तीन लोग, जिन्होंने शुरुआत मार्क्सवादी के तौर पर की और पहुँचे कहीं और। तीनों इस नतीजे पर पहुँचे कि असली दिक़्क़त पार्टी है: रॉय ने उसकी जगह संगठित लोकतंत्र रखा, लोहिया ने जाति को पहचानने वाला समाजवाद, जयप्रकाश ने नीचे से बनी समुदाय-आधारित व्यवस्था।
यह PSIR Optional Notes का 18वाँ अध्याय है, जो पेपर I के पाठ्यक्रम में भारतीय राजनीतिक चिंतन वाले हिस्से से आता है। पूरी किताब मुफ़्त डाउनलोड की जा सकती है।
UPSC पाठ्यक्रम
भारतीय राजनीतिक चिंतन: एम.एन. रॉय। (लोहिया और जयप्रकाश नारायण को यहाँ इसी दलील की समाजवादी धारा के रूप में लिया गया है; दोनों भाग IV में फिर आते हैं।)
एक पन्ने में
- एम.एन. रॉय ने 1920 में ताशकंद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बनाई, और उसी साल कॉमिन्टर्न की दूसरी कांग्रेस में लेनिन से इस बात पर बहस की कि कम्युनिस्टों को पूँजीवादी राष्ट्रवादी आंदोलनों का साथ देना चाहिए या नहीं। उनकी पूरक थीसिस का जवाब था — नहीं, या फिर सिर्फ़ शर्तों के साथ।
- उन्होंने मार्क्सवाद से नाता तोड़ा उसके नियतिवाद की वजह से, और इसलिए भी कि वह व्यक्ति को वर्ग के नीचे रख देता है, पार्टी के नीचे भी। उनका नतीजा था कि जो दर्शन इंसानों को औज़ार मानता है, वह ऐसा ही राज्य पैदा करेगा।
- आमूल मानवतावाद या नव-मानवतावाद (1947, बाईस सूत्र) व्यक्ति की आज़ादी को सबसे ऊपर रखता है, जिसकी जड़ें तर्क में हैं और ऐसे भौतिकवाद में हैं जो फिर भी इंसान की नैतिक ज़िम्मेदारी के लिए जगह छोड़ता है।
- उनका संस्थागत सुझाव है दलविहीन या संगठित लोकतंत्र: स्थानीय जन-समितियों का एक पिरामिड, जिनके पास असली ताक़त हो, और जहाँ प्रतिनिधि पाँच साल में एक बार नहीं, लगातार जवाबदेह रहें।
- लोहिया का मुख्य दावा यह है कि जो समाजवाद वर्ग की जाँच करे और जाति को छोड़ दे, वह भारत में चल ही नहीं सकता। जाति जमा हुआ वर्ग है, वर्ग बहती हुई जाति है।
- उनका कार्यक्रम: सप्तक्रांति, यानी सात एक साथ चलने वाली क्रांतियाँ; चौखंभा राज; पिछड़ी जातियों के लिए विशेष अवसर; और चुनावी रणनीति के तौर पर ग़ैर-कांग्रेसवाद।
- जयप्रकाश नारायण मार्क्सवाद से गांधीवादी सर्वोदय तक गए, और 1974 में संपूर्ण क्रांति तक, इस मान्यता के साथ कि पार्टी की राजनीति ख़ुद ही भ्रष्ट कर देती है।
- उनकी A Plea for Reconstruction of Indian Polity (1959) गाँव के समुदायों से ऊपर की ओर बना लोकतंत्र सुझाती है, और 1974 के आंदोलन का सैद्धांतिक आधार यही किताब है।
एम.एन. रॉय
विचारक
मानवेंद्र नाथ रॉय (1887–1954)
मुख्य रचनाएँ। दूसरी कॉमिन्टर्न कांग्रेस की पूरक थीसिस (1920), India in Transition (1922), Reason, Romanticism and Revolution (1952–55), New Humanism: A Manifesto (1947), Radical Humanist
मूल दावा। मार्क्सवाद का आर्थिक नियतिवाद इंसान की नैतिक ज़िम्मेदारी को समझा ही नहीं पाता, और व्यक्ति को वर्ग के नीचे, पार्टी के नीचे रखकर वह ठीक वही ज़ुल्म पैदा करता है जिसे ख़त्म करने का वादा था। सही बुनियाद है व्यक्ति की संप्रभुता, जो तर्क पर टिकी हो; और सही राजनीति है दलविहीन लोकतंत्र, जो स्थानीय समितियों पर बना हो और जहाँ ताक़त सीधे इस्तेमाल होती हो।
आम आलोचना। दलविहीन लोकतंत्र यह नहीं बताता कि बड़े पैमाने पर अलग-अलग कार्यक्रमों को एक जगह कैसे जोड़ा जाए, बिना ऐसे संगठनों के जो असल में पार्टी का ही काम करें। और उनका अपना आंदोलन, रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी, चुनावों में कहीं टिका ही नहीं, इसलिए यह सिद्धांत कभी परखा ही नहीं गया।
परीक्षा में पकड़। UPSC ने 2024 में पूछा कि क्या उनका चिंतन मार्क्सवाद के मानवतावादी पहलुओं को उभारता है। सवाल एकदम सही है: वे मार्क्सवाद के भीतर से शुरू हुए, और उसी की मानवतावादी मान्यताओं को दबाते-दबाते बाहर निकल गए।
मार्क्सवादी दौर, और लेनिन से बहस
रॉय का शुरुआती सफ़र बंगाल के क्रांतिकारी राष्ट्रवाद से शुरू होकर दक्षिण-पूर्व एशिया में हथियार जुटाने के एक मिशन से होते हुए मेक्सिको पहुँचा, जहाँ उन्होंने मैक्सिकन कम्युनिस्ट पार्टी बनाने में मदद की, और वहाँ से मॉस्को। 1920 में कॉमिन्टर्न की दूसरी कांग्रेस में उन्होंने लेनिन की औपनिवेशिक थीसिस के जवाब में अपनी पूरक थीसिस रखी।
लेनिन का रुख़ यह था कि उपनिवेशों के कम्युनिस्टों को पूँजीवादी-लोकतांत्रिक राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों का साथ एक पड़ाव के तौर पर देना चाहिए। रॉय का जवाब तीन हिस्सों का था: औपनिवेशिक पूँजीपति वर्ग के भौतिक हित साम्राज्यवाद से बँधे हैं, इसलिए वह समझौता कर लेगा; किसानों-मज़दूरों का अपना क्रांतिकारी आंदोलन पहले से मौजूद है, जिसे सीधे खड़ा किया जाना चाहिए; और यूरोप की क्रांति का भविष्य उपनिवेशों पर उससे कहीं ज़्यादा टिका है जितना कॉमिन्टर्न मानता है। कांग्रेस ने दोनों को संशोधित रूप में अपनाया, और लेनिन की भाषा को नरम करके पूँजीवादी-लोकतांत्रिक से राष्ट्रीय-क्रांतिकारी कर दिया गया। इसके बाद रॉय ने अक्तूबर 1920 में ताशकंद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बनाई, और 1929 में उन्हें कॉमिन्टर्न से निकाल दिया गया।
नाता टूटना, और आमूल मानवतावाद
यह नाता धीरे-धीरे टूटा, और इसकी वजहें ही उन पर लिखे किसी भी उत्तर का असली माल हैं।
- नियतिवाद के ख़िलाफ़। अगर चेतना उत्पादन के तरीक़े से तय होती है, तो इंसान कर्ता नहीं, नतीजा भर रह जाता है, और नैतिक फ़ैसले का कोई मतलब ही नहीं बचता। रॉय इसके उलट मानते हैं कि विचारों की अपनी कारण-शक्ति है, और आज़ादी की चाह इतिहास का सबसे गहरा तथ्य है — जीव-विज्ञान में यह जीने की लड़ाई बनकर आती है, समाज में स्वतंत्रता की माँग बनकर।
- पार्टी के ख़िलाफ़। जो हरावल दस्ता यह दावा करता है कि वह किसी वर्ग का ऐतिहासिक हित जानता है, वह असली इंसानों को उसी दावे के नीचे दबा देगा। सोवियत अनुभव पर उनका फ़ैसला यह है कि सर्वहारा की तानाशाही सर्वहारा पर एक पार्टी की तानाशाही बन गई।
- हर तरह के सामूहिकतावाद के ख़िलाफ़। राष्ट्रवाद हो या साम्यवाद, दोनों एक अमूर्त चीज़ — राष्ट्र या वर्ग — को मूल्य का वाहक बना देते हैं, और व्यक्ति को साधन मान लेते हैं। रॉय का नारा है कि इंसान ही पैमाना है, इंसान ही रचने वाला।
- तर्क के पक्ष में। Reason, Romanticism and Revolution (1952–55) प्रबोधन (Enlightenment) के वादे को पकड़ती है, और कहती है कि आधुनिक अधिनायकवाद उस वादे के पूरा होने से नहीं, उसके साथ हुए धोखे से पैदा हुआ।
नव-मानवतावाद (1947) बाईस सूत्रों में उनका रचनात्मक सिद्धांत रखता है। इसके मुख्य दावे: इंसान ही समाज का मूल रूप है, और सहकारी सामाजिक रिश्ते इसीलिए हैं कि व्यक्ति का विकास हो सके; आज़ादी का मतलब है व्यक्ति की संभावनाओं के खुलने में आने वाली रुकावटें एक-एक कर हटाना; तर्क एक जैविक गुण है, और नैतिकता की जड़ वहीं है, इसलिए नैतिकता को किसी ईश्वरीय मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं; और राजनीति को इस कसौटी पर परखा जाए कि वह अभी, इसी वक़्त, व्यक्ति की असली आज़ादी बढ़ाती है या नहीं — किसी भावी समाज के वादे पर नहीं।
दलविहीन लोकतंत्र
संस्थागत सुझाव इसी से निकलता है। रॉय की नज़र में संसदीय लोकतंत्र सहमति का रूप देता है, सार नहीं: पार्टियाँ राय ज़ाहिर करने के लिए नहीं, सत्ता के लिए लड़ती हैं; वोटर का काम पर्ची डालते ही ख़त्म हो जाता है; और प्रतिनिधित्व पर संगठन क़ब्ज़ा कर लेता है।
उनका विकल्प, जो रैडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ और 1948 में उसके भंग होने के बाद खुला, है संगठित लोकतंत्र: गाँव और मोहल्ले के स्तर पर जन-समितियों का जाल, जिनके पास सचमुच प्रशासनिक-विधायी काम हों, जो ऊपर की ओर आपस में जुड़ी हों, जहाँ उम्मीदवार पार्टी के लेबल पर नहीं अपनी योग्यता पर खड़े हों, और जहाँ वापस बुलाने का हक़ हर वक़्त मौजूद रहे। इससे पहले एक दार्शनिक क्रांति ज़रूरी है, यानी शिक्षा से आया नज़रिये का बड़ा बदलाव। यही वजह है कि उन्होंने अपनी ज़िंदगी का आख़िरी हिस्सा पार्टी नहीं, अध्ययन-मंडलियाँ चलाते हुए बिताया। साफ़ आपत्ति यह है, जिसका उन्होंने कभी संतोषजनक जवाब नहीं दिया, कि राष्ट्रीय पैमाने पर समितियों का कोई भी टिकाऊ तालमेल आख़िरकार वही चीज़ दोबारा खड़ी कर देगा जो काम पार्टी करती है।
राममनोहर लोहिया
विचारक
राममनोहर लोहिया (1910–1967)
मुख्य रचनाएँ। Wheel of History (1955), Marx, Gandhi and Socialism (1963), The Caste System (1964), Interval During Politics (1965)
मूल दावा। भारतीय समाजवाद को जाति उतनी ही गंभीरता से लेनी होगी जितनी वर्ग को, क्योंकि यहाँ हैसियत और संपत्ति आपस में जुड़ी हुई हैं: जाति जमा हुआ वर्ग है, वर्ग बहती हुई जाति है। इसलिए बराबरी के लिए पिछड़ों को विशेष अवसर देने पड़ेंगे, और समाजवाद औद्योगिक परिपक्वता के बाद नहीं, अभी लाना होगा।
आम आलोचना। विशेष अवसर वाले कार्यक्रम पर यह आलोचना होती रही है कि इसने जाति की पहचान को राजनीति का सिक्का बनाकर और पक्का कर दिया। अमेरिकी और सोवियत, दोनों गुटों से बराबर दूरी वाला उनका सिद्धांत कहने में जितना आसान था, अमल में उतना नहीं।
परीक्षा में पकड़। उत्तर भारत की पिछड़ा-वर्ग राजनीति की, और 1967 के कांग्रेस-विरोधी गठबंधनों की बौद्धिक जड़। भाग IV में जाति और दलीय व्यवस्था वाले अध्यायों के लिए यह ज़रूरी पृष्ठभूमि है।
उनके कार्यक्रम के चार हिस्से परीक्षा में आते हैं।
सप्तक्रांति, यानी सात क्रांतियाँ, उनका यह बयान है कि समाजवाद को एक साथ किन चीज़ों पर हमला करना है: स्त्री-पुरुष की ग़ैर-बराबरी; रंग के आधार पर बनी ग़ैर-बराबरी; श्रेणीबद्ध पिछड़ेपन के ज़रिए चलने वाली जातिगत ग़ैर-बराबरी; उपनिवेश बनाने वाले और उपनिवेश बने देशों के बीच की ग़ैर-बराबरी; आर्थिक ग़ैर-बराबरी के साथ नियोजित उत्पादन; निजी ज़िंदगी में दख़ल, यानी व्यक्ति की आज़ादी का बचाव; और हथियारों के ख़िलाफ़ सत्याग्रह के पक्ष में क्रांति।
चौखंभा राज सत्ता को चार खंभों में बाँटता है — गाँव, ज़िला, प्रांत, केंद्र — जिनमें से हर एक के पास अपना पक्का दायरा हो, अपने संसाधन हों। यह जान-बूझकर उस दो-मंज़िला संघवाद के उलट रखा गया है जिसमें नीचे की इकाइयाँ बस प्रशासनिक सुविधा भर होती हैं।
विशेष अवसर उनका सबसे बड़े नतीजे वाला सुझाव है: आरक्षण सिर्फ़ अनुसूचित जातियों के लिए नहीं, पिछड़ी जातियों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों के लिए भी। दलील यह है कि जिस समाज में मौक़े पीढ़ी-दर-पीढ़ी बाँटे गए हों, वहाँ काग़ज़ी बराबरी उसी बँटवारे पर मुहर लगा देती है। समाजवादी भर्ती पर उनका यह नारा कि साठ फ़ीसदी जगहें पिछड़ों को मिलें, मंडल वाली दलील का पुरखा है।
ग़ैर-कांग्रेसवाद इसी का चुनावी नतीजा है। कांग्रेस का दबदबा सबसे ऊपर वाले तबक़े और सबसे नीचे वाले तबक़े के गठजोड़ पर टिका था, इसलिए लोहिया की दलील थी कि सारे विपक्षी दल वैचारिक दूरी की परवाह किए बिना उसके ख़िलाफ़ एक हो जाएँ। 1967 के चुनाव और कई राज्यों की संयुक्त विधायक दल सरकारें इसी का नतीजा थीं।
जयप्रकाश नारायण
विचारक
जयप्रकाश नारायण (1902–1979)
मुख्य रचनाएँ। Why Socialism? (1936), A Plea for Reconstruction of Indian Polity (1959), Swaraj for the People (1961), Total Revolution (1974–75)
मूल दावा। पश्चिमी ढर्रे का संसदीय लोकतंत्र ताक़त को पार्टियों में और राज्य में समेट देता है, और नागरिक के हाथ में सिर्फ़ एक वोट रह जाता है, उसके अलावा कुछ नहीं। असली लोकतंत्र नीचे से, अपना शासन चलाने वाले समुदायों से बनना चाहिए; और चूँकि पार्टियाँ ख़ुद इसमें रुकावट हैं, इसलिए इसके लिए चलने वाला आंदोलन ग़ैर-दलीय होना चाहिए। 1974 में उन्होंने इसी दलील को संपूर्ण क्रांति का रूप दे दिया, यानी सात क्षेत्रों में एक साथ चलने वाला बदलाव।
आम आलोचना। 1974–75 के आंदोलन ने ऐसे संगठनों से हाथ मिलाया जिनकी प्रतिबद्धताएँ उनकी अपनी प्रतिबद्धताओं से बहुत दूर थीं, और आपातकाल ख़त्म होने के बाद कोई संस्थागत कार्यक्रम था ही नहीं। इसलिए वह नैतिक ऊर्जा जनता सरकार के ढहने में बिखर गई।
परीक्षा में पकड़। गांधीवादी सर्वोदय और जन-स्तर की सत्ता-विरोधी राजनीति के बीच का पुल, और 1975 के आपातकाल की तुरंत पहले वाली पृष्ठभूमि।
असली बात उनका सफ़र है। 1930 के दशक में वे मार्क्सवादी थे, 1934 में कांग्रेस समाजवादी पार्टी के संस्थापकों में थे, और भारत छोड़ो आंदोलन में भूमिगत नेता थे। 1954 में उन्होंने जीवनदान किया, यानी अपना जीवन विनोबा भावे के भूदान आंदोलन को सौंप दिया, और पार्टी की राजनीति से पूरी तरह हट गए।
सिद्धांत A Plea for Reconstruction of Indian Polity (1959) में है। दलील यह है कि पश्चिमी संसदीय व्यवस्था ऐसे समाज पर ऊपर से चिपकाई गई जो समुदायों में बँटा हुआ था, और सच्ची भारतीय व्यवस्था समुदाय-आधारित लोकतंत्र पर बनेगी: गाँव का समुदाय बुनियादी इकाई हो, जिसके पास असली ताक़त हो; ऊपर ज़िला-राज्य के स्तर पर अप्रत्यक्ष चुनाव हों; फ़ैसले जहाँ तक हो सके बहुमत से नहीं, सहमति से हों; और पार्टियों की होड़ कम से कम रहे। उन्होंने इसके लिए दलविहीन लोकतंत्र नाम भी क़बूल किया, और गांधी के महासागरीय वृत्तों का सहारा लिया।
संपूर्ण क्रांति का ऐलान 1974 में पटना में हुआ, जिसने बिहार में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ चल रहे छात्र आंदोलन को एक आम कार्यक्रम में बदल दिया। उनके अपने शब्दों में इसके सात हिस्से हैं: सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, वैचारिक या बौद्धिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक क्रांति — सब एक साथ, सब अहिंसक तरीक़े से। पुलिस और प्रशासन से उनकी यह अपील कि वे अन्यायपूर्ण आदेश न मानें, और बिहार विधानसभा भंग करने की उनकी माँग — यही 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा की तुरंत वजह बने।
| एम.एन. रॉय | लोहिया | जयप्रकाश नारायण | |
|---|---|---|---|
| मार्क्सवाद से नाता क्यों टूटा | नियतिवाद, और व्यक्ति को नीचे रख देना | जाति को न देख पाना; यूरोप से उठाया गया वर्ग-विश्लेषण | साधन साध्य को बिगाड़ते हैं; ताक़त एक जगह जमा हो तो बिगाड़ती है |
| सबसे ऊपर क्या | व्यक्ति की आज़ादी, जो तर्क पर टिकी हो | बराबरी, जिसकी असली धुरी जाति है | समुदाय का अपना शासन, और नैतिक पुनर्जन्म |
| तरीक़ा | शिक्षा के ज़रिए दार्शनिक क्रांति | तुरंत समाजवाद, आंदोलन, चुनावी गठजोड़ | पहले सर्वोदय, फिर ग़ैर-दलीय जन-आंदोलन |
| संस्थागत सुझाव | जन-समितियाँ; दलविहीन संगठित लोकतंत्र | चौखंभा राज; विशेष अवसर | गाँव से ऊपर की ओर बना समुदाय-आधारित लोकतंत्र |
| पार्टियों पर रुख़ | ख़त्म कर दो; उम्मीदवार अपनी योग्यता पर | इस्तेमाल करो, कांग्रेस के ख़िलाफ़ जोड़कर | किनारे कर दो; औज़ार आंदोलन है |
| विरासत | आमूल मानवतावाद; छोटी पर टिकाऊ बौद्धिक धारा | पिछड़ा-वर्ग राजनीति; मंडल; 1967 के गठबंधन | 1974 का आंदोलन; आपातकाल; जनता वाला प्रयोग |
बहस: क्या एम.एन. रॉय ने मार्क्सवाद को इंसानी चेहरा दिया, या उसे छोड़ दिया?
इंसानी चेहरा दिया। रॉय ने मार्क्सवाद की अपनी ही मान्यताओं को उनके अंजाम तक पहुँचाया। 1844 की पांडुलिपियों वाले युवा मार्क्स ने अलगाव को और प्रजाति-सत्ता (species-being) को केंद्र में रखा था, और रॉय का यह ज़ोर कि व्यक्ति साध्य है, समूह साधन, उसी मानवतावाद को स्तालिनी बिगाड़ के सामने दोहराता है। उन्होंने भौतिकवाद भी रखा, शोषण की आलोचना भी रखी, और यह माँग भी रखी कि दर्शन अमल में उतरे। छोड़ दिया। जैसे ही आर्थिक निर्धारण से इनकार किया, वर्ग इतिहास का इंजन नहीं रह जाता, और यह उम्मीद करने की कोई वजह नहीं बचती कि सर्वहारा किसी चीज़ का कर्ता होगा। रॉय की अपील तर्क से है, शिक्षा से है — यानी वही प्रबोधन वाला उदारवाद, जिससे आगे जाने के लिए मार्क्स चले थे। जिस सिद्धांत में न वर्ग-संघर्ष हो, न क्रांति, न पार्टी, वह मार्क्सवाद का सुधरा हुआ रूप नहीं, उसकी जगह रखी गई कोई और चीज़ है। परीक्षक वाली लाइन। 2024 के सवाल की भाषा — “मार्क्सवाद के मानवतावादी पहलुओं को उभारा” — उनके सफ़र का सही वर्णन है, पर मंज़िल को कम करके बताती है। लिखिए कि वे आमूल मानवतावाद तक मार्क्स के मानवतावाद को गंभीरता से लेकर पहुँचे, और जहाँ पहुँचे वह अब मार्क्सवाद नहीं है, क्योंकि जो सिद्धांत ऐतिहासिक भौतिकवाद छोड़ दे और वर्ग-कर्ता भी, वह अपनी पहचान वाली चीज़ ही छोड़ चुका है। साथ में फ़्रैंकफ़र्ट स्कूल की समानता भी दर्ज कीजिए, जो इतनी ही दूर गया पर नाम अपने पास रखे रहा।
जाति जमा हुआ वर्ग है, और वर्ग बहती हुई जाति है
राममनोहर लोहिया, The Caste System, 1964
इंसान ही हर चीज़ का पैमाना है; इंसान ही अपनी नियति का रचनाकार है
एम.एन. रॉय, New Humanism: A Manifesto, 1947
जहाँ उत्तर नंबर गँवाते हैं
- रॉय के आमूल मानवतावाद को उनकी बुढ़ापे की सनक मान लेना। यह उस लंबी दलील का नतीजा है जो 1920 में लेनिन से उनकी असहमति से शुरू होती है।
- यह लिख देना कि दूसरी कांग्रेस में रॉय लेनिन से सहमत थे। उनकी पूरक थीसिस पूँजीवादी राष्ट्रवाद को समर्थन देने के सवाल पर उल्टा रुख़ थी, और दोनों संशोधित रूप में अपनाई गईं।
- लोहिया को सिर्फ़ कांग्रेस-विरोधी रणनीतिकार बना देना। उन्हें राजनीतिक चिंतक वह सैद्धांतिक दावा बनाता है कि जाति और वर्ग एक ही चीज़ की दो हालतें हैं।
- लोहिया की सप्तक्रांति को जेपी की संपूर्ण क्रांति समझ लेना। दोनों में सात-सात हिस्से हैं, पर सूचियाँ अलग हैं, मक़सद भी अलग; इन्हें ठीक-ठीक गिना देना आसान नंबर हैं।
- संपूर्ण क्रांति पर A Plea for Reconstruction of Indian Polity (1959) के बिना लिख देना। 1974 का आंदोलन मौक़े पर गढ़ा नहीं गया था; उसका सिद्धांत पंद्रह साल पुराना था।
- नतीजा छोड़ देना। जेपी के आंदोलन ने आपातकाल को उकसाया, जनता सरकार बनवाई, और उसका बिखर जाना भी आकलन का हिस्सा है।
पहले पूछा जा चुका है
- मानवेंद्र नाथ रॉय के राजनीतिक चिंतन ने मार्क्सवाद के मानवतावादी पहलुओं को उभारा। चर्चा कीजिए। (2024, पेपर I, 15 अंक)
उत्तर का ढाँचा
मानवेंद्र नाथ रॉय के राजनीतिक चिंतन ने मार्क्सवाद के मानवतावादी पहलुओं को उभारा। चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
शुरुआत। इस बात को उनके सफ़र के वर्णन के रूप में मान लीजिए, फिर परखिए कि मंज़िल अब भी मार्क्सवाद है या नहीं। यही ढाँचा ही उत्तर है।
मार्क्सवादी पहचान। 1920 में ताशकंद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक; उसी साल दूसरी कॉमिन्टर्न कांग्रेस में लेनिन के ख़िलाफ़ पूरक थीसिस, जिसमें दलील थी कि औपनिवेशिक पूँजीपति वर्ग समझौता कर लेगा; 1929 में निष्कासन।
मार्क्स में उन्हें मानवतावादी क्या लगा। 1844 की पांडुलिपियों का अलगाव और प्रजाति-सत्ता; यह माँग कि दर्शन असली इंसानी ज़िंदगियों को बदलने में उतरे।
उन्होंने क्या ठुकराया, और क्यों। आर्थिक नियतिवाद, जो इंसानों को कर्ता नहीं नतीजा बना देता है और नैतिक फ़ैसले को बेमानी कर देता है। पार्टी, जो असली व्यक्तियों को किसी दावा किए गए ऐतिहासिक हित के नीचे दबा देती है। सोवियत नतीजे पर उनका फ़ैसला: सर्वहारा पर एक पार्टी की तानाशाही।
सकारात्मक सिद्धांत। नव-मानवतावाद, 1947, बाईस सूत्र: व्यक्ति की आज़ादी सबसे ऊपर, तर्क एक जैविक गुण जिस पर नैतिकता टिकी है, सहकारी रिश्ते व्यक्ति के विकास का साधन। प्रबोधन के साथ हुए धोखे पर Reason, Romanticism and Revolution (1952–55)।
संस्थागत रूप। दलविहीन संगठित लोकतंत्र: जन-समितियों के पास असली ताक़त, उम्मीदवार अपनी योग्यता पर, जवाबदेही लगातार, और इन सबसे पहले शिक्षा के ज़रिए एक दार्शनिक क्रांति।
आकलन। सफ़र सचमुच मानवतावादी है, पर मंज़िल ऐतिहासिक भौतिकवाद को छोड़ देती है, वर्ग-कर्ता को भी। इसलिए इसे मानवतावादी मार्क्सवाद कहने के बजाय आमूल मानवतावाद कहना ज़्यादा सही है। अंत व्यावहारिक आपत्ति पर कीजिए: दलविहीन लोकतंत्र यह बताता ही नहीं कि राष्ट्रीय पैमाने पर कार्यक्रम एक जगह कैसे जुड़ेंगे, और उनकी अपनी पार्टी की चुनावी नाकामी ने इसे कभी परखा ही नहीं।
आख़िरी दौर का रिवीज़न
- रॉय: मैक्सिकन कम्युनिस्ट पार्टी; 1920 की दूसरी कॉमिन्टर्न कांग्रेस में लेनिन की औपनिवेशिक थीसिस के ख़िलाफ़ पूरक थीसिस; अक्तूबर 1920 में ताशकंद में CPI; 1929 में कॉमिन्टर्न से निष्कासन।
- नाता टूटना: नियतिवाद के ख़िलाफ़, पार्टी के ख़िलाफ़, सामूहिकतावाद के ख़िलाफ़; तर्क के पक्ष में। Reason, Romanticism and Revolution (1952–55)।
- नव-मानवतावाद 1947, बाईस सूत्र; इंसान पैमाना भी, रचनाकार भी; दलविहीन या संगठित लोकतंत्र; जन-समितियाँ; पहले दार्शनिक क्रांति।
- लोहिया: जाति जमा हुआ वर्ग, वर्ग बहती हुई जाति; सप्तक्रांति, सात क्रांतियाँ; चौखंभा राज, चार खंभे; विशेष अवसर; ग़ैर-कांग्रेसवाद और 1967 की SVD सरकारें।
- जेपी: कांग्रेस समाजवादी पार्टी 1934; भारत छोड़ो में भूमिगत; 1954 में भूदान को जीवनदान; A Plea for Reconstruction of Indian Polity (1959) — समुदाय-आधारित लोकतंत्र, सहमति, ऊपर की ओर अप्रत्यक्ष चुनाव।
- संपूर्ण क्रांति, पटना 1974: सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, वैचारिक, शैक्षिक, आध्यात्मिक; अहिंसक; 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा।
आगे पढ़िए। यह अध्याय पूरी PSIR Optional Notes के 58 अध्यायों में से एक है, जिसमें पेपर I और पेपर II दोनों पूरे कवर हैं — मुफ़्त डाउनलोड।