भारत में इलेक्ट्रिक वाहन एक दशक से भी कम समय में नीति की अनोखी चीज़ से निकलकर बाज़ार का मुख्य हिस्सा बन गए हैं। 2014-15 में सालाना बिक्री 2,000 से भी कम थी, और 2024-25 में भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों का रजिस्ट्रेशन 19 लाख पार कर गया। इससे सड़क पर चल रहे कुल EV 50 लाख से ऊपर पहुँच गए और सभी श्रेणियों को मिलाकर हिस्सेदारी 7.5% से ऊपर चली गई, जिसमें दोपहिया और तिपहिया सबसे आगे हैं। इस रफ़्तार के पीछे कई चीज़ें हैं: 2019 से 2024 तक चली FAME-II (Faster Adoption and Manufacturing of (Hybrid &) Electric Vehicles), मार्च 2024 में शुरू हुई उसकी उत्तराधिकारी PM E-Drive योजना, ₹18,100 करोड़ की एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल (ACC) बैटरी भंडारण वाली PLI, शहरी बसों के लिए PM E-Bus Sewa, और टाटा मोटर्स, महिंद्रा, ओला इलेक्ट्रिक, एथर एनर्जी, TVS, बजाज तथा आने वाले रिलायंस-ब्लैकरॉक संयुक्त उद्यम की आक्रामक चालें। भारत में इलेक्ट्रिक वाहन देश की पेरिस समझौते वाली प्रतिबद्धताओं, ग्रीन हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था, सौर ऊर्जा के अभियान, इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन और अगली पीढ़ी की बैटरी तकनीकों की आपूर्ति शृंखला, सबके केंद्र में हैं।
भारत के लिए इलेक्ट्रिक वाहन क्यों मायने रखते हैं
भारत के CO₂ उत्सर्जन में परिवहन का हिस्सा क़रीब 14% है, और शहरी हवा की ख़राबी में इससे कहीं ज़्यादा। भारत अपना 85% से ज़्यादा कच्चा तेल बाहर से मँगाता है — 2024-25 में क़रीब 130 अरब डॉलर का। सड़क परिवहन को बिजली पर लाना दोनों समस्याओं का एक साथ जवाब है: इससे गाड़ी के साइलेंसर से निकलने वाला धुआँ बहुत घट जाता है, तेल के आयात पर निर्भरता कम होती है, और बैटरी, मोटर, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स तथा सॉफ़्टवेयर का बड़ा घरेलू बाज़ार बनता है।
भारत सरकार के NITI Aayog ने EV30@30 का लक्ष्य रखा है — 2030 तक नई गाड़ियों की बिक्री में 30% हिस्सा इलेक्ट्रिक वाहनों का हो। इसे आगे इस तरह बाँटा गया है: व्यावसायिक वाहनों में 70%, बसों में 40%, निजी कारों में 30% और दोपहिया तथा तिपहिया में 80%।
नीति का सफ़र — NEMMP 2020 से PM E-Drive तक
भारत की EV नीति रातोंरात नहीं बनी। यह चार चरणों से गुज़री है।
NEMMP 2020 (2013)
राष्ट्रीय इलेक्ट्रिक मोबिलिटी मिशन प्लान 2020 पहला पूरा ढाँचा था — इसमें 2020 तक 60-70 लाख EV का लक्ष्य रखा गया। लक्ष्य पूरा नहीं हुआ, लेकिन इससे संस्थाओं के स्तर पर रफ़्तार बनी।
FAME-I (2015-19)
हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों को तेज़ी से अपनाने तथा बनाने की योजना के पहले चरण (FAME-I) का बजट ₹895 करोड़ था, जिससे 2.78 लाख हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों को मदद मिली और 520 चार्जिंग स्टेशन बने। यह सीखने का दौर था, जिसने दिखाया कि देश में ही पुर्ज़े बनाने के नियम और सख़्त करने होंगे।
FAME-II (2019-24)
असली मोड़ FAME-II से आया। 1 अप्रैल 2019 को ₹11,500 करोड़ के बजट के साथ शुरू हुई इस योजना का बजट बाद में और बढ़ाया गया। FAME-II ने इलेक्ट्रिक दोपहिया, तिपहिया, चारपहिया और बसों की ख़रीद पर सब्सिडी दी, और साथ में चरणबद्ध विनिर्माण कार्यक्रम (Phased Manufacturing Programme, PMP) के तहत देश में ही पुर्ज़े बनाने की सख़्त शर्तें रखीं। 31 मार्च 2024 को तय समय पर बंद होने तक इस योजना से क़रीब 16 लाख EV को मदद मिली और 7,000 से ज़्यादा सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन खड़े हुए। इसी ने बैटरी और पुर्ज़े देश में बनवाने पर मजबूर किया, जो आज के पूरे EV तंत्र की नींव है।
इलेक्ट्रिक मोबिलिटी प्रमोशन स्कीम (अप्रैल-सितंबर 2024)
यह FAME-II और PM E-Drive के बीच का छोटा पुल था, जिसमें इलेक्ट्रिक दोपहिया और तिपहिया को कम दर पर सब्सिडी मिली।
PM E-Drive (सितंबर 2024 – मार्च 2026)
PM Electric Drive Revolution in Innovative Vehicle Enhancement (PM E-Drive) योजना ने FAME-II की जगह ली, और इसका बजट अक्टूबर 2024 से दो साल के लिए ₹10,900 करोड़ रखा गया। PM E-Drive में इलेक्ट्रिक दोपहिया (24.79 लाख गाड़ियाँ), तिपहिया (3.16 लाख), ट्रक (3.4 लाख), बसें (14,028) और ई-एंबुलेंस शामिल हैं। इस योजना में व्यावसायिक वाहनों और सार्वजनिक तथा साझा परिवहन पर ज़ोर बढ़ा दिया गया है।
बैटरी के लिए PLI-ACC योजना
एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल बैटरी भंडारण के लिए ₹18,100 करोड़ की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मई 2021 में मंज़ूरी दी। बोली के दो दौर में 50 GWh की ACC विनिर्माण क्षमता ओला सेल टेक्नोलॉजीज़, रिलायंस न्यू एनर्जी, राजेश एक्सपोर्ट्स, हुंडई-एक्साइड, एनविल केबल्स और ACC एनर्जी स्टोरेज को दी जा चुकी है। बची हुई 20 GWh के लिए तीसरा दौर 2024 में बंद हुआ।
PLI, PM E-Drive का आपूर्ति वाला दूसरा पहलू है। भारत का लक्ष्य है कि 2030 तक देश के भीतर 100-120 GWh ACC क्षमता खड़ी हो जाए — इतनी कि पूरी तरह स्वदेशी EV आपूर्ति शृंखला और उभरते ऊर्जा भंडारण के काम, दोनों टिक सकें।
PM E-Bus Sewa — शहरों के लिए इलेक्ट्रिक बसें
अगस्त 2023 में मंज़ूर हुई PM E-Bus Sewa योजना का बजट 10 साल के लिए ₹57,613 करोड़ है, और इसके तहत 169 शहरों में 10,000 इलेक्ट्रिक बसें उतारी जाएँगी। यह सकल लागत अनुबंध (Gross Cost Contract, GCC) मॉडल पर होगा, जिसमें बसें निजी ऑपरेटर चलाते हैं और शहर प्रति किलोमीटर के हिसाब से पैसा देते हैं। दूसरे चरण में यह बढ़ाकर 38,000 ई-बसें कर दिया गया। योजना को कन्वर्जेंस एनर्जी सर्विसेज़ लिमिटेड (CESL) लागू करती है।
PM E-Bus Sewa दुनिया का सबसे बड़ा अकेला इलेक्ट्रिक बस कार्यक्रम है और शहरी सार्वजनिक परिवहन से कार्बन घटाने के लिए निर्णायक है, क्योंकि स्थानीय वायु प्रदूषण में इसका हिस्सा ज़रूरत से कहीं ज़्यादा है।
चार्जिंग ढाँचा और बैटरी बदलने की सुविधा
2026 की शुरुआत तक भारत में 25,000 से ज़्यादा सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन थे, और लगाने की रफ़्तार बढ़ी है, क्योंकि PM E-Drive में हाइवे किनारे तथा शहरी क्लस्टरों में फ़ास्ट चार्जर के लिए ₹2,000 करोड़ रखे गए हैं। भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स (BHEL), टाटा पावर, अडानी टोटल एनर्जीज़, स्टैटिक, Tata.ev और रिलायंस सबसे बड़े चार्जिंग नेटवर्क चलाते हैं।
बैटरी बदलकर आगे बढ़ने की सुविधा — ख़ासकर दोपहिया और तिपहिया के लिए — सन मोबिलिटी, बाउंस, बैटरी स्मार्ट और यूलू शुरू कर रही हैं। राष्ट्रीय बैटरी स्वैपिंग नीति के मसौदे में ऐसे मानक सुझाए गए हैं जो सब जगह एक जैसे चलें, लेकिन यह नीति अभी अंतिम रूप नहीं ले पाई है।
भारत में इलेक्ट्रिक वाहन कौन बना रहा है
भारत का EV बाज़ार गिनी-चुनी तेज़ चलने वाली कंपनियों के इर्द-गिर्द सिमट गया है।
दोपहिया
इलेक्ट्रिक दोपहिया में ओला इलेक्ट्रिक (S1 और S1 Pro), एथर एनर्जी (450X, Rizta), TVS (iQube), बजाज (चेतक इलेक्ट्रिक), हीरो मोटोकॉर्प (Vida), ग्रीव्स-एम्पियर और ओकिनावा का दबदबा है। ये सब मिलकर साल में 10 लाख से ज़्यादा गाड़ियाँ भेजते हैं।
तिपहिया
इस श्रेणी में महिंद्रा (Treo), बजाज (RE Electric), पियाजियो (Ape E-City) और अतुल ऑटो सबसे आगे हैं। भारत में अब नए तिपहिया वाहनों की बिक्री में 60% से ज़्यादा हिस्सा इलेक्ट्रिक तिपहिया का है — किसी भी श्रेणी में सबसे गहरी EV पैठ।
चारपहिया
इलेक्ट्रिक कार बाज़ार का क़रीब 70% हिस्सा टाटा मोटर्स (Nexon EV, Tiago EV, Punch EV, Curvv EV) के पास है। महिंद्रा इलेक्ट्रिक (XUV400, और INGLO प्लेटफ़ॉर्म पर BE 6 तथा XEV 9e), MG मोटर (ZS EV, Comet, Windsor), हुंडई (Kona, Creta Electric), किआ (EV6, EV9), BYD (Atto 3, Seal) और BMW भी इसी श्रेणी में हैं।
व्यावसायिक वाहन
ई-बस और ई-ट्रक की श्रेणी में टाटा मोटर्स, महिंद्रा, JBM ऑटो, ओलेक्ट्रा ग्रीनटेक, अशोक लेलैंड, VECV और स्विच मोबिलिटी सबसे आगे हैं।
रिलायंस-ब्लैकरॉक
रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ने ब्लैकरॉक के साथ संयुक्त उद्यम का ऐलान किया है, जो बैटरी तकनीक, एक EV प्लेटफ़ॉर्म और पूरी मोबिलिटी सेवा का कारोबार खड़ा करेगा। पहली गाड़ियाँ 2027 तक आने की उम्मीद है।
लिथियम-आयन बनाम सोडियम-आयन — आगे की बैटरी कौन सी
भारत में आज के इलेक्ट्रिक वाहन लगभग पूरी तरह लिथियम-आयन बैटरियों पर चलते हैं — ख़ासकर निकल-मैंगनीज़-कोबाल्ट (NMC) और लिथियम-आयरन-फ़ॉस्फ़ेट (LFP) रसायन वाली। दो बड़ी दिक़्क़तें अब भी बनी हुई हैं।
लिथियम की आपूर्ति
भारत में लिथियम के ज्ञात भंडार बहुत कम हैं — भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने 2023 में जम्मू और कश्मीर के रियासी में भंडार पहचाना, और कर्नाटक, आंध्र प्रदेश तथा राजस्थान में खोज चल रही है। NALCO, HCL और MECL का संयुक्त उद्यम KABIL अर्जेंटीना, चिली और ऑस्ट्रेलिया में लिथियम की खदानें ख़रीद रहा है।
सोडियम-आयन की उम्मीद
सोडियम-आयन बैटरियाँ — जिनमें लिथियम की जगह सोडियम इस्तेमाल होता है — कम दूरी वाले दोपहिया, तिपहिया और एक जगह टिके भंडारण के लिए सस्ता और काम का विकल्प बनकर उभर रही हैं। IIT बॉम्बे, IIT मद्रास और CSIR-केंद्रीय विद्युत रसायन अनुसंधान संस्थान जैसी भारतीय प्रयोगशालाएँ सोडियम-आयन कैथोड पर काम कर रही हैं। रिलायंस ने ब्रिटेन की फैराडियन ख़रीद ली है, ताकि सोडियम-आयन की आपूर्ति शृंखला खड़ी कर सके।
सॉलिड-स्टेट बैटरियाँ, हाइड्रोजन फ़्यूल सेल (जो राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन से जुड़े हैं) और पेट्रोल-डीज़ल गाड़ियों को पूरी तरह इलेक्ट्रिक में बदलने वाली किट, आगे आने वाली दूसरी तकनीकें हैं।
टैक्स और GST
इलेक्ट्रिक वाहनों पर GST 5% है — GST ढाँचे की सबसे कम रियायती दरों में से एक — जबकि पेट्रोल-डीज़ल गाड़ियों पर 28% और ऊपर से सेस लगता है। आयकर की धारा 80EEB के तहत EV लोन के ब्याज पर हर साल ₹1.5 लाख तक की छूट मिलती है। दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और गुजरात जैसी कई राज्य नीतियाँ रजिस्ट्रेशन और रोड टैक्स में छूट तथा अलग से पूँजी सब्सिडी भी देती हैं।
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों के सामने चुनौतियाँ
- बैटरी के लिए आयात पर निर्भरता। जब तक PLI-ACC की क्षमता चालू नहीं होती, भारत चीन और कोरिया से सेल मँगाता रहेगा।
- सार्वजनिक चार्जिंग में खालीपन। हाइवे के रास्तों और छोटे शहरों में सुविधा अब भी कम है।
- रेंज की चिंता और कुल ख़र्च। सस्ते EV असल सड़क पर उतनी दूरी नहीं देते जितनी कंपनी बताती है, और इससे ख़रीदार हिचकते हैं।
- बीमा और पुरानी गाड़ी का बाज़ार। दोबारा बेचने पर कितना दाम मिलेगा, यह अभी तय हो रहा है, और बीमा उत्पाद भी शुरुआती दौर में हैं।
- बिजली ग्रिड पर असर। EV बड़े पैमाने पर अपनाए गए तो सबसे ज़्यादा बिजली की माँग 50-100 GW बढ़ जाएगी — ग्रिड को साथ-साथ नवीकरणीय बिजली और स्मार्ट चार्जिंग के नियम चाहिए।
- पुरानी हो चुकी बैटरियाँ। भारत के पास अभी सिर्फ़ बैटरी कचरा प्रबंधन का मसौदा ढाँचा है। 2030 से EV बैटरियों की पहली खेप रिटायर होने लगेगी, और रीसाइक्लिंग का ढाँचा उससे पहले खड़ा होना चाहिए।
आगे का रास्ता
भारत में इलेक्ट्रिक वाहन वह मोड़ पार कर चुके हैं जहाँ से पीछे लौटना नहीं होता — दोपहिया, तिपहिया और शहरी बसों में इनकी पैठ अब अपने दम पर बढ़ रही है। अगले दशक में तीन काम ज़रूरी हैं: PLI के तहत देश में ही ACC बनाने की क्षमता तेज़ी से बढ़ाना, पूरे देश में एक जुड़ा हुआ चार्जिंग नेटवर्क जिसके मानक हर जगह एक जैसे चलें और जो ग्रिड से जुड़े भंडारण के साथ काम करे, और बैटरियों के दूसरे जीवन तथा रीसाइक्लिंग का पक्का तंत्र। लंबी दूरी के परिवहन के लिए ग्रीन हाइड्रोजन के अभियान और गाड़ी के भीतर के इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए सेमीकंडक्टर मिशन के साथ मिलकर, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी भारत के साफ़ परिवहन की सबसे बड़ी धुरी बनेगी।
सामान्य प्रश्न
EV30@30 का लक्ष्य क्या है?
EV30@30 NITI Aayog की वह सोच है जिसके तहत 2030 तक नई गाड़ियों की बिक्री में 30% हिस्सा इलेक्ट्रिक वाहनों का हो। इसे इस तरह बाँटा गया है: व्यावसायिक वाहनों में 70%, बसों में 40%, निजी कारों में 30% और दोपहिया तथा तिपहिया में 80%।
FAME-II क्या है?
Faster Adoption and Manufacturing of Electric Vehicles का दूसरा चरण ₹11,500 करोड़ की माँग बढ़ाने वाली प्रोत्साहन योजना थी, जो 1 अप्रैल 2019 से 31 मार्च 2024 तक चली। इससे क़रीब 16 लाख EV को मदद मिली और 7,000 से ज़्यादा चार्जिंग स्टेशन बने।
PM E-Drive क्या है?
PM E-Drive, FAME-II की जगह लेने वाली योजना है, जिसका बजट अक्टूबर 2024 से मार्च 2026 तक ₹10,900 करोड़ है। इसमें इलेक्ट्रिक दोपहिया, तिपहिया, ट्रक, बसें, एंबुलेंस और चार्जिंग ढाँचा, सब शामिल हैं।
PLI-ACC योजना क्या है?
एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल बैटरी भंडारण के लिए बनी उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना का बजट ₹18,100 करोड़ है, और इसका मक़सद 2030 तक देश के भीतर 100-120 GWh बैटरी विनिर्माण क्षमता खड़ी करना है।
PM E-Bus Sewa क्या है?
PM E-Bus Sewa अगस्त 2023 की योजना है, जिसका बजट ₹57,613 करोड़ है और जिसके तहत 169 शहरों में 10,000 इलेक्ट्रिक बसें सकल लागत अनुबंध मॉडल पर चलाई जाएँगी। इसे कन्वर्जेंस एनर्जी सर्विसेज़ लिमिटेड चलाती है।
भारत के EV बाज़ार में कौन सी कंपनियाँ आगे हैं?
इलेक्ट्रिक कारों में टाटा मोटर्स सबसे आगे है (क़रीब 70% हिस्सेदारी), इलेक्ट्रिक दोपहिया में ओला इलेक्ट्रिक, एथर, TVS और बजाज आगे हैं, तिपहिया में महिंद्रा सबसे आगे है, और ई-बसों में टाटा, ओलेक्ट्रा तथा JBM आगे हैं।
इलेक्ट्रिक वाहनों पर GST की दर क्या है?
इलेक्ट्रिक वाहनों पर GST 5% है, जबकि पेट्रोल-डीज़ल गाड़ियों पर 28% और ऊपर से सेस लगता है। आयकर अधिनियम की धारा 80EEB के तहत EV लोन के ब्याज पर ₹1.5 लाख तक की छूट मिलती है।
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों के सामने मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं?
बैटरी सेल के लिए आयात पर निर्भरता, हाइवे पर कम चार्जिंग सुविधा, असल सड़क पर रेंज की चिंता, शुरुआती दौर के बीमा और पुनर्बिक्री बाज़ार, बिजली ग्रिड पर असर, और पुरानी हो चुकी बैटरियों की रीसाइक्लिंग — ये मुख्य चुनौतियाँ हैं।