परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसमें सबसे नई जनगणना के आँकड़ों के आधार पर चुनाव क्षेत्रों की सीमाएँ दोबारा खींची जाती हैं, ताकि हर सीट पर आबादी का प्रतिनिधित्व मोटे तौर पर बराबर रहे। भारत ने 1971 के बाद से नई आबादी के आँकड़ों पर लोकसभा क्षेत्रों की सीमाएँ दोबारा नहीं खींची हैं। यह रोक 2026 में ख़त्म हो रही है, और उसके बाद जो होगा वह भारतीय संघवाद की शक्ल बुनियादी तौर पर बदल सकता है।
UPSC सालों से संघवाद, सहकारी संघवाद और चुनाव आयोग पर सवालों के ज़रिये इस विषय की तरफ़ बढ़ता रहा है। 2026 और 2027 की मुख्य परीक्षा में सीधे सवाल की उम्मीद रखिए।
संवैधानिक आधार
अनुच्छेद 82 कहता है कि हर जनगणना के बाद संसद एक क़ानून बनाएगी, जिससे राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का फिर से बँटवारा हो और हर राज्य को क्षेत्रीय चुनाव क्षेत्रों में बाँटा जाए।
अनुच्छेद 170 राज्य विधानसभाओं के लिए यही काम करता है।
अनुच्छेद 327 संसद को संसद और राज्य विधानमंडलों के चुनावों से जुड़े क़ानून बनाने की ताक़त देता है, जिसमें परिसीमन भी शामिल है।
परिसीमन का असली काम एक स्वतंत्र परिसीमन आयोग करता है, जो परिसीमन आयोग अधिनियम के तहत बनता है। आयोग के आदेशों को क़ानून जैसी ताक़त हासिल है और किसी भी अदालत में उन पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
परिसीमन आयोगों का इतिहास
भारत में अब तक चार परिसीमन आयोग बने हैं:
| आयोग | साल | किस जनगणना पर | मुख्य नतीजे |
|---|---|---|---|
| पहला | 1952 | 1951 जनगणना | आज़ादी के बाद पहला परिसीमन, 489 लोकसभा सीटें |
| दूसरा | 1963 | 1961 जनगणना | नए आबादी आँकड़ों पर सीटों का फिर से बँटवारा |
| तीसरा | 1973 | 1971 जनगणना | आख़िरी बार जब आबादी के आधार पर राज्यों के बीच कुल लोकसभा सीटें फिर से बाँटी गईं |
| चौथा | 2002 | 2001 जनगणना | अध्यक्ष न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह; राज्यों के भीतर चुनाव क्षेत्रों की सीमाएँ बदलीं, लेकिन हर राज्य की कुल सीटें नहीं बदलीं |
चौथे परिसीमन आयोग ने अपना काम 2008 में पूरा किया। उसने 2001 की जनगणना के आँकड़ों पर हर राज्य के भीतर चुनाव क्षेत्रों की सीमाएँ दोबारा खींचीं और SC तथा ST के लिए आरक्षित सीटों का बँटवारा भी नए सिरे से किया। लेकिन सबसे अहम बात यह कि उसने किसी राज्य को मिलने वाली कुल सीटों की संख्या नहीं बदली, क्योंकि रोक तब भी लागू थी।
रोक: 42वाँ, 84वाँ और 87वाँ संशोधन
परिसीमन की बहस का केंद्र यही है, और UPSC उम्मीद करता है कि आपको संशोधनों की पूरी कड़ी ठीक-ठीक पता हो।
42वाँ संशोधन (1976)
आपातकाल के दौरान 42वें संविधान संशोधन ने राज्यों को लोकसभा सीटों का बँटवारा 1971 की जनगणना पर रोक दिया, और यह रोक 2001 की जनगणना के बाद तक के लिए थी। इसकी वजह साफ़ बताई गई थी: जिन राज्यों ने आबादी की रफ़्तार कामयाबी से थामी थी (ख़ास तौर पर दक्षिणी और पश्चिमी राज्य), उन्हें ज़्यादा आबादी बढ़ने वाले राज्यों (ख़ास तौर पर उत्तरी राज्यों) के हाथों संसदीय सीटें गँवाकर सज़ा नहीं भुगतनी चाहिए।
अगर यह रोक न होती, तो जनगणना पर होने वाला हर परिसीमन धीरे-धीरे सीटें दक्षिण से उत्तर की ओर खिसकाता रहता, और परिवार नियोजन के ख़िलाफ़ एक उल्टा ही लालच खड़ा हो जाता।
84वाँ संशोधन (2001)
रोक की मियाद ख़त्म होने को थी। 84वें संशोधन ने इस रोक को 2026 के बाद की पहली जनगणना तक बढ़ा दिया। इसका मतलब यह कि हर राज्य की कुल लोकसभा सीटें कम से कम 2026 के बाद होने वाली जनगणना तक 1971 के आबादी आँकड़ों पर ही टिकी रहेंगी।
84वें संशोधन ने 1991 की जनगणना के आँकड़ों पर राज्यों के भीतर चुनाव क्षेत्रों की सीमाएँ दोबारा खींचने की इजाज़त दी, बिना किसी राज्य की कुल सीटें बदले।
87वाँ संशोधन (2003)
इस संशोधन ने तय किया कि (राज्यों के भीतर) चुनाव क्षेत्रों का फिर से बँटवारा और SC/ST के लिए आरक्षित सीटों का फिर से बँटवारा 2001 की जनगणना पर होगा, 1991 की जनगणना पर नहीं। ग़ौर करने की बात यह है कि हर राज्य की कुल सीटें तब भी 1971 के स्तर पर ही रुकी रहीं।
छात्रों की आम ग़लती: 84वें और 87वें संशोधन को गड्डमड्ड कर देना। 84वें ने कुल सीटों का बँटवारा 2026 के बाद तक रोका। 87वें ने राज्यों के भीतर सीमाएँ दोबारा खींचने का जनगणना आधार 1991 से बदलकर 2001 किया। दोनों संशोधनों ने राज्यों के बीच कुल सीटों का बँटवारा नहीं बदला।
2026 की दिक़्क़त
यह रोक 2026 के बाद की पहली जनगणना के बाद ख़त्म होती है। भारत की आख़िरी पूरी हुई जनगणना 2011 में हुई थी। 2021 की जनगणना कोविड-19 की वजह से टलती रही और मार्च 2026 तक हुई नहीं है। अगली जनगणना जब भी होगी, वह नए सिरे से परिसीमन कराने की संवैधानिक ज़िम्मेदारी शुरू कर देगी।
अगर लोकसभा सीटें आज की आबादी के आधार पर दोबारा बाँटी गईं, तो बदलाव नाटकीय होगा।
सीटों के अनुमानित बँटवारे
| राज्य | मौजूदा सीटें (1971 के आधार पर) | अनुमानित सीटें (2026 के बाद की आबादी पर) | बदलाव |
|---|---|---|---|
| उत्तर प्रदेश | 80 | ~120+ | +40+ |
| बिहार | 40 | ~60+ | +20+ |
| मध्य प्रदेश | 29 | ~40+ | +11+ |
| राजस्थान | 25 | ~38+ | +13+ |
| तमिलनाडु | 39 | ~30 | -9 |
| केरल | 20 | ~14 | -6 |
| आंध्र प्रदेश + तेलंगाना | 42 | ~35 | -7 |
| कर्नाटक | 28 | ~25 | -3 |
ध्यान दें: अनुमान तरीक़े के हिसाब से बदलते हैं। ये आँकड़े दिशा दिखाने के लिए हैं, ठीक-ठीक संख्या नहीं हैं। अगर आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व बनाए रखा गया तो लोकसभा की कुल संख्या 543 से बढ़कर 750 से 900 से भी ऊपर जा सकती है।
आँकड़े साफ़ कहानी कहते हैं। कम जन्मदर वाले दक्षिणी राज्य सीटें गँवाते हैं। ज़्यादा जन्मदर वाले उत्तरी राज्य सीटें पाते हैं। यह ठीक वही उल्टा नतीजा है जिसे 42वाँ संशोधन रोकना चाहता था।
दक्षिणी राज्य क्यों एतराज़ करते हैं
एतराज़ सिर्फ़ सीटों की गिनती का नहीं है। यह वित्तीय संघवाद, शासन की गुणवत्ता और लोकतांत्रिक इंसाफ़ का मामला है।
GDP में हिस्सा बनाम प्रतिनिधित्व। दक्षिणी राज्य (तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना) अपनी आबादी के मुक़ाबले भारत की GDP में कहीं बड़ा हिस्सा देते हैं। तमिलनाडु और कर्नाटक भारत के सबसे बड़े आर्थिक इंजनों में हैं। उनका टैक्स उत्तरी राज्यों को होने वाले केंद्रीय हस्तांतरण का पैसा जुटाता है, और उसी वक़्त उनकी संसदीय हिस्सेदारी घटाना लोकतांत्रिक घाटा पैदा करता है।
अच्छी नीति की सज़ा। दक्षिणी राज्यों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार नियोजन में पैसा लगाया। आबादी थामने की उनकी कामयाबी का इनाम है राजनीतिक ताक़त गँवाना। इससे उल्टा ही लालच वाला ढाँचा बनता है।
भाषा और संस्कृति की चिंता। संसद में उत्तर का दबदबा बढ़ने से भाषा, शिक्षा और सांस्कृतिक मामलों पर राष्ट्रीय नीति ऐसी दिशा ले सकती है जो दक्षिणी राज्यों के हित में न हो।
संघीय संतुलन। भारत का संघीय ढाँचा आबादी पर टिके प्रतिनिधित्व (लोकसभा) और राज्यों पर टिके प्रतिनिधित्व (राज्यसभा) के बीच संतुलन पर चलता है। अगर लोकसभा उत्तरी राज्यों की तरफ़ भारी झुक गई, तो यह संघीय संतुलन बिगड़ जाएगा।
तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक के मुख्यमंत्री खुलकर चिंता जता चुके हैं। DMK, AIADMK, CPI(M) और दक्षिण के क्षेत्रीय दलों ने इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया है।
मुमकिन रास्ते
संविधान के जानकारों, राजनीति शास्त्रियों और संसदीय समितियों ने कई सुझावों पर बहस की है।
रास्ता 1: कुल सीटें बढ़ाओ, किसी राज्य की घटाओ मत
लोकसभा को 543 से बढ़ाकर 750 या 900 से भी ज़्यादा सीटों तक ले जाइए। उत्तरी राज्यों को आबादी बढ़ने के अनुपात में अतिरिक्त सीटें दीजिए, लेकिन दक्षिणी राज्यों की सीटें घटाइए मत। इससे मौजूदा प्रतिनिधित्व भी बचता है और आबादी में हुए बदलाव का जवाब भी मिल जाता है।
दिक़्क़त: 900 सदस्यों वाली लोकसभा पर कामकाज, ख़र्च और संसद की जगह को लेकर सवाल उठते हैं। नई संसद की इमारत 888 लोकसभा सदस्यों के हिसाब से बनाई गई है, जिससे लगता है कि यह रास्ता पहले से सोचा जा चुका था।
रास्ता 2: वोट का वज़न अलग-अलग
मौजूदा 543 सीटें वैसी ही रखिए, लेकिन ज़्यादा आबादी वाले राज्यों के सांसदों को संसद में ज़्यादा वोट वज़न दीजिए। उत्तर प्रदेश के सांसद का वोट वज़न 1.5 हो सकता है और केरल के सांसद का 1.0, ताकि आबादी का फ़र्क़ दिख जाए।
दिक़्क़त: इससे सांसदों के दो वर्ग बन जाते हैं, जो बराबर विधायी अधिकार के सिद्धांत को कमज़ोर करता है। संवैधानिक चुनौतियाँ पक्की हैं।
रास्ता 3: आबादी + विकास वाला फ़ॉर्मूला
सीटें ऐसे मिले-जुले सूचकांक पर बाँटिए जिसमें आबादी के साथ विकास के पैमाने (HDI, प्रति व्यक्ति आय, साक्षरता) भी जुड़े हों। जिन राज्यों ने विकास में पैसा लगाया है, उन्हें सज़ा के बजाय इनाम मिलेगा।
दिक़्क़त: ऐसा फ़ॉर्मूला बनाना जो संविधान की कसौटी पर भी टिके और सारे राज्यों को भी मंज़ूर हो, राजनीतिक तौर पर बेहद मुश्किल होगा।
रास्ता 4: राज्यसभा को मज़बूत कीजिए
अगर लोकसभा आबादी की तरफ़ ज़्यादा झुकती है, तो छोटे और दक्षिणी राज्यों को बचाने के लिए राज्यसभा की ताक़त बढ़ाइए। संघीय संतुलन से जुड़े ख़ास तरह के क़ानूनों पर राज्यसभा को वीटो का अधिकार दीजिए।
दिक़्क़त: इसके लिए दोनों सदनों के बीच संतुलन बदलने वाले संविधान संशोधन चाहिए, जिनका भारतीय संसद इतिहास में विरोध करती रही है।
रास्ता 5: रोक आगे बढ़ा दीजिए
संविधान संशोधन के ज़रिये रोक को 25 से 50 साल और बढ़ा दीजिए। यह सबसे कम टकराव वाला रास्ता है।
दिक़्क़त: इससे असली दिक़्क़त हल नहीं होती। उत्तरी राज्यों को प्रति व्यक्ति के हिसाब से सचमुच कम प्रतिनिधित्व मिला हुआ है। मामले को आगे टालना उसे सुलझाता नहीं।
एक देश एक चुनाव से जुड़ाव
एक साथ चुनाव (एक देश एक चुनाव) पर बनी राम नाथ कोविंद समिति ने अपनी रिपोर्ट 2024 में सौंपी थी, जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की सिफ़ारिश की गई। कुछ राजनीतिक विश्लेषक इस प्रस्ताव को परिसीमन की बहस से जोड़कर देखते हैं।
अगर परिसीमन और ONOE दोनों साथ-साथ लागू हुए, तो मिलाकर असर भारत के चुनावी ढाँचे के बड़े फेरबदल जैसा होगा। दक्षिणी राज्यों को डर है कि ये दोनों सुधार मिलकर उत्तर के राजनीतिक दबदबे को और पक्का कर देंगे।
भारतीय संविधान एक चलते-बदलते संघीय ढाँचे की कल्पना करता है। परिसीमन की बहस इसी की परीक्षा है कि भारत बराबर प्रतिनिधित्व के सिद्धांत (एक व्यक्ति, एक वोट, एक क़ीमत) और छोटे तथा ज़्यादा विकसित राज्यों को दबने से बचाने के संघीय सिद्धांत के बीच संतुलन बिठा पाता है या नहीं।
केंद्र शासित प्रदेशों और जम्मू-कश्मीर में परिसीमन
जम्मू एवं कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 (जिसने अनुच्छेद 370 हटाया और जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाया) के बाद चौथे परिसीमन आयोग के काम में जम्मू-कश्मीर भी शामिल था।
न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अगुआई वाले एक अलग परिसीमन आयोग ने जम्मू-कश्मीर का परिसीमन 2022 में पूरा किया। इसने कुल विधानसभा सीटें 83 से बढ़ाकर 90 कर दीं (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लिए आरक्षित 24 सीटों को छोड़कर)। ख़ास बात यह कि जम्मू क्षेत्र को 6 अतिरिक्त सीटें मिलीं जबकि कश्मीर को 1, जिससे दोनों क्षेत्रों के बीच पहले वाला संतुलन बदल गया।