UPSC CSE 2026 Essay Paper Discussion

राज्य पुनर्गठन आयोग: धर आयोग, जेवीपी समिति, फजल अली आयोग और भाषाई राज्य

राज्य पुनर्गठन आयोग, धर आयोग और जेवीपी समिति ने क्या सिफारिश की, और 1956 में राज्यों का नया नक्शा कैसे बना, यह सब एक ही जगह समझिए।

The granite facade of Vidhana Soudha in Bengaluru, with a central dome, columned portico and an Indian flag against a cloudy sky.

आजाद भारत अपने प्रांतों की सीमाएँ भाषा के आधार पर दोबारा खींचे या नहीं, इस सवाल की पहली सरकारी जाँच धर आयोग ने की थी। बाद में यही सवाल राज्य पुनर्गठन आयोग तक पहुँचा। धर आयोग को जून 1948 में संविधान सभा के अध्यक्ष ने नियुक्त किया था, और इसके अध्यक्ष इलाहाबाद हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज एस. के. धर थे। आयोग का जवाब था: नहीं। इसके बाद दो और संस्थाएँ आईं। पहली थी 1949 में कांग्रेस की जेवीपी समिति। दूसरी थी फजल अली आयोग, जिसका औपचारिक नाम राज्य पुनर्गठन आयोग था। इसने 1955 में अपनी रिपोर्ट दी, और उसी से वह नक्शा बना जो 1 नवंबर 1956 से लागू हुआ।

ज्यादातर छात्रों के मन में एक गलत तस्वीर बैठी रहती है: कि ये तीनों संस्थाएँ धीरे-धीरे एक ही दिशा में, यानी भाषाई राज्यों की ओर बढ़ती गईं। ऐसा नहीं हुआ। धर आयोग ने भाषा को मुख्य कसौटी मानने से इनकार किया। जेवीपी समिति ने रुकने की सलाह दी। और फजल अली आयोग ने भी “एक भाषा एक राज्य” का विचार ठुकरा दिया। नक्शा असल में 1952 में मद्रास राज्य में हुए एक अनशन से बदला। फिर 1956 में संसद ने जो अंतिम अधिनियम बनाया, वह भी कई जगह आयोग से अलग चला। यह नोट इन तीनों संस्थाओं को अलग-अलग रखकर समझाता है, और हर सिफारिश के आगे बताता है कि असल में क्या हुआ।

धर आयोग, जेवीपी समिति और फजल अली आयोग: एक नजर में

तीनों संस्थाओं को अलग-अलग अधिकारियों ने नियुक्त किया था। तीनों के सामने सवाल अलग थे, और तीनों के फैसले भी अलग निकले। नीचे की तालिका में इन्हें आमने-सामने रखा गया है।

तथ्यविवरण
धर आयोग (भाषाई प्रांत आयोग)17 जून 1948 को संविधान सभा के अध्यक्ष ने नियुक्त किया; रिपोर्ट पर 10 दिसंबर 1948 को दस्तखत
धर आयोग के सदस्यएस. के. धर (अध्यक्ष), पन्ना लाल और जगत नारायण लाल
धर आयोग का फैसला“पूरी तरह या मुख्य रूप से भाषाई” आधार पर प्रांत बनाना राष्ट्रीय हित में नहीं
जेवीपी समितिजवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया; कांग्रेस के जयपुर अधिवेशन में गठित; रिपोर्ट की तारीख 1 अप्रैल 1949
आंध्र राज्यआंध्र राज्य अधिनियम, 1953 के तहत 1 अक्टूबर 1953 को बना
फजल अली आयोग (राज्य पुनर्गठन आयोग)फजल अली (अध्यक्ष), एच. एन. कुंजरू और के. एम. पणिक्कर; नियुक्ति 29 दिसंबर 1953; रिपोर्ट पर दस्तखत 30 सितंबर 1955
फजल अली आयोग का प्रस्ताव16 राज्य और केंद्र द्वारा प्रशासित 3 क्षेत्र
नतीजाराज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 और सातवां संशोधन, दोनों 1 नवंबर 1956 से लागू: 14 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेश

आजाद भारत को भाषाई प्रांतों पर आयोग की जरूरत क्यों पड़ी

सीधा जवाब यह है कि कांग्रेस दशकों से भाषाई प्रांतों का वादा करती आई थी, लेकिन सत्ता में आते ही वह हिचकने लगी। उसे विरासत में जो प्रांत मिले, वे अंग्रेजों की प्रशासनिक इकाइयाँ थीं। उनकी सीमाएँ जीत और सुविधा के हिसाब से खिंची थीं। इसलिए मद्रास में तेलुगु, तमिल, मलयालम और कन्नड़ बोलने वाले एक ही सरकार के तहत थे। उधर बंबई में मराठी, गुजराती और कन्नड़ बोलने वाले साथ रहते थे।

कांग्रेस अपने संगठन के भीतर यह सिद्धांत पहले ही मान चुकी थी। 1920 के नागपुर अधिवेशन से पार्टी ने अपनी प्रांतीय समितियाँ अंग्रेजों के प्रांतों के हिसाब से नहीं, बल्कि भाषा के हिसाब से बनाईं। जेवीपी रिपोर्ट खुद दर्ज करती है कि कांग्रेस आंध्र, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात के लिए अलग-अलग समितियाँ चलाती थी। बंबई शहर के लिए भी एक अलग समिति थी। यह सब तब था, जब इनमें से कोई भी प्रांत के रूप में मौजूद ही नहीं था।

विभाजन ने पूरा हिसाब बदल दिया। 1947 और 1948 में नई सरकार सैकड़ों रियासतों को भारत में मिला रही थी, शरणार्थियों को बसा रही थी और संविधान का मसौदा बना रही थी। जो नेता 25 साल से भाषाई प्रांतों का समर्थन करते आए थे, अब उन्हें डर था कि इस उथल-पुथल के बीच सीमाएँ दोबारा खींचने से वही चीज बढ़ेगी, जिसे जेवीपी समिति ने बाद में “संकीर्ण प्रांतवाद” कहा।

इसलिए सवाल एक जाँच को सौंप दिया गया। संविधान की प्रारूप समिति की सिफारिश पर संविधान सभा के अध्यक्ष ने जून 1948 में एक आयोग नियुक्त किया। इसे चार प्रस्तावित प्रांतों पर रिपोर्ट देनी थी:

  • आंध्र, जिसे मद्रास से अलग करके बनाना था;
  • कर्नाटक, जो मद्रास, बंबई, हैदराबाद और मैसूर के हिस्सों से बनता;
  • केरल, जो मालाबार के साथ त्रावणकोर और कोचीन रियासतों को जोड़कर बनता;
  • महाराष्ट्र, जो बंबई, हैदराबाद और मध्य प्रांत-बरार के हिस्सों से बनता।

ऐसे बदलाव करने की संवैधानिक शक्ति एक अलग विषय है, जिसे अनुच्छेद 3 और राज्यों का पुनर्गठन वाले नोट में समझाया गया है। केंद्र-राज्य संबंधों का बड़ा ढाँचा भारत में संघवाद वाले नोट में है।

धर आयोग ने क्या सिफारिश की और क्यों

धर आयोग ने सिफारिश की कि फिलहाल चारों में से कोई भी भाषाई प्रांत न बनाया जाए। उसकी रिपोर्ट पर 10 दिसंबर 1948 को दस्तखत हुए। रिपोर्ट सर्वसम्मत थी, और उसमें असहमति का कोई नोट नहीं था।

पहले नाम की वर्तनी पर एक छोटी-सी बात। रिपोर्ट और उस दौर के कांग्रेस के कागजों में अध्यक्ष का नाम S. K. Dar (डार) छपा है। पाठ्यपुस्तकें और परीक्षा की ज्यादातर सामग्री इसे “Dhar” यानी धर लिखती हैं, इसीलिए इस संस्था को आम तौर पर धर आयोग कहा जाता है। दोनों नाम एक ही भाषाई प्रांत आयोग के हैं, और यह नोट धर वाली वर्तनी ही इस्तेमाल करता है।

आयोग में तीन सदस्य और एक सचिव थे। इसके अलावा संबंधित इलाकों से कुछ सहयोगी सदस्य भी जोड़े गए थे। उन्होंने गवाहों से पूछताछ में मदद की, लेकिन रिपोर्ट पर दस्तखत नहीं किए:

  • एस. के. धर, इलाहाबाद हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज, अध्यक्ष;
  • डॉ. पन्ना लाल, इंडियन सिविल सर्विस (ICS) के रिटायर्ड सदस्य;
  • जगत नारायण लाल, संविधान सभा के सदस्य;
  • बिहार के महालेखाकार बी. सी. बनर्जी, सचिव के रूप में।

आयोग ने तेजी से काम किया। पहली बैठक 19 जुलाई 1948 को हुई। उसके बाद विजागपट्टम, मद्रास, मदुरा, मंगलौर, कालीकट, कोयंबटूर, नागपुर, हुबली, पूना और बंबई के दौरे हुए। रिपोर्ट के मुताबिक आयोग को करीब 1,000 लिखित ज्ञापन मिले, और उसने 700 से ज्यादा गवाहों के बयान दर्ज किए।

रिपोर्ट के पैराग्राफ 152 में उसके निष्कर्ष ये थे:

  • “पूरी तरह या मुख्य रूप से भाषाई आधार पर” प्रांत बनाना राष्ट्र के बड़े हित में नहीं है, इसलिए यह काम हाथ में नहीं लेना चाहिए।
  • मद्रास, बंबई और मध्य प्रांत-बरार में सचमुच गंभीर प्रशासनिक समस्याएँ थीं, लेकिन इनका हल केंद्र की ओर से प्रशासनिक कदमों से निकलना चाहिए, नए प्रांत बनाकर नहीं।
  • प्रांतों का नया गठन तब तक रुक सकता है, जब तक रियासतों का एकीकरण पूरा न हो जाए और देश में स्थिरता न आ जाए।
  • आगे जब प्रांत दोबारा बनें, तो भाषा कई कारणों में से एक हो सकती है, लेकिन कभी भी निर्णायक या मुख्य कारण नहीं।
  • दो भाषाओं वाले सीमावर्ती जिलों को तोड़ा न जाए, और बंबई और मद्रास शहरों के साथ खास बर्ताव किया जाए।

आयोग का तर्क उसी की शब्दावली में याद रखने लायक है। उसे डर था कि भाषाई बहुमत किसी प्रांत को अपना होमलैंड मानने लगेगा और अल्पसंख्यकों को बाहर धकेल देगा। इसलिए उसने साझी बोली से ज्यादा वजन प्रशासनिक सुविधा, वित्तीय व्यवहार्यता और भौगोलिक निरंतरता को दिया। यह फैसला विभाजन के साये में लिया गया था। आयोग ने आंध्र और महाराष्ट्र की माँग को उस एकता के लिए खतरा माना, जो तब तक नाजुक थी।

जेवीपी समिति 1949 में किस नतीजे पर पहुँची

जेवीपी समिति समय के सवाल पर धर आयोग से सहमत थी, लेकिन सिद्धांत पर नहीं। आयोग ने कहा था कि भाषा कभी मुख्य कसौटी नहीं होनी चाहिए। समिति ने माना कि आखिर में जनभावना ही फैसला कर सकती है।

कांग्रेस ने यह समिति दिसंबर 1948 के जयपुर अधिवेशन में बनाई, धर रिपोर्ट आने के कुछ ही समय बाद। इसका नाम इसके तीन सदस्यों के नाम के पहले अक्षरों से बना है: जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल और तब के कांग्रेस अध्यक्ष पट्टाभि सीतारमैया। इसका काम था कांग्रेस की पुरानी नीति पर धर रिपोर्ट “के आलोक में” दोबारा विचार करना, और आजादी के बाद आई नई समस्याओं को भी देखना।

1 अप्रैल 1949 की तारीख वाली इसकी रिपोर्ट चार नतीजों पर पहुँची:

  • सबसे पहले भारत की सुरक्षा, एकता और आर्थिक समृद्धि देखनी होगी, और अलगाववादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए।
  • समिति चाहती थी कि नए प्रांत कुछ साल के लिए टाल दिए जाएँ।
  • अगर जनभावना “आग्रहपूर्ण और प्रबल” हो, तो लोकतंत्र में विश्वास रखने वालों को उसके आगे झुकना होगा, लेकिन पूरे भारत की भलाई से जुड़ी शर्तों के साथ।
  • आंध्र पहले बन सकता है, क्योंकि उसके पीछे सबसे व्यापक सहमति थी, लेकिन तभी जब उसके समर्थक मद्रास शहर पर अपना दावा छोड़ दें। और अगर कभी बंबई प्रांत बँटा, तो ग्रेटर बंबई एक अलग इकाई बनेगा।

बाद में यही तीसरी बात सबसे अहम साबित हुई। समिति ने रिकॉर्ड पर एक शर्त लिख दी थी। चार साल के भीतर तेलुगु भाषी जिलों ने वह शर्त सम्मेलन की मेज पर नहीं, सड़क पर पूरी कर दी।

पोट्टि श्रीरामुलु के अनशन से आंध्र राज्य कैसे बना

1952 में आंध्र की माँग ने मामले को निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया। मद्रास राज्य के तेलुगु जिलों के कांग्रेस कार्यकर्ता पोट्टि श्रीरामुलु ने अलग आंध्र राज्य के लिए 19 अक्टूबर 1952 को अनशन शुरू किया। दिसंबर 1952 में अनशन तोड़े बिना ही उनकी मौत हो गई। उनकी मौत के बाद पूरे तेलुगु इलाके में विरोध-प्रदर्शन और हिंसा भड़क उठी।

19 दिसंबर 1952 को नेहरू ने घोषणा की कि आंध्र राज्य बनेगा। संसद ने आंध्र राज्य अधिनियम, 1953 पास किया, और नया राज्य 1 अक्टूबर 1953 को भाग A राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। इसमें मद्रास राज्य के तेलुगु भाषी जिले थे, उत्तर में श्रीकाकुलम से लेकर दक्षिण में चित्तूर और नेल्लोर तक। साथ में बेल्लारी जिले के आलूर, आदोनी और रायदुर्ग तालुके भी जोड़े गए। मद्रास शहर मद्रास के पास ही रहा, ठीक वैसे ही जैसी जेवीपी समिति ने शर्त रखी थी। कुरनूल को राजधानी बनाया गया।

आंध्र पहला राज्य था जो खुले तौर पर भाषा के आधार पर बना, और इसके बाद हर दूसरी माँग को ठुकराना और मुश्किल हो गया। तीन महीने के भीतर, 22 दिसंबर 1953 को, नेहरू ने संसद में कहा कि एक आयोग पूरे देश के पुनर्गठन की जाँच “वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष ढंग से” करेगा।

फजल अली आयोग ने क्या सिफारिश की

फजल अली आयोग, यानी राज्य पुनर्गठन आयोग, ने 16 राज्यों और केंद्र द्वारा प्रशासित 3 क्षेत्रों वाले देश की सिफारिश की। इसका आधार अकेली भाषा नहीं थी। आधार था भाषा, प्रशासन, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन। इसे गृह मंत्रालय (MHA) के 29 दिसंबर 1953 के एक प्रस्ताव से नियुक्त किया गया, और इसके तीनों सदस्यों ने 30 सितंबर 1955 को रिपोर्ट पर दस्तखत किए:

  • फजल अली, अध्यक्ष, एक जज;
  • एच. एन. कुंजरू, एक सांसद;
  • के. एम. पणिक्कर, इतिहासकार और राजनयिक।

आयोग को जो काम सौंपा गया था, उसमें कहा गया कि वह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, मौजूदा हालात और हर जरूरी पहलू का अध्ययन करे। पहले वह मोटे सिद्धांत तय करे। फिर अगर चाहे, तो यह भी सुझाए कि किन-किन राज्यों का पुनर्गठन किस तरह हो।

सिद्धांत

पैराग्राफ 162 और 163 में आयोग ने अपना नजरिया रखा। उसका निष्कर्ष था कि राज्यों का पुनर्गठन “केवल भाषा या संस्कृति की एक कसौटी” पर नहीं हो सकता। उसने एक संतुलित रास्ता सुझाया:

  • भाषाई एकरूपता को प्रशासन की एक अहम मदद मानना, लेकिन ऐसा बाध्यकारी नियम नहीं, जो प्रशासनिक, वित्तीय या राजनीतिक बातों पर भारी पड़ जाए;
  • भाषाई समूहों की शिक्षा और संस्कृति से जुड़ी जरूरतें पूरी करना, चाहे वे एक भाषा वाले राज्य में रहें या मिली-जुली आबादी वाले राज्य में;
  • जहाँ सारी बातें तौलने पर मिश्रित राज्य बेहतर लगें, वहाँ उन्हें बनाए रखना, और सभी समूहों के लिए सुरक्षा उपाय देना;
  • “होमलैंड” के विचार को सिरे से नकारना, क्योंकि यह पूरे संघ में सभी नागरिकों के बराबर अधिकारों को नकारता है;
  • “एक भाषा एक राज्य” को ठुकराना, क्योंकि एक भाषा एक से ज्यादा राज्यों का आधार बन सकती है, और पूरी हिंदी भाषी आबादी को एक इकाई में नहीं रखा जा सकता;
  • इससे जो भी क्षेत्रीय भावना पनपे, उसका जवाब केंद्र और राज्यों के बीच के रिश्ते मजबूत करके देना।

मुख्य सिफारिशें

ढाँचे से जुड़े प्रस्ताव नई सीमाओं जितने ही अहम थे। आयोग चाहता था कि भाग A, भाग B और भाग C का भेद खत्म हो। वह राजप्रमुख का पद भी खत्म करना चाहता था। राजप्रमुख वह पूर्व शासक होता था, जो भाग B राज्य का प्रमुख था। साथ ही अनुच्छेद 371 हटाने की बात थी, जो केंद्र को भाग B राज्यों पर आम नियंत्रण देता था। ज्यादातर भाग C राज्यों को बड़े पड़ोसी राज्यों में मिलाया जाना था।

नक्शे पर उसने ये बदलाव सुझाए:

  • त्रावणकोर-कोचीन और मालाबार से एक नया केरल, और मैसूर के इर्द-गिर्द एक नया कर्नाटक;
  • मध्य प्रदेश के मराठी भाषी जिलों से अलग विदर्भ राज्य;
  • तेलुगु भाषी जिलों (तेलंगाना) का एक बचा हुआ हैदराबाद राज्य, जो करीब 1961 में होने वाले आम चुनावों के बाद आंध्र में मिल सकता था, बशर्ते उसकी विधानसभा दो-तिहाई बहुमत से सहमति दे;
  • एक बड़ा द्विभाषी बंबई, जिसमें सौराष्ट्र, कच्छ और हैदराबाद के मराठी भाषी जिले भी शामिल हों;
  • पंजाब का बँटवारा नहीं, दक्षिण बिहार में झारखंड राज्य नहीं, और असम में पहाड़ी राज्य भी नहीं;
  • दिल्ली, मणिपुर और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह को केंद्र द्वारा प्रशासित क्षेत्र बनाना।

पणिक्कर का असहमति नोट

रिपोर्ट पूरी तरह सर्वसम्मत नहीं थी। के. एम. पणिक्कर ने उत्तर प्रदेश को जैसा है वैसा ही रखने की सिफारिश नहीं मानी, और एक अलग नोट में अपने कारण बताए। उत्तर प्रदेश की आबादी 63 मिलियन से ज्यादा थी, यानी भारत की आबादी के छठे हिस्से से भी ज्यादा। लोकसभा की 499 में से 86 सीटें अकेले उसके पास थीं। उनका तर्क था कि इतनी बड़ी एक इकाई संघ का संतुलन बिगाड़ देगी। उन्होंने मेरठ, आगरा, रुहेलखंड और झांसी डिवीजनों और आसपास के कुछ जिलों को मिलाकर एक नया “आगरा राज्य” बनाने का प्रस्ताव रखा। सरकार ने इसे आगे नहीं बढ़ाया।

1956 के अधिनियम और सातवें संशोधन ने नक्शा कैसे बदला

राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 (1956 का अधिनियम संख्या 37) की तारीख 31 अगस्त 1956 है। इसने आयोग की योजना को कुछ बदलावों के साथ कानून का रूप दिया। इसका नियत दिन 1 नवंबर 1956 था। संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956, जिसकी तारीख 19 अक्टूबर 1956 है, उसी दिन लागू हुआ। उसने संविधान के ढाँचे को भी इसके हिसाब से बदल दिया।

इस विषय के लिहाज से सातवें संशोधन ने तीन अहम काम किए:

  • इसने भाग A, भाग B, भाग C और भाग D की श्रेणियाँ खत्म कीं, और उनकी जगह दो तरह की इकाइयाँ रखीं: राज्य और केंद्र शासित प्रदेश;
  • इसने पहली अनुसूची दोबारा लिखी, जिसमें 14 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेश दर्ज हुए;
  • इसने अनुच्छेद 239 और 240 दोबारा लिखे, ताकि हर केंद्र शासित प्रदेश का प्रशासन राष्ट्रपति एक प्रशासक के जरिए चलाएँ।

14 राज्य ये थे: आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, बंबई, जम्मू और कश्मीर, केरल, मध्य प्रदेश, मद्रास, मैसूर, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल। 6 केंद्र शासित प्रदेश ये थे: दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, और लकादीव, मिनिकॉय और अमीनदीवी द्वीप समूह। आज की सूची और उसके पीछे का तर्क भारत के केंद्र शासित प्रदेश वाले नोट में है।

संसद ने रिपोर्ट की हूबहू नकल नहीं की। मुख्य अंतर ये थे:

सवालफजल अली आयोग (1955)राज्य पुनर्गठन अधिनियम (1956)
तेलंगानाअलग बचा हुआ हैदराबाद राज्य, करीब 1961 के बाद विलय संभवतुरंत आंध्र में मिलाकर आंध्र प्रदेश बनाया
विदर्भअलग राज्यद्विभाषी बंबई में मिलाया
हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरापंजाब और असम में मिलेंकेंद्र शासित प्रदेश बने रहे
लकादीव, मिनिकॉय और अमीनदीवीनए केरल का हिस्साएक अलग केंद्र शासित प्रदेश
कुल16 राज्य, 3 क्षेत्र14 राज्य, 6 केंद्र शासित प्रदेश

अधिनियम ने वह काम भी किया, जिसका इशारा आयोग ने केंद्र-राज्य रिश्ते मजबूत करने की अपनी बात में किया था। धारा 15 से पाँच क्षेत्रीय परिषदें बनीं: उत्तरी, मध्य, पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी। ये पड़ोसी राज्यों के लिए साझी समस्याएँ सुलझाने के मंच हैं। आज इनका कामकाज कैसे चलता है, यह क्षेत्रीय परिषदें वाले नोट में समझाया गया है।

1956 के बाद क्या बदला

1956 का नक्शा एक समझौता था, कहानी का अंत नहीं। संसद ने आयोग की सलाह के खिलाफ जाकर दो समझौते किए थे: द्विभाषी बंबई और एक अविभाजित पंजाब। यही दोनों सबसे पहले टूटे:

  • 1 मई 1960: बंबई पुनर्गठन अधिनियम, 1960 ने बंबई को गुजरात और महाराष्ट्र में बाँट दिया। इसके पीछे के आंदोलनों की कहानी महागुजरात आंदोलन वाले नोट में है।
  • 1 नवंबर 1966: पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 ने हरियाणा बनाया और पहाड़ी इलाके हिमाचल प्रदेश को सौंप दिए।
  • 2 जून 2014: आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 ने तेलंगाना को अलग किया। इससे 1956 का वह विलय पलट गया, जिसके खिलाफ आयोग ने सलाह दी थी।

बाकी राज्य दूसरे दबावों से बने: पूर्वोत्तर में जनजातीय पहचान, सिक्किम का विलय, और 2000 में विकास से जुड़ी वे माँगें, जिनसे छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड बने। आज भारत में 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश हैं। 1956 का नक्शा भाषा ने खींचा था। बाद के बदलावों के पीछे बोली जितनी ही भूमिका जातीय पहचान, भूगोल और असमान विकास की भी रही। इसीलिए क्षेत्रवाद वाला नोट इस नोट के साथ पढ़ना चाहिए।

नए राज्यों का सवाल आज कहाँ खड़ा है

राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 आज भी लागू है, और उसकी क्षेत्रीय परिषदें आज भी केंद्रीय गृह मंत्री की अध्यक्षता में बैठती हैं। दूसरा कोई राज्य पुनर्गठन आयोग नहीं बना। उसे बनाने के लिए संसद में 2001, 2005 और 2014 में विधेयक पेश हुए, लेकिन कोई भी कानून नहीं बन पाया। इसलिए 1956 के बाद हर बदलाव एक-एक मामले के हिसाब से, अनुच्छेद 3 के तहत अलग अधिनियम से हुआ है।

हाल के चलन से यह भी दिखता है कि नई सीमाएँ खींचने के बजाय मौजूदा राज्यों के भीतर स्वायत्तता देने की ओर झुकाव बढ़ा है। फरवरी 2026 में केंद्र, नगालैंड सरकार और ईस्टर्न नगालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन ने छह पूर्वी जिलों के लिए फ्रंटियर नगालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी बनाने के समझौते पर दस्तखत किए। यह अलग राज्य की लंबी माँग के बाद हुआ। पूरी जानकारी करेंट अफेयर्स के नोट पूर्वी नगालैंड को स्वायत्तता क्यों मिली में है। यह कदम फजल अली आयोग के नक्शे से ज्यादा उसकी सोच पर चलता है: पहले सुरक्षा उपायों से शिकायत दूर करो, और सीमा तभी बदलो जब यह रास्ता नाकाम हो जाए।

परीक्षा के लिए धर आयोग और राज्य पुनर्गठन आयोग कैसे पढ़ें

यह विषय GS पेपर I में आजादी के बाद के एकीकरण और राज्यों के पुनर्गठन के तहत आता है। संघवाद और अनुच्छेद 3 के जरिए यह GS पेपर II से भी जुड़ता है। मुख्य परीक्षा के सवाल आम तौर पर तारीखें नहीं, आपकी समझ और आकलन माँगते हैं। मुख्य परीक्षा 2016 के GS पेपर I में पूछा गया था, “क्या भाषाई राज्यों के गठन से भारतीय एकता के उद्देश्य को मजबूती मिली है?” इसके अच्छे उत्तर में तीनों संस्थाओं का जिक्र जरूरी है। प्रीलिम्स की तरफ देखें, तो Anantam IAS के प्रीलिम्स प्रश्न बैंक के 1,403 प्रश्नों में से 240 भारतीय राजव्यवस्था के हैं। और किसने किसकी अध्यक्षता की, इस पर कथन वाले प्रश्न एक आम ढाँचा हैं।

ये तथ्य तब तक दोहराइए, जब तक ये जुबान पर न चढ़ जाएँ:

  • धर आयोग: 17 जून 1948 को संविधान सभा के अध्यक्ष ने नियुक्त किया, रिपोर्ट 10 दिसंबर 1948, भाषा को मुख्य आधार मानने से इनकार।
  • जेवीपी समिति: नेहरू, पटेल और सीतारमैया, कांग्रेस का जयपुर अधिवेशन, रिपोर्ट 1 अप्रैल 1949, नए प्रांत टालो लेकिन “आग्रहपूर्ण और प्रबल” जनभावना के आगे झुको।
  • आंध्र राज्य: दिसंबर 1952 में पोट्टि श्रीरामुलु की मौत के बाद 1 अक्टूबर 1953 को बना; मद्रास शहर इससे बाहर रहा।
  • फजल अली आयोग: फजल अली, कुंजरू और पणिक्कर; नियुक्ति 29 दिसंबर 1953; रिपोर्ट 30 सितंबर 1955; 16 राज्य और 3 क्षेत्र।
  • पणिक्कर का असहमति नोट: उत्तर प्रदेश को बाँटकर आगरा राज्य बनाने का प्रस्ताव।
  • राज्य पुनर्गठन अधिनियम और सातवां संशोधन: 1 नवंबर 1956 से लागू; 14 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेश; भाग A, B, C और D खत्म; पाँच क्षेत्रीय परिषदें।

जिन गलतफहमियों से अंक कटते हैं, वे पहले से पता हैं। पहली, धर आयोग को कांग्रेस की संस्था समझ लेना। उसे संविधान सभा के अध्यक्ष ने नियुक्त किया था, जबकि जेवीपी समिति कांग्रेस की अपनी समिति थी। दूसरी, यह सोचना कि फजल अली आयोग ने हर भाषा के लिए एक राज्य का प्रस्ताव रखा था। उसने तो इस विचार को साफ तौर पर ठुकराया था। तीसरी, यह मान लेना कि 1956 का अधिनियम रिपोर्ट के हिसाब से ही चला। तेलंगाना और विदर्भ, ये दो मामले साबित करते हैं कि ऐसा नहीं हुआ।

संस्था या कानूनकिसने बनायावर्षमुख्य फैसला
धर आयोगसंविधान सभा के अध्यक्ष1948भाषा मुख्य कसौटी नहीं; अभी कोई नया प्रांत नहीं
जेवीपी समितिभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस1949टालो, लेकिन मद्रास छोड़ने पर आंध्र पहले
फजल अली आयोगभारत सरकार (MHA का प्रस्ताव)1955संतुलित रास्ता; 16 राज्य, 3 क्षेत्र
राज्य पुनर्गठन अधिनियमसंसद195614 राज्य, 6 केंद्र शासित प्रदेश

असली हुनर है एक क्रम को दिमाग में बिठाना: एक सिद्धांत का वादा, उसी सिद्धांत पर शक, एक शर्त, एक संकट जिसने वह शर्त पूरी कर दी, और एक कानून जिसने बीच का रास्ता निकाला। जब आप यह कहानी पाँच वाक्यों में सुना सकेंगे, तब भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन जैसे विषय के ज्यादातर सवाल बस इतने रह जाएँगे कि कहानी के किस हिस्से पर जोर देना है।

सामान्य प्रश्न

धर आयोग क्या था?

धर आयोग, जिसका औपचारिक नाम भाषाई प्रांत आयोग था, 17 जून 1948 को संविधान सभा के अध्यक्ष ने नियुक्त किया था। इसे आंध्र, कर्नाटक, केरल और महाराष्ट्र प्रांत बनाने के सवाल पर रिपोर्ट देनी थी। इसके अध्यक्ष इलाहाबाद हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज एस. के. धर थे। पन्ना लाल और जगत नारायण लाल इसके सदस्य थे। इसने 10 दिसंबर 1948 को अपनी रिपोर्ट दी।

धर आयोग ने क्या सिफारिश की थी?

इसने सिफारिश की कि प्रांत पूरी तरह या मुख्य रूप से भाषाई आधार पर न बनाए जाएँ, और फिलहाल कोई नया प्रांत न बने। आयोग ने माना कि भाषा कई कारणों में से एक हो सकती है, लेकिन सबसे ऊपर उसने प्रशासनिक सुविधा, वित्त और भौगोलिक निरंतरता को रखा। उसने यह सलाह भी दी कि दो भाषाओं वाले सीमावर्ती जिलों के मामले अलग से देखे जाएँ, और बंबई और मद्रास शहरों के भी।

जेवीपी समिति के सदस्य कौन थे?

जेवीपी समिति का नाम उसके तीन सदस्यों के नाम से बना: जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया, जो उस समय कांग्रेस अध्यक्ष थे। कांग्रेस ने धर रिपोर्ट की समीक्षा के लिए इसे दिसंबर 1948 के अपने जयपुर अधिवेशन में बनाया था। इसकी रिपोर्ट की तारीख 1 अप्रैल 1949 है।

क्या फजल अली आयोग और राज्य पुनर्गठन आयोग एक ही हैं?

हाँ। 1953 से 1955 तक काम करने वाले राज्य पुनर्गठन आयोग को उसके अध्यक्ष फजल अली के नाम पर अक्सर फजल अली आयोग कहा जाता है। इसके दूसरे सदस्य एच. एन. कुंजरू और के. एम. पणिक्कर थे। इसे 1948 के धर आयोग से नहीं मिलाना चाहिए, जो एक अलग और उससे पहले की संस्था थी।

भाषाई आधार पर बनने वाला पहला राज्य कौन-सा था?

आंध्र राज्य, जो आंध्र राज्य अधिनियम, 1953 के तहत 1 अक्टूबर 1953 को बना, खुले तौर पर भाषा के आधार पर बनाया गया पहला राज्य था। यह दिसंबर 1952 में पोट्टि श्रीरामुलु के अनशन और मौत के बाद बना। बाद में 1 नवंबर 1956 को इसमें हैदराबाद राज्य के तेलुगु भाषी जिले जोड़कर इसे आंध्र प्रदेश बना दिया गया।

1956 के पुनर्गठन से कितने राज्य और केंद्र शासित प्रदेश बने?

राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 और सातवें संशोधन से 1 नवंबर 1956 से 14 राज्य और 6 केंद्र शासित प्रदेश बने। फजल अली आयोग ने 16 राज्य और 3 क्षेत्र सुझाए थे। यह अंतर मुख्य रूप से तीन फैसलों से आया: तेलंगाना को आंध्र में मिलाना, विदर्भ को बंबई में मिलाना, और हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा को केंद्र शासित प्रदेश बनाए रखना।

राज्य पुनर्गठन आयोग में असहमति नोट किसने लिखा?

के. एम. पणिक्कर ने उत्तर प्रदेश को अखंड रखने की सिफारिश से असहमति जताते हुए एक अलग नोट लिखा। उनका तर्क था कि 63 मिलियन से ज्यादा आबादी और लोकसभा की 499 में से 86 सीटों वाला राज्य संघ का संतुलन बिगाड़ देगा। उन्होंने उसके पश्चिमी डिवीजनों से एक नया ‘आगरा राज्य’ बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसे सरकार ने नहीं माना।

क्या फजल अली आयोग ने एक भाषा एक राज्य का समर्थन किया था?

नहीं। आयोग ने ‘एक भाषा एक राज्य’ के सिद्धांत और ‘होमलैंड’ के विचार, दोनों को साफ तौर पर ठुकरा दिया। उसने भाषाई एकरूपता को प्रशासन की एक अहम मदद माना, बाध्यकारी नियम नहीं। फिर उसे राष्ट्रीय एकता, वित्त और प्रशासनिक जरूरतों के साथ तौलकर देखा।

अभ्यास प्रश्न

प्रीलिम्स MCQ

1. 1948 के भाषाई प्रांत आयोग के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इसे संविधान सभा के अध्यक्ष ने नियुक्त किया था। 2. इसने आंध्र और महाराष्ट्र प्रांत तुरंत बनाने की सिफारिश की थी। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 2
  • (c) 1 और 2 दोनों
  • (d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (a) धर आयोग को संविधान सभा के अध्यक्ष ने नियुक्त किया था, और उसने सलाह दी थी कि फिलहाल कोई नया प्रांत न बनाया जाए।

2. 1949 की जेवीपी समिति में निम्नलिखित में से कौन शामिल थे?

  • (a) जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया
  • (b) जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल और राजेंद्र प्रसाद
  • (c) फजल अली, एच. एन. कुंजरू और के. एम. पणिक्कर
  • (d) एस. के. धर, पन्ना लाल और जगत नारायण लाल

उत्तर: (a) जेवीपी का मतलब है जवाहरलाल, वल्लभभाई और पट्टाभि के नाम के पहले अक्षर। विकल्प (c) राज्य पुनर्गठन आयोग है और विकल्प (d) धर आयोग।

3. राज्य पुनर्गठन आयोग (1953-1955) के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इसने 16 राज्य और केंद्र द्वारा प्रशासित 3 क्षेत्र प्रस्तावित किए। 2. इसने अलग विदर्भ राज्य की सिफारिश की। 3. इसकी रिपोर्ट हर राज्य के मामले में सर्वसम्मत थी। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-से सही हैं?

  • (a) केवल 1 और 2
  • (b) केवल 2 और 3
  • (c) केवल 1 और 3
  • (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a) के. एम. पणिक्कर ने उत्तर प्रदेश पर असहमति जताते हुए अलग नोट लिखा था, इसलिए कथन 3 गलत है।

4. 1 नवंबर 1956 की स्थिति में पहली अनुसूची के तहत निम्नलिखित में से कौन-सा केंद्र शासित प्रदेश था?

  • (a) गोवा
  • (b) त्रिपुरा
  • (c) चंडीगढ़
  • (d) पांडिचेरी

उत्तर: (b) 1956 के छह केंद्र शासित प्रदेश थे: दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, और लकादीव, मिनिकॉय और अमीनदीवी द्वीप समूह।

5. संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इसने राज्यों को भाग A, भाग B, भाग C और भाग D में बाँटने की व्यवस्था खत्म की। 2. यह उसी दिन लागू हुआ, जिस दिन राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 लागू हुआ। ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  • (a) केवल 1
  • (b) केवल 2
  • (c) 1 और 2 दोनों
  • (d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c) दोनों 1 नवंबर 1956 को लागू हुए, और संशोधन ने तीनों श्रेणियों की जगह राज्य और केंद्र शासित प्रदेश रखे।

मुख्य परीक्षा प्रश्न

  1. भारतीय राज्यों का भाषाई पुनर्गठन नीचे से उठे जन-दबाव से प्रेरित था। टिप्पणी कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2026, GS पेपर I।
  2. उन्नीसवीं सदी के मध्य से राज्यों और क्षेत्रों का राजनीतिक और प्रशासनिक पुनर्गठन एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया रहा है। उदाहरणों सहित चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द) पिछले वर्ष का प्रश्न: मुख्य परीक्षा 2022, GS पेपर I।
  3. धर आयोग और जेवीपी समिति, दोनों ने भाषाई प्रांतों पर सावधानी बरतने की सलाह दी, लेकिन अलग-अलग कारणों से। दोनों के दृष्टिकोणों की तुलना कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)
  4. राज्य पुनर्गठन आयोग ने ‘होमलैंड’ की अवधारणा और ‘एक भाषा एक राज्य’ के सिद्धांत, दोनों को नकार दिया। इन सिद्धांतों को समझाइए, और मूल्यांकन कीजिए कि क्या 1956 के अधिनियम ने इनका सम्मान किया। (15 अंक, 250 शब्द)
  5. किसी संघ की इकाइयों के बीच संतुलन के संदर्भ में उत्तर प्रदेश के आकार पर के. एम. पणिक्कर के तर्क का परीक्षण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

Share this

PDF

Vaibhav Mishra Sir

Written by

Vaibhav Mishra Sir

Faculty — Polity & Governance · Anantam IAS

Vaibhav Mishra teaches Polity and Governance at Anantam IAS. He breaks the Indian Constitution down article-by-article, connects polity static matter to contemporary governance debates, and trains students to write Mains answers that cite the right articles, schedules and case law.

Specialises in · Indian polity, constitution and governance Experience · 10+ years Visit website ↗

UPSC की तैयारी हिंदी माध्यम में — एक निशुल्क डेमो क्लास

न कोई सेल्स कॉल, न कोई ब्रोशर। सोमवार सुबह की असली GS क्लास देखिए — हमारे अनुभवी शिक्षकों के साथ।