों पर निर्भर करते हैं।

  • विसर्ग के पहले हो और बाद में सघोष व्यंजन या स्वर हो → विसर्ग का (अ सहित ‘ओ’)।
  • मनः + रथ = मनोरथ; मनः + बल = मनोबल; तपः + वन = तपोवन; अधः + गति = अधोगति।
  • विसर्ग के पहले अ/आ से भिन्न स्वर हो और बाद में सघोष व्यंजन/स्वर हो → विसर्ग का र्
  • निः + आहार = निराहार; दुः + उपयोग = दुरुपयोग; निः + झर = निर्झर; आशीः + वाद = आशीर्वाद।
  • विसर्ग के बाद च/छ/श हो → विसर्ग का श्
  • निः + छल = निश्छल; दुः + शासन = दुश्शासन; निः + चय = निश्चय।
  • विसर्ग के बाद ट/ठ/ष हो → विसर्ग का ष्
  • निः + ठुर = निष्ठुर; धनुः + टंकार = धनुष्टंकार।
  • विसर्ग के बाद त/थ/स हो → विसर्ग का स्
  • नमः + ते = नमस्ते; निः + संतान = निस्संतान; मनः + ताप = मनस्ताप।
  • विसर्ग के पहले अ/आ हो और बाद में क/ख/प/फ हो → विसर्ग यथावत् रहता है।
  • प्रातः + काल = प्रातःकाल; अंतः + करण = अंतःकरण; पयः + पान = पयःपान।

सामान्य अशुद्धियाँ और परीक्षा-दृष्टि

  • गुण संधि में ‘अ + इ = ए’ के स्थान पर ‘ऐ’ लिख देना (नरेंद्र को ‘नरैंद्र’)।
  • वृद्धि और गुण संधि का भ्रम — ‘सदैव’ (वृद्धि) को गुण मान लेना।
  • यण् संधि में ‘इ’ को ‘य्’ के बजाय पूर्ण ‘य’ कर देना (‘अत्याचार’ को ‘अतियाचार’)।
  • विसर्ग संधि में मूल विसर्ग का लोप — ‘मनः + रथ’ का विच्छेद ‘मन + रथ’ लिख देना; सही ‘मनः + रथ’ है।
  • व्यंजन संधि में ‘त्’ को बिना बदले रखना — ‘सद्जन’ अशुद्ध, ‘सज्जन’ शुद्ध।
  • संधि-विच्छेद में पुनः अशुद्ध जोड़ — ‘महेश’ का विच्छेद ‘मह + ईश’ नहीं, ‘महा + ईश’ है।

परीक्षा में सुझाव — पहले शब्द के अंतिम वर्ण और दूसरे शब्द के पहले वर्ण को पहचानें; स्वर+स्वर हो तो स्वर संधि (फिर पाँच भेदों में से सूत्र लगाएँ), विसर्ग दिखे तो विसर्ग संधि, अन्यथा व्यंजन संधि।

अभ्यास प्रश्न

(अ) संधि कीजिए —

  1. देव + आलय
  2. सूर्य + उदय
  3. महा + औषध
  4. अति + आचार
  5. पौ + अक
  6. सत् + जन
  7. सम् + तोष
  8. मनः + रथ
  9. निः + छल
  10. नमः + ते

उत्तर: 1. देवालय (दीर्घ), 2. सूर्योदय (गुण), 3. महौषध (वृद्धि), 4. अत्याचार (यण्), 5. पावक (अयादि), 6. सज्जन (व्यंजन), 7. संतोष (व्यंजन), 8. मनोरथ (विसर्ग), 9. निश्छल (विसर्ग), 10. नमस्ते (विसर्ग)।

(ब) संधि-विच्छेद कीजिए —

  1. महेश
  2. गायक
  3. उच्चारण
  4. निराहार
  5. विद्यालय
  6. नयन
  7. उज्ज्वल
  8. प्रातःकाल

उत्तर: 11. महा + ईश (गुण), 12. गै + अक (अयादि), 13. उत् + चारण (व्यंजन), 14. निः + आहार (विसर्ग), 15. विद्या + आलय (दीर्घ), 16. ने + अन (अयादि), 17. उत् + ज्वल (व्यंजन), 18. प्रातः + काल (विसर्ग, यथावत्)।

(स) संधि का नाम/भेद बताइए —

  1. ‘सम् + कल्प = संकल्प’ में कौन-सी संधि है?
  2. ‘देवर्षि’ में कौन-सी संधि और कौन-सा भेद है?

उत्तर: 19. व्यंजन संधि (म् → अनुस्वार)। 20. स्वर संधि — गुण भेद (देव + ऋषि; अ + ऋ = अर्)।

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

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