शब्द किसी मूल अर्थ-इकाई से बनते हैं, परंतु उन्हें नया रूप और नया अर्थ देने के दो प्रमुख साधन हैं — उपसर्ग और प्रत्यय। जो अंश शब्द के आरंभ में जुड़कर उसका अर्थ बदल दे, उसे उपसर्ग कहते हैं; जैसे ‘हार’ से ‘प्रहार’, ‘आहार’, ‘विहार’, ‘संहार’। और जो अंश शब्द के अंत में जुड़कर नया शब्द बनाए, उसे प्रत्यय कहते हैं; जैसे ‘पढ़’ से ‘पढ़ाई’, ‘लिख’ से ‘लिखावट’, ‘सुंदर’ से ‘सुंदरता’। ये दोनों ही स्वतंत्र अर्थ नहीं रखते, परंतु शब्द से जुड़ते ही अर्थ की दिशा मोड़ देते हैं।
अनिवार्य हिंदी की परीक्षा-दृष्टि से यह अध्याय बहुत फलदायी है, क्योंकि प्रश्न प्रायः सीधे होते हैं — दिए गए शब्द में उपसर्ग/प्रत्यय अलग कीजिए, किसी उपसर्ग या प्रत्यय से शब्द बनाइए, अथवा कृत् और तद्धित में भेद कीजिए। उपसर्ग और प्रत्यय को पहचानने का अभ्यास हो जाने पर शब्द-भंडार स्वतः समृद्ध होता है और वर्तनी की अनेक त्रुटियाँ भी दूर हो जाती हैं।
उपसर्ग — परिभाषा और स्रोत
जो शब्दांश किसी शब्द के आरंभ में जुड़कर उसके अर्थ में विशेषता ला दे, उसे उपसर्ग (उप = समीप, सर्ग = सृष्टि करना) कहते हैं। हिंदी में उपसर्ग तीन स्रोतों से आए हैं — (1) संस्कृत (तत्सम) उपसर्ग, (2) हिंदी (तद्भव/देशज) उपसर्ग, और (3) अरबी-फ़ारसी एवं उर्दू उपसर्ग। प्रयोग में आने पर ये मूल शब्द से इतने घुल-मिल जाते हैं कि कभी-कभी एक ही शब्द में दो उपसर्ग भी लग जाते हैं, जैसे ‘अन्-अधि-कार’ → ‘अनधिकार’।
संस्कृत (तत्सम) उपसर्ग
संस्कृत के लगभग बाईस उपसर्ग हिंदी में सर्वाधिक प्रयुक्त होते हैं। नीचे उनके अर्थ और उदाहरण दिए गए हैं।
| उपसर्ग | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| अति | अधिक, ऊपर | अत्यधिक, अतिवृष्टि, अत्याचार |
| अधि | ऊपर, श्रेष्ठ | अध्यक्ष, अधिकार, अधिपति |
| अनु | पीछे, समान | अनुसरण, अनुज, अनुवाद |
| अप | बुरा, हीन | अपयश, अपमान, अपकार |
| अभि | सामने, ओर | अभिमुख, अभिनय, अभियान |
| अव | नीचे, हीन | अवनति, अवतार, अवगुण |
| आ | तक, ओर | आगमन, आजीवन, आहार |
| उत् / उद् | ऊपर, उत्कर्ष | उत्थान, उद्गम, उन्नति |
| उप | समीप, गौण | उपकार, उपवन, उपमंत्री |
| दुर् / दुस् | बुरा, कठिन | दुराचार, दुर्बल, दुष्कर्म |
| नि | नीचे, अभाव | निवास, निबंध, निवारण |
| निर् / निस् | बिना, बाहर | निराहार, निर्जल, निष्फल |
| परा | उलटा, पीछे | पराजय, पराभव, पराक्रम |
| परि | चारों ओर | परिक्रमा, परिवार, परिणाम |
| प्र | आगे, अधिक | प्रगति, प्रहार, प्रबल |
| प्रति | विरुद्ध, हर | प्रतिदिन, प्रतिकूल, प्रत्युत्तर |
| वि | विशेष, भिन्न | विज्ञान, विदेश, विकास |
| सम् | पूर्ण, साथ | संस्कार, संगम, संतोष |
| सु | अच्छा, सरल | सुगम, सुपुत्र, स्वागत |
हिंदी (तद्भव/देशज) उपसर्ग
ये उपसर्ग हिंदी ने अपने आप विकसित किए हैं अथवा संस्कृत से बिगड़कर आए हैं। इनका रूप सरल और बोलचाल का है।
| उपसर्ग | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| अ / अन | अभाव, नहीं | अछूता, अनपढ़, अनबन |
| क / कु | बुरा, हीन | कपूत, कुचाल, कुढंग |
| औ | हीन, अभाव | औगुन, औघट, औसर |
| भर | पूरा | भरपेट, भरपूर, भरसक |
| बिन | बिना | बिनब्याहा, बिनबुलाया, बिनदेखा |
| दु | दो, बुरा | दुगुना, दुधारी, दुलारा |
| नि | अभाव, बिना | निडर, निहत्था, निकम्मा |
| स | सहित | सपूत, सबल, सजीव |
| उन | एक कम | उनतीस, उनचास, उनसठ |
अरबी-फ़ारसी एवं उर्दू उपसर्ग
मुग़ल-काल से हिंदी में अरबी-फ़ारसी शब्द बड़ी संख्या में आए और उनके साथ अनेक उपसर्ग भी। ये आज भी प्रशासनिक और व्यावहारिक हिंदी में खूब चलते हैं।
| उपसर्ग | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| बा | सहित, के साथ | बाकायदा, बाइज़्ज़त, बामौक़ा |
| बे | बिना | बेईमान, बेकार, बेरहम |
| बद | बुरा | बदनाम, बदचलन, बदसूरत |
| ला | बिना, रहित | लाइलाज, लापरवाह, लावारिस |
| बिला | बिना | बिलावजह, बिलाशक, बिलानागा |
| कम | थोड़ा, हीन | कमज़ोर, कमबख़्त, कमउम्र |
| ख़ुश | अच्छा | ख़ुशनसीब, ख़ुशबू, ख़ुशमिज़ाज |
| गैर | भिन्न, नहीं | गैरहाज़िर, गैरकानूनी, गैरमुनासिब |
| दर | में, अंदर | दरअसल, दरमियान, दरकार |
| ना | अभाव, नहीं | नाराज़, नालायक, नासमझ |
| हम | साथ, समान | हमदर्द, हमराह, हमउम्र |
| हर | प्रत्येक | हररोज़, हरदम, हरएक |
| सर | मुख्य, ऊपर | सरपंच, सरकार, सरताज |
प्रत्यय — परिभाषा और प्रकार
जो शब्दांश किसी शब्द (या धातु) के अंत में जुड़कर उसका अर्थ या व्याकरणिक श्रेणी बदल दे, उसे प्रत्यय (प्रति = साथ, अय = चलने वाला) कहते हैं। हिंदी में प्रत्यय मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं —
- कृत् प्रत्यय — जो क्रिया (धातु) के अंत में जुड़ते हैं और संज्ञा/विशेषण बनाते हैं। इनसे बने शब्द ‘कृदंत’ कहलाते हैं। जैसे — पढ़ + आई = पढ़ाई; लिख + आवट = लिखावट।
- तद्धित प्रत्यय — जो संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण के अंत में जुड़ते हैं और नया शब्द बनाते हैं। इनसे बने शब्द ‘तद्धितांत’ कहलाते हैं। जैसे — मानव + ता = मानवता; लोहा + आर = लोहार।
इनके अतिरिक्त स्त्रीलिंग बनाने वाले स्त्री प्रत्यय भी एक उपयोगी वर्ग हैं। नीचे तीनों की विस्तृत तालिकाएँ दी गई हैं।
कृत् प्रत्यय (धातु + प्रत्यय)
| प्रत्यय | धातु/शब्द | निर्मित शब्द |
|---|---|---|
| -अन | ले, गा, मिल | लेन, गायन, मिलन |
| -ना | पढ़, लिख, खा | पढ़ना, लिखना, खाना |
| -आई | पढ़, चढ़, सिल | पढ़ाई, चढ़ाई, सिलाई |
| -आवट | लिख, सज, बना | लिखावट, सजावट, बनावट |
| -आहट | घबरा, चिल्ला, मुस्कुरा | घबराहट, चिल्लाहट, मुस्कुराहट |
| -आव | बह, चढ़, घुम | बहाव, चढ़ाव, घुमाव |
| -आक | तैर, लड़, पैर | तैराक, लड़ाक, पैराक |
| -ऊ | उड़, बिक, टिक | उड़ाऊ, बिकाऊ, टिकाऊ |
| -आका | धम, भभ, फट | धमाका, भभका, फटका |
| -ता | बह, डूब, चल | बहता, डूबता, चलता |
| -या | बीत, खा, सी | बीता, खाया, सीया |
| -वैया | गा, खे, पढ़ | गवैया, खिवैया, पढ़वैया |
| -हार | राख, होन, खेव | राखनहार, होनहार, खेवनहार |
| -क | पाठ, लेख, गाय | पाठक, लेखक, गायक |
| -ती | खा, चढ़, बच | खाती, चढ़ती, बचती |
तद्धित प्रत्यय (संज्ञा/विशेषण + प्रत्यय)
| प्रत्यय | मूल शब्द | निर्मित शब्द |
|---|---|---|
| -ता | मानव, सुंदर, मित्र | मानवता, सुंदरता, मित्रता |
| -त्व | गुरु, मनुष्य, प्रभु | गुरुत्व, मनुष्यत्व, प्रभुत्व |
| -पन | बच्चा, अपना, लड़का | बचपन, अपनापन, लड़कपन |
| -आई | भला, चतुर, मीठा | भलाई, चतुराई, मिठाई |
| -इक | समाज, धर्म, इतिहास | सामाजिक, धार्मिक, ऐतिहासिक |
| -ई | धन, गुण, सुख | धनी, गुणी, सुखी |
| -वाला | दूध, टोपी, गाड़ी | दूधवाला, टोपीवाला, गाड़ीवाला |
| -हार | लकड़ी, सोना (स्वर्ण) | लकड़हारा, सुनार |
| -आर | लोहा, सोना, कुम्भ | लोहार, सुनार, कुम्हार |
| -एरा | चाचा, मामा, साँझ | चचेरा, ममेरा, सँझेरा |
| -इया | खाट, डिब्बा, गठ | खटिया, डिबिया, गठिया |
| -आलू | दया, कृपा, श्रद्धा | दयालु, कृपालु, श्रद्धालु |
| -मान | बुद्धि, श्री, शक्ति | बुद्धिमान, श्रीमान, शक्तिमान |
| -वान | धन, बल, गुण | धनवान, बलवान, गुणवान |
| -इष्ठ | गुरु, बल, श्रेष्ठ | गरिष्ठ, बलिष्ठ, श्रेष्ठ |
| -त्र | अन्य, सर्व, एक | अन्यत्र, सर्वत्र, एकत्र |
स्त्री प्रत्यय (स्त्रीलिंग बनाने वाले)
| प्रत्यय | पुल्लिंग शब्द | स्त्रीलिंग शब्द |
|---|---|---|
| -ई | लड़का, घोड़ा, बकरा | लड़की, घोड़ी, बकरी |
| -इन | धोबी, माली, तेली | धोबिन, मालिन, तेलिन |
| -इनी / -नी | हाथी, मोर, शेर | हथिनी, मोरनी, शेरनी |
| -आनी | सेठ, देवर, जेठ | सेठानी, देवरानी, जेठानी |
| -इया | बूढ़ा, बेटा, डिब्बा | बुढ़िया, बिटिया, डिबिया |
| -आइन | ठाकुर, पंडित, बाबू | ठकुराइन, पंडिताइन, बबुआइन |
| -का | बालक, मूषक, अध्यापक | बालिका, मूषिका, अध्यापिका |
उपसर्ग बनाम प्रत्यय और सामान्य अशुद्धियाँ
मूल अंतर सरल है — उपसर्ग शब्द के आगे लगता है, प्रत्यय पीछे। ‘हार’ शब्द को देखें — आगे ‘प्र’ लगने से ‘प्रहार’ (उपसर्ग) बनता है; धातु ‘राख’ के पीछे ‘-हार’ लगने से ‘राखनहार’ (प्रत्यय) बनता है। परीक्षा में सावधानी के कुछ बिंदु —
- संधि-परिवर्तन को पहचानें — उपसर्ग जुड़ते समय प्रायः ध्वनि बदलती है, जैसे ‘निर् + रस = निरस’ नहीं बल्कि ‘नीरस’, ‘दुर् + गति = दुर्गति’, ‘सम् + तोष = संतोष’। मूल उपसर्ग पहचानने के लिए संधि खोलनी पड़ती है।
- कृत् और तद्धित का भेद — यदि प्रत्यय क्रिया/धातु से जुड़ा है तो कृत् (पढ़ाई, लिखावट); यदि संज्ञा/विशेषण से जुड़ा है तो तद्धित (मानवता, धनी)।
- दो उपसर्ग एक साथ — कुछ शब्दों में दो उपसर्ग होते हैं, जैसे ‘अन् + आ + गत = अनागत’, ‘सु + प्र + सिद्ध = सुप्रसिद्ध’; दोनों अलग करने का अभ्यास करें।
- स्रोत-भ्रम से बचें — ‘बेईमान’ में ‘बे’ फ़ारसी उपसर्ग है, संस्कृत नहीं; स्रोत पूछे जाने पर इसका ध्यान रखें।
अभ्यास प्रश्न
नीचे तीन भागों में अभ्यास दिया गया है। उत्तर हर भाग के अंत में दिए गए हैं।
(क) निम्नलिखित शब्दों में से उपसर्ग अलग कीजिए तथा उसका स्रोत (संस्कृत/हिंदी/अरबी-फ़ारसी) बताइए —
- अपयश
- बेईमान
- निडर
- प्रतिदिन
- गैरहाज़िर
- सुपुत्र
(ख) निम्नलिखित शब्दों में से प्रत्यय अलग कीजिए तथा बताइए कि वह कृत् है या तद्धित —
- लिखावट
- मानवता
- गायक
- धार्मिक
- बुढ़िया
- होनहार
(ग) रिक्त स्थान भरिए / निर्देशानुसार शब्द बनाइए —
- ‘सम्’ उपसर्ग से दो शब्द बनाइए।
- ‘-पन’ तद्धित प्रत्यय से दो शब्द बनाइए।
- ‘लड़का’ का स्त्रीलिंग रूप और उसमें प्रयुक्त स्त्री प्रत्यय बताइए।
उत्तर
(क)
- अपयश = अप (उपसर्ग) + यश — संस्कृत।
- बेईमान = बे (उपसर्ग) + ईमान — अरबी-फ़ारसी।
- निडर = नि (उपसर्ग) + डर — हिंदी।
- प्रतिदिन = प्रति (उपसर्ग) + दिन — संस्कृत।
- गैरहाज़िर = गैर (उपसर्ग) + हाज़िर — अरबी-फ़ारसी।
- सुपुत्र = सु (उपसर्ग) + पुत्र — संस्कृत।
(ख)
- लिखावट = लिख (धातु) + आवट — कृत् प्रत्यय।
- मानवता = मानव (संज्ञा) + ता — तद्धित प्रत्यय।
- गायक = गा (धातु) + क — कृत् प्रत्यय।
- धार्मिक = धर्म (संज्ञा) + इक — तद्धित प्रत्यय।
- बुढ़िया = बूढ़ा + इया — तद्धित (यहाँ स्त्री/लघुता) प्रत्यय।
- होनहार = होन (धातु) + हार — कृत् प्रत्यय।
(ग)
- ‘सम्’ से — संगम, संतोष (अथवा संस्कार, संयम)।
- ‘-पन’ से — बचपन, अपनापन (अथवा लड़कपन, बड़प्पन)।
- ‘लड़का’ का स्त्रीलिंग — लड़की; प्रयुक्त स्त्री प्रत्यय — ‘-ई’।
निष्कर्ष
उपसर्ग और प्रत्यय हिंदी की शब्द-रचना के दो मुख्य औज़ार हैं — एक शब्द के आगे लगकर, दूसरा पीछे लगकर अर्थ को नई दिशा देता है। उपसर्गों को उनके तीन स्रोतों — संस्कृत, हिंदी और अरबी-फ़ारसी — के अनुसार समझ लेने पर पहचान सरल हो जाती है; और प्रत्ययों में कृत् (धातु से) तथा तद्धित (संज्ञा/विशेषण से) का भेद स्पष्ट रखने पर प्रश्न सहज हल हो जाते हैं। स्त्री प्रत्ययों की जानकारी लिंग-संबंधी प्रश्नों में भी सहायक है। दी गई तालिकाओं को बार-बार पढ़कर तथा नए शब्द स्वयं बनाकर अभ्यास करने से यह अध्याय अनिवार्य हिंदी में निश्चित अंक दिलाने वाला सिद्ध होता है।
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