नवीकरणीय और ग़ैर-नवीकरणीय संसाधनों का फ़र्क़ असल में इस बात का फ़र्क़ है कि वे दोबारा कितनी जल्दी बनते हैं। नवीकरणीय संसाधन कुदरत ख़ुद इतनी जल्दी दोबारा भर देती है कि इंसान के लिए उसका मतलब बने — धूप रोज़ आती है, हवा लगातार बहती है, जंगल कुछ दशकों में फिर खड़ा हो जाता है। ग़ैर-नवीकरणीय संसाधन एक तय भंडार की तरह है, जो भूगर्भीय समय में बना, इसलिए एक बार निकालकर इस्तेमाल कर लिया तो हमारे किसी भी काम के लिहाज़ से वह ख़त्म ही है।
यह फ़र्क़ रफ़्तार का है, मात्रा का नहीं। ज़मीन के भीतर कोयला बेहिसाब है और सौर पैनल पर किसी एक घंटे में पड़ने वाली धूप सीमित है। फिर भी कोयला ग़ैर-नवीकरणीय है और धूप नवीकरणीय, क्योंकि कोयला बनने में करोड़ों साल लगे और कुछ सदियों में ख़र्च हो रहा है, जबकि धूप कल सुबह फिर आ जाएगी।
प्राकृतिक संसाधनों का बँटवारा कैसे होता है
भूगोलवेत्ता प्राकृतिक संसाधनों को एक साथ कई आधारों पर बाँटते हैं, और नवीकरणीय–ग़ैर-नवीकरणीय उनमें से बस एक आधार है। संसाधनों को उनके स्रोत (जैविक और अजैविक), मालिकाने (व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय), और विकास की अवस्था (संभाव्य, वास्तविक, आरक्षित, संचित) से भी बाँटा जाता है।
ख़त्म होने या न होने के आधार पर दो श्रेणियाँ आम तौर पर इस तरह बताई जाती हैं:
- नवीकरणीय या अक्षय संसाधन: सौर ऊर्जा, हवा, बहता पानी, ज्वार, भूतापीय गर्मी, जैव पदार्थ, जंगल, वन्यजीव, और — कुछ अहम शर्तों के साथ — मिट्टी तथा भूजल।
- ग़ैर-नवीकरणीय या क्षय होने वाले संसाधन: कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, यूरेनियम और थोरियम जैसे नाभिकीय ईंधन, तथा सभी धात्विक और अधात्विक खनिज।
नवीकरणीय श्रेणी के भीतर एक और काम का बँटवारा है। सतत या प्रवाही संसाधन — सौर, पवन, ज्वारीय — चाहे हम जितना भी इस्तेमाल करें, आते रहते हैं, और कितना भी ख़र्च कल की आपूर्ति घटाता नहीं। जैविक या दोबारा बनने वाले नवीकरणीय संसाधन — जंगल, मछलियाँ, भूजल, मिट्टी — तभी दोबारा बनते हैं जब इस्तेमाल की रफ़्तार कुदरत के भरने की रफ़्तार से नीचे रहे। ज़्यादा खींच लीजिए तो वे बिल्कुल ग़ैर-नवीकरणीय भंडार जैसा बर्ताव करने लगते हैं। भारत का भूजल इसकी जानी-पहचानी मिसाल है: गिनती उसकी नवीकरणीय में होती है, और उत्तर-पश्चिम के बड़े हिस्सों में उसे मानसून के भरने से कहीं तेज़ी से निकाला जा रहा है।
नवीकरणीय और ग़ैर-नवीकरणीय संसाधन: तुलना तालिका
| आधार | नवीकरणीय संसाधन | ग़ैर-नवीकरणीय संसाधन |
|---|---|---|
| दोबारा बनने की रफ़्तार | इंसानी उम्र के भीतर कुदरती तौर पर भर जाते हैं | करोड़ों साल में बने; किसी काम की समय-सीमा में दोबारा नहीं बनते |
| उपलब्धता | कुदरत की हद में रहकर इस्तेमाल करें तो लगभग असीमित | तय भंडार, जो हर निकाली गई इकाई के साथ घटता है |
| बनने में लगा समय | लगातार, रोज़, मौसमी, या कुछ दशकों में | दसियों से सैकड़ों करोड़ साल |
| ऊर्जा में उदाहरण | सौर, पवन, जल, जैव, भूतापीय, ज्वारीय | कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, यूरेनियम, थोरियम |
| दूसरे उदाहरण | जंगल, मछलियाँ, मिट्टी, भूजल, वन्यजीव | लौह अयस्क, बॉक्साइट, ताँबा, चूना पत्थर, सभी खनिज भंडार |
| इस्तेमाल का आगे की आपूर्ति पर असर | प्रवाही संसाधनों पर कोई नहीं; जैविक संसाधन ज़्यादा खींचे जाएँ तो बड़ा असर | हर इकाई के इस्तेमाल से बचा हुआ भंडार हमेशा के लिए घटता है |
| इस्तेमाल की जगह पर उत्सर्जन | सौर, पवन और जल में न के बराबर या बिल्कुल नहीं | जीवाश्म ईंधन जलने पर कार्बन डाइऑक्साइड और दूसरे प्रदूषक निकलते हैं |
| मुख्य पर्यावरणीय चिंताएँ | ज़मीन का इस्तेमाल, उपकरणों का कच्चा माल, आवास का बिगड़ना, पुराने साज़ो-सामान का कचरा | जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, अम्लीय जमाव, खनन से नुक़सान, तेल रिसाव |
| ख़र्च का ढाँचा | शुरुआती लागत ज़्यादा; चलाने का ख़र्च बहुत कम, क्योंकि ईंधन मुफ़्त है | अब तक शुरुआती लागत कम; ईंधन का ख़र्च लगातार और क़ीमतें ऊपर-नीचे |
| आपूर्ति का भरोसा | सौर और पवन में घटती-बढ़ती; भंडारण या बैकअप चाहिए | ईंधन मिलता रहे तो जब चाहें तब चला सकते हैं |
| भौगोलिक फैलाव | लगभग हर जगह, हालाँकि सबसे अच्छी जगहें कुछ ही इलाक़ों में | कुछ ख़ास भूगर्भीय संरचनाओं और देशों में सिमटे हुए |
| ऊर्जा सुरक्षा पर असर | एक बार लग जाने पर आयात पर निर्भरता घटती है | जहाँ अपने भंडार कम हों वहाँ आयात पर निर्भरता बढ़ती है |
| लंबी अवधि की तस्वीर | टिकाऊ, बशर्ते इस्तेमाल की रफ़्तार दोबारा बनने की रफ़्तार का लिहाज़ रखे | ख़त्म होना तय है; बस कब, यह पक्का नहीं |
ग़ैर-नवीकरणीय संसाधनों को बनने में इतना समय क्यों लगता है
कोयले की शुरुआत दलदली घाटियों की घनी वनस्पति से हुई, ख़ास तौर पर कार्बनी काल में, यानी क़रीब 35.9 से 29.9 करोड़ साल पहले। पेड़-पौधों का मलबा सड़ने की रफ़्तार से तेज़ी से जमा हुआ, तलछट के नीचे दब गया, और फिर भूगर्भीय युगों तक दबाव और गर्मी झेलता रहा। पीट लिग्नाइट बना, लिग्नाइट बिटुमिनस कोयला, और और ज़्यादा दबाव में उसका कुछ हिस्सा एन्थ्रेसाइट। रसायन धीमा है, दबना धीमा है, और यह क्रम छोटा किया ही नहीं जा सकता।
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस समुद्री प्लवक और शैवाल से बने, जो पुराने समुद्रों की तलहटी में बैठे, तलछट के नीचे दबे, और करोड़ों सालों तक कुछ ख़ास गहराइयों और तापमानों पर पकते रहे। फिर ये हाइड्रोकार्बन छिद्रदार चट्टानों से ऊपर की ओर बहते गए और वहीं रुक गए जहाँ ऊपर कोई अभेद्य परत मिली — इसीलिए तेल बराबर फैला हुआ नहीं, कुछ ख़ास संरचनाओं में ही मिलता है।
नाभिकीय ईंधन इस आम बँटवारे में ठीक से बैठते नहीं। यूरेनियम और थोरियम तारों की प्रक्रियाओं में तब बने जब धरती थी ही नहीं, और धरती पर उनका भंडार तय है। बिजली बनाते वक़्त नाभिकीय ऊर्जा से कार्बन डाइऑक्साइड लगभग नहीं निकलती, इसलिए वह कम-कार्बन स्रोत है, पर उसका ईंधन साफ़-साफ़ ग़ैर-नवीकरणीय है। यही वजह है कि भारत के सरकारी आँकड़े ग़ैर-जीवाश्म क्षमता की बात करते हैं — इस श्रेणी में नवीकरणीय और नाभिकीय, दोनों आते हैं — और “स्वच्छ” तथा “नवीकरणीय” को एक ही शब्द नहीं मान लेते।
असंतुलन साफ़ दिखता है। ये भंडार जमा होने में करोड़ों साल लगे। औद्योगिक समाज ने जितना हिस्सा हाथ में आ सकता था, उसका बड़ा भाग क़रीब दो सौ साल में निकाल लिया।
भारत की ऊर्जा तस्वीर: दोनों श्रेणियाँ कहाँ खड़ी हैं
भारत इसका बहुत साफ़ उदाहरण है, क्योंकि यहाँ नवीकरणीय ऊर्जा तेज़ी से बढ़ी है और साथ-साथ कोयले पर निर्भरता भी बड़ी बनी हुई है।
30 जून 2026 तक भारत की लगी हुई नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 288.59 GW थी, जैसा नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के भौतिक प्रगति आँकड़ों में दर्ज है। इसका ब्योरा:
- सौर ऊर्जा: 162.15 GW
- पवन ऊर्जा: 57.44 GW
- बड़ी जल परियोजनाएँ: 52.06 GW
- जैव ऊर्जा: क़रीब 11.75 GW
- छोटी जल परियोजनाएँ: 5.18 GW
इसमें क़रीब 8.78 GW नाभिकीय क्षमता जोड़ दें तो ग़ैर-जीवाश्म कुल क़रीब 297 GW बैठता है। तुलना के लिए, मंत्रालय ने 31 मार्च 2026 तक 283.46 GW ग़ैर-जीवाश्म क्षमता बताई थी, और यह 2025–26 में 55.29 GW की रिकॉर्ड सालाना बढ़ोतरी के बाद था — किसी एक साल में भारत की सबसे बड़ी बढ़ोतरी, और 2024–25 के पिछले सबसे अच्छे आँकड़े 29.5 GW से लगभग दोगुनी। यह अप्रैल 2026 की पत्र सूचना कार्यालय की विज्ञप्ति में दर्ज है।
दो नीतिगत पड़ाव अहम हैं। पेरिस समझौते के तहत अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान में भारत ने वादा किया था कि 2030 तक उसकी कुल लगी हुई बिजली क्षमता का 50% ग़ैर-जीवाश्म स्रोतों से होगा, और यह लक्ष्य उसने जून 2025 में, पाँच साल पहले ही पार कर लिया। COP26 में की गई अलग घोषणा — 2030 तक 500 GW ग़ैर-जीवाश्म क्षमता — अब भी चालू लक्ष्य है।
अब वह बात, जिससे पूरी तस्वीर बदल जाती है। लगी हुई क्षमता और असल बिजली उत्पादन एक चीज़ नहीं हैं। सौर संयंत्र रात में कुछ नहीं बनाता और पवन चक्की हवा रुकने पर कुछ नहीं बनाती, जबकि कोयला संयंत्र चौबीसों घंटे चल सकता है। इसलिए भले ही ग़ैर-जीवाश्म स्रोत भारत की *क्षमता* का आधा पार कर गए हों, असल में *बनी* बिजली में उनका हिस्सा 2025–26 में 29.2% था। ख़र्च होने वाली ज़्यादातर बिजली आज भी कोयले से आती है। भारत के बदलाव की कोई भी ईमानदार बात इन दोनों आँकड़ों को एक साथ रखकर ही हो सकती है। तकनीक और नीति की बड़ी तस्वीर नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों और भारत के कार्यक्रमों वाले लेख में दी गई है।
बढ़ोतरी अब ज़्यादा बिखरी हुई भी हो रही है। 2025–26 में जुड़ी सौर क्षमता का अच्छा-ख़ासा हिस्सा बड़ी परियोजनाओं से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी जगहों पर लगे संयंत्रों से आया — पीएम सूर्य घर के तहत छतों पर लगे सिस्टम, और पीएम-कुसुम के तहत सौर पंप तथा फीडर।
पर्यावरण पर असर: कोई भी श्रेणी मुफ़्त नहीं है
ग़ैर-नवीकरणीय संसाधन हर चरण पर क़ीमत वसूलते हैं। निकालने का मतलब है खुली और भूमिगत खदानें, ज़मीन का बिगड़ना, और लोगों का उजड़ना। जलने पर कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है, जो जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी वजह है, साथ ही सल्फ़र डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड, जिनसे अम्लीय वर्षा होती है, और महीन कण, जो सीधे इंसान के फेफड़े ख़राब करते हैं। तेल की ढुलाई में रिसाव का ख़तरा रहता है। कोयले की राख को हमेशा के लिए कहीं ठिकाने लगाना पड़ता है।
नवीकरणीय संसाधन भी मुफ़्त नहीं हैं, और यह छिपाने से उनका पक्ष कमज़ोर ही होता है। बड़ी जल परियोजनाएँ जंगल और खेत डुबो देती हैं, आबादी उजाड़ती हैं, और नीचे की ओर नदी की पारिस्थितिकी तथा गाद के बहाव को बदल देती हैं। सौर पार्क बहुत ज़मीन घेरते हैं। पैनल, टरबाइन और बैटरी बनाने के लिए सिलिकॉन, ताँबा, दुर्लभ मृदा तत्व और लिथियम चाहिए, जिनके खनन का अपना बोझ है। आने वाले दशकों में सौर मॉड्यूल और टरबाइन के ब्लेड बड़े पैमाने पर ठिकाने लगाने या दोबारा इस्तेमाल में लाने पड़ेंगे। ग़लत जगह लगी पवन चक्कियाँ पक्षियों और चमगादड़ों को नुक़सान पहुँचाती हैं।
असल में काम की तुलना पूरे जीवन चक्र की तुलना है, सिर्फ़ इस्तेमाल की जगह की नहीं। उस पैमाने पर नवीकरणीय स्रोत हर यूनिट बिजली पर कोयले या गैस से कहीं कम ग्रीनहाउस गैस छोड़ते हैं। पर इस बदलाव से एक और सवाल खड़ा होता है, जिसका जवाब कोई तकनीकी तुलना नहीं दे सकती: कोयले पर टिके ज़िलों में नौकरियाँ, राजस्व और पूरी-पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्थाएँ उसी ईंधन पर खड़ी हैं जिसे घटाया जा रहा है। यही न्यायसंगत बदलाव की बहस है, और यह जितनी ऊर्जा की समस्या है उतनी ही राजनीति और समाज की भी।
टिकाऊपन का नज़रिया
दोनों श्रेणियों को जोड़ने वाला विचार सतत विकास है, जिसकी परिभाषा ब्रुंटलैंड आयोग ने 1987 में दी थी: ऐसा विकास जो आज की ज़रूरतें पूरी करे और आगे आने वाली पीढ़ियों की अपनी ज़रूरतें पूरी करने की ताक़त कम न करे।
संसाधनों पर लगाएँ तो इससे तीन काम के नियम निकलते हैं:
- नवीकरणीय संसाधन उतनी तेज़ी से मत इस्तेमाल कीजिए जितनी तेज़ी से वे दोबारा नहीं बन सकते। लकड़ी जंगल के बढ़ने की रफ़्तार से कम काटिए; भूजल भरने की रफ़्तार से कम निकालिए; मछलियाँ उनके बढ़ने की रफ़्तार से कम पकड़िए।
- ग़ैर-नवीकरणीय संसाधन उतनी तेज़ी से मत इस्तेमाल कीजिए जितनी तेज़ी से उनका विकल्प तैयार नहीं हो सकता। तय भंडार को घटाना तभी सही है जब उससे मिली कमाई वह ताक़त खड़ी करे जो आगे उसकी जगह लेगी।
- कचरा उतनी तेज़ी से मत छोड़िए जितनी तेज़ी से पर्यावरण उसे सोख नहीं सकता। कार्बन डाइऑक्साइड भी एक कचरा है, जो कुदरती सोखने वाली जगहों की क्षमता से कहीं तेज़ी से छोड़ा जा रहा है — और एक वाक्य में यही पूरी जलवायु समस्या है।
इन्हीं नियमों से यह भी साफ़ होता है कि “नवीकरणीय” का ठप्पा कोई गारंटी नहीं है। जो जंगल बढ़ने से तेज़ी से काटा जा रहा हो, वह कोयले की परत जैसा ही बर्ताव करता है: घटता हुआ भंडार। नवीकरणीयता इस बात का गुण है कि संसाधन इस्तेमाल कैसे हो रहा है, सिर्फ़ इस बात का नहीं कि वह है क्या।
आम ग़लतफ़हमियाँ
“नवीकरणीय का मतलब है कभी न ख़त्म होने वाला।” यह सिर्फ़ धूप और हवा जैसे प्रवाही संसाधनों पर सही है। जंगल, मछलियाँ, मिट्टी और भूजल सिद्धांत में नवीकरणीय हैं और व्यवहार में ख़त्म हो सकते हैं — और इनमें से कई अभी इसी वक़्त ख़त्म हो रहे हैं।
“नाभिकीय ऊर्जा नवीकरणीय है।” वह कम-कार्बन है, नवीकरणीय नहीं। यूरेनियम और थोरियम सीमित खनिज हैं। भारत के सरकारी आँकड़े नाभिकीय को नवीकरणीय के साथ “ग़ैर-जीवाश्म” शीर्षक के नीचे रखते हैं, जो सही है; उसे नवीकरणीय कहना सही नहीं।
“भारत को अब आधी से ज़्यादा बिजली स्वच्छ स्रोतों से मिलती है।” भारत की लगी हुई *क्षमता* का आधे से ज़्यादा हिस्सा ग़ैर-जीवाश्म स्रोतों का है। असल *उत्पादन* में उनका हिस्सा 2025–26 में 29.2% था। क्षमता वह है जो लगाई गई है; उत्पादन वह है जो सचमुच बनी — और दोनों इसलिए अलग हैं क्योंकि सौर और पवन कम घंटे चलते हैं।
“नवीकरणीय ऊर्जा की कोई पर्यावरणीय क़ीमत नहीं है।” ज़मीन, कच्चा माल, बनाने की प्रक्रिया और आख़िर में बचा कचरा — सब गिनती में आते हैं। नवीकरणीय स्रोतों का पक्ष इस पर टिका है कि पूरे जीवन चक्र में वे कहीं बेहतर हैं, इस पर नहीं कि वे बिल्कुल बेज़रर हैं।
“जीवाश्म ईंधन जल्द ख़त्म हो जाएँगे और इससे जलवायु की समस्या हल हो जाएगी।” ज्ञात भंडार उससे कहीं ज़्यादा हैं जितना किसी भी सुरक्षित कार्बन बजट में जलाया जा सकता है। असली रोक भूगर्भ की नहीं, वायुमंडल की है।
“जैव ईंधन अपने आप कार्बन के लिहाज़ से तटस्थ होता है।” तभी, जब जली हुई वनस्पति उतनी ही रफ़्तार से दोबारा उगे, और तभी जब काटने, तैयार करने और ढोने का उत्सर्जन भी गिना जाए। जंगल के दोबारा उगने से तेज़ी से लकड़ी जलाना वायुमंडल में उतना ही कार्बन जोड़ता है जितना कोयला।
सामान्य प्रश्न
नवीकरणीय और ग़ैर-नवीकरणीय संसाधनों में बुनियादी फ़र्क़ क्या है?
नवीकरणीय संसाधन कुदरती प्रक्रियाओं से इंसानी उम्र के भीतर दोबारा भर जाते हैं, इसलिए अगर इस्तेमाल उनके भरने की रफ़्तार के भीतर रहे तो वे हमेशा चल सकते हैं। ग़ैर-नवीकरणीय संसाधन भूगर्भीय समय में बने, तय भंडार के रूप में मौजूद हैं, और हर इस्तेमाल की गई इकाई से हमेशा के लिए घट जाते हैं।
भूजल नवीकरणीय है या ग़ैर-नवीकरणीय?
तकनीकी तौर पर नवीकरणीय, क्योंकि जलभृत बारिश और रिसाव से भरते हैं। पर व्यवहार में जहाँ साल-दर-साल निकाला गया पानी भरे गए पानी से ज़्यादा हो — जैसा उत्तर-पश्चिमी भारत के बड़े हिस्से में है — वहाँ जलभृत को खोदकर निकाला जा रहा है, और वह ग़ैर-नवीकरणीय भंडार जैसा बर्ताव करता है।
नाभिकीय ऊर्जा को नवीकरणीय क्यों नहीं गिना जाता?
क्योंकि उसका ईंधन एक सीमित खनिज है। यूरेनियम और थोरियम के भंडार दोबारा नहीं भरते। नाभिकीय ऊर्जा को कम-कार्बन कहना सही है, और भारत के आँकड़े उसे नवीकरणीय के साथ ग़ैर-जीवाश्म क्षमता में गिनते हैं, पर ईंधन ख़ुद ख़त्म होने वाला है।
भारत की बिजली क्षमता का कितना हिस्सा नवीकरणीय है?
30 जून 2026 तक लगी हुई नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता क़रीब 288.59 GW थी, जिसमें अकेले सौर 162.15 GW है। भारत की कुल लगी हुई बिजली क्षमता में ग़ैर-जीवाश्म स्रोत जून 2025 में 50% पार कर गए — पेरिस समझौते के तहत तय 2030 के लक्ष्य से पाँच साल पहले।
उत्पादन में नवीकरणीय का हिस्सा क्षमता के मुक़ाबले कम क्यों है?
क्योंकि किसी संयंत्र का उत्पादन इस पर टिका है कि वह कितने घंटे चलता है। सौर सिर्फ़ दिन में बनाता है और पवन तभी जब हवा चले, जबकि तापीय संयंत्र लगातार चल सकते हैं। इसीलिए लगाई गई क्षमता में ग़ैर-जीवाश्म स्रोतों का हिस्सा असल में बनी बिजली के हिस्से से बड़ा दिखता है।
क्या लोहा और बॉक्साइट जैसे खनिज नवीकरणीय हैं?
नहीं। सारे खनिज भंडार ग़ैर-नवीकरणीय हैं, जो करोड़ों साल की भूगर्भीय प्रक्रियाओं से बने। धातुओं को दोबारा इस्तेमाल में लाया जा सकता है, जिससे पहले निकाले गए माल की उम्र बढ़ती है, पर भंडार ख़ुद दोबारा नहीं बनते।
न्यायसंगत बदलाव क्या है?
यह विचार कि जीवाश्म ईंधन से हटते समय उन मज़दूरों, समुदायों और इलाक़ाई अर्थव्यवस्थाओं का ध्यान रखना ज़रूरी है जो उन्हीं पर टिके हैं — नई ट्रेनिंग, दूसरे रोज़गार और आमदनी की मदद के ज़रिए — ताकि बदलाव का बोझ उन पर न पड़े जो उसे सबसे कम उठा सकते हैं।
अभ्यास प्रश्न
1. निम्नलिखित में से किसे सही तौर पर प्रवाही या सतत संसाधन कहा जाएगा?
a) भूजल
b) ज्वारीय ऊर्जा
c) जंगल की लकड़ी
d) कोयला
उत्तर: b) ज्वारीय ऊर्जा
2. कोयले को ग़ैर-नवीकरणीय संसाधन मुख्य रूप से इसलिए कहा जाता है क्योंकि:
a) वह सिर्फ़ कुछ ही देशों में मिलता है
b) उसके जलने से कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है
c) वह करोड़ों साल में बना और इंसानी उम्र के भीतर दोबारा नहीं बनता
d) उसके भंडार पेट्रोलियम से कम हैं
उत्तर: c) वह करोड़ों साल में बना और इंसानी उम्र के भीतर दोबारा नहीं बनता
3. भारत के सरकारी ऊर्जा आँकड़ों में “ग़ैर-जीवाश्म क्षमता” में शामिल है:
a) सिर्फ़ सौर और पवन क्षमता
b) नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के साथ नाभिकीय क्षमता
c) आयातित कोयले के अलावा सभी स्रोत
d) बड़ी जल परियोजनाओं को छोड़कर नवीकरणीय क्षमता
उत्तर: b) नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के साथ नाभिकीय क्षमता
4. भारत ने अपनी कुल लगी हुई बिजली क्षमता का 50% ग़ैर-जीवाश्म स्रोतों से कब हासिल किया?
a) जून 2020
b) जून 2025
c) मार्च 2026
d) दिसंबर 2030
उत्तर: b) जून 2025
5. भारत के कुल बिजली उत्पादन में ग़ैर-जीवाश्म स्रोतों का हिस्सा लगी हुई क्षमता के हिस्से से कम है, इसकी मुख्य वजह है:
a) नवीकरणीय संयंत्र खपत वाले इलाक़ों से दूर लगे हैं
b) सौर और पवन संयंत्र तापीय संयंत्रों से कम घंटे चलते हैं
c) नवीकरणीय क्षमता राष्ट्रीय ग्रिड से जुड़ी नहीं है
d) उत्पादन के आँकड़ों में नाभिकीय संयंत्र नहीं गिने जाते
उत्तर: b) सौर और पवन संयंत्र तापीय संयंत्रों से कम घंटे चलते हैं
- नवीकरणीय और ग़ैर-नवीकरणीय संसाधनों में अंतर बताइए, और समझाइए कि यह बँटवारा कुल मात्रा पर नहीं, दोबारा बनने की रफ़्तार पर क्यों टिका है।
- “नवीकरणीयता इस बात का गुण है कि संसाधन इस्तेमाल कैसे हो रहा है, सिर्फ़ इस बात का नहीं कि वह है क्या।” जंगल, मछलियों और भूजल के संदर्भ में इस कथन की जाँच कीजिए।
- भारत की लगी हुई बिजली क्षमता का आधे से ज़्यादा हिस्सा ग़ैर-जीवाश्म स्रोतों से है, फिर भी ज़्यादातर बिजली कोयले से बनती है। इस अंतर की वजहों और ऊर्जा नीति पर इसके असर का विश्लेषण कीजिए।
- नवीकरणीय ऊर्जा के ढाँचे से जुड़ी पर्यावरणीय क़ीमतों पर चर्चा कीजिए, और बताइए कि आकलन का सही आधार इस्तेमाल की जगह की तुलना क्यों नहीं, बल्कि पूरे जीवन चक्र की तुलना क्यों है।
- कोयले पर टिके भारतीय इलाक़ों के संदर्भ में न्यायसंगत बदलाव की धारणा की जाँच कीजिए, और ऐसे उपाय सुझाइए जिनसे जलवायु के वादे और रोज़ी-रोटी की सुरक्षा, दोनों साथ चल सकें।