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MGNREGA 2005: हक़, मज़दूरी, काम और आज के मुद्दे

MGNREGA 2005 दुनिया का सबसे बड़ा अधिकार-आधारित रोज़गार क़ानून है। जानिए 100 दिन के काम का हक़, मज़दूरी दर, अनुसूची I के काम, सोशल ऑडिट, ABPS भुगतान और बजट की तंगी पर चल रही बहस।

Agriculture in India — Wikimedia Commons

MGNREGA 2005 दुनिया का सबसे बड़ा अधिकार-आधारित रोज़गार कार्यक्रम है, और आज़ाद भारत में सामाजिक सुरक्षा का सबसे ज़्यादा पढ़ा-परखा क़ानून। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम हर उस ग्रामीण परिवार को एक वित्त वर्ष में कम से कम 100 दिन के अकुशल शारीरिक काम की गारंटी देता है, जिसके बालिग़ सदस्य ऐसा काम करने को तैयार हों। संसद ने इसे अगस्त 2005 में पास किया, 2 फ़रवरी 2006 को यह अधिसूचित हुआ, और इसी के साथ MGNREGA 2005 ने रोज़गार को विकास के एक वादे से बदलकर क़ानूनी तौर पर लागू कराने लायक़ हक़ बना दिया।

MGNREGA 2005 का पैमाना किसी और योजना से नहीं मिलता। वित्त वर्ष 2024-25 में इसने 5.5 करोड़ से ज़्यादा सक्रिय परिवारों के लिए 280 करोड़ से ज़्यादा व्यक्ति-दिवस (person-days) का काम पैदा किया, और इसमें 58 फ़ीसदी व्यक्ति-दिवस महिलाओं के रहे। यह देश का सबसे विकेंद्रित कार्यक्रम भी है — काम की योजना बनाना, उसे कराना और उसकी जाँच करना, तीनों ग्राम पंचायतें करती हैं, जबकि मज़दूरी और सामान का ख़र्च केंद्र और राज्य मिलकर उठाते हैं। इस लेख में MGNREGA 2005 का क़ानूनी ढाँचा, इसके तहत होने वाले काम, सोशल ऑडिट की व्यवस्था, Aadhaar-Based Payment System (ABPS) की तरफ़ हुआ बदलाव और पैसे का बँटवारा — सब खोलकर देखा गया है। साथ में देर से मिलती मज़दूरी और बजट की तंगी पर चल रही बहस भी।

शुरुआत: NREGA से MGNREGA तक

MGNREGA 2005 का बीज महाराष्ट्र की 1977 वाली रोज़गार गारंटी योजना में पड़ा था, जिसे 1972-73 के अकाल के बाद वी.एस. पागे ने सोचा। महाराष्ट्र EGS ने साबित किया कि मज़दूरी वाले काम की क़ानूनी गारंटी एक साथ दो काम कर सकती है — सामाजिक बीमा भी बन सकती है और संपत्ति बनाने का ज़रिया भी। 1990 के दशक के आख़िरी सालों में अरुणा रॉय, ज्यां द्रेज़ और रोज़गार गारंटी के लिए बने जन-अभियान ने इसका राष्ट्रीय रूप माँगना शुरू किया।

UPA-I सरकार ने अपने साझा न्यूनतम कार्यक्रम में राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी को जगह दी। विधेयक दिसंबर 2004 में पेश हुआ, संसद की स्थायी समिति ने इसे परखा, और अगस्त 2005 में यह राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (NREGA) के नाम से पास हो गया। 2 फ़रवरी 2006 से इसे सबसे ग़रीब 200 ज़िलों में लागू किया गया, 2007-08 में 130 और ज़िले जोड़े गए, और 1 अप्रैल 2008 से यह पूरे ग्रामीण भारत में लागू हो गया। अक्टूबर 2009 में इसका नाम बदलकर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम कर दिया गया — इसी वजह से आज का छोटा नाम “MGNREGA 2005” है।

क़ानूनी ढाँचा

MGNREGA 2005 में 34 धाराएँ और सात अनुसूचियाँ हैं। अनुसूची I में वे काम गिनाए गए हैं जो इसके तहत कराए जा सकते हैं, साथ में काम चलाने के दिशानिर्देश भी; अनुसूची II रोज़गार की शर्तें तय करती है। क़ानून तीन परतों से चलता है। केंद्र यानी ग्रामीण विकास मंत्रालय नियम बनाता है और पैसा देता है। राज्य रोज़गार गारंटी परिषद राज्य के स्तर पर तालमेल बिठाती है। और ग्राम पंचायत कम से कम 50 फ़ीसदी कामों के लिए मुख्य योजना बनाने और उन्हें कराने वाली इकाई है।

MGNREGA 2005 क्या-क्या हक़ देता है

MGNREGA 2005 के हक़ माँग पर मिलते हैं — काम तब दिया जाता है जब परिवार अर्ज़ी देता है, तब नहीं जब सरकार कोई प्रोजेक्ट शुरू करने का मन बनाए। यह पुराने कल्याण मॉडल को उलट देता है, और यही इस क़ानून की सबसे ज़्यादा गिनाई जाने वाली नई बात है।

100 दिन के काम का हक़

किसी भी ग्रामीण परिवार का बालिग़ सदस्य, जो अकुशल शारीरिक काम करने को तैयार हो, ग्राम पंचायत में नाम लिखवा सकता है और 15 दिन के अंदर जॉब कार्ड ले सकता है। लिखित में काम माँगने पर परिवार को अर्ज़ी के 15 दिन के अंदर काम मिलना चाहिए। ऐसा न हो तो राज्य को बेरोज़गारी भत्ता देना पड़ता है — पहले 30 दिन तक मज़दूरी दर का एक-चौथाई, उसके बाद आधा।

100 दिन की गारंटी परिवार के हिसाब से है, हर व्यक्ति के हिसाब से नहीं। जिन परिवारों का इलाक़ा सूखाग्रस्त घोषित है या जो वन अधिकार वाले क्षेत्रों में रहते हैं, उनके लिए यह हक़ 150 दिन तक जाता है। मज़दूरों को उनकी बस्ती के 5 किलोमीटर के दायरे में काम देना होता है। इससे दूर काम दिया गया तो आने-जाने और गुज़ारे के लिए मज़दूरी का 10 फ़ीसदी अलग से मिलता है।

मज़दूरी दर और बराबरी

MGNREGA 2005 की मज़दूरी हर राज्य के लिए अलग-अलग, क़ानून की धारा 6(1) के तहत अधिसूचित होती है, और हर साल कृषि मज़दूरों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI-AL) के हिसाब से बदलती है। 2025-26 के लिए अधिसूचित दरें मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में ₹241 से लेकर हरियाणा में ₹374 तक हैं। क़ानून मर्द और औरत की मज़दूरी बराबर रखना ज़रूरी करता है — बराबर काम का बराबर दाम — और ठेकेदारों पर, साथ ही मज़दूरों की जगह लेने वाली मशीनों पर, रोक लगाता है।

धारा 6(1) ने MGNREGA की मज़दूरी को राज्य की न्यूनतम मज़दूरी से अलग कर दिया, जो ट्रेड यूनियनों की लंबे समय से चली आ रही माँग थी। अनूप सतपथी समिति (2019) ने रोज़ाना ₹375 की राष्ट्रीय न्यूनतम मज़दूरी सुझाई थी, लेकिन केंद्र ने पैसे की तंगी का हवाला देकर इसे MGNREGA के लिए नहीं अपनाया।

काम की जगह पर क्या मिलना चाहिए

MGNREGA 2005 की अनुसूची II कहती है कि जहाँ 20 से ज़्यादा मज़दूर काम कर रहे हों, वहाँ पालना घर, पीने का पानी, छाँव वाली आराम की जगह और फ़र्स्ट-एड बॉक्स होना चाहिए। काम पूरा होने के 15 दिन के अंदर मज़दूरी मिलनी चाहिए। देर से भुगतान पर हर दिन के हिसाब से बकाया मज़दूरी का 0.05 फ़ीसदी मुआवज़ा देना, सुप्रीम कोर्ट के स्वराज अभियान बनाम भारत संघ (2016) फ़ैसले के बाद ज़रूरी कर दिया गया।

कौन-कौन से काम कराए जा सकते हैं

MGNREGA 2005 की अनुसूची I में 262 काम गिनाए गए हैं, जो चार श्रेणियों में बँटे हैं। श्रेणी A में प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन आता है — जल संरक्षण, सूखे से बचाव, सूक्ष्म सिंचाई और पुराने जल स्रोत। श्रेणी B में कमज़ोर परिवारों के लिए निजी संपत्तियाँ हैं, यानी SC/ST, BPL और IAY लाभार्थियों के साथ छोटे-सीमांत किसानों की ज़मीन पर बाग़बानी, पशुपालन या मछली पालन से रोज़ी-रोटी। श्रेणी C में स्वयं सहायता समूहों की रोज़ी-रोटी के लिए साझा ढाँचा आता है। श्रेणी D में गाँव का बुनियादी ढाँचा है — सड़क संपर्क, आंगनवाड़ी केंद्र, पंचायत भवन और अनाज गोदाम।

किसी भी ज़िले में कम से कम 60 फ़ीसदी काम ऐसे होने चाहिए जो सीधे खेती या प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी उपयोगी संपत्ति बनाएँ। योजना बनाते वक़्त 12 दूसरे मंत्रालयों के साथ तालमेल — PMAY-G, जल जीवन मिशन और PMKSY के जलग्रहण विकास घटक समेत — पहले से ही व्यवस्था में शामिल है।

सोशल ऑडिट: क़ानून में लिखी गई नई पहल

MGNREGA 2005 की सबसे मौलिक बात धारा 17 के तहत मिलने वाला सोशल ऑडिट (social audit) है। हर ग्राम पंचायत को कम से कम हर छह महीने में अपने सारे कामों का सोशल ऑडिट कराना होता है। सोशल ऑडिट यूनिट (SAU) — योजना ऑडिट नियम 2011 (Audit of Scheme Rules 2011) के तहत बनी एक स्वतंत्र संस्था — यह काम कराती है, लेकिन उसे पूरे कार्यक्रम के ख़र्च का सिर्फ़ 0.5 फ़ीसदी पैसा मिलता है।

सोशल ऑडिट में ग्राम सभा की सुनवाई होती है, जहाँ मज़दूर, सतर्कता एवं निगरानी समिति के सदस्य और SAU के संसाधन-व्यक्ति मस्टर रोल, माप-पुस्तिका और बिलों की जाँच करते हैं। आंध्र प्रदेश की SAU को, जिसे वहाँ पूरा ढाँचा मिल चुका है, सबसे अच्छा उदाहरण माना जाता है और उस पर काफ़ी अध्ययन हुए हैं। CAG की 2013 और 2024 की जाँच में अमल की खाई दिखी — साफ़ नियम होने के बावजूद 14 राज्यों ने अब तक स्वतंत्र SAU बनाई ही नहीं।

MGNREGA 2005 का पैसा कहाँ से आता है

अकुशल मज़दूरी की पूरी लागत केंद्र उठाता है, सामान और कुशल मज़दूरी की लागत का 75 फ़ीसदी भी, और प्रशासनिक ख़र्च का 6 फ़ीसदी। बची हुई सामान की लागत, बेरोज़गारी भत्ता और राज्य रोज़गार गारंटी परिषद का ख़र्च राज्य देते हैं।

MGNREGA 2005 का बजट राजनीति का मैदान बना हुआ है। केंद्रीय बजट 2025-26 में ₹86,000 करोड़ रखे गए, जो 2024-25 जितने ही हैं, लेकिन असल क़ीमत के हिसाब से 2021-22 में COVID के दौर की ₹1,11,500 करोड़ वाली चोटी से कम हैं। जनवरी 2026 तक राज्यों का बकाया ₹16,000 करोड़ के पार पहुँच चुका था, जिसे देखते हुए ग्रामीण विकास पर संसद की स्थायी समिति ने सुझाया कि बजट की एक न्यूनतम सीमा माँग से जोड़कर तय की जाए।

आधार आधारित भुगतान व्यवस्था: 2024 का बदलाव

1 जनवरी 2024 से ग्रामीण विकास मंत्रालय ने MGNREGA 2005 की सारी मज़दूरी के लिए Aadhaar-Based Payment System (ABPS) ज़रूरी कर दिया। ABPS में पैसा राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक फंड मैनेजमेंट सिस्टम (Ne-FMS) से निकलकर NPCI मैपर के रास्ते मज़दूर के उस बैंक खाते में जाता है जो आधार से जुड़ा हुआ है।

ABPS इसलिए बनाया गया था कि फ़र्ज़ी मज़दूर पकड़े जाएँ और पैसा इधर-उधर न हो। लेकिन LibTech India और IIM अहमदाबाद के ज़मीनी अध्ययनों ने एक दूसरी ही दिक़्क़त दर्ज की। उनके 2024 के नमूने में क़रीब 27 फ़ीसदी सक्रिय मज़दूरों का भुगतान कम से कम एक बार लौट आया, क्योंकि आधार का जुड़ाव मेल नहीं खा रहा था, खाता बंद पड़ा था, या NPCI मैपर में गड़बड़ी थी। केंद्र ने ABPS को इकलौता रास्ता बनाने से पहले चार बार तारीख़ आगे बढ़ाई। आलोचक कहते हैं कि हक़ पर टिकी योजना को ऐसी भुगतान व्यवस्था पर खड़ा नहीं किया जा सकता, जिसमें लोगों के छूट जाने की गड़बड़ियाँ दर्ज हो चुकी हों।

असर पर हुए अध्ययन

MGNREGA 2005 के असर को नापने वाला अर्थमिति का बड़ा काम मौजूद है। इंबर्ट और पैप (2015) ने पाया कि जिन ज़िलों में योजना पहले लागू हुई, वहाँ खेती में निजी क्षेत्र की मज़दूरी 8 फ़ीसदी बढ़ी। क्लोनर और ओल्डिजेस (2022) ने रात की रोशनी वाले सैटेलाइट आँकड़ों से आदिवासी ब्लॉकों में खपत बढ़ने की बात दिखाई। विश्व बैंक के 2017 के अध्ययन का अनुमान था कि पहले दशक में MGNREGA की वजह से घोर ग़रीबी 32 फ़ीसदी घटी।

संपत्ति बनने पर हुए अध्ययनों की तस्वीर ज़्यादा मिली-जुली है। इंस्टिट्यूट ऑफ़ इकोनॉमिक ग्रोथ (2020) ने पाया कि कर्नाटक, राजस्थान और महाराष्ट्र में MGNREGA से बनी 78 फ़ीसदी संपत्तियाँ पाँच साल बाद भी काम कर रही थीं। दूसरे राज्यों में यह आँकड़ा 50 फ़ीसदी से नीचे रहा, जिससे साफ़ है कि सब कुछ पंचायत की क्षमता पर टिका है।

महिलाएँ और MGNREGA

MGNREGA 2005 में महिलाओं की हिस्सेदारी 2013 से लगातार 50 फ़ीसदी के ऊपर बनी हुई है — ग्रामीण भारत में महिला श्रम बल भागीदारी दर से कहीं ज़्यादा। योजना का सबके लिए खुला होना, बराबर मज़दूरी और काम की जगह पर पालना घर की शर्त, तीनों मिलकर यह नतीजा समझा देते हैं। 2023-24 में केरल ने 92 फ़ीसदी महिला भागीदारी छू ली, जो देश में सबसे ऊँची है।

हाल के मुद्दे और सुधार की बहस

आजकल MGNREGA 2005 पर तीन बहसें छाई हुई हैं। पहली, बजट की तंगी और बढ़ते बकाया की वजह से 17 राज्यों में फ़रवरी-मार्च में पैसा ख़त्म हो जाने पर काम रोकना पड़ा। दूसरी, क़ानून में तय 15 दिन से आगे भुगतान की देरी बनी हुई है — अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के आँकड़े बताते हैं कि 2024-25 में 41 फ़ीसदी भुगतान समय-सीमा पार कर गए। तीसरी, हाज़िरी के लिए राष्ट्रीय मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम (NMMS) पर जाने के प्रस्ताव की आलोचना हुई है कि कमज़ोर नेटवर्क वाले ब्लॉकों में यह मज़दूरों को बाहर कर देता है। स्थायी समिति ने 2024 में सुझाया कि जब तक 4G हर जगह न पहुँच जाए, NMMS मर्ज़ी पर छोड़ा जाए।

जो सुझाव मेज़ पर हैं, उनमें 100 दिन की सीमा पूरे देश में बढ़ाकर 150 दिन करना, मज़दूरी को राज्य की न्यूनतम मज़दूरी से जोड़ना, और बजट को GDP के 1 फ़ीसदी पर बाँधकर सुरक्षित करना शामिल है।

सामान्य प्रश्न

आसान शब्दों में MGNREGA 2005 क्या है?

MGNREGA 2005 भारत का वह क़ानून है जो हर उस ग्रामीण परिवार को एक वित्त वर्ष में कम से कम 100 दिन के मेहनताने वाले अकुशल शारीरिक काम की गारंटी देता है, जिसके बालिग़ सदस्य यह काम करने को तैयार हों। यह हक़ पर टिका, माँग पर चलने वाला रोज़गार कार्यक्रम है, जिसे मुख्य रूप से ग्राम पंचायतें चलाती हैं।

NREGA और MGNREGA में क्या फ़र्क़ है?

NREGA 2005 में पास हुए क़ानून का असली नाम था। अक्टूबर 2009 में महात्मा गांधी के सम्मान में इसका नाम बदलकर MGNREGA कर दिया गया। नाम बदलने से इसके नियम, दायरा और हक़ जस के तस रहे।

MGNREGA 2005 में अभी मज़दूरी दर कितनी है?

2025-26 के लिए MGNREGA की मज़दूरी दरें राज्य के हिसाब से अलग-अलग हैं — मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में ₹241 से लेकर हरियाणा में ₹374 तक। केंद्र हर वित्त वर्ष में ये दरें बदलता है, और इन्हें कृषि मज़दूरों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से जोड़ा गया है।

MGNREGA के तहत किस तरह का काम कराया जा सकता है?

अनुसूची I में चार श्रेणियों के 262 काम गिनाए गए हैं — प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन, कमज़ोर परिवारों के लिए निजी संपत्तियाँ, स्वयं सहायता समूहों के लिए साझा ढाँचा, और गाँव का बुनियादी ढाँचा। किसी भी ज़िले में कम से कम 60 फ़ीसदी काम ऐसे होने चाहिए जो खेती से जुड़ी उपयोगी संपत्ति बनाएँ।

MGNREGA 2005 में सोशल ऑडिट क्या होता है?

सोशल ऑडिट धारा 17 के तहत तय की गई वह प्रक्रिया है जिसमें ग्राम सभा हर छह महीने में MGNREGA के ख़र्च, मस्टर रोल और बनी हुई संपत्तियों की खुले में समीक्षा करती है। इसे एक स्वतंत्र सोशल ऑडिट यूनिट कराती है, जिसका ख़र्च इसी कार्यक्रम से निकलता है।

MGNREGA की मज़दूरी देर से क्यों मिलती है?

देरी की वजहें कई हैं — केंद्र से राज्यों तक पैसा पूरा और वक़्त पर न पहुँचना, Aadhaar-Based Payment System (ABPS) में आधार का जुड़ाव मेल न खाना, NPCI मैपर की गड़बड़ियाँ, और कभी-कभी पंचायत के स्तर पर मंज़ूरी का अटक जाना। क़ानून 15 दिन में भुगतान और देरी पर रोज़ 0.05 फ़ीसदी मुआवज़ा ज़रूरी करता है।

2025-26 में MGNREGA 2005 का बजट कितना है?

केंद्रीय बजट 2025-26 में MGNREGA के लिए ₹86,000 करोड़ रखे गए — रक़म 2024-25 जितनी ही है। राज्यों का ₹16,000 करोड़ से ज़्यादा बकाया पड़ा होने की वजह से असल में नया पैसा इस बड़े आँकड़े से कम बैठता है।

क्या MGNREGA ने गाँवों की ग़रीबी घटाई है?

कई अध्ययनों का — विश्व बैंक के 2017 के विश्लेषण समेत — अनुमान है कि MGNREGA ने अपने पहले दशक में घोर ग़रीबी क़रीब 32 फ़ीसदी घटाई, गाँवों की मज़दूरी 8 फ़ीसदी बढ़ाई, और सूखे के दौरान खपत को गिरने से रोका। असर वहाँ सबसे ज़्यादा दिखता है जहाँ राज्य की क्षमता सबसे अच्छी है।

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Gaurav Tiwari

Written by

Gaurav Tiwari

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