UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

हिंदी उपसर्ग और प्रत्यय: शब्द-रचना के नियम और उदाहरण

उपसर्ग और प्रत्यय से शब्द-रचना के नियम — संस्कृत, हिंदी व अरबी-फ़ारसी उपसर्ग और कृत्, तद्धित तथा स्त्री प्रत्यय की बड़ी तालिकाएँ एवं अभ्यास।

हिंदी उपसर्ग और प्रत्यय: शब्द-रचना के नियम और उदाहरण

शब्द किसी मूल अर्थ-इकाई से बनते हैं, परंतु उन्हें नया रूप और नया अर्थ देने के दो प्रमुख साधन हैं — उपसर्ग और प्रत्यय। जो अंश शब्द के आरंभ में जुड़कर उसका अर्थ बदल दे, उसे उपसर्ग कहते हैं; जैसे ‘हार’ से ‘प्रहार’, ‘आहार’, ‘विहार’, ‘संहार’। और जो अंश शब्द के अंत में जुड़कर नया शब्द बनाए, उसे प्रत्यय कहते हैं; जैसे ‘पढ़’ से ‘पढ़ाई’, ‘लिख’ से ‘लिखावट’, ‘सुंदर’ से ‘सुंदरता’। ये दोनों ही स्वतंत्र अर्थ नहीं रखते, परंतु शब्द से जुड़ते ही अर्थ की दिशा मोड़ देते हैं।

अनिवार्य हिंदी की परीक्षा-दृष्टि से यह अध्याय बहुत फलदायी है, क्योंकि प्रश्न प्रायः सीधे होते हैं — दिए गए शब्द में उपसर्ग/प्रत्यय अलग कीजिए, किसी उपसर्ग या प्रत्यय से शब्द बनाइए, अथवा कृत् और तद्धित में भेद कीजिए। उपसर्ग और प्रत्यय को पहचानने का अभ्यास हो जाने पर शब्द-भंडार स्वतः समृद्ध होता है और वर्तनी की अनेक त्रुटियाँ भी दूर हो जाती हैं।

उपसर्ग — परिभाषा और स्रोत

जो शब्दांश किसी शब्द के आरंभ में जुड़कर उसके अर्थ में विशेषता ला दे, उसे उपसर्ग (उप = समीप, सर्ग = सृष्टि करना) कहते हैं। हिंदी में उपसर्ग तीन स्रोतों से आए हैं — (1) संस्कृत (तत्सम) उपसर्ग, (2) हिंदी (तद्भव/देशज) उपसर्ग, और (3) अरबी-फ़ारसी एवं उर्दू उपसर्ग। प्रयोग में आने पर ये मूल शब्द से इतने घुल-मिल जाते हैं कि कभी-कभी एक ही शब्द में दो उपसर्ग भी लग जाते हैं, जैसे ‘अन्-अधि-कार’ → ‘अनधिकार’।

संस्कृत (तत्सम) उपसर्ग

संस्कृत के लगभग बाईस उपसर्ग हिंदी में सर्वाधिक प्रयुक्त होते हैं। नीचे उनके अर्थ और उदाहरण दिए गए हैं।

उपसर्गअर्थउदाहरण
अतिअधिक, ऊपरअत्यधिक, अतिवृष्टि, अत्याचार
अधिऊपर, श्रेष्ठअध्यक्ष, अधिकार, अधिपति
अनुपीछे, समानअनुसरण, अनुज, अनुवाद
अपबुरा, हीनअपयश, अपमान, अपकार
अभिसामने, ओरअभिमुख, अभिनय, अभियान
अवनीचे, हीनअवनति, अवतार, अवगुण
तक, ओरआगमन, आजीवन, आहार
उत् / उद्ऊपर, उत्कर्षउत्थान, उद्गम, उन्नति
उपसमीप, गौणउपकार, उपवन, उपमंत्री
दुर् / दुस्बुरा, कठिनदुराचार, दुर्बल, दुष्कर्म
निनीचे, अभावनिवास, निबंध, निवारण
निर् / निस्बिना, बाहरनिराहार, निर्जल, निष्फल
पराउलटा, पीछेपराजय, पराभव, पराक्रम
परिचारों ओरपरिक्रमा, परिवार, परिणाम
प्रआगे, अधिकप्रगति, प्रहार, प्रबल
प्रतिविरुद्ध, हरप्रतिदिन, प्रतिकूल, प्रत्युत्तर
विविशेष, भिन्नविज्ञान, विदेश, विकास
सम्पूर्ण, साथसंस्कार, संगम, संतोष
सुअच्छा, सरलसुगम, सुपुत्र, स्वागत

हिंदी (तद्भव/देशज) उपसर्ग

ये उपसर्ग हिंदी ने अपने आप विकसित किए हैं अथवा संस्कृत से बिगड़कर आए हैं। इनका रूप सरल और बोलचाल का है।

उपसर्गअर्थउदाहरण
अ / अनअभाव, नहींअछूता, अनपढ़, अनबन
क / कुबुरा, हीनकपूत, कुचाल, कुढंग
हीन, अभावऔगुन, औघट, औसर
भरपूराभरपेट, भरपूर, भरसक
बिनबिनाबिनब्याहा, बिनबुलाया, बिनदेखा
दुदो, बुरादुगुना, दुधारी, दुलारा
निअभाव, बिनानिडर, निहत्था, निकम्मा
सहितसपूत, सबल, सजीव
उनएक कमउनतीस, उनचास, उनसठ

अरबी-फ़ारसी एवं उर्दू उपसर्ग

मुग़ल-काल से हिंदी में अरबी-फ़ारसी शब्द बड़ी संख्या में आए और उनके साथ अनेक उपसर्ग भी। ये आज भी प्रशासनिक और व्यावहारिक हिंदी में खूब चलते हैं।

उपसर्गअर्थउदाहरण
बासहित, के साथबाकायदा, बाइज़्ज़त, बामौक़ा
बेबिनाबेईमान, बेकार, बेरहम
बदबुराबदनाम, बदचलन, बदसूरत
लाबिना, रहितलाइलाज, लापरवाह, लावारिस
बिलाबिनाबिलावजह, बिलाशक, बिलानागा
कमथोड़ा, हीनकमज़ोर, कमबख़्त, कमउम्र
ख़ुशअच्छाख़ुशनसीब, ख़ुशबू, ख़ुशमिज़ाज
गैरभिन्न, नहींगैरहाज़िर, गैरकानूनी, गैरमुनासिब
दरमें, अंदरदरअसल, दरमियान, दरकार
नाअभाव, नहींनाराज़, नालायक, नासमझ
हमसाथ, समानहमदर्द, हमराह, हमउम्र
हरप्रत्येकहररोज़, हरदम, हरएक
सरमुख्य, ऊपरसरपंच, सरकार, सरताज

प्रत्यय — परिभाषा और प्रकार

जो शब्दांश किसी शब्द (या धातु) के अंत में जुड़कर उसका अर्थ या व्याकरणिक श्रेणी बदल दे, उसे प्रत्यय (प्रति = साथ, अय = चलने वाला) कहते हैं। हिंदी में प्रत्यय मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं —

  1. कृत् प्रत्यय — जो क्रिया (धातु) के अंत में जुड़ते हैं और संज्ञा/विशेषण बनाते हैं। इनसे बने शब्द ‘कृदंत’ कहलाते हैं। जैसे — पढ़ + आई = पढ़ाई; लिख + आवट = लिखावट।
  2. तद्धित प्रत्यय — जो संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण के अंत में जुड़ते हैं और नया शब्द बनाते हैं। इनसे बने शब्द ‘तद्धितांत’ कहलाते हैं। जैसे — मानव + ता = मानवता; लोहा + आर = लोहार।

इनके अतिरिक्त स्त्रीलिंग बनाने वाले स्त्री प्रत्यय भी एक उपयोगी वर्ग हैं। नीचे तीनों की विस्तृत तालिकाएँ दी गई हैं।

कृत् प्रत्यय (धातु + प्रत्यय)

प्रत्ययधातु/शब्दनिर्मित शब्द
-अनले, गा, मिललेन, गायन, मिलन
-नापढ़, लिख, खापढ़ना, लिखना, खाना
-आईपढ़, चढ़, सिलपढ़ाई, चढ़ाई, सिलाई
-आवटलिख, सज, बनालिखावट, सजावट, बनावट
-आहटघबरा, चिल्ला, मुस्कुराघबराहट, चिल्लाहट, मुस्कुराहट
-आवबह, चढ़, घुमबहाव, चढ़ाव, घुमाव
-आकतैर, लड़, पैरतैराक, लड़ाक, पैराक
-ऊउड़, बिक, टिकउड़ाऊ, बिकाऊ, टिकाऊ
-आकाधम, भभ, फटधमाका, भभका, फटका
-ताबह, डूब, चलबहता, डूबता, चलता
-याबीत, खा, सीबीता, खाया, सीया
-वैयागा, खे, पढ़गवैया, खिवैया, पढ़वैया
-हारराख, होन, खेवराखनहार, होनहार, खेवनहार
-कपाठ, लेख, गायपाठक, लेखक, गायक
-तीखा, चढ़, बचखाती, चढ़ती, बचती

तद्धित प्रत्यय (संज्ञा/विशेषण + प्रत्यय)

प्रत्ययमूल शब्दनिर्मित शब्द
-तामानव, सुंदर, मित्रमानवता, सुंदरता, मित्रता
-त्वगुरु, मनुष्य, प्रभुगुरुत्व, मनुष्यत्व, प्रभुत्व
-पनबच्चा, अपना, लड़काबचपन, अपनापन, लड़कपन
-आईभला, चतुर, मीठाभलाई, चतुराई, मिठाई
-इकसमाज, धर्म, इतिहाससामाजिक, धार्मिक, ऐतिहासिक
-ईधन, गुण, सुखधनी, गुणी, सुखी
-वालादूध, टोपी, गाड़ीदूधवाला, टोपीवाला, गाड़ीवाला
-हारलकड़ी, सोना (स्वर्ण)लकड़हारा, सुनार
-आरलोहा, सोना, कुम्भलोहार, सुनार, कुम्हार
-एराचाचा, मामा, साँझचचेरा, ममेरा, सँझेरा
-इयाखाट, डिब्बा, गठखटिया, डिबिया, गठिया
-आलूदया, कृपा, श्रद्धादयालु, कृपालु, श्रद्धालु
-मानबुद्धि, श्री, शक्तिबुद्धिमान, श्रीमान, शक्तिमान
-वानधन, बल, गुणधनवान, बलवान, गुणवान
-इष्ठगुरु, बल, श्रेष्ठगरिष्ठ, बलिष्ठ, श्रेष्ठ
-त्रअन्य, सर्व, एकअन्यत्र, सर्वत्र, एकत्र

स्त्री प्रत्यय (स्त्रीलिंग बनाने वाले)

प्रत्ययपुल्लिंग शब्दस्त्रीलिंग शब्द
-ईलड़का, घोड़ा, बकरालड़की, घोड़ी, बकरी
-इनधोबी, माली, तेलीधोबिन, मालिन, तेलिन
-इनी / -नीहाथी, मोर, शेरहथिनी, मोरनी, शेरनी
-आनीसेठ, देवर, जेठसेठानी, देवरानी, जेठानी
-इयाबूढ़ा, बेटा, डिब्बाबुढ़िया, बिटिया, डिबिया
-आइनठाकुर, पंडित, बाबूठकुराइन, पंडिताइन, बबुआइन
-काबालक, मूषक, अध्यापकबालिका, मूषिका, अध्यापिका

उपसर्ग बनाम प्रत्यय और सामान्य अशुद्धियाँ

मूल अंतर सरल है — उपसर्ग शब्द के आगे लगता है, प्रत्यय पीछे। ‘हार’ शब्द को देखें — आगे ‘प्र’ लगने से ‘प्रहार’ (उपसर्ग) बनता है; धातु ‘राख’ के पीछे ‘-हार’ लगने से ‘राखनहार’ (प्रत्यय) बनता है। परीक्षा में सावधानी के कुछ बिंदु —

  • संधि-परिवर्तन को पहचानें — उपसर्ग जुड़ते समय प्रायः ध्वनि बदलती है, जैसे ‘निर् + रस = निरस’ नहीं बल्कि ‘नीरस’, ‘दुर् + गति = दुर्गति’, ‘सम् + तोष = संतोष’। मूल उपसर्ग पहचानने के लिए संधि खोलनी पड़ती है।
  • कृत् और तद्धित का भेद — यदि प्रत्यय क्रिया/धातु से जुड़ा है तो कृत् (पढ़ाई, लिखावट); यदि संज्ञा/विशेषण से जुड़ा है तो तद्धित (मानवता, धनी)।
  • दो उपसर्ग एक साथ — कुछ शब्दों में दो उपसर्ग होते हैं, जैसे ‘अन् + आ + गत = अनागत’, ‘सु + प्र + सिद्ध = सुप्रसिद्ध’; दोनों अलग करने का अभ्यास करें।
  • स्रोत-भ्रम से बचें — ‘बेईमान’ में ‘बे’ फ़ारसी उपसर्ग है, संस्कृत नहीं; स्रोत पूछे जाने पर इसका ध्यान रखें।

अभ्यास प्रश्न

नीचे तीन भागों में अभ्यास दिया गया है। उत्तर हर भाग के अंत में दिए गए हैं।

(क) निम्नलिखित शब्दों में से उपसर्ग अलग कीजिए तथा उसका स्रोत (संस्कृत/हिंदी/अरबी-फ़ारसी) बताइए —

  1. अपयश
  2. बेईमान
  3. निडर
  4. प्रतिदिन
  5. गैरहाज़िर
  6. सुपुत्र

(ख) निम्नलिखित शब्दों में से प्रत्यय अलग कीजिए तथा बताइए कि वह कृत् है या तद्धित —

  1. लिखावट
  2. मानवता
  3. गायक
  4. धार्मिक
  5. बुढ़िया
  6. होनहार

(ग) रिक्त स्थान भरिए / निर्देशानुसार शब्द बनाइए —

  1. ‘सम्’ उपसर्ग से दो शब्द बनाइए।
  2. ‘-पन’ तद्धित प्रत्यय से दो शब्द बनाइए।
  3. ‘लड़का’ का स्त्रीलिंग रूप और उसमें प्रयुक्त स्त्री प्रत्यय बताइए।

उत्तर

(क)

  1. अपयश = अप (उपसर्ग) + यश — संस्कृत।
  2. बेईमान = बे (उपसर्ग) + ईमान — अरबी-फ़ारसी।
  3. निडर = नि (उपसर्ग) + डर — हिंदी।
  4. प्रतिदिन = प्रति (उपसर्ग) + दिन — संस्कृत।
  5. गैरहाज़िर = गैर (उपसर्ग) + हाज़िर — अरबी-फ़ारसी।
  6. सुपुत्र = सु (उपसर्ग) + पुत्र — संस्कृत।

(ख)

  1. लिखावट = लिख (धातु) + आवट — कृत् प्रत्यय।
  2. मानवता = मानव (संज्ञा) + ता — तद्धित प्रत्यय।
  3. गायक = गा (धातु) + क — कृत् प्रत्यय।
  4. धार्मिक = धर्म (संज्ञा) + इक — तद्धित प्रत्यय।
  5. बुढ़िया = बूढ़ा + इया — तद्धित (यहाँ स्त्री/लघुता) प्रत्यय।
  6. होनहार = होन (धातु) + हार — कृत् प्रत्यय।

(ग)

  1. ‘सम्’ से — संगम, संतोष (अथवा संस्कार, संयम)।
  2. ‘-पन’ से — बचपन, अपनापन (अथवा लड़कपन, बड़प्पन)।
  3. ‘लड़का’ का स्त्रीलिंग — लड़की; प्रयुक्त स्त्री प्रत्यय — ‘-ई’।

निष्कर्ष

उपसर्ग और प्रत्यय हिंदी की शब्द-रचना के दो मुख्य औज़ार हैं — एक शब्द के आगे लगकर, दूसरा पीछे लगकर अर्थ को नई दिशा देता है। उपसर्गों को उनके तीन स्रोतों — संस्कृत, हिंदी और अरबी-फ़ारसी — के अनुसार समझ लेने पर पहचान सरल हो जाती है; और प्रत्ययों में कृत् (धातु से) तथा तद्धित (संज्ञा/विशेषण से) का भेद स्पष्ट रखने पर प्रश्न सहज हल हो जाते हैं। स्त्री प्रत्ययों की जानकारी लिंग-संबंधी प्रश्नों में भी सहायक है। दी गई तालिकाओं को बार-बार पढ़कर तथा नए शब्द स्वयं बनाकर अभ्यास करने से यह अध्याय अनिवार्य हिंदी में निश्चित अंक दिलाने वाला सिद्ध होता है।

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

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