मार्क्स ने बताया कि मज़दूर वर्ग को बग़ावत क्यों करनी चाहिए। बग़ावत नहीं हुई, तो फ़ासीवादी जेल में बैठे ग्राम्शी ने बताया कि क्यों नहीं हुई: विकसित समाज में शासन सहमति के दम पर टिकता है, और ताक़त हारने से पहले सहमति को हराना पड़ता है।
यह PSIR Optional Notes का 13वाँ अध्याय है, जो पेपर I के पश्चिमी राजनीतिक चिंतन वाले हिस्से से आता है। पूरी किताब मुफ़्त डाउनलोड की जा सकती है।
UPSC पाठ्यक्रम
पश्चिमी राजनीतिक चिंतन: मार्क्स, ग्राम्शी।
एक पन्ने में
- ऐतिहासिक भौतिकवाद तरीक़ा है: उत्पादन का ढंग ही सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक ज़िंदगी की शर्तें तय करता है, और चेतना सामाजिक अस्तित्व को नहीं, सामाजिक अस्तित्व चेतना को तय करता है।
- द्वंद्ववाद हेगेल से लिया गया है, फिर उलट दिया गया है। हेगेल इसे आत्मा की चाल में पाते हैं; मार्क्स इसे उत्पादन की शक्तियों और उत्पादन संबंधों के बीच के भौतिक टकराव में रखते हैं।
- 1844 की पांडुलिपियों वाले अलगाव के चार पहलू हैं: उत्पाद से, मेहनत करने की क्रिया से, प्रजाति-सत्ता से, और बाक़ी लोगों से। मार्क्स का मानवतावादी सुर यहीं है।
- अतिरिक्त मूल्य उनकी पकी हुई आर्थिक दलील है: श्रम शक्ति अपने पूरे मूल्य पर ही ख़रीदी जाती है, वह अपनी लागत से ज़्यादा मूल्य बनाती है, और यह फ़र्क़ मालिक हड़प लेता है।
- वर्ग संघर्ष इतिहास का इंजन है; राज्य दबदबे वाले वर्ग का औज़ार है; क्रांति के बाद सर्वहारा की तानाशाही आती है और आख़िर में वर्गहीन, राज्यहीन समाज।
- ग्राम्शी इसमें वर्चस्व (hegemony) जोड़ते हैं: पश्चिम में शासक वर्ग नागरिक समाज के भीतर नैतिक और बौद्धिक अगुआई के दम पर राज करता है, इतना कि उसका नज़रिया ही आम समझ बन जाता है।
- इसलिए रणनीति बदल जाती है। सीधे हमले की जंग (war of manoeuvre), यानी राज्य पर आमने-सामने का क़ब्ज़ा, उन समाजों के लिए है जहाँ राज्य ही सब कुछ है; मोर्चा जमाने की जंग (war of position), यानी सांस्कृतिक अगुआई की लंबी लड़ाई, उनके लिए जहाँ नागरिक समाज घना है।
- जैविक बुद्धिजीवी, ऐतिहासिक गुट और निष्क्रिय क्रांति इसी से निकले हुए विचार हैं, और आख़िरी वाला भारत के रास्ते को समझाने में ख़ूब बरता गया है।
मार्क्स
विचारक
कार्ल मार्क्स (1818–1883)
मुख्य रचनाएँ। Economic and Philosophic Manuscripts (1844), The German Ideology (1845–46), The Communist Manifesto (1848), A Contribution to the Critique of Political Economy (1859), Capital, Volume I (1867)
मूल दावा। इंसान का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास है, जिसे उत्पादन की बढ़ती शक्तियों और उन्हें जकड़ने वाले संपत्ति संबंधों का टकराव चलाता है। पूँजीवाद में मेहनत अलगाव की शिकार होती है और अतिरिक्त मूल्य हड़प लिया जाता है; और सर्वहारा, जिसे पूँजीवाद ने ख़ुद पैदा किया है, उसी को हटाने वाला कर्ता बन जाता है।
आम आलोचना। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में न वैसा ध्रुवीकरण हुआ, न वैसी बदहाली, और यही बर्नस्टाइन का संशोधनवादी नुक़्ता है; यह सिद्धांत अधिरचना के बारे में इतना कम तय करता है कि एंगेल्स को बाद में शर्तें जोड़नी पड़ीं; और पॉपर की दलील है कि यह ढाँचा हर उलटे सबूत को पचा जाता है।
परीक्षा में पकड़। मार्क्स पाठ्यक्रम में तीन जगह आते हैं: यहाँ पश्चिमी राजनीतिक चिंतन के रूप में, अध्याय 8 में विचारधारा के रूप में, और अध्याय 2 में राज्य के सिद्धांत के रूप में। तीनों सुर अलग-अलग रखिए।
हेगेल को उलट देना
हेगेल का द्वंद्ववाद आत्मा के आत्म-चेतना की तरफ़ बढ़ने में टकराव और उसके हल की चाल है, जिसमें इतिहास उसका खुलना है और राज्य उसका सबसे ऊँचा नैतिक रूप। मार्क्स ढाँचा रख लेते हैं और भीतर की सामग्री ख़ारिज कर देते हैं। उन्होंने लिखा कि हेगेल के यहाँ द्वंद्ववाद सिर के बल खड़ा है; उसे सीधा करना होगा, तभी रहस्य के छिलके के भीतर छिपी अक्ल की गुठली मिलेगी।
द्वंद्वात्मक भौतिकवाद इसीलिए टकराव को विचारों में नहीं, भौतिक हालात में रखता है, और विचारों को उन्हीं हालात से पैदा हुआ मानता है। फ़ायरबाख़ से वे धर्म की यह आलोचना लेते हैं कि आदमी ख़ुद से अलगाव में पड़कर अपनी ही ताक़त किसी देवता पर डाल देता है, और फिर इसे और आगे बढ़ाते हैं: धर्म दबे हुए प्राणी की आह है, बेदिल दुनिया का दिल है, और लोगों की अफ़ीम है। लेकिन फ़ायरबाख़ का भौतिकवाद देखने-भर तक रह जाता है, और Theses on Feuerbach (1845) की ग्यारहवीं थीसिस वह सुधार बताती है जो मार्क्सवाद को अमल (praxis) के रूप में परिभाषित करता है।
अलगाव
यह जवान मार्क्स की श्रेणी है, जो 1844 की पांडुलिपियाँ 1932 में छपने पर वापस मिली, और बीसवीं सदी में मानवतावादी मार्क्सवाद इसी की वजह से मुमकिन हुआ। जिन हालात में मज़दूर अपनी श्रम शक्ति बेचता है, वहाँ:
- उत्पाद से। मज़दूर जो बनाता है वह किसी और का है और उसके सामने एक पराई ताक़त बनकर खड़ा हो जाता है; वह जितना ज़्यादा बनाता है, उसकी अपनी भीतरी दुनिया उतनी ग़रीब होती जाती है।
- बनाने की क्रिया से। मेहनत किसी ज़रूरत को पूरा करने का सुख नहीं रह जाती, बल्कि उससे बाहर की ज़रूरतें पूरी करने का ज़रिया बन जाती है; मज़दूर को अपना घर तभी लगता है जब वह काम पर न हो।
- प्रजाति-सत्ता से। आज़ाद, होशमंद, सिरजने वाली गतिविधि ही इंसान को जानवर से अलग करती है; जब वही गतिविधि सिर्फ़ जीने का ज़रिया बन जाए, तो इंसानी सार उलट जाता है।
- बाक़ी इंसानों से। हर आदमी दूसरे को होड़ करने वाला मानने लगता है, और लोगों के बीच का रिश्ता चीज़ों के बीच का रिश्ता बन जाता है — पकी हुई रचनाओं में इसी को वस्तु-पूजा (commodity fetishism) कहा गया है।
ऐतिहासिक भौतिकवाद और पका हुआ ढाँचा
1859 की भूमिका इसका प्रामाणिक बयान है और इसे ठीक-ठीक अपने शब्दों में रखना चाहिए: अपने जीने का सामान बनाते हुए लोग कुछ तय रिश्तों में आ जाते हैं, जो उनकी मर्ज़ी से नहीं बनते, यानी उत्पादन संबंध, जो भौतिक उत्पादन शक्तियों के एक ख़ास पड़ाव से मेल खाते हैं; इन सबका जोड़ ही आर्थिक ढाँचा है, वह असली नींव जिस पर क़ानूनी और राजनीतिक अधिरचना खड़ी होती है; और लोगों की चेतना उनका अस्तित्व तय नहीं करती, उनका सामाजिक अस्तित्व उनकी चेतना तय करता है। एक पड़ाव पर भौतिक शक्तियाँ मौजूदा संबंधों से टकरा जाती हैं, वे संबंध बेड़ी बन जाते हैं, और सामाजिक क्रांति का दौर शुरू हो जाता है।
अर्थशास्त्र वाला हिस्सा: किसी माल का मूल्य उसे बनाने में लगने वाले सामाजिक रूप से ज़रूरी श्रम-समय से तय होता है। पूँजीवाद में मज़दूर श्रम नहीं, श्रम शक्ति बेचता है, जिसका मूल्य उतना है जितना उसे दोबारा खड़ा करने में लगता है। काम का दिन उस मूल्य को बनाने में लगने वाले समय से लंबा होता है, और यह जो ऊपर बचता है वही अतिरिक्त मूल्य है, यानी मुनाफ़े का स्रोत। होड़ के दबाव में पूँजीपति पूँजी की बनावट में मशीनों का हिस्सा बढ़ाते जाते हैं, और मार्क्स की दलील है कि इससे मुनाफ़े की दर गिरने का रुझान बनता है, बार-बार ज़रूरत से ज़्यादा पैदावार के संकट आते हैं, पूँजी कुछ हाथों में जमा और केंद्रित होती जाती है, और बेकार मज़दूरों की रिज़र्व फ़ौज बढ़ती जाती है।
राजनीति वाला हिस्सा: राज्य पूँजीपति वर्ग की कार्यकारिणी समिति है, जिस पर अध्याय 2 में बात है; फिर क्रांति; बीच के दौर के रूप में सर्वहारा की तानाशाही; और Critique of the Gotha Programme (1875) में कम्युनिस्ट समाज के दो पड़ाव, जिनमें पहला बाँटता है किसने कितनी मेहनत दी उसके हिसाब से, और ऊँचा वाला इस उसूल पर कि हर कोई अपनी क्षमता के मुताबिक़ दे, हर किसी को उसकी ज़रूरत के मुताबिक़ मिले।
ग्राम्शी
विचारक
अंतोनियो ग्राम्शी (1891–1937)
मुख्य रचनाएँ। Prison Notebooks (1929–35 में लिखी गईं)
मूल दावा। विकसित समाजों में दबदबा ज़बरदस्ती से कम, वर्चस्व से ज़्यादा टिकता है: यानी वह नैतिक और बौद्धिक अगुआई, जिससे एक वर्ग अपना नज़रिया ही आम समझ जैसा दिखा देता है। राज्य दरअसल राजनीतिक समाज और नागरिक समाज दोनों मिलकर है, यानी सहमति का कवच पहने हुई ताक़त। इसलिए क्रांति की रणनीति आमने-सामने का हमला नहीं, सांस्कृतिक अगुआई के लिए मोर्चा जमाने की लंबी जंग होनी चाहिए।
आम आलोचना। वर्चस्व इतना लचीला है कि हर नतीजा समझा देता है, और इसी से समझाने वाली दलील के तौर पर कमज़ोर पड़ जाता है; और यह शायद उस बात को कम आँकता है कि दबे हुए समूह ऊपर से मान लेते हैं और भीतर से असहमत रहते हैं — जेम्स स्कॉट ने इसी को छिपा हुआ पाठ (hidden transcript) कहकर आगे बढ़ाया।
परीक्षा में पकड़। नव-मार्क्सवादियों में सबसे ज़्यादा पूछे जाने वाले। UPSC वर्चस्व सीधे पूछ चुका है, और यह अध्याय 7 वाले ल्यूक्स के ताक़त के तीसरे आयाम का ही ऐतिहासिक रूप है।
वर्चस्व की ज़रूरत क्यों पड़ी
ग्राम्शी की समस्या ज़मीनी है: मार्क्स ने क्रांति के लिए जो हालात गिनाए थे, वे 1917 के बाद पश्चिमी यूरोप में मौजूद थे, फिर भी क्रांति सिर्फ़ रूस में कामयाब हुई, जो सबसे कम विकसित मामला था। उनका जवाब यह है कि दोनों जगह राज्य और समाज का रिश्ता अलग है। रूस में राज्य ही सब कुछ था और नागरिक समाज कच्चा-सा, लसलसा-सा; पश्चिम में राज्य और नागरिक समाज के बीच ठीक-ठाक रिश्ता था, और जब राज्य हिला तो पीछे नागरिक समाज का मज़बूत ढाँचा तुरंत सामने आ गया। पश्चिम का पूँजीपति वर्ग सिर्फ़ ज़बरदस्ती के औज़ारों से नहीं, स्कूलों, गिरजाघरों, अख़बारों, संगठनों और सांस्कृतिक रूपों के पूरे जाल से राज करता है, जो सहमति गढ़ता रहता है।
वर्चस्व इसलिए न प्रचार है, न मोटे अर्थ में झूठी चेतना। यह अगुआई है: दबदबे वाला समूह अपने ख़ास हितों को इतने भरोसे के साथ सबका हित बताकर पेश करता है कि दबे हुए समूह उन्हें अपनी आम समझ मान लेते हैं, और इसके लिए वह असल रियायतें भी देता है।
इससे निकले हुए विचार
- सीधे हमले की जंग और मोर्चा जमाने की जंग। पहली राज्य पर सीधा हमला है, जो वहाँ काम आती है जहाँ नागरिक समाज कमज़ोर हो। दूसरी नागरिक समाज की संस्थाओं के भीतर चलने वाली लंबी लड़ाई है, ताकि ताक़त हाथ में आने से पहले एक दूसरी आम समझ खड़ी हो चुके।
- जैविक बुद्धिजीवी। हर वर्ग अपने बुद्धिजीवी ख़ुद बनाता है, जो उसे एकजुट करते हैं और उसे उसका काम समझाते हैं; मज़दूर वर्ग को भी अपने ख़ुद के बुद्धिजीवी पैदा करने होंगे, न कि उन पारंपरिक बुद्धिजीवियों से काम चलाना होगा जो ख़ुद को वर्ग से ऊपर समझते हैं। ग्राम्शी यह भी जोड़ते हैं कि हर आदमी बुद्धिजीवी है, भले समाज में यह काम सबके हिस्से न आता हो।
- ऐतिहासिक गुट। आधार और अधिरचना का, यानी आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक ताक़तों का, टिकाऊ जुड़ाव, जिसमें कोई वर्ग अकेले नहीं, गठजोड़ के रास्ते वर्चस्व चलाता है।
- निष्क्रिय क्रांति। ऊपर से चलाया गया बदलाव, जो सामाजिक रिश्तों को आधुनिक कर देता है पर दबे हुए वर्गों को अपने बल पर खड़ा नहीं होने देता; उनके उदाहरण इतालवी रिसोर्जिमेंतो और फ़ासीवाद हैं। कविराज से लेकर चटर्जी तक भारतीय विद्वानों ने इससे बाद के राष्ट्रीय आंदोलन को भी समझाया है और 1947 के बाद राज्य की अगुआई वाले विकास को भी।
- आम समझ और अच्छी समझ। आम समझ रोज़मर्रा की ज़िंदगी में परत-दर-परत जमा हुआ बिखरा नज़रिया है, जिसमें अच्छी समझ के टुकड़े भी पड़े रहते हैं। वर्चस्व को चुनौती देने वाली कोशिश को उन्हें बुहार देने के बजाय उन्हीं के साथ काम करना होता है।
| मार्क्स | ग्राम्शी | |
|---|---|---|
| राज्य | दबदबे वाले वर्ग का औज़ार; ज़बरदस्ती वाला | राजनीतिक समाज और नागरिक समाज दोनों; सहमति का कवच पहने ताक़त |
| शासक वर्ग राज करता है | उत्पादन के साधनों और राज्य पर क़ब्ज़े से | वर्चस्व से: नैतिक और बौद्धिक अगुआई |
| अधिरचना | आख़िरी हद में आधार से तय होती है | कुछ हद तक अपने बल पर; असली शासन इसी ज़मीन पर जीता जाता है |
| विचारधारा | वर्ग हित साधने वाली बिगड़ी हुई चेतना | एक भौतिक ताक़त, संस्थाओं के ज़रिए गढ़ी हुई, जिसमें अच्छी समझ भी है |
| रणनीति | टकराव पक जाने पर क्रांति | पहले मोर्चा जमाने की जंग; ताक़त सांस्कृतिक अगुआई के पीछे आती है |
| बुद्धिजीवी | अलग से कोई सवाल नहीं | वर्ग से जैविक रूप से जुड़े; वर्चस्व को चुनौती देने में सबसे अहम |
बहस: ग्राम्शी ने मार्क्सवाद को बचाया या घोल दिया?
बचाया। उन्होंने वह गुत्थी सुलझाई जो वरना पूरे सिद्धांत को ग़लत साबित कर देती: विकसित पूँजीवाद में क्रांति क्यों नहीं हुई। यह दिखाकर कि शासन असल में अधिरचना पर जीता जाता है, उन्होंने देरी की वजह बताई और वर्ग विश्लेषण भी नहीं छोड़ा, और उन समाजों को रणनीति दी जहाँ सीधा हमला आत्महत्या था। अल्थ्यूसर से लेकर सांस्कृतिक अध्ययन तक, विचारधारा का हर बाद वाला विवरण उन्हीं पर टिका है। घोल दिया। जब समझाने का सारा काम सहमति, संस्कृति और विचार करने लगें, तो आर्थिक आधार किसी काम के अर्थ में तय करने वाला नहीं रह जाता, और बचती है ताक़त की एक आम थ्योरी, जो बस मार्क्सवादी शब्द बरतती है। अगर वर्चस्व चुप्पी भी समझा दे और बग़ावत भी, तो वह कुछ भी नहीं समझाता, और वर्ग वाला कर्ता चुपचाप एक ऐसे गठजोड़ में गुम हो जाता है जिसे बस बातचीत जोड़े रखती है। परीक्षक वाली लाइन। दोनों सही हैं, और यह खिंचाव जानलेवा नहीं, उपजाऊ है। ग्राम्शी ने वर्ग विश्लेषण बचा लिया, लेकिन अधिरचना को इतना अपने बल पर खड़ा कर दिया कि बाद के लेखक वह आज़ादी रख लें और वर्ग छोड़ दें — उत्तर-मार्क्सवादी सिद्धांत ने उनके साथ ठीक यही किया। उन्हें इससे परखिए कि उनका विचार करता क्या है: भारत में जाति और सांप्रदायिक सहमति को वर्चस्व जितना समझाता है, उतना कोई शुद्ध आर्थिक विवरण नहीं, और इसीलिए भारतीय विद्वानों ने उन्हें इतनी जल्दी और इतने गहरे अपनाया।
दार्शनिकों ने अब तक दुनिया की व्याख्या ही की है, अलग-अलग तरीक़ों से; असल बात तो उसे बदलने की है
कार्ल मार्क्स, Theses on Feuerbach, 1845
धर्म दबे हुए प्राणी की आह है, बेदिल दुनिया का दिल है, और बेरूह हालात की रूह है। यह लोगों की अफ़ीम है
कार्ल मार्क्स, Contribution to the Critique of Hegel’s Philosophy of Right, 1844
पुराना मर रहा है और नया जन्म नहीं ले पा रहा; इस बीच के दौर में तरह-तरह के रोगी लक्षण उभर आते हैं
अंतोनियो ग्राम्शी, Prison Notebooks, 1929–35
जहाँ उत्तर नंबर गँवाते हैं
- मार्क्स को सिर्फ़ अर्थशास्त्री की तरह लिख देना। 1844 की पांडुलिपियाँ, अलगाव और प्रजाति-सत्ता उतनी ही बार पूछे जाते हैं जितना अतिरिक्त मूल्य, और वही उन्हें रॉय से और फ़्रैंकफ़र्ट स्कूल से जोड़ते हैं।
- आधार और अधिरचना को मशीनी तौर पर तय होने वाला बता देना। एंगेल्स की 1890 वाली ब्लॉख को लिखी चिट्ठी सिर्फ़ आख़िरी हद में तय होना मानती है, और यह भी कि अधिरचना पलटकर असर डालती है।
- द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और ऐतिहासिक भौतिकवाद को गड्डमड्ड कर देना। पहला तरीक़ा है, दूसरा उसी तरीक़े का इतिहास पर इस्तेमाल।
- वर्चस्व को प्रचार या दिमाग़ धोना मान लेना। यह नागरिक समाज की संस्थाओं से चलता है और इसमें असल रियायतें शामिल होती हैं; यह आम समझ जैसा लगता है, और इसीलिए कारगर है।
- मोर्चा जमाने और सीधे हमले की जंग को बस दो दाँव की तरह गिना देना, बिना उस वजह के जिससे यह भेद बना: रूस और पश्चिम में राज्य का नागरिक समाज से रिश्ता अलग था।
- निष्क्रिय क्रांति को ढीले अर्थ में बरतना। इसका पक्का मतलब है — ऊपर से लाया गया आधुनिकीकरण, जो नीचे से उठने वाली अपनी पहल को पहले ही रोक देता है।
पहले पूछा जा चुका है
- मार्क्सवाद कर्म का एक राजनीतिक सिद्धांत है, जो अपने मूल उसूलों के कड़े पालन की माँग करता है। टिप्पणी कीजिए। (2024, पेपर I, 15 अंक)
- ताक़त और वर्चस्व के बीच का रिश्ता। (2024, पेपर I, 10 अंक)
उत्तर का ढाँचा
ताक़त और वर्चस्व के बीच का रिश्ता। (10 अंक, 150 शब्द)
फ़्रेम। वर्चस्व ताक़त का पर्यायवाची नहीं है; यह उसका एक तरीक़ा बताता है, जिसमें लोग हुक्म से नहीं, अगुआई से मानते हैं।
यह किस सवाल का जवाब है। क्रांति के लिए मार्क्स की बताई शर्तें 1917 के बाद पश्चिम में मौजूद थीं और क्रांति एक भी नहीं हुई। ग्राम्शी का जवाब: पश्चिम में राज्य के पीछे एक मज़बूत नागरिक समाज खड़ा है।
विचार क्या है। राज्य राजनीतिक समाज और नागरिक समाज दोनों है, यानी सहमति का कवच पहने ताक़त। दबदबे वाला वर्ग स्कूल, गिरजाघर, अख़बार और संस्कृति के रास्ते अपने ख़ास नज़रिए को आम समझ बना देता है, और इसके लिए असल रियायतें भी देता है।
ताक़त के सिद्धांत से जोड़। यह ल्यूक्स के तीसरे आयाम को ऐतिहासिक और संस्थाओं वाला रूप देना है: वह ताक़त जो तय कर देती है कि लोग चाहें क्या, ताकि शिकायत पैदा ही न हो। यह जोड़ साफ़ शब्दों में लिखिए।
रणनीति पर नतीजा। सीधे हमले से पहले मोर्चा जमाने की जंग; जैविक बुद्धिजीवी; ऐतिहासिक गुट।
इस्तेमाल। वह जगह बताइए जहाँ यह कुछ ऐसा समझाता है जो सिर्फ़ ज़बरदस्ती वाला विवरण नहीं समझा सकता। जाति को धार्मिक मंज़ूरी से जायज़ ठहराया गया, और इसीलिए आंबेडकर ने राजनीति से पहले उस मंज़ूरी पर हमला किया।
हद बताकर ख़त्म कीजिए। अगर वर्चस्व मान लेना भी समझा दे और बग़ावत भी, तो ख़तरा है कि वह कुछ भी न समझाए; स्कॉट के छिपे हुए पाठ बताते हैं कि ऊपर से दिखने वाली हामी अक्सर सहमति होती ही नहीं।
आख़िरी दौर का रिवीज़न
- मार्क्स हेगेल का द्वंद्ववाद उलट देते हैं: अक्ल की गुठली, रहस्य का छिलका। धर्म पर फ़ायरबाख़ का ख़ुद से अलगाव वाला विचार; ग्यारहवीं थीसिस, 1845।
- अलगाव के चार पहलू: उत्पाद, मेहनत की क्रिया, प्रजाति-सत्ता, बाक़ी लोग। पकी हुई रचनाओं में वस्तु-पूजा।
- 1859 की भूमिका: उत्पादन की शक्तियाँ और संबंध, आधार और अधिरचना, सामाजिक अस्तित्व चेतना तय करता है, संबंध बेड़ी बन जाते हैं, सामाजिक क्रांति का दौर।
- श्रम के मुक़ाबले श्रम शक्ति; अतिरिक्त मूल्य; मुनाफ़े की गिरती दर; पूँजी का जमाव और केंद्रीकरण; बेकारों की रिज़र्व फ़ौज।
- Critique of the Gotha Programme (1875): सर्वहारा की तानाशाही; दो पड़ाव, पहले मेहनत के हिसाब से, फिर ज़रूरत के हिसाब से।
- ग्राम्शी की गुत्थी: क्रांति पिछड़े रूस में हुई, विकसित पश्चिम में नहीं। जवाब: रूस में राज्य ही सब कुछ, पश्चिम में नागरिक समाज मज़बूत।
- वर्चस्व यानी नैतिक और बौद्धिक अगुआई; राज्य यानी राजनीतिक समाज और नागरिक समाज; सहमति का कवच पहने ताक़त।
- मोर्चा जमाने और सीधे हमले की जंग; जैविक बनाम पारंपरिक बुद्धिजीवी; ऐतिहासिक गुट; निष्क्रिय क्रांति; आम समझ और अच्छी समझ।
आगे पढ़िए। यह अध्याय पूरी PSIR Optional Notes के 58 अध्यायों में से एक है, जिसमें पेपर I और पेपर II दोनों पूरे कवर हैं — मुफ़्त डाउनलोड।