इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन भारत सरकार का वह प्रमुख कार्यक्रम है, जिसका मक़सद इसी दशक में देश के भीतर सेमीकंडक्टर डिज़ाइन, चिप बनाने, पैकेजिंग और उपकरणों का पूरा तंत्र खड़ा करना है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इसे 15 दिसंबर 2021 को ₹76,000 करोड़ की शुरुआती रक़म के साथ मंज़ूरी दी और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के तहत इसे चालू किया गया। इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में यह देश की अब तक की सबसे बड़ी एक औद्योगिक-नीति मुहिम है। 2026 के मध्य तक मिशन छह सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को मंज़ूरी दे चुका है, जिनमें कुल ₹1.6 लाख करोड़ से ज़्यादा का निवेश जुड़ा है — साणंद में माइक्रोन टेक्नोलॉजी का असेंबली और टेस्ट प्लांट, धोलेरा में टाटा-PSMC का फ़ैब, साणंद में CG पावर-रेनेसास-स्टार्स का ATMP, जगीरोड में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स का OSAT, साणंद में कायन्स टेक्नोलॉजी की इकाई और जेवर में HCL-फ़ॉक्सकॉन का डिस्प्ले-ड्राइवर IC फ़ैब। इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन का रिश्ता दूसरे तकनीकी कार्यक्रमों से भी है — ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, सोलर PLI, इलेक्ट्रिक वाहन मुहिम और बैटरी तकनीक का ज़ोर, जो मिलकर भारत का मैन्युफ़ैक्चरिंग नक़्शा नए सिरे से खींचना चाहते हैं।
सेमीकंडक्टर इतने अहम क्यों हैं
सेमीकंडक्टर हर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक चीज़ की बुनियादी ईंट हैं — स्मार्टफ़ोन और लैपटॉप से लेकर कारों, उपग्रहों, लड़ाकू विमानों, चिकित्सा उपकरणों और उन चिप्स तक, जिन पर लार्ज लैंग्वेज मॉडल तैयार होते हैं। भारत अपनी लगभग पूरी चिप ज़रूरत आयात करता है, और यह ज़रूरत 2030 तक 110 अरब डॉलर से ऊपर पहुँचने वाली है, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफ़ैक्चरिंग तेज़ी से बढ़ रही है। कोविड-19 महामारी ने दिखा दिया कि एक ही जगह सिमटी चिप सप्लाई चेन कितनी कमज़ोर होती है: 2021-22 में गाड़ियों वाले माइक्रोकंट्रोलर की कमी से भारतीय कार कंपनियों को उत्पादन 20-25% तक घटाना पड़ा। इसलिए देश के भीतर क्षमता खड़ी करना औद्योगिक नीति का लक्ष्य भी है और राष्ट्रीय सुरक्षा की मजबूरी भी।
दुनिया में चिप का नक़्शा
दुनिया की क़रीब 75% वेफ़र बनाने की क्षमता पूर्वी एशिया में है — ताइवान (TSMC), दक्षिण कोरिया (सैमसंग, SK हाइनिक्स), चीन और जापान। अमेरिका, यूरोप और भारत, तीनों ने भारी सब्सिडी कार्यक्रमों से जवाब दिया है — अमेरिका का CHIPS एंड साइंस एक्ट (52.7 अरब डॉलर), यूरोपियन चिप्स एक्ट (43 अरब यूरो) और भारत की अपनी ₹76,000 करोड़ की सेमीकंडक्टर योजना।
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन की शुरुआत कहाँ से हुई
भारत का सेमीकंडक्टर सफ़र इससे पुराना है। मोहाली में सेमीकंडक्टर कॉम्प्लेक्स लिमिटेड (SCL) 1976 में बना था, लेकिन 1989 की आग के बाद पिछड़ गया। विदेशी फ़ैब लाने की पुरानी कोशिशें — जिनमें 2007 की सेमइंडिया वाली योजना भी शामिल है — नाकाम रहीं। मौजूदा मिशन उन नाकामियों से सबक़ लेकर सिर्फ़ बाज़ार देने का वादा नहीं करता, बल्कि पहले ही पूँजी पर सब्सिडी, कर रियायतें और बुनियादी ढाँचा देता है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने संशोधित सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम को 21 सितंबर 2022 को मंज़ूरी दी, जिसके चार हिस्से हैं:
- सेमीकंडक्टर फ़ैब लगाने की संशोधित योजना — परियोजना लागत का 50% तक सरकारी सहारा।
- डिस्प्ले फ़ैब की संशोधित योजना — 50% तक सरकारी सहारा।
- कंपाउंड सेमीकंडक्टर, सिलिकॉन फ़ोटोनिक्स, सेंसर और ATMP/OSAT की संशोधित योजना — पूँजी लागत पर 50% मदद।
- डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) योजना — बिना अपने कारख़ाने वाले (fabless) डिज़ाइन स्टार्टअप के लिए।
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन, जो डिजिटल इंडिया कॉर्पोरेशन के भीतर एक स्वतंत्र बिज़नेस डिवीज़न के रूप में बना है, इस कार्यक्रम को चलाता है।
मंज़ूर हुए फ़ैब और परियोजनाएँ
2026 के मध्य तक इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन छह परियोजनाओं को मंज़ूरी दे चुका है, जिनमें कुल ₹1.6 लाख करोड़ से ज़्यादा का निवेश तय है।
माइक्रोन टेक्नोलॉजी — साणंद, गुजरात
जून 2023 में मंज़ूर हुआ माइक्रोन का 2.75 अरब डॉलर वाला ATMP (असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग) प्लांट साणंद, गुजरात में है और ISM की मदद से ज़मीन पर उतरने वाली पहली इकाई है। भारत सरकार पूँजी लागत का 50% देती है और गुजरात 20% और जोड़ता है। पहले चरण में 2025 के आख़िर में पैकेजिंग शुरू होगी, जिसमें माइक्रोन की वैश्विक सप्लाई चेन के लिए DRAM और NAND मेमोरी चिप बनेंगी।
टाटा-PSMC — धोलेरा, गुजरात
फ़रवरी 2024 में मंज़ूर हुआ टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और ताइवान की पावरचिप सेमीकंडक्टर मैन्युफ़ैक्चरिंग कॉर्पोरेशन (PSMC) का साझा उपक्रम धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र में है। यह भारत की पहली व्यावसायिक वेफ़र फ़ैब्रिकेशन इकाई है, जिसमें ₹91,000 करोड़ का निवेश तय है और 28 nm प्रोसेस नोड पर हर महीने 50,000 वेफ़र शुरू करने की योजना है। यह फ़ैब गाड़ियों, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक इस्तेमाल के लिए चिप बनाएगा।
CG पावर-रेनेसास-स्टार्स — साणंद, गुजरात
CG पावर का जापान की रेनेसास इलेक्ट्रॉनिक्स और थाईलैंड की स्टार्स माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स के साथ साझा उपक्रम साणंद में ₹7,600 करोड़ की OSAT (आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट) इकाई लगाएगा, जो ख़ास तौर पर पावर-मैनेजमेंट IC बनाएगी।
टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स OSAT — जगीरोड, असम
असम के जगीरोड में ₹27,000 करोड़ की OSAT/ATMP इकाई — पूर्वोत्तर में भारत की पहली सेमीकंडक्टर इकाई। इसमें 2025-26 तक उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है और 27,000 से ज़्यादा सीधे तथा परोक्ष रोज़गार बनने की बात है।
कायन्स सेमीकॉन — साणंद, गुजरात
कायन्स टेक्नोलॉजी की ₹3,300 करोड़ वाली ATMP इकाई साणंद में है, जिसे सितंबर 2024 में मंज़ूरी मिली।
HCL-फ़ॉक्सकॉन — जेवर, उत्तर प्रदेश
HCL समूह और फ़ॉक्सकॉन का ₹3,706 करोड़ का साझा उपक्रम मई 2025 में मंज़ूर हुआ, जो जेवर के पास यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण इलाक़े में डिस्प्ले-ड्राइवर IC (DDIC) बनाएगा। गुजरात और असम से बाहर यह ISM की पहली परियोजना है।
कुल निवेश
इन छह परियोजनाओं में तय कुल निवेश ₹1.6 लाख करोड़ से ऊपर है। रोज़गार की कुल संभावना 80,000 से ज़्यादा सीधे पदों की है, और निर्माण, सामग्री, सप्लाई चेन तथा डिज़ाइन सेवाओं में कई लाख परोक्ष कामों की।
डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव योजना
डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) योजना की रक़म ₹1,000 करोड़ है और यह भारतीय सेमीकंडक्टर डिज़ाइन स्टार्टअप को तीन हिस्सों में सहारा देती है — चिप डिज़ाइन इंफ़्रास्ट्रक्चर सपोर्ट, प्रोडक्ट डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव (परियोजना लागत का 50% तक) और डिप्लॉयमेंट लिंक्ड इंसेंटिव। 2026 तक 40 से ज़्यादा DLI स्टार्टअप जुड़ चुके हैं, जो माइक्रोप्रोसेसर, FPGA, RF चिप, AI एक्सेलेरेटर और सेंसर जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। ज़मीन पर इसे चलाने का काम सेंटर फ़ॉर डेवलपमेंट ऑफ़ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC) देखता है।
ChipIN सेंटर
ChipIN सेंटर एक “वन-स्टॉप” सुविधा है, जिसे C-DAC ने DLI योजना के तहत बनाया है, ताकि स्टार्टअप को व्यावसायिक EDA (इलेक्ट्रॉनिक डिज़ाइन ऑटोमेशन) टूल, फ़ाउंड्री शटल सेवाएँ और पैकेजिंग की मदद मिल सके। इससे शुरुआती कंपनियों के लिए चिप डिज़ाइन की शुरुआती लागत बहुत घट जाती है।
वे दूसरी योजनाएँ जो ISM को मज़बूती देती हैं
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन अकेला नहीं चलता। तीन और योजनाएँ इसे सहारा देती हैं।
संशोधित विशेष प्रोत्साहन पैकेज योजना (M-SIPS)
असली M-SIPS ने 2012 से 2018 के बीच इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफ़ैक्चरिंग इकाइयों को पूँजी लागत पर 20-25% सब्सिडी दी थी — इसके बाद आई PLI योजना इलेक्ट्रॉनिक कल-पुर्ज़ों और सेमीकंडक्टर के लिए अब कंपोनेंट मैन्युफ़ैक्चरिंग का मुख्य ज़रिया है।
बड़े पैमाने के इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव
बड़े पैमाने की इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफ़ैक्चरिंग के लिए ₹40,995 करोड़ की PLI ने भारत में मोबाइल फ़ोन असेंबली को जमा दिया है, और 2024-25 में निर्यात 20 अरब डॉलर के पार चला गया।
IT हार्डवेयर के लिए PLI
IT हार्डवेयर (लैपटॉप, टैबलेट, सर्वर, ऑल-इन-वन PC) के लिए PLI ₹17,000 करोड़ के साथ मंज़ूर हुई थी। मंज़ूर कंपनियों में डेल, HP, लेनोवो, आसुस, एसर और फ़ॉक्सकॉन शामिल हैं।
इंडिया सेमीकंडक्टर रिसर्च सेंटर
केंद्रीय बजट 2025-26 में जिसकी घोषणा हुई, वह प्रस्तावित इंडिया सेमीकंडक्टर रिसर्च सेंटर IIT और दुनिया भर की R&D प्रयोगशालाओं के साथ मिलकर काम करेगा, ताकि अगली पीढ़ी के नोड, एडवांस्ड पैकेजिंग और पोस्ट-सिलिकॉन तकनीकों में देश की अपनी क्षमता बने।
हुनर और ट्रेनिंग
एक 28 nm फ़ैब को हर शिफ़्ट में क़रीब 1,000-1,500 प्रशिक्षित इंजीनियर चाहिए। मिशन की हुनर रणनीति में 113 शैक्षणिक संस्थानों वाला चिप्स टु स्टार्टअप (C2S) कार्यक्रम, स्किल इंडिया का फ़्यूचर स्किल्स प्राइम पोर्टल, और IIT तथा IIIT में सेमीकंडक्टर तकनीक व VLSI डिज़ाइन के अलग MTech कोर्स शामिल हैं। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स, माइक्रोन और दूसरी कंपनियाँ गुजरात और असम में अपनी ट्रेनिंग अकादमियाँ खोल रही हैं।
रणनीतिक अहमियत
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन तीन वजहों से रणनीतिक है।
- आर्थिक। भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स बाज़ार 2030 तक 300 अरब डॉलर पार कर जाएगा। चिप की माँग का 25% भी देश के भीतर पूरा हो जाए तो हर साल 25-30 अरब डॉलर का आयात बचता है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा। रडार, मिसाइल, लड़ाकू विमान और उपग्रह — रक्षा के ये सारे मंच अब आधुनिक सिलिकॉन पर टिकते जा रहे हैं। अपने दम पर खड़े रहना है तो कुछ चिप देश में ही बननी चाहिए।
- भू-राजनीति। भारत ख़ुद को दुनिया की चिप सप्लाई चेन के लिए “चीन + 1” ठिकाने के रूप में खड़ा कर रहा है और अमेरिकी, जापानी, ताइवानी तथा यूरोपीय साझेदारों के साथ क्वाड की सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन पहल और भारत-अमेरिका iCET साझेदारी जैसे ढाँचों में काम कर रहा है।
चुनौतियाँ और अड़चनें
मिशन के सामने कई असली चुनौतियाँ हैं।
- तकनीक का फ़ासला। भारत का पहला व्यावसायिक फ़ैब 28 nm पर चलेगा। ताइवान और दक्षिण कोरिया के सबसे आगे वाले फ़ैब 3 nm पर हैं और 2 nm की ओर बढ़ रहे हैं।
- तंत्र की गहराई। एक आधुनिक फ़ैब को सैकड़ों सप्लायर चाहिए — सिलिकॉन वेफ़र, फ़ोटोरेज़िस्ट, बेहद शुद्ध गैसें, फ़ोटोमास्क, EUV से जुड़ी सामग्री। इनमें ज़्यादातर आयात होती हैं।
- पानी और बिजली। एक 28 nm फ़ैब हर दिन 1-1.5 करोड़ लीटर बेहद शुद्ध पानी और 100 MW से ऊपर बिजली खाता है। गुजरात ने इसके लिए अलग बुनियादी ढाँचा बनाया है, लेकिन लंबे समय तक यह टिकेगा या नहीं, यह सवाल बना हुआ है।
- हुनर की कमी। भारत में डिज़ाइन का हुनर मज़बूत है, लेकिन फ़ैब और उसके उपकरणों पर हाथ चलाने वाले इंजीनियर बहुत कम हैं। ऐसी कार्यशक्ति बनने में एक दशक लगेगा।
- चढ़ाव-उतार वाला उद्योग। मेमोरी की क़ीमतें तो ख़ास तौर पर तेज़ी से ऊपर-नीचे होती हैं, जिससे शुरुआती कमाई दब सकती है और एक के बाद एक चुनावों के बीच नीति पर टिके रहना मुश्किल हो जाता है।
आगे का रास्ता
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन नीति की घोषणा से ज़मीन पर काम शुरू होने तक ज़्यादातर लोगों की उम्मीद से जल्दी पहुँचा है। अगले चरण में चार क़दम ज़रूरी हैं: कंपाउंड सेमीकंडक्टर और एडवांस्ड पैकेजिंग को टिकाने के लिए ₹76,000 करोड़ की दूसरी क़िस्त, ऊपर की तरफ़ सामग्री और उपकरणों में गहराई, प्रस्तावित इंडिया सेमीकंडक्टर रिसर्च सेंटर में भरोसेमंद R&D, और पानी, बिजली तथा ट्रेनिंग पर राज्यों की लगातार मदद। ये चारों बैठ जाएँ तो भारत 2030 तक दुनिया के शीर्ष पाँच सेमीकंडक्टर पैकेजिंग और परिपक्व-नोड फ़ैब्रिकेशन ठिकानों में सचमुच जगह बना सकता है।
सामान्य प्रश्न
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन क्या है?
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन भारत सरकार का कार्यक्रम है, जो 15 दिसंबर 2021 को ₹76,000 करोड़ की रक़म के साथ शुरू हुआ, ताकि देश के भीतर सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले बनाने का पूरा तंत्र खड़ा हो सके। इसे MeitY के तहत डिजिटल इंडिया कॉर्पोरेशन के भीतर एक स्वतंत्र बिज़नेस डिवीज़न के रूप में चलाया जाता है।
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत कौन-कौन से फ़ैब मंज़ूर हुए हैं?
छह परियोजनाएँ मंज़ूर हुई हैं — साणंद में माइक्रोन, धोलेरा में टाटा-PSMC, साणंद में CG पावर-रेनेसास-स्टार्स, असम के जगीरोड में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स OSAT, साणंद में कायन्स टेक्नोलॉजी और उत्तर प्रदेश के जेवर में HCL-फ़ॉक्सकॉन।
मिशन के तहत कुल कितना निवेश तय हुआ है?
छह मंज़ूर परियोजनाओं में तय कुल निवेश ₹1.6 लाख करोड़ से ऊपर है।
डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव योजना क्या है?
DLI योजना की रक़म ₹1,000 करोड़ है और यह भारतीय सेमीकंडक्टर डिज़ाइन स्टार्टअप को चिप डिज़ाइन इंफ़्रास्ट्रक्चर, उत्पाद विकास पर प्रोत्साहन और तैनाती पर प्रोत्साहन के ज़रिए सहारा देती है। 2026 तक 40 से ज़्यादा स्टार्टअप इससे जुड़ चुके हैं।
ChipIN सेंटर क्या है?
ChipIN सेंटर C-DAC की बनाई एक वन-स्टॉप सुविधा है, जो भारतीय स्टार्टअप को रियायती दर पर व्यावसायिक EDA टूल, फ़ाउंड्री शटल सेवाएँ और पैकेजिंग की मदद देती है।
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन रणनीतिक रूप से अहम क्यों है?
स्मार्टफ़ोन और कारों से लेकर रक्षा के मंचों और AI के बुनियादी ढाँचे तक, सब कुछ सेमीकंडक्टर पर टिका है। देश में चिप बनने से आयात पर निर्भरता घटती है, रक्षा की सप्लाई चेन सुरक्षित होती है और भारत दुनिया की “चीन + 1” रणनीतियों में हिस्सा ले पाता है।
भारत का पहला फ़ैब किस प्रोसेस नोड पर काम करेगा?
धोलेरा में टाटा-PSMC का फ़ैब 28 nm प्रोसेस नोड पर वेफ़र बनाएगा — जो गाड़ियों, उपभोक्ता सामान और औद्योगिक इस्तेमाल के लिए ठीक है। दुनिया के सबसे आगे वाले फ़ैब 3 nm और उससे नीचे पर हैं।
मिशन के सामने सबसे बड़ी चुनौतियाँ क्या हैं?
दुनिया के अगुआ देशों से तकनीक का फ़ासला, सामग्री और उपकरणों वाला उथला तंत्र, पानी तथा बिजली की भारी खपत, फ़ैब का तजुर्बा रखने वाले लोगों की कमी और उद्योग का चढ़ाव-उतार — यही मुख्य चुनौतियाँ हैं।